Thursday, March 27, 2008

कविता कैसे बन जाती है ?


यूँ तो मैं पोस्ट लिखने में थोड़ा समय लेती हूँ.....पर कल के बाद आज फिर तुरंत अपनी पोस्ट दे रही हूँ, क्योंकि मुझसे पूँछा गया कि तुम जब लिख लेती हो तो लिखती क्यों नही....? प्रश्न थोड़ा जटिल था.... बात यूँ है कि मुझे लगता है कि मेरी सारी कविताएं एक ही मूड की होती हैं...और दस तरह से एक ही बात कह कर मैं अपने पाठकों को बोर नही करना चाहती हूँ... तथापि कम से कम कल तो अपनी ही कविता पोस्ट करूँगी ऐसा वादा किया मैने।


ये कविता अभी परसों ही लिखी है जब रात बड़ी देर तक नींद नही आ रही थी और लग रहा था कि कुछ जन्म लेना चाह रहा है...कवि ही जानते होंगे ये मानसिक स्थिति जब आप कहीं भी हों ..कुछ भी कर रहे हों और अंदर से बस कोई मजबूर करता है कि कलम उठाओ.... ! ऐसी ही मानसिकता में उस दिन दो कविता लिखी गई,...दूसरी की ज़रूरत इस लिये पड़ी क्योंकि एक ने संतुष्ट नही किया... वो दूसरी ही कविता आप के साथ बाँट रही हूँ।





तुम पूँछ रहे थे न मुझसे कविता कैसे बन जाती है,
ये दूर देश की वासिनि है हर रोज़ नही आ पाती है।


दुनिया को समझ ना पाने पर,
जब जब खुद को समझाती हूँ।
और खुद को समझ ना पाने पर,
खुद प्रश्न चिह्न बन जाती हूँ।
जब मन आहत हो जाता है,
बुद्धि पत्थर हो जाती है,
मेरी लेखनि की आँखों से तब तब कविता बह जाती है।
ये दूर देश की वासिनि है हर रोज़ नही आ पाती है।


जब कोई सब कुछ ले कर के,
मन को धोखा दे जाता है,
और ये मन धोखा खाने की,
ज़िद पर फिर से अड़ जाता है।
जब लाख मनाओ इस मन को,
मन पर इक न चल पाती है
मेरी लेखनि की शाखों से तब तब कविता झर जाती है।
ये दूर देश की वासिनि है हर रोज़ नही आ पाती है।


जब दिल के सागर से उठकर के,
घन मस्तिष्क पे छाते हैं।
जब बहुत उमस बढ़ जाती है,
हम तड़प तड़प रह जाते हैं।
जब मन की धरती, चटक चटक,
बस प्यास प्यास चिल्लाती है।
मेरी लेखनि बादल बन के तब तब कविता बरसाती है।
ये दूर देश की वासिनि है हर रोज़ नही आ पाती है।

Wednesday, March 26, 2008

मान जाओ प्रिय ना जाओ और दो घड़ी अभी।

आजकल कल कानपुर में हूँ .... अपने बचपन के घर में ..... कल किताबों की अलमारी उलटते पलटते एख किताब दिखी फटी सी..क्या पता कौन लाया होगा इसे लेकिन इसके पन्नों की कविताओं पर कहीं मेरे और कहीं भईया के हस्ताक्षर हैं जो हमारी पसंद होने का द्योतक हैं.... आपसे बाँट रही देवी प्रसाद "राही" की लिखी वो कविता जिस पर हम दोनो भाई बहन के हस्ताक्षर हैं...!




