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Tuesday, May 19, 2015

यह मलिन स्वच्छ्ता

दौड़ती,भागती,
हाथ से छूटती उम्र के व्यस्ततम पलों में,
अचानक आता है तुम्हारा ज़िक्र...!
और मैं हो जाती हूँ 20 साल की युवती।
मन में उठती है इच्छा,
 "काश ! तुम फिर से आ जाते ज़िन्दगी में,
 अपनी सारी दीवानगी के साथ "

और इस तपते कमरे के चारों ओर
 लग जाती है यकबयक खस की टाट।
और उससे हो कर आने लगते हैं,
 सुगन्धित ठंढे छीटे।

तमाम सफेद षडयन्त्रों के बीच,
तुम्हारी याद का काला साया...

आह !
कितनी स्वच्छ है ये मलिनता।

Saturday, March 7, 2015

मेरी पसंद डिफरेंट नहीं है

मेरी पसंद डिफरेंट नहीं.

मुझे पसंद हैं रंग, राग, ताल, शब्द.
मुझे पसंद हैं गीत, बोल, लय, छंद.
मुझे पसंद हैं गुनगुनाना, खिलखिलाना,
सावन की झमाझम बारिश में पोर पोर भीग जाना,

मगर यह सब तो सबको पसंद है,
मेरी पसंद डिफरेंट नहीं

मुझे पसंद हैं हरियाली, फूल, पहाड़, समन्दर,
मुझे पसंद हैं धूप, ओस, हवा, चिकने गोल पत्थर,
मुझे पसंद है अपनी कविताओं में बहकना,
और जिंदगी में सम्भलना.
मुझे पसंद है अपनी हदों तक उछाल मार मार कर जाना,
और फिर भी हदों के भीतर रह जाना.
मुझे पसंद है समन्दर भर रोना,
और हवा भर खुश होना.
मुझे पसंद है खुद का औरत होना,

मगर यह तो शायद सबको पसंद है,
मेरी पसंद डिफरेंट नहीं है.

मुझे पसंद है ईश्वर,
मुझे पसंद है प्रेम,
मुझे पसंद है समझना ईश्वर और प्रेम की गूढ़ता,
इन दोनों के अस्तित्वहीन होने के तथ्य,
और इन दोनों से ही हर चीज़ के अस्तित्व में होने का सत्य.
मुझे पसंद है सुबह की आरती,
शाम की अगरबत्ती,
कृष्ण का रास,
शिव का लास,
मुझे पसंद है बाज़ार का चाकचिक्य,
होली का हुडदंग,
दीपावली की जगमग,
एक सामान्य से उथले व्यक्ति की सारी पसंद मुझे पसंद है,
मेरी पसंद डिफरेंट नहीं,

मुझे पसंद हो तुम....
तुम तो सबको पसंद हो.

मेरी पसंद डिफरेंट नहीं...!

Monday, March 7, 2011

बस अगर इतना होता



सोचती हूँ कि वो रातें,

जो इस तसल्ली मिली बेचैनी से बिता दी जाती थीं,

कि इधर हम इस लिये जग रहे हैं क्योंकि

उधर कोई जागती आँखें ले कर जगा रहा है हमें....

कितनी आसानी से कट जातीं,

११ रू के एसएमएस पैक से,

सायलेंट मोड मोबाईल के साथ।



या वो दिन,

जो इस सोच में कटते थे कि

तुम जाने कहाँ होगे आज....?

कितनी तसल्ली से बीत सकते थे,

किसी सोशल साइट पर तुम्हारे स्टेटस अपडेट से तुम्हारा हाल ले कर।



तुम्हें खोजना होता कितना आसान,

जब तुम्हारा नाम लिख कर,

बस सर्च पर अँगुली मार देती,

और तुम अपनी सबसे अच्छी तस्वीर के साथ,

मुस्कुराते हुए पहचान लिये जाते।



तुम्हारी बातों की लज्ज़त,

तु्म्हारे दाँतों की चमक को पाने के लिये,

तुम्हे आँखों में बुला कर चादर के लेट जाने

की ज़रूरत ही क्या थी?

जब तुम वीडिओ चैट में,

सामने छोटी सी स्क्रीन पर,

एक आन्सर पर क्लिक के मोहताज़ होते।


बहुत छोटा सा फासला था,

उस युग से इस युग को तय करने का,

बस अगर इतना होता,

कि जिन साँसो को मैं ढो रही हूँ,

उन साँसों को तुम जी पाते ............!!


 

Monday, September 27, 2010

नया तो तब हो "गर तुम लौट आओ.....!!"


लोग कहते हैं कि
अब मेरे लिखने में नही रही वो बात जो पहले थी।
कैसे बताऊँ उन्हे,
कि लिखना तो दर्द से होता है।
और मेरा दर्द तो बहुत पुराना हो गया है अब,
इतना ....
कि अब ये दर्द हो गया है साँसों की तरह सहज और अनायास।

चाहे जितनी भी असह्य पीड़ा हो,
आप कितनी देर तक चिल्ला सकते हैं उस पीड़ा से ?
कितनी तरह से कराह सकते हैं ?

अपनी पीड़ा व्यक्त करने के सारे के सारे तरीके तो कर चुकी हूँ इस्तेमाल।
कराहने के लिये प्रयुक्त हर शब्द तो चुकी हूँ उचार।
कितनी कितनी बार......!
कितनी कितनी तरह......!

और अब दर्द पहुँच गया है उस मुकाम पर,
जहाँ कुछ कहने से बेहतर चुप रहना लगता है !
या शायद कहूँ तो क्या ?
कुछ है भी तो नही नया......!!

सुनो....!!


अगर सुन रहे हो,


तो तुम्ही से कह रही हूँ
नया तो तब हो "गर तुम लौट आओ.....!!"



तमन्ना फिर मचल जाये अगर तुम मिलने आ जाओ

Tuesday, April 6, 2010

ये प्यार नहीं है।


किसी खूबसूरत परों वाली चिड़िया को
चुगाओ हीरे के दाने,
पिलाओ झरनों का पानी,
उसके लिये बनाओ,
सोने का एक विशाल महल,
जड़ो,
शीशे के दरवाजे खड़कियाँ
सजाओ उसमें,
जन्नत के फूल, कलियाँ, हरियाली।

और उसके उड़ने के लिये आसमान
तुम करो निर्धारित


ये प्यार नहीं है।

Sunday, February 14, 2010

तुमने इश्क का नाम सुना है, हम ने इश्क किया है


बेतहाशा चूमते हुए होंठो पर

अपना हाथ रख के,

उस दिन जब पूंछा था तुमने

कि

"अब क्यों नहीं लिखता मै कविता तुम पर"

कहना चाहता था

कि

"लिख ही तो रहा था अभी

जब तुमने अचानक रख दिया हाथ.......!!"


नोट: किसी ने किसी से कहा ऐसा और मैंने जस का तस लिख दिया कभी कभी यूँ भी हो जाती है कविता