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Thursday, October 22, 2009

तुम्हारी खुशबू अभी भी यही पे बिखरी है,तुम्हारी मुस्कुराहटें हैं आस पास वही....




कुछ दिन हुए .....पता नही किस के ब्लॉग पर पढ़ा था "अग़र किसी जगह से आपकी मीठी यादे जुड़ी हों तो वहाँ दोबारा कभी नही जाना चाहिये... " बात सच थी क्योंकि यादे वहीं रह जाती हैं, और वक़्त आगे निकल जाता है। हम सब कुछ यादों के अनुसार ढूँढ़ते हैं... छोटी छोटी बातों को भी बिलकुल वैसे ही दोहराना चाहते हैं और ये अपने वश में होता नही....! वक़्त सब कुछ ले के आगे बढ़ गया होता है। मगर ऐसे में जब उस जगह मजबूरन पहुँचना ही पड़ जाये, तो जो होता है वो दिखता नही, जो दिखता है वो होता नही.....! दिखता है वो सब जो कभी हो चुका है....! ऐसे हालातों में लिख गई ये नज़्म.....!!!! ऐसी ही किसी सीढ़ी पर.....! जैसी ऊपर चित्र में है (साभारः गूगल)


बदल गये हैं सभी सड़के इमारत लेकिन,
शहर में आ के मेरे दिल का धड़कना है वही,
तुम्हारी खुशबू अभी भी यही पे बिखरी है
तुम्हारी मुस्कुराहटें हैं आस पास वही....

ज़रा सी दूरी बना कर यहीं पे बैठै हो,
कि बार बार हाथ, बढ़ के थम से जाते हैं,
कहीं से कोई कोई आ के झाँक जाता है,
औ आते आते सभी लब्ज़ ठहर जाते हैं।

तुम इर्द गिर्द हो के दूर बहुत लगते हो,
मै खुद को पाती हूँ मज़बूर बहुत फिर से यहाँ,
जहाँ भी देखूँ वहाँ तुम ही नज़र आते हो,
मगर मिलने के लिये तुम से जगह ढूढ़ूँ कहाँ ?


ये कैसे सारी की सारी अवाज़ें जिंदा हुईं,
ये कैसे सारे पुराने दरख्त फिर हैं हरे,
ये कैसे उठ के खड़े हैं वो पुराने मंज़र,
ये कैसे आँख में पुरनम से ख़ाब फिर हैं भरे।

नज़र मिला के बिना बोले कोई कहता है,
नज़र के सामने मेरे नज़र भरी फिर क्यों?
मैं साथ साथ हूँ तेरे, मैं इर्द गिर्द ही हूँ
औ मेरे रहते ये तनहाई की बातें फिर क्यों ?

तुम्हारी आँख के झोके जो छू के जाते हैं,
अब्र आँखों के हवा पा के बरस जाते हैं,
तुम हो बेचैन बहुत ज्यादा मगर बेबस हो,
तुम्हारे हाथ जो मुझ तक न पहुँच पाते हैं।

हँसी बेफिक्र वही और हमारी फिक्र वही,
तेरी शरीर निगाहों में मेरा ज़िक्र वही,
दिखाई देती न हो उसकी इबारत लेकिन,
है सारी बात फिज़ा में वही, हवा में वही...

तुम्हारी खुशबू अभी भी यही पे बिखरी है
तुम्हारी मुस्कुराहटें हैं आस पास वही....

Wednesday, February 27, 2008

फर्क़ इतना ही है शायद कहीं हममें, तुम में...!



फर्क़......!

फर्क़ इतना ही है शायद कहीं हममें, तुम में...!

फर्क़ इतना ही है शायद कहीं हममें, तुम में...!

कि तुम्हारी जिंदगी में तब तलक है मेरा वज़ूद,

जब तलक और कोई आ न जाए जिंदगी में

और जब तक रहेगा दिल में मेरे तेरा वज़ूद,

तब तलक कोई नही आ सकता दिल में मेरे...!!


तो जिंदगी का क्या है...? रोज कई मिलते है,

मै आज हूँ तुम्हें कल ही कोई मिल जाएगा।

कहा है तुमने, तुम्हें चीज नई भाती है,

तुम्हारी जिंदगी में ज़ूक* नया आएगा
(ज़ूक* taste)


और मै...?

और मै क्या हूँ, ये तो तुम भी जानते ही हो,

तुम्ही तो कहते हो माज़ी से निकल पाती नही,

मुझे जो भाता है एक बार भा ही जाता है,

मैं रोज़ रोज़ अपना जू़क बदल पाती नही।


और खिड़की जो है दिल की मेरे मेरे हमदम..!

वो बड़ी देर देर बाद खुला करती है,

इसमें आता है बड़ी देर में आने वाला,

और जाने क्यों उसे जाने नही देती है।


तो.. फर्क़ इतना ही है शायद कहीं हममे, तुम में,

कि तुम्हारी जिंदगी में मैं फक़त लम्हों को हूँ,

और जन्मों के लिये तुम मेरे वज़ूद में हो,

मेरी हर साँस तुम्हारी फक़त तुम्हारी है,

तुम मेरी ज़ीस्त मे, दिल में हो, मेरे ज़ूक में हो..!


तेरी जुबान पे मैं हूँ, मेरे लबों पे तुम,

तुम्हारे सीने पे मैं हूँ, मेरी धड़कन में तुम,

तुम्हारे इर्द गिर्द मैं हूँ और तुम मुझमें....!

फर्क़ इतना ही है शायद कहीं हममें, तुम में...!