मान जाओ प्रिय ना जाओ और दो घड़ी अभी।

चाँद कह रहा गगन से, मैं अभी न जाऊँगा
थोड़ी देर और चाँदनी के गीत गाऊँगा,
रात है उसी की जो लुटाये मुफ्त रोशनी,
सो गया तो फिर ना जिंदगी का मीत पाऊँगा,
काट दो अधूरी रात और बात बात में
धीरे धीरे दुख बँटाओ और दो घड़ी अभी।


मेरी प्यास बचपने से कैद काटती रही
रोज़ रोज़ आँसुओं के कर्ज़ पाटती रही
गाँव गाँव जोगिनी सी ले सितार गीत का
मेरी पीर द्वार द्वार प्यार बाँटती रही
आ गई है आँसुओं को नींद थोड़ी देर से
धीरे धीरे मुस्कुराओ और दो घड़ी अभी।


मोड़ दो हृदय की ओर जिंदगी की धार को
रीति नीति से न बाँधो आदमी के प्यार को
बंधनों में बँध सकी कहाँ प्रणय की भावना
कौन है जो चाहता नही दुलार प्यार को
मोम सा विरह पिघल रहा, मिलन के ताप से
धीरे धीरे लौ बढ़ाओ, और दो घड़ी अभी।

Sunday, March 23, 2008

नीरज की प्रतिनिधि कविताओं में एक-मुझे न करना याद तुम्हारा आँगन गीला हो जाएगा।

नीरज के फिल्मी गीत तथा उनके नॉन फिल्मी गीतों को समानांतर रूप से साथ ले कर चलें तो अधिक मज़ा आयेगा शायद.... अतः उनके गीतों की श्रृंखला में प्रस्तुत है उनका एक बहुचर्चित गीत



मुझे न करना याद तुम्हारा आँगन गीला हो जाएगा,

रोज रात को नींद चुरा ले जाएगी पपिहों की टोली,
रोज प्रात को पीर जगाने आएगी कोयल की बोली।
रोज दुपहरी में तुम से कुछ कथा कहेंगी सूनी गलियाँ,
रोज साँझ को आँख भिगो जायेगी वे मुरझाई कलियाँ।
यह सब होगा पर न दुखी होना तुम मेरी मुक्त केशिनी

तुम सिसकोगी वहाँ, यहाँ यह पग बोझीला हो जाएगा
मुझे न करना याद तुम्हारा आँगन गीला हो जाएगा।

कभी लगेगा तुम्हें कि जैसे दूर कहीं गाता हो कोई,
कभी तुम्हें मालूम पड़ेगा आँचल छू जाता हो कोई,
कभी सुनोगो तुम कि कहीं से किसी दिशा ने तुम्हे पुकारा,
कभी दिखेगा तुम्हे कि जैसे बात कर रहा हो हर तारा।
पर ना तड़पना पर ना बिलखना, पर ना आँख भर लाना तुम,

तुम्हे तड़फता देख विरह शुक और हठीला हो जाएगा
मुझे न करना याद तुम्हारा आँगन गीला हो जाएगा।

याद सुखद बस जगा में उसकी, हो कर भी जो दूर पास हो,
किंतु व्यर्थ उसकी सुधि करना जिसके मिलने की न आस हो।
मैं अब इतनी दूर कि जितनी, सागर से मरुथल की दूरी,
और अभी क्या ठीक कहाँ ले जाएं जीवन की मजबूरी
गीत हंस के साथ इसलिये मुझको मत भेजना संदेशा,

मुझको मिटता देख, तुम्हारा स्वर दर्दीला हो जाएगा
मुझे न करना याद तुम्हारा आँगन गीला हो जाएगा।

मैने कब यह चाहा मुझको याद करो, जग को तुम भूलो,
मेरी यही रही ख्वाहिश, बस मै जिस जगह झरूँ तुम फूलो,
शूल मुझे दो, जिससे वह चुभ सके न किसी अन्य के पग में
और फूल जाऔ, ले जाऔ, बिखराओ जन जन के मग में,
यही प्रेम की रीत कि सब कुछ देता किंतु न कुछ लेता है,

यदि तुम ने कुछ दिया, प्रेम का बंधन ढीला हो जाएगा
मुझे न करना याद तुम्हारा आँगन गीला हो जाएगा।

Tuesday, March 18, 2008

नीरज के गीतों का कमाल फिल्म "शर्मीली" में

नीरज के गीतों की तलाश इंटरनेट पर करते समय पाया कि १९७१ में प्रदर्शित हुई फिल्म शर्मीली के गीत भी नीरज द्वारा ही लिखे गये हैं... यूँ तो इस फिल्म के हर गीत के बोल अलग अलग मानसिक स्थिति के हिसाब से क़माल करते हैं ...और साथ में जब संगीत दिया हो एस० डी० वर्मन ने तो वही समस्या जो हमेशा आती है कि चुनें तो किसे..?



