Tuesday, February 5, 2008

हो भी गया प्रेम हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा..?


"नीरज" मेरे बहुत प्रिय कवियों में एक है...और उनकी लिखी कविताओं में से एक प्रिय कविता आपके साथ बाँटना चाहूँगी...!

मै पीड़ा का राजकुँवर हूँ, तुम शहजादी रूपनगर की
हो भी गया प्रेम हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा..?
मेरा कुर्ता सिला दुखों ने,
बदनामी ने काज निकाले,
तुम जो आँचल ओढ़े उसमें
अम्बर ने खुद जड़े सितारे
मैं केवल पानी ही पानी, तुम केवल मदिरा ही मदिरा
मिट भी गया भेद तन का तो, मन का हवन कहाँ पर होगा

मैं जन्मा इसलिये कि,
थोड़ी उम्र आँसुओं की बढ़ जाए
तुम आई इस हेतु कि मेंहदी
रोज नए कंगन बनवाए,
तुम उदयाचल, मैं अस्ताचल, तुम सुखांत की
मिल भी गए अंक अपने तो रस अवतरण कहाँ पर होगा?

मीलों जहाँ न पता खुशी का,
मै उस आँगन का इकलौता,
तुम उस घर की कली जहाँ
नित होंठ करें गीतों का न्यौता
मेरी उमर अमावस काली और तुम्हारी पूनम गोरी
मिल भी गई राशि अपनी तो बोलो लगन कहाँ पर होगा?

इतना दानी नही समय कि
हर गमले में फूल खिला दे
इतनी भावुक नही जिंदगी
हर खत का उत्तर भिजवा दे
मिलना अपना सरल नही पर फिर भी ये सोचा करता हूँ,
जब ना आदमी प्यार करेगा जाने भुवन कहाँ पर होगा..?


हो भी गया प्रेम हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा..?

10 comments:

Parul said...

aaj bhi padhkar bahut achhi lagii...agar NASENI ho neeraj ji ki to post kariye...

मुसाफिर said...

अति उत्तम...

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi said...

वाह!!!
इसे पढकर मुझे नीरज का एक विरह गीत याद आ गया.

"मुझे न करना याद ,तुम्हारा आंगन गीला हो जायेगा"

आकाशवाणी के जिस कार्यक्रम का कल मैने अपनी पोस्ट में जिक्र किया था, उसमें मैने नीरज जी से पूछा था कि आपने अब रोमांटिक कविता को तिलांजलि क्यों दे दी है.उन्होने अपने दार्शनिक अन्दाज़ में कहा कि हर भावना के एक उम्र होती है.

किंतु ...नीरज की एसी कवितायें पढकर मन फिर फिर रूमानी हो ही जाता है.

इतनी सुन्दर रचना सब तक पहुंचाने के लिये धन्यवाद.
धन्यवाद

Anonymous said...

कंचन जी आप की और मेरी पसंद काफी मिलती है ये तो इस गीत से पात ही चल गया है : पंकज सुबीर

राकेश खंडेलवाल said...

बचपन से ही नीरजजी मेरे प्रिय गीतकार रहे हैं. उनके कई गीतों में से यह भी मुझे भी उतना ही प्रिय है जितना कि
मैं अकंपित दीप प्राणोम का लिये
ये तिमिर तूफ़ान मेरा क्या करेगा
और
पीड़ा मिली जनम के द्वारे, अपयश पाया नदी किनारे
और
अब सही जाती नहीं ये निर्दयी बरसात.
एक दो हो तो सूची भी बनाई जाये.

मेरा सौभाग्य है कि नीरज जी के साथ एक ही मंच से काव्य पाठ करने का अवसर कई बार प्राप्त हुआ.

ajeet said...

Kanchan ji

bahut hi sundar kavita hai. kabhi- kabhi lagta hai bahut saari chijen apne adhurepan mein hi apni purnata ka ahsas karati hai aur prem bhi shayad unhin mein se ek hai kyunki milan ki apeksha virah ki sthiti prem ko jyada achchhe se paribhashit karti dikhati hai. lekin antim line mein kavi itne saare prashnon ka uttar ek prashan se hi de deta hai aur bahut kuchh sochne par majboor bhi.

जब ना आदमी प्यार करेगा जाने भुवन कहाँ पर होगा..?

itni achchhi kavita ham tak pahunchane ke liye bahut-bahut shukriya.

Regards
Ajeet

रवीन्द्र रंजन said...

बहुत खूबसूरत कविता है। शुक्रिया आपका इसे पढ़वाने के लिए।

kanchan said...

Parul ji! nasaini ke vishay me zara vistar se bataiyega...shayad mil jaye

Musafir jI! aapka dhanyavad..apna naam pata bata diya hota to ham bhi jaan jate aapko

Arvind jI AAp ke blog par Neeraj ji ka zikra padhne ke baad hi to mai is post ke liye prerit hui thi ...

aap ki batai kavi "mujhe na karna yaad bhi mujhe bahut pasand hai shighra hi post karu.ngi

Subir jI Aap se pasand milna saubhagya ki baat hai...!

Rakesh ji! huzur aate aate bahut der kar di...bade dino se pratiksha thi aapki apne gavaksh par...suswagatm

Ajit ji aap ke swabhav me jo darshnikta hai us ke karan Neeraj ki kavitae.n pasand aana swabhavik hi hai.

Ravindra ji Shukriya ka Shukriya

Manish said...

नीरज की इस रचना को हम सब तक पहुँचाने का शुक्रिया !

Bhupendra Raghav said...

बहुत बहुत शुक्रिया कंचन जी, मंत्र मुग्ध कर दिया आपके ब्लोग और लेखनी ने...

नमन..