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Friday, June 1, 2012

ना खुशी, ना ग़म....

पिछले ९ सालों में उस बाज़ार के सारे भिखारी अब शक्ल से पहचाने जाने लगे हैं।

वो बूढ़े दादा..जिनके पास गुदड़ियों का एक पूरा भंडार है। जिनकी दाढ़ी भी उलझ उलझ कर गुदड़ी ही बन गई है। वो तीखे नाक नक्श वाली उनकी गाढ़ी साँवली युवा पत्नी..जो उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर उनके धंधे में उनका पूर्ण सहयोग देती है।

" ए बहेऽन.. तुम्हारा भईया जियेगा बहेऽन.." अनसुना कर देने पर वजन डालने को वाक्य बदलती " तुम्हारा भंडार भरा रहेगा बहेऽन।" और अगर भूल से उस उपेक्षा के बीच घर का कोई हम उम्र पुरुष वर्ग, जो अंदर किसी दुकान से कुछ लेना गया हो और बाहर आ कर मुस्कुरा कर वो सामान पसंद कराने लगे तो चट से सबसे वजनी डायलॉग " तुम्हारा जोड़ा बना रहेगा बहेऽन।"

एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा लेने के बाद उसके अकाट्य वाक्य को काटते हुए जब आप कहते हैं " अरे जाइये दीदी ! नही देना है...! उसका जोड़ा अभी बहुत देर है बनने में और हमारा हमें बनाना नही।" ‌और गाड़ी स्टार्ट कर देते हैं, तो उस घर्रर्रर्र के बीच आप सुनते हैं उसकी स्पेशल बिलासपुरिया भाषा में बढ़ियाँ बढ़ियाँ शब्द जिससे आप इतना तो समझ ही लेते हैं कि ये कोई बहुत सुंदर सी गहन गाली है, जो आपके सम्मान में पढ़ी जा रही है।

थोड़े दिन में आप पाते हैं कि उसकी गोद का लाल आपसे " बहुत भूख लगी है" की दुहाई दे रहा है और वो तीखे नैन नक्श वाली अपने पति से तिहाई उम्र वाली नारी पूरे दिनो से है और अपने पेट की तरफ इशारा कर के आप से कहती है " ए बहेऽन... तेरा लाल जियेगा बहेऽन..दो दिन से कुछ भी नही खाया।"

आपका कसैला मुँह कहना चाहेगा, "जब खाने को नही है, तो ये रेल गाड़ी के डिब्बे..." मगर आपको याद ही हैं वो गहन शब्द.. तो आप या तो अपनी बाईक स्टार्ट कर जगह बदल देते हैं या फिर अपने देखने की दिशा....!!

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परसो उसकी शादी की पहली वर्षगाँठ है, मैं दोनो को पैसे देती हूँ, अपने पसंद का कुछ ले आने को। वो जिद करते हैं साथ चलने को। " कपड़े पसंद करने में आसानी रहेगी।"

अंदर शॉप में वो दोनो साड़ी पसंद कर रहे हैं... शीशे के पीछे से वो लोग दूर से ही दिखा रहे हैं साड़ियाँ और फोन पर सड़क से हाँ या ना बोल रही हूँ।

पसंद साड़ियाँ पैक कराने के बीच के गैप में तटस्थ अपनी कायनेटिक पर बैठे बैठे दुनिया देख रही हूँ। शनि महाराज एक लोहे के टुकड़े और 7-8 फूलों वाली माला के साथ कई लोगो का पेट पालने में सहायक बने हुए हैं।

एक बच्चा आता है। "आंटी.." कह कर हाथ फैलाता है।
मैं ना कर के मुँह घुमा लेती हूँ।

दूसरा बच्चा दिखता है। अपने अपने पतले पतले पैरों के साथ घिसटते हुए। मन में जो करुणा उपजती है, उसका नाम शायद "सम वेदना" है। हाथ पर्स की तरफ बढ़ता है और फिर रुक जाता है, कुछ सोच कर..नही ये ठीक नही, इस प्रथा को बढ़ावा देना...

वैसे उसने कुछ माँगा भी नही है। बस बाइक के अगले पहिये से सट कर बैठ गया है। थोड़ी देर में आवाज़ आती है।

 "अंटी"
"हम्म्म ?? "
" ये गाड़ी कित्ते रुपए में मिलती है ?"
" क्यों ? खरीदना है ?"
वो हाँ में सिर हिलाता है।
" तो पढ़ाई करते हो?"
वो शरमा कर ना में सिर हिला देता है।
" तब कैसे खरीदोगे ? इसे खरीदने के लिये तो बहुत सारी किताबें पढ़नी पड़ती है। देखो तुममें हममे कोई फरक थोड़े है। बस हमने पढ़ाई की तो हम अब ऐसी गाड़ी खरीद सकते हैं और तुम भी पढ़ोगे तो तुम भी खरीद लोगे..बल्कि किसी को खरीद कर भी दे सकते हो। बताओ ? करोगे पढ़ाई ? तो हम तुम्हे पढ़ा देंगे खूब ज्याद।" मैं अपने दोनो हाथ हवा में पसार देती हूँ, कायनेटिक पर बैठे बैठे ही।
उसने फिर सिर ना में हिला दिया।
 " नही.. ? क्यों ????"
"हमाअ् मन नही लगता है।"
"तब कैसे लोगे ये गाड़ी ? बिना पढ़ाई के तो नही मिल पायेगी।"
" ले लेंगे..।"
" कैसे ?"
" एक साल तक पइसा माँगेगे औ खरच नही करेंगे.. आ जईहै गाड़ी।"
मुझे हँसी आ जाती है सकारात्मक नकारात्मकता पर।
" अरे...? पइसा माँग माँग कर तुम गाड़ी खरीद लोगे ?"
"हाँअ्" वो भोले पन के साथ गर्दन टेढ़ी कर के कहता है।
" अच्छा.. ?? चलो गाड़ी खरीद भी लोगे, तो चलाओगे कैसे ? पेट्रोल का पैसा कहाँ से आयेगा ? वो भी माँग लोगे ?"
"हाँअ्" वो अपनी उसी अदा के साथ जवाब देता है।
"अरे पेट्रोल भराने को कौन देगा तुम्हें पैसा ?"
" दे देंगे..!" वो बड़े आत्मविश्वास के साथ जवाब देता है।
" कौन देगा ?? कोई नही देगा... हम तो नही देंगे।" मैने लगभग खीझते हुए जवाब दिया।
" तुम तो पहले भी कउन दे देती थी। सब तो कहिते हैं, ऊ चरपहिया स्कूटर वाली अंटी से ना माँगना कभौ देती नही हैं लेच्चर से अगल बगल वाल्यो भड़क जाउत हैं।"