प्यार का नशा जब अपने आस पास हर तरफ नज़र आता है, ऐसी स्थिति में नीरज का नायिका से कहलाना कि


आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन,
बिना ही बात मुस्कुराए रे मेरा मन।



और फिर उसी नायिका का विरहावस्था में कहना


मेघा छाये आधी रात बैरन बन गई निंदिया
नायक की छेड़छाड़ और नायिका को संबोधित ही शर्मीली से करते हुए गाना


ओ मेरी शर्मीली


और फिर प्यार मे धोखा खाने के बाद कहना


कैसे कहे कि प्यार ने हमको क्या क्या खेल दिखाए
यूँ शरमाई किस्मत हमसे, खुद से हम शरमाए



और दार्शनिकता से भरा गीत


खिलते हैं गुल यहाँ खिल के बिखरने को
मिलते हैं दिल यहाँ, मिल के बिछड़ने को



सभी उम्दा...लेकिन जब सुनवाना हो अपनी एक पसंद तो खिलते हैं गुल यहाँ खिल के बिखरने को और मेघा छाये आधी रात बैरन बन गई निंदिया में टाइ हो जाता है और राग भीमपालासी पर आधारित गीत मेघा छाये आधी
रात की तरफ मेरा व्यक्तिगत झुकाव थोड़ा अधिक हो जाता है तो सुनिये यही गीत।

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मेघा छाये आधी रात, बैरन बन गई निंदिया
बता दे मैं क्या करूँ,


सब के आँगन दिया जले रे
मोरे आँगन जिया,(२)
हवा लागे शूल जैसी,
ताना मारे चुनरिया
आई है आँसू की बारात
बैरन बन गई निंदिया
बता दे मैं क्या करूँ,

रूठ गए मेरे सपने सारे
टूट गई रे आशा,(२)
नैन बहें गंगा मेरे,
फिर भी मन है प्यासा,
कासे कहूँ मैं मन की बात
बैरन बन गई निंदिया
बता दे मैं क्या करूँ,

मेघा छाये आधी रात, बैरन बन गई निंदिया


नीरज से संबंधित पिछली पोस्ट यहाँ देखें
http://kanchanc.blogspot.com/2008/03/blog-post_14.html
http://kanchanc.blogspot.com/2008/03/blog-post_12.html
http://kanchanc.blogspot.com/2008/02/blog-post.html

नोटः पिछली पोस्ट में मनीष जी ने ध्यान दिलाया था फिल्म और गीतकार का भी जिक्र करने के विषय में...पिछली पोस्ट को तो नही संपादित किया ..इस बार ध्यान दिया है

Friday, March 14, 2008

सुबह न आई, शाम न आई...नीरज का एक गीत

जब "नीरज जी" के बारे में लिना शुरू किया तो ऐसा कोई इरादा नही था कि किसी प्रकार की सिरीज़ दूँगी, क्योंकि नीरज जैसे रचनाकारों की रचनाओं मे best चुनने से अधिक दुष्कर कार्य मेरे जैसे लोगों के लिये कम ही होते होंगे...! तो अभी भी यही है के बीच बीच में खुद को खुश करने के लिये उनकी पसंद देती रहूँगी...! लेकिन पढ़ने वालों का उत्साह देख कर मन उत्साहित हुआ कुछ और देने को