मुस्कुराने के अलावा कर भी क्या कर सकती थी मैं... मगर आज १३ दिन हो गये...इस धंधे से जुड़े समाज के मनोविज्ञान को, उनकी दिनचर्या को, उनकी सुख दुःख को समझने और समझ कर उस पर कुछ लिखने के लिये अपने को बेचैन पा रही हूँ।

Thursday, April 5, 2012

चुवत अन्हरवे अजोर

लगभग १० माह..... और गवाक्ष के कपाट खुले ही नही.....इस वर्ष की शुरुआत के बाद चौथाई से अधिक वर्ष भी बीत गया.... बस इसलिये कि खिड़कियाँ खोलूँ, तो शायद कुछ ताज़ी हवा मिले, कुछ राहत हो दम घुटते माहौल से....

जाते हुए चैत को विदा देते हुए....




चुवत अन्हरवे अजोर ओ रामा, चईत महिनवा,

अमवा मउरि गईलें, नेहिया बउरि गईले,
देहिया टुटेला पोरे पोर हो रामा,
चईत महिनवा...

चुवत अन्हरवे अजोर......

उड़ि उड़ि मनवा, छुएला असमनवा,
बन्हला पिरितिया के डोर हो रामा,
चईत महिनवा...
चुवत अन्हरवे अजोर......

अँखिया न फर धरे, निंदिया उचटि पड़े,
पगिया भईल लरकोर हो रामा,
चईत महिनवा...

Wednesday, March 23, 2011

कि मैने इतना नाटकीय जीवन कभी नही जिया था.....!!!


पिछले १० वर्षों से साथ रहने के बावज़ूद.... वो ये नही समझा कि ये परिवर्तन जो उसे सुखद लग रहे हैं, वो किसी की जीवंतता की समाप्ति का लक्षण है। उसे नही पता चल रहा कि उसके साथी ने इतना नाटकीय जीवन कभी नही जिया....!

कितना अजीब है ? कि वो समझ भी नही पा रहा कि ऐसा होना तितलियों के रंगीन परों को, जबर्दस्ती सफेद रंग में रंग देने जैसा है। चिड़ियों की चहचहाहट को आँख बंद कर उनींदा बना देने जैसा। चमेली की तेज खुशबू में, कमल की भीनी महक ढूँढ़ने जैसा.....!!

उसने ये तो देखा कि पिछले १ माह से वो उस पर झल्लाई नही, मगर उसने ये नही देखा कि पिछले एक माह से वो चलते फिरते उसके गालों को भी हिला के नही गई। उसने नही देखा कि अचानक आकर टी०वी० बंद करते हुए, वो साड़ी का पल्ला फैला के खड़ी भी नही हुई ये कहती हुई कि " इस साड़ी का आँचल एकदम डिफरेंट है ना ? " उसने नही देखा कि देर रात उसने अपनी फेवरिट आइसक्रीम खाने की ज़िद भी नही की पिछले एक महीने से। उसने नही देखा कि बिंदी अब हफ्तों तक नही बदली जाती माथे पर, लिप्स्टिक आजकल लगाई ही नही जाती और काजल को छुआ भी नही गया पिछले एक माह से। आफिस से आने के बाद पानी का गिलास दे कर उदास आँखों वाली मुस्कान ने पिछले एक महीने से देर से आने का कारण भी नही पूछा और न ही नाराज़ हो कर घर सिर पर उठाया। ध्यान ही नही दिया उसने कि काँधे पर आये हाथ के दो सेकंड बाद ही उसे कोई काम याद आ जाता है और वो उठ के चल देती है, बहुत देर तक वापस ना आने के लिये। न्यूज़ पेपर छीन कर फेंका नही गया, ज्यादा आयली खाने पर आँखें नही तरेरी गईं। प्राणायाम में बंद हुई आँखों को कोई चूम के नही गया.....

और उधर शांत बैठी वो सोच रही थी कि अब करना भी क्या है ? चिल्लाना, रूठना, चीजों को इन्वेस्टीगेट करना ... वो सब तो तब तक था, जब पता था कि तुम मेरे हो। अब.... जब तुम मेरे हो ही नही, अब जब मैने जान ही लिया कि तुम बँट चुके हो, तो तुम पर अधिकार क्या जताना। ये शांति नही, बेबसी थी। किसी अपने की मृत्यु की सूचना के बाद हाहाकार मचाते हुए बिलख बिलख रो लेने के बाद, हिचकियों को भी घोट देने जैसा। अपने ही कटे पैरों को देख कर, चिल्लाते हुए बार बार नज़र हटा लेने के बाद एक टक घूरते रहने जैसा। हड्डियों तक धँसे हुए दर्द का चीख चीख के प्रदर्शन करने के बाद होंठों पर दाँत रख के भींच लेने जैसा। बलात्कार में घोर विरोध से हाथ पैर चला कर नुचे हुए अंग प्रत्यंगो को देख, शिथिल पड़ जाने जैसा............!!!!

कि मैने इतना नाटकीय जीवन कभी नही जिया था.....!!!

Thursday, January 20, 2011

दुःखों से निकलने की होड़

हाल चाल लेने की जनरल कॉल करती हूँ, तो उसकी आवाज़ थोड़ी डल लगती है।

"क्या हाल है?"
"ठीक है।"
" क्या हुआ बड़ा शोर है?"
"हम्म्म.. वो यहाँ आया था ना ! नीरा दी के घर"
"ओके ओके...नीरा ठीक है ?"
" अरे वो मौसी..... वो... नीरा दीदी के ससुर एक्सपायर कर गये।"
"क्या ऽऽऽ ?? हे भगवाऽऽन !"
मैने फोन काट दिया। ३ दिन पहले नीरा की ननद की शादी हुई है। परसो रिसेप्शन के बाद कल ही वो ननद सिंगापुर गई है हस्बैंड के साथ, चूँकि वो एनआरआई है। उसके ससुर अपनी बेटी को एयरपोर्ट छोड़ने गये तो कितने खुश और कितने दुखी थे, जैसा कि नीरा ने कल बताया... और अचानक आज...??

फोन कैसे करूँ नीरा को समझ नही आया। उसके हस्बैण्ड अभी ३२ साल के होंगे इस उम्र में पिता का साया उठना। दुख का रंग कहीं अपना सा लगा।

हिम्मत कर के शाम को फोन किया।
"हेलो"
"हाँ भईया।"
"प्रणाम मौसी"
"......." मुझे उनकी आवाज़ सुनते ही पता नही कैसा लगने लगा। सिसकी शायद वहाँ तक गई।
" अरे मौसी आप प्लीज़ परेशान ना होइये। जो होना था हो गया। अब आप अपने आप को संभालिये।"

अरे ! ये क्या ? मैं संभालूँ ? खुद पर बड़ी शर्म आई। लगा जैसे अजीब ड्रामेबाज हूँ मैं भी। जबर्दस्ती रो रही हूँ। फोन नीरा ने पकड़ लिया।

" मौसी आप रोयेंगी तो तबियत खराब हो जायेगी। देखिये पापा जी तो चले गये। अब रोने से उनकी आत्मा को कष्ट ही होगा।"

मुझे लग रहा था कि कही कोई जगह मिले, कि मैं जल्दी से उसमें समा जाऊँ और अपने ही क्रिएट किये हुए इस ड्रामे का पटाक्षेप करूँ।

दो दिन बाद फिर हाल लिया, तो माहौल खुशनुमा था। नीरा ने कहा " मैं खुद इनके साथ चुहल करती रहती हूँ मासी। जिससे ये अब चीजों से निकलें।" मैने हाँ में हाँ मिलाई "हाँ ये तो होना ही चाहिये।" उसने मुझे फिर से आगाह किया " और मौसी आप भी अपना खयाल रखियेगा। परेशान ना होइयेगा। अब जो हो गया, उसे बदला तो नही जा सकता ना।" मै फिर उसी ड्रामे का अंग महसूस करने लगी खुद को और फोन झट से रख दिया।

नीरा (नाम बदला हुआ) मेरी कोई रिश्तेदार नही। दीदी की पड़ोसी की बहन की पड़ोसी है। इस रिश्ते से मुझे मौसी कहती है, उम्र में मुझसे कुछ बड़ी ही होगी और उसके ससुर को मैने देखा भी नही था।

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अभी एक महीना ही हुआ था उस घर में आये हुए। सुबह दीदी के घर गई तो अंकल डॉ० के पास जा रहे थे।

लंच लेने के बाद विजू और पिंकू ये कह के घर चले गये कि आज छत पर रहेंगे थोड़ी देर। मुझे शाम की चाय दीदी के साथ पीने के बाद आना था।

दीदी के चाय बनाने को उठने के ठीक पहले फोन आता है।
"फोन मौसी को दीजिये ज़रा।" मैने फोन दीदी को दे दिया।

दीदी कुछ बोल नही रही थीं। मुझे लगा कुछ गड़बड़ है।
"क्या हुआ ?"
" कुछ नही, रुको, चाय बना लाऊँ।"
"नही पहले बताओ तो ? कुछ बात है, क्या हुआ ? "
" अरे वो विजू कह रहा था कि मौसी को आज अपने ही पास रोक लीजिये"
"क्यों ?"
"ऐसे ही, कह रहा है कि कल संडे है, क्या करेंगी आ कर।"
" अरे तुम सही बताओ ?" मैने हड़बड़ाते हुए पूछा।
" ये लोग घर पहुँचे तो देखा तुम्हारे घर पर भीड़ लगी है और तु्म्हारे लैण्डलॉर्ड की बॉडी बॉउण्ड्री में रखी है।"
" हम जा रहे हैं दीदी।"
" रुको हम भी चलते हैं तुम्हारे साथ। ऐसे अकेले गाड़ी नही चलाने देंगे।"

आंटी बैठी थी शरीर के पास। उनके आँसू धार-ओ-धार निकल रहे थे। पास में बैठी महिलाएं शांत बैठी थीं। क्षेत्रीय रिश्तेदार भी। एचआईजी मकानों वाले इस मोहल्ले में मैने आज तक किसी को चिल्ला के, गला फाड़ के, विह्वल हो के, बिलख के रोते नही देखा।

मैं आंटी के पास जा कर बैठ गई। उन्होने मेरा हाथ पकड़ लिया औड़ आँसू की धार और तेज हो गई। दोनो बच्चे दिल्ली में थे। फ्लाईट से चल चुके थे। आंटी को पानी पिलाया जा रहा था, चाय पिलाने की कोशिश के लिये़ दूसरे टेनेंट के घर उनकी मेड को भेजा, तो उन्होने जाली के अंदर से बड़ी सभ्यता से जवाब दिया "रुनझुन बस अभी सोई है। शोर होने से डिस्टर्ब हो जायेगी।"

चूँकि मेरे घर के में दोनो लड़के थे, इसलिये वो जाने में संकोच कर रही थी। मैने उसको परमीशन दी। और फिर रात में थोड़ी थोड़ी देर में चाय बनवाती रही। बेटे के आने के बाद जब आंटी के बगल में वो बैठ गया, तब घर में आई। मुझे सामने पड़ा शरीर अपने पिता के शरीर की याद दिला रहा था, आंटी अम्मा की और वो दोनो लड़के दोनो भाईयों की