बहुत दिन से सोच रही थी नीरज जी का कोई गीत पोस्ट करने को.. सिद्धेश्वर जी ने उस चिंगारी को हवा दे दी...तो फिलहाल तो सुनिये वो गीत जो मुझे बहुत पसंद है..खण्डहर ताजमहल हो जाता, गंगाजल आँखों का पानी.. सुनने के बाद प्रेम की पवित्रता की पराकाष्ठा महसूस करती थी, सोचती थी कि इसे शब्दों में उतारने वाला कौन होगा...और बहुत दिनो बाद पता चला कि वो नीरज थे..! ऐसा कई बार हो जाता है, कल जब इस गाने को तलाश कर रही थी तब भी ऐसे कई गीत मिले जिनके विषय में मुझे ये तो नही पता था कि ये गीत नीरज का है लेकिन पसंद मुझे वो गीत बहुत थे...! तो ऐसे ही गीतों के साथ आती रहूँगी ..मगर आज तो सुनिये ये गीत...!


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सुबह न आई, शाम ना आई,(2)
जिस दिन तेरी याद न आई ,याद न आई,

सुबह न आई, शाम ना आई

कैसी लगन लगी ये तुझसे, कैसी लगन लगी ये,
हँसी खो गई, खुशी खो गई,
आँसू तक सब रहन हो गए,
अर्थी तक नीलाम हो गई(2)
दुनिया ने दुश्मनी निभाई,याद न आई
सुबह न आई, शाम ना आई

तुम मिल जाते तो हो जाती, पूरी अपनी राम कहानी,
खण्डहर ताज़महल हो जाता, गंगाजल आँखों का पानी,
साँसों ने हथकड़ी लगाई,याद न आई
सुबह न आई, शाम ना आई

जैसे भी हो तुम आ जाओ, (2)
आग लगी है तन में और मन में
एक तार की दूरी है (2)
बस दामन और कफन में
हुई मौत के संग सगाई,याद न आई

आ जाओ. आ जाओ, आ जाओ

Wednesday, March 12, 2008

इसीलिये तो.......!गीतकार नीरज की एक और रचना


लीजिये पढ़िये मेरे प्रिय गीतकार नीरज की एक और रचना जो मुझे बेहद प्रिय है......

इसीलिये तो नगर नगर बदनाम हो गये मेरे आँसू,
मै उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नही था।

जिनका दुख लिखने की खातिर,
मिली न इतिहासों को स्याही,
कानूनो को नाखुश कर के,
मैने उनकी भरी गवाही।

जले उमर भर फिर भी जिनकी
अर्थी उठी अंधेरे मे ही
खुशियों की नौकरी छोड़कर,
मै उनका बन गया सिपाही,

पदलोभी आलोचक कैसे, करता दर्द पुरस्कृत मेरा,
मैने जो कुछ गाया उसमें करुणा थी श्रृंगार नही था।

मैने चाहा नही कि कोई,
आकर मेरा दर्द बँटाये,
बस यह ख्वाहिश रही कि
मेरी उम्र जमाने को लग जाये,

चमचम चूनर चोली पर तो
लाखों ही थे लिखने वाले
मेरी मगर ढिठाई मैने
फटी कमीजों के गुन गाये,

इसका ही यह फल है शायद कल जब मैं निकला दुनिया मे
तिल बर ठौर मुझे देने को मरघट तक तैयार नही था।

कोशिश भी की किंतु हो सका,
मुझसे यह न कभी जीवन में,
इसका साथी बनूँ जेठ में,
उससे प्यार करूँ सावन में,

जिसको भी अपनाया उसकी
याद संजोई मन में ऐसे
कोई साँझ सुहागिन दीवा
बोले ज्यों तुलसी पूजन में

फिर भी मेरे स्वप्न मर गये अविवाहित केवल इस कारण,
मेरे पास सिर्फ कुंकम था कंगन पानीदार नही था।

दोषी है तो बस इतनी ही
दोषी है मेरी तरुणाई,
अपनी उमर घटा कर मैने
हर आँसू की उमर बढ़ाई

और गुनाह किया है कुछ तो
इतना सिर्फ गुनाह किया है
लोग चले जब राजभवन को
मुझे याद कुटिया की आई

आज भले कुछ भी कहलो तुम, पर कल विश्व कहेगा सारा
नीरज से पहले गीतों में कुछ भी था पर प्यार नही था।


नोटः नीरज से संबंधित मेरी पिछली पोस्ट आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

Monday, March 10, 2008

इसे चाहिये आपका आशीर्वाद...!