सुबह आंटी मेरे ही कमरे में आ गई और महिलाओं की भीड़ यहीं इकट्ठा हुई। मोहल्ले की महिलाएं आँखों आँखौं में एक दूसरे से बात कर लेतीं, फिर बातों बातों में। अचानक कान में आवाज़ आई।

"कलर अभी लगाया क्या?"
"हम्म्म"
"कौन सा लगाती हो?"
"बसमोल"
" गार्नियर लगाया करो यार। मँहगा है लेकिन एक महीने की छुट्टी हो जाती है।"

आंटी चिल्ला रहीं थीं।" मुझे भी साथ ले चलो जी। कभी कुछ करने नही दिया। अब कैसे करूँगी अकेले इस उम्र में।"

शरीर जाने के बाद सफाई करती हुई मेड के गुनगुनाने की आवाज़ सुनकर मैने कहा " इस घर से अभी मिट्टी उठी है। एक हफ्ते बाद गाना गा लेना।" समझ नही आ रहा था कि गुस्सा कहाँ निकालूँ।

शाम को आंटी के घर से खूब हँसी की आवाजे आ रहीं थी। मुँह अजीब सा बना मेरा। बड़े लोग...! आंटी बेचारी कैसे बर्दाश्त कर रही होंगी।

वो सीढ़ियाँ चढ़ना बहुत बड़ी कवायद था मेरे लिये। मगर आंटी से मिलना चाह रही थी। किसी तरह गई। सामने कुर्सी डाल दी गई और आंटी भी वहीं आ गई। आई हुई रिश्तेदार ने फिर से एक जोक मारा। पब्लिक फिर से ठहाका मार उठी। मुझे हँसना अपराध लगा। आंटी ने मुस्कुराते हुए कहा। "बेटा, वो वाला किस्सा सुनाओ, नाना जी वाला । उसने हँस हँस के पूरी मिमिक्री के साथ नानाजी का किस्सा सुनाया, अबकी बार आंटी के साथ मैं भी हँसी।

आंटी ने कहा कि यही सब सुना रही है ये। उसने भी मनोविज्ञान की छात्रा की तरह कहा " अब रोने से क्या, जतनी जल्दी हो सके, निकलो इन सब से।"

मैने भी कहा " हाँ सही है। रो के कहाँ जिंदगी बीतनी है।"

सुबह आफिस को तैयार होते समय आंटी की बहन आई। "बेटा मुझे ज़रा अपने घर की चाभी दे जाना। २ बजे मायका आयेगा ना। अब वहाँ तो टी०वी० चला नही सकते। अच्छा नही लगता ना....!! "

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किस्से ऐसे बहुत सारे हैं। सोच रहीं हूँ कि इस बात को इतना सोच क्यों रही हूँ....गलत क्या है ऐसा करने में ???

Sunday, February 14, 2010

तुमने इश्क का नाम सुना है, हम ने इश्क किया है


बेतहाशा चूमते हुए होंठो पर

अपना हाथ रख के,

उस दिन जब पूंछा था तुमने

कि

"अब क्यों नहीं लिखता मै कविता तुम पर"

कहना चाहता था

कि

"लिख ही तो रहा था अभी

जब तुमने अचानक रख दिया हाथ.......!!"


नोट: किसी ने किसी से कहा ऐसा और मैंने जस का तस लिख दिया कभी कभी यूँ भी हो जाती है कविता

Friday, October 30, 2009

यूँ ही



सुबह से रोक रही हूँ खुद को, मगर नही रुक पाई आख़िर....! बस लिखती चली जा रही हूँ जुनून में...यहाँ क्यों लिख रही हूँ ? पता नही.... सुबह से कई जगह दिमाग लगाना चाहा मगर नही.... यही आ कर लग जता है।

बार बार प्रश्न आ रहे हैं। क्या जिंदगी का कोई फॉर्मूला भी होता है ? क्या जिंदगी के shortcut भी होते हैं ? अगर होते हैं तो क्या long lasting होते हैं ?? क्या हर चीज के करने के पहले कोई कारण होता है ??? क्या हम रिश्ते बनाने के पहले ओहदे देखते हैं ???? ये सोच कर किसी से जुड़ते हैं कि इससे रिश्ता बनाना भविष्य में ये फल दे सकता है और क्या रिश्ते इतने सुविचारित हों सकते हैं?????

नही..नही ...नही... नही...!!! फिर...??फिर ऐसा क्यों लगा ?????

पता नही...! पता नही कि मैं आखिर लिखना क्या चाह रही हूँ। मगर बस इतना जानती हूँ, कि जिंदगी जैसी दिखती है वैसी ही नही है। हर होने के पीछे कितनी बार का ना होना होता है उसका ज़िक्र नही होता...नही किया जाता...!! और नही किया जाता इसका मतलब ये नही कि जो हुआ वो दूसरे के साथ आसानी से हो गया। उसे भी वो चीज़ उतनी ही कठिनाई से मिली है जितनी आपको। बस उसने ढिंढोरा नही पीटना चाहा। उसने नही चाहा कि असफलता पर लोगो की संवेदनाएं मिले। क्यों कि संवेदनाएं १०० में सिर्फ २ ही सच्ची होती है। बाकि औपचारिकता और पीछे उपहास..बस यही होती हैं...!

लोग कहते हैं कि मैं अक्सर रोने धोने वाली बात लिखती हूँ...! सब कहते हैं तो सच ही कहते हैं। मगर जहाँ तक मुझे याद है मैने कभी अपनी किसी व्यक्तिगत त्रासदी का ज़िक्र नही किया होगा। कुछ अपनो की पुण्यतिथि के अलावा, क्योंकि उस दिन इतना तो अधिकार है कि अपने पन्ने को अपने रंग में रंग सकूँ। मगर जिंदगी के फलसफे इतने आसाँ भी नही थे। मगर क्या करना है उन बातों का ज़िक्र करके....! ज़िक्र तो ये है कि आप सब हैं आज। आप सब का साथ है। कुछ सच्चे मित्र हैं। उनका प्रोत्साहन है ...!! मगर ज़िक्र ना होने का अर्थ घटित ना होना नही, ये सबको समझना चाहिये। कोई भी हो.. वो जिस स्थान पर है वो उसकी अपनी मेहनत है। वैसे तो सीढ़ियों तक आने के रास्ते ही बहुत कठिन होते है...मगर फिर भी अगर मान लीजिये एक बार कोई सीढ़ी तक पहुँचा भी देगा तो उन्हे चढ़ने की ऊर्जा तो खुद ही लगानी होगी..! और बुलंदी पर पहुँच कर फिर उसी जगह पर बने रहने का कोई शॉर्टकट नही है। वैसे तो जहाँ तक मुझे पता है न सीढ़ियाँ आसानी से मिली, ना उन तक के रास्ते....!!!

सब को मेरा रहन सहन और खाना पीना दिखता है,
हमने कितने कच्चे पक्के सपने बेंचे उनका क्या...?


सब सिर से ऊपर गुज़र रहा है ना आप लोगों के..?? जाइये कहाँ फँस गये मुझ झक्की के चक्कर में..! मैं भी जा रही हूँ कुछ दिनो को ब्लॉगजगत से दूर...! बिटिया (भाजी) की शादी है तैयारी करनी है भाई....! मगर कहीं कहीं झाँकती मिलूंगी बीच बीच में...! :)

Friday, September 11, 2009

अपील एक माँ की


ज़रा सोचिये....! एक बार अपनी जिंदगी पर नज़र डालिये...! आपकी जिंदगी में भी कोई ना कोई तो ऐसा होगा ही ना जो हर मंदिर में जा कर आपके लिये प्रार्थना करता होगा, हर दरगाह पर आपके लिये धागा बाँधता होगा, हर मज़ार पर आपकी लंबी उम्र के लिये चराग जलाता होगा। दुनिया के सारे व्रत सारे टोटके इस उम्मीद पर कर रखे होंगे कि एक दिन सारी तपस्या रंग लायेगी, हर दुआ काम आयेगी और आप उन रास्तो को छोड़ कर लौट आयेंगे उस जिंदगी की तरफ जहाँ हर पल एक खटका सा नही लगा होगा....!

फिर उस रिश्ते का चाहे जो नाम हो... वो आपकी माँ हो, पिता हों, भाई हो, बहन हो, पत्नी हो, दोस्त हो या कोई भी पवित्र सा प्यारा सा रिश्ता....! कोई ना कोई तो होगा ही ना आपके जीवन में भी, जो चाहता होगा कि आप चलें तो आपके सिर पर कड़ी धूप भी न हो...! और आप..?? आप भी तो चाहते होंगे कि उसे धूप भी छुए तो शीतल बन कर। आप भी तो चाहे दुनिया के लिये कितने ही कठोर क्यों न हों, एक शख़्स है जिसका नाम आते ही कुछ भीग जाता है आपके अंदर। ज़रा गंभीरता से उसके बारे में सोच कर देखिये ना। आप जानते हैं....?? जब आप जेल में होते हैं ना, तो वो अपना बिस्तर ज़मीन पर डाल लेता है, क्योंकि वो सुख उसके लिये किसी काम का नही, जो आपको ना मिल रहा हो। वो जानता है, कि आप बहुत बुरे आदमी हैं, लेकिन फिर भी आप उसके लिये दुनिया में सबसे खास शख़्स हैं। वो आपकी हर हक़ीकत जानता है, लेकिन फिर भी वो आपके हर झूठे वादे को हक़ीकत ही मानता है। वो जानता है कि आपकी किसी भी बात का विश्वास नही करना चाहिये, लेकिन वो चाहता आपकी हर बात पर विश्वास करना। वो जानता है कि वो भ्रमों मे जी रहा है, लेकिन उसने मान लिया है कि उसका ये भ्रम कभी नही टूटेगा.....

आप जानते हैं ? कि जब जब आप अपना वादा तोड़ते हैं, उसका दिल तिड़ते हैं, उसका विश्वास तोड़ते हैं, तो वो भी अपने आप में टूट जाता है,लेकिन फिर से वो जुड़ने की कोशिश करता है हर बार..! नई उम्मीद जोड़ कर, आपके वादों से फिर से जुड़ कर, अपने टूटे विश्वास जोड़ कर, अपना दिल संभालता है, लेकिन उस दिन, जिस दिन उसका वो भरम टूटता है,जिसके लिये उसने मान रखा है कि कभी नही टूटेगा, उस दिन वो बिखर जाता है...बिलकुल बिखर जाता है। और आप जानते हैं ना..टूटी चीज जुड़ सकती है, बिखरी चीज कहाँ...?? फिर वो जुड़ने की स्थिति में होता ही नही और सम्हल पाता ही नही

हाँ, हाँ पता है मुझे...! पता है आपको मौत से डर नही लगता। मौत तो एक दिन सबको आनी है। तो क्या होगा ..? कल ना सही आज सही, लकिन सोचिये ज़रा मेरे जैसे उस शख़्स के बारे में, जिसे आप रोज़ मरने के लिये छोड़ जाते हैं। जिसके एक आँसू पर आप खून बहा सकते हैं, वो जिंदगी भर खून के आँसू रोता रह जाता है।

कोई भी शख़्स बुरा नही बनना चाहता, परिस्थितियाँ उसे बुरा बना देती हैं। आप भी शायद खुशी से किसी निर्दोष का घर ना उजाड़ते हों।...हाथ तो आपके भी काँपते ही होंगे, मन तो आपका भी मसोसता ही होगा....!