अभी जैसे कल ही की तो बात है जब इधर मेरा बी०ए० का परिणाम आया था और उधर मेरी ये भतीजी जो फोटो में है, आने की तैयारी में थी .....! अभी तो हम इसे ही कविता समझ रहे थे..अचानक इसमें कहाँ से कविता करने के भावों का अंकुरण हो गया....? बात करना इसने बहुत जल्दी सीखा था। भावुक वो शुरू से ही है..! मुझे उस जैसा कोई लगता भी नही था ..इसलिये मैने उसे नाम दिया अनन्या ... घर मे उसे सब हिमांशी बुलाते है... अभी जुलाई में हमने उसका १० वाँ जन्मदिन मनाया है...!



पिछले कुछ महीनो से माँ सरस्वती के आशीर्वाद से वो कविता करने लगी है....! उसकी ये प्रतिभा सकारात्मक रूप से पुष्पित पल्लवित हो इस हेतु जरूरत है आप सबके आशीर्वाद की.... !


पढ़िये उसकी आड़ी बेड़ी भावनाएं... उसी के तरीके से बिना किसी प्रकार के संपादन किये हुए...! और दीजिये उन्हें नियमित, संयमित और विचारशील होने का आशीर्वाद

1

बचपन में जिस माँ ने तुझे चलना सिखया था,
आज उसी माँ को चलाने का वक्त आया था....!
बचपन में जो सिखाती थी तुझको चलना
आज तुम्ही ने शुरू किया उसे छलना...!
अगर दूध का कर्ज़ न चुकाया होता,
तो कम से कम बेटे का फर्ज़ तो निभाया होता।
माँ का अर्थ तुम क्या जानो वो तो माँ ही जानती है,
माँ ही एक माँ, बेटी और दोस्त का फर्ज़ पहचानती है।
छुपन छुपाई में भी तू अगर छिप जाता था,
तो भी माँ का बुरा हाल हो जाता था,
दरवाजे पर बैठ कर जो करती तेरा इंतजार,
उसी दरवाजे से निकाला तूने उसको और सोचा भी ना एक बार।
बचपन में तुम्हारे लिये जिसने इतना दुःख झेला,
उसी माँ को समझता है, अब तू एक झमेला।
बचपन में जब तू करता था सवाल,
माँ भी उत्तर देती थी बार बार
आज जब माँ ने किया तुमसे एक सवाल ,
तूने कहा उससे मत करो परेशान बार बार
मगर आज भी कहीं वो माँ तेरे लिये दुआ करती है,
तेरे खुश रहने की कामना बार बार करती है।

2.
ढल गया सूरज, ढल गई शाम,
ढल गया एक अनोखा नाम।
नया साल जो देख ना पाई,
बेनज़ीर था उसका नाम।
तात भ्रात की हत्या देख, जो न हुई की निराश
ऐसी महिला के मरने की न थी अभी किसी को आस।
इतनी खुशी के माहौल में लगी थी जिसको इतनी गोली,
जिसने भी मारा था उसको खेली उसने खून की होली।
रोते थे बच्चे और पति रोते थे उसके,
मरने पर दहला था पूरा देश जिसके।
काँपी धरती हृदय हिल गए,
सब लोगों के दिल दहल गए।
नीला सूट सफेद चुन्नी, गले में ओढ़े दुशाला,
गुलाब और चमेली की पहनी थी जिसने माला।
सोचा था जिसने कि देखेगी वो नया साल,
क्या पता था उसे कि पास आ रहा है उसका काल।
आज हमारे बीच नही है वो बहादुर बाला,
जिसने हमेशा पहनाई पाक को सम्मान की माला....!