लेकिन मैं ये भी जानती हूँ कि दुनिया का कोई काम आपके लिये कठिन नही है, तो ये काम इतना कठिन क्यों..??? ये काम जिसका वास्ता दूसरों से नही बल्कि आपके अपनो की खुशी से है।

मैं आपको उनका वास्ता नही देती जिन्हे आप किन्ही कारणों से कष्ट देते हैं। जिनका जीवन आपने जीने काबिल नही रखा। जिन्हे कई बार आप ऐसे मोड़ पर छोड़ आते हैं, कि आप जैसा एक और शख़्स अपने को, अपनों को और दुनिया को तबाह करने को तैयार हो जाता है।

मैं तो वास्ता देती हूँ आपको उनका जिन्हे आप हमेशा खुश देखना चाहते हैं। जिनके आँसू आप जैसे पत्थर को भी रुला देते हैं। आप चाहे खुद पे गोलियाँ झेल लें लेकिन उसके पैर में काँटा भी चुभे तो दर्द आपको होता है...! उसके आँसू पर आप अपना खून बहा देना चाहते है...! उसकी हँसी के लिये आप खजाने लुटा देना चाहते हैं...! मैं उन लोगों का वास्ता देती हूँ आपको। उन्हे मेरी तरह अकेला मत छोड़िये... दुनिया के लिये आप एक शख्स होंगे, लेकिन एक शख़्स के लिये आप सारी दुनियाँ हैं। उस शख्स की दुनिया मत सूनी कीजिये। आपके बाद जीना वो चाहता नही और मर वो पाता नही। मैं आपके हाथ जोड़ती हूँ, मुझे वो आख़िरी शख्स बन जाने दीजिये। अब किसी और को ये दुख झेलने के लिये मात छोड़ जाइये आप....! ये दुःख सहा नही जाता... ये दुःख कहा नही जाता...!!!!!


नोट : बहुत पहले एक कहानी लिखी थी....! ११ साल पहले...! कहानी क्या लघु उपन्यास था। मेरे दिल के बहुत करीब....! मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट था वो...! कभी कोई छपने को भेजने के लिये कहता भी तो मैं नही देती। मुझे उस पर फिल्म बनानी थी। या फिर जेलों में जा कर प्ले करवाना था। और कहानी के अंत में ये मोनोलॉग नायक की माँ से बुलवाना था। मैने तो बहुत हिफाज़त से रखा था उसे.....जाने कैसे मेरी शेल्फ में अब नही है वो...! मैने कहाँ कहाँ नही ढूँढ़ा...! मन्नत भी मानी...मगर मैं जिस के लिये मन्नत मान लूँ, वो तो पक्का नही पूरा होना है। ये मानी बात है। हँसी तो तब आई जब किसी ने मुझसे कहा कि अगर कोई चीज खो जाये तो दुपट्टे में गाँठ बाँध कर छोड़ दो..चीज मिल जायेगी। मैने अपने प्रिय सूट को छोड़ ही दिया तब तक के लिये जब तक वो मिल ना जाये...! थोड़े दिन बाद ढूँढ़ा तो वो दुपट्टा ही गायब था, जिस में गाँठ डाली थी....!
आज जब लिखने बैठी तो कई बार लगा कि इस वाक्य को बदल दूँ तो ज्यादा असर पड़ेगा...मगर फिर हिम्मत नही हुई। ये तब की बात है जब मैं सिर्फ अपने लिये लिखती थी....!

Wednesday, December 10, 2008

एक शेर


एक धागे का साथ देने को,

मोम का रोम रोम जलता है....!

बस गुलजार का ये एक शेर कहने का मन हो रहा है आज..ये शेर जो कभी पुराना नही पड़ता मेरे लिये। और कुछ-कुछ दिनों पर इसकी धार कुछ ज्यादा तेज हो जाती है... नश्तर की तरह चुभता है ये...! आज कल धार फिर तेज हो गई है इसकी...!

Friday, October 10, 2008

गावक्ष की हवाओं का राकेश खण्डेलवाल को सलाम

गुरुवर का आदेश है कि इस सप्ताह चूँकि राकेश खण्डेलवाल जी की पुस्तक अंधेरी रात का सूरज का विमोचन हो रहा है अतः सभी शिष्यों को एक पोस्ट उनसे संबंधित लगानी है.... ! गुरुवर का आदेश सिर माथे पर।

तो राकेश जी जिन्हे मैंने ब्लॉग का नीरज नाम दिया है, उनके प्रभाव मे मै तब से आई हूँ जब से मैं इस ब्लॉग जगत में आई हूँ। जून २००७ से ब्लॉगिंग शुरू करने के बाद जब मै कुछ अच्छी कविताओं के लिये ब्लॉग सर्फिंग कर रही थी, तभी मेरि दृष्टि राकेश जी की एक कविता पर पड़ी जो इस प्रकार थी

आह न बोले, वाह न बोले
मन में है कुछ चाह न बोले
जिस पथ पर चलते मेरे पग,
कैसी है वो राह न बोले,
फिर भी ओ आराध्य ह्रदय के पाषाणी !
इतना बतला दो
कितने गीत और लिखने हैं ?
कितने गीत और लिखने हैं,
लिखे सुबह से शाम हो गई
थकी लेखनी लिखते लिखते,
स्याही सभी तमाम हो गई

तुरंत मैने एक हार्ड कॉपी सुरक्षित की और राकेश जी की सारी कविताएं पढ़ डाली। एक समस्या जो तब से अब तक आती है कि आखिर उनकी कविताओं की प्रशंसा के लिये नए शब्द कहाँ से लाए जाएं..? वही क्या बात है....! वही कुछ कहने को नही...!वही निश्शब्द हूँ मैं... !वही मन को भीतर तक छू गई....! खुद को बनावटी लगने लगते हैं अपने शब्द..! कभी कभी पढ़ के बस वापस लौट आती हूँ, बिना कोई कमेंट किये।

तो यूँ गीत कलश पान हेतु मेरा तो जाना अक्सर ही होता था, पर कष्ट इस बात का रहता था कि मैं क्यों नही थोड़ा सा अच्छा लिखती कि कभी वो भी मेरे गवाक्ष तक आएं, और मुझे पता था कि यदि राकेश जी कभी कुछ कहेंगे तो अवश्य वो लेन देन या मन रखने हेतु तो नही ही होगा और कवि की प्रशंसा हो या निंदा मगर उचित मूल्यांकन उसकी सबसे बड़ी निधि होती है शायद। ब्लॉग जगत ने मुझे निराश तो नही किया कभी, जैसा मैं लिखती थी उस हिसाब से ठीक ठाक प्रतिक्रियाएं मिलती रहीं, लेकिन कष्ट इस बात का होता था कि जिनके हम प्रशंसक हैं, वो हम पर निगाह क्यों नही डालते। अपने ब्लॉग गुरु मनीष जी से यह कष्ट बाँटा भी,कि कभी राकेश जी मेरी कविता की प्रशंसा नही करते? तो उन्होने सलाह दी कि "आप उनकी निगाह में नहीं आई होंगी, उनको खुद अपनी कविताएं मेल कर दीजिये।" लेकिन मुझे लगा कि ये तो न्यौता दे कर बड़ाई कराना होगा। कोई भी विनम्र व्यक्ति इतने पर तो प्रोत्साहन देगा ही। खैर ५ फर०, २००८ का वह दिन आया जब राकेश जी की पहल टिप्पणी मेरी किसी पोस्ट पर आई (यद्यपि वो मेरी किसी कविता पर नही नीरज जी की कविता पर थी)। जैसा कि मैने उन्हे मेल मे लिखा कि मेरे लिये "उनका आना शबरी की कुटिया में राम का आना था।" ये बात शब्दशः सत्य थी। खैर उनके जैसे व्यक्तित्व का तुरत विनम्र उत्तर आना तो स्वाभाविक ही था और इस प्रकार उनका आना जाना गवाक्ष की तरफ हुआ लेकिन मेरी पोस्ट पर उनकी हर टिप्पणी से भी अधिक प्रभावकारी उनकी वे दो टिप्पणी हैं मेरे लिये जो मेरी कविता के लिये सीधे मेरी मेल पर आई। मैने महसूस किया कि वो हृदय से मुझ पर स्नेहाशीष रखते हैं। वे टप्पणियाँ मेरी पोस्ट अब तुम मुझको .... और पर सुलगती ये ...... पर आईं जो इस तरह हैं।

कंचनजी
नमस्कार,

आपका यह गीत पढ़ा. सुन्दर भाव और शिल्प भी अच्छा है लेकिन कहीं कहीं प्रवाह अटकता है. कारण या तो टंकण दोष है या शब्दों के प्रवाह पर आपने ध्यान नहीं दिया.

आशा है आप मेरी स्पष्ट वादिता को अन्यथा नहीं लेंगी. गीत की गेयता के लिये प्रवाह एक आवश्यकता है. एक और त्रुटि की ओर ध्यान दिला रहा हूँ. कॄपया गीत में सम्बोधन एक ही रखें. अगर तुम का प्रयोग है तो तुम ही और तू का तो तू ही.

कुछ शब्द संगीत के माध्यम से तो लघु और दीर्घ स्वर होते हुए भी चल जाते हैं लेकिन पढ़ने में अटकते हैं. अगर आप को मेरे शब्द उचित न लगें तो क्षमाप्रार्थी हूँ. मुझे व्यर्थ हां में हां मिला कर टिप्पणी अपने पसन्द के ब्लागों पर लिखना नहीं आता. अगर औपचारिकतावश करनी होती तो शायद मैं भी तारीफ़ ही करता, दोष नहीं निकालता.
सादर,
राकेश खंडेलवाल

खत्म हुआ एक सफर मेरा, अब मंजिल पाई तुमको पा कर !

तेरी सोच में दिन कट जाये, तेरी सोच में कटती रातें !

और


कंचन जी,
नमस्कार,

जैसा मैने अपनी टिप्पणी में लिखा था आपके सुन्दर गीत में एक शाब्दिक त्रुटि की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ
निम्नता लो, उच्चता लो,
इक कोई स्तर बना लो।
और उस स्तर पे थम के,फिर मुझे अनुरूप ढालो।

अकसर ऐसा होता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार के अंचल में स्तर को इस्तर की तर्ह बोला जाता है. यही नहीं स्नेह, स्कूल आदि शब्द आंचलिकता के कारण उच्चारण दोष से ग्रसित होते हैं गाते हुए तो आपका गीत ठीक लगेगा क्योंकि सुर को दीर्घ कर बोल दिया जायेगा लेकिन सही नहीं होगा.
उदाहरण के लिये
वर दे वीणा वादिनी वर दे
काट अंध उर के बंधन स्तर
बहा जननि ज्योर्तिमय निर्झर
कलुष भेद तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे

यहाँ स्तर को लघु सम्मिश्रित ही गाया और बोला जायेगा. यदि इस्तर बोला जाये तो मात्रा दोष दिखेगा और वह गलत भी होगा.

आशा है आप मेरी बात को अन्यथा नहीं लेंगी.

आपके लेखन में निरन्तर प्रगति हो, यही कामना है,

शुभकामनाओं सहित
राकेश

चलते चलते राकेश खण्डेलवाल जी पुस्तक अँधेरी रात का सूरज के विमोचन के अवसर पर शुभकामनओं के साथ गुनगुनाइये उनका लिखा एक गीत (राकेश जी के ब्लॉग विन्यास की विशेषता अथवा मेरी अनभिज्ञता किन्ही कारणों से exact लिंक नही दे पा रही हूँ जून, २००७ के आर्काइव का लिंक क्लिक करें यहाँ दूसरे नं० पर २२ जून, २००७ को पोस्ट है यह कविता) जो मुझे बहुत प्रिय है।

एक तुम्हारा प्रश्न अधूरा, दूजे उत्तर जटिल बहुत था
तीजे रुंधी कंठ की वाणी, इसीलिये मैं मौन रह गया

बचपन की पहली सीढ़ी से यौवन की अंतिम पादानें
मंदिर की आरति से लेकर मस्जिद से उठती आजानें
गिरजे की घंटी के सुर में घुलती हुई शंख की गूँजें
थीं हमको आवाज़ लगातीं हम आकर उनको पहचानें

लेकिन पिया घुटी में जो था, उसका कुछ प्रभाव ऐसा था
परछाईं में रहे उलझते, और सत्य हो गौण रह गया

लालायित हम रहे हमेशा, आशीषों के चन्द्रहार के
और अपेक्षित रहे बाग के दिन सारे ही हों बहार के
स्वर्ण-पत्र पर भाग्य लिखेगा सदा, हमारा भाग्य नियंता
और कामनायें ढूंढ़ेंगी, रह रह कर हमको पुकार के

जब ललाट पर लगीं उंगलियां, हमने सोचा राजतिलक है
देखा दर्पण में तो पाया, केवल लगा डिठौन रह गया

सदा शीर्ष के इर्द गिर्द ही रहीं भटकतीं अभिलाषायें
और खोजतीं केवल वे स्वर, जो श्रवनामॄत मंत्र सुनायें
पक्षधार हो द्रोण, कर सके, एकलव्य हर एक नियंत्रित
और दिशायें विजयश्री की धवल पताकायें फ़हरायें
जीवन के इस बीजगणित के लेकिन समीकरण सब उलझे

जो चाहा था पूरा हो ले, वो ही आधा-पौन रह गया

जहां लिया विश्राम काल की गति ने एक निमिष को रुककर
थमे हुए हैं जीवन के पल, अब तक उसी एक बिन्दु पर
राजसभा में ज्यों लंका की, पांव अड़ाया हो अंगद ने
या इक राजकुंवर अटका हो, चन्दा को पाने के हठ पर

बारह बरस बदल देते हैं, मिट्टी की भी जर्जर काया
ढूंढ़ रहा हूँ कोई बताये, ये सब बातें कौन कह गया ?

Friday, May 16, 2008

लेकिन खाना खाया नही गया हमसे


आज लंच करते समय में अपनी सखी शिवानी सक्सेना से नासिरा शर्मा की किताब औरत के लिये औरत में पुरुष बदलेगा तभी बदलेगा समाज विषय पर उनके लेख की चर्चा कर रही थी और उन्हे बता रही थी कि १९७१ में स्कॉटलैंड से इलाहाबाद लौटने पर नासिरा जी को मिनिस्टर के०डी० मालवीया की आधी कोठी मिली थी। उनसे मिलने जिस दिन नासिरा जी गईं उस दिन करवा चौथ था। ये जानने पर श्रीमती मालवीया ने हँसते हुए कहा कि "मै तो अपनी बहू को मना करती हूँ कि उस मर्द को अगले जन्म में पति के रूप में क्या माँगना जिसको इसी जन्म में सहन करना मुश्किल है।" नासिरा जी को उनकी बात नैतिक प्रश्न लगी। उनका कहना था कि जहाँ स्वयं की विशेष निष्ठा पति के प्रति हो वो अलग बात है मगर सिर्फ दिखावे के लिये ऐसा करना उन्हे समझ नही आता। उनका कहना है कि इन बातों से यह तात्पर्य हरगिज नही कि करवा चौथ मनाया ना जाये जरूर मनाया जाए, पर बाजार की दृष्टि से नही बल्कि पारस्परिक विश्वास को माध्यम बना कर।
इसी संदर्भ में चर्चा करते हुए उन्होने बताया कि एक बार सरित साहित्य संगम संस्था में आये अशोक चक्रधर एवं उनकी पत्नी की कविता के बाद वार्तालाप में जब बात करवाचौथ की आई तो अशोक जी ने कहा कि मैं भी करवाचौथ ब्रत रहता हूँ। मजाक समझने पर पत्नी वागेश्वरी देवी ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि हम दोनो ही एक दूसरे के लिये करवा्चौथ व्रत रहते हैं, मेरी तरह चलनी में चाँद ये देखते है। नासिरा जी का कूतुहल से भरा प्रश्न आया कि उस दिन आपका श्रृंगार क्या होता है तो अशोक जी ने उत्तर दिया सादगी ही पुरुषों का श्रृगार है अतः मैं उस दिन अपना झक मँहगा कुरता पहन कर मित्रों की कृपा से प्राप्त विदेशी पर्फ्यूम लगा कर खड़ा हो जाता हूँ।

इस पर शिवानी जी ने हँसते हुए कहा "यार मेरे पतिदेव का तो फंडा है कि न तुम रहो न मैं..! " लेकिन इसी के साथ उन्होने अपने घर में बर्तन माँजने वाली औरत माधुरी का वृतांत बताया कि उसके पति ने उसे चार छोटे बच्चों के साथ छोड़ दिया था और वो किसी तरह लोगो के घर बर्तन माँज कर गुजारा कर रही है। एक करवाचौथ पर जब वो सुबह आई तो शिवानी जीने उससे पूँछा " अरे आप आ गईं...ब्रत है न आपका" तो उसने बर्तन माँजते हुए कहा " अरे भाभी चार साल हो जिस आदमी ने कभी अपने लड़के बच्चों की भी खबर नही ली उसके लिये कौन सा ब्रत" और शिवानी जी ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा "हाँ और क्या..." लेकिन दूसरे दिन जब माधुरी आई तो शिवानी जी को देखते ही उसने कहा " भाभी ब्रत तो नही रहे लेकिन खाना खाया नही गया हमसे कल..."

शिवानी मैम के मुँह से ये घटना सुन कर थोड़ी देर के लिये उस महिला को महसूस करने लगी मैं...यही है भारतीय नारी ...जिसके लिये मैं श्रद्धावनत हो जाती हूँ... प्रतिशोध की भावना यदि उसमें भी आ जाये... बुरे का बदल यदि बुरा वो भी देने लगे तो धरती संभलेगी कैसे..? वो चाह कर भी बुरी नही बन पाती। उस औरत को मेरा सलाम......!