
बसंत की गुलाबी सर्दी में पढ़िये... मेरी ये emotinally warm कविता...!
चारों तरफ घना कोहरा है, ठिठुरन भरी कड़ी सर्दी है,
छोटे छोटे कोयले देकर आग अभी जिंदा रक्खी है..!
मैं तो कोशिश खूब करूँगी, आग मेरी बुझने न पाये,
लेकिन तुम भी कोशिश करना..
आग रहे तब तक आ जाना..!
माज़ी से न कोई शिक़वा, न उम्मीदें कोई कल की,
रिश्ता तुम से जो है, उसमें बातें हैं बस इसी सफर की।
मैं तो कोशिश खूब करूँगी, आज हमारा मैला न हो,
लेकिन तुम भी कोशिश करना,
रोज आज को नहला जाना ।।
लेकिन तुम भी कोशिश करना,
रोज आज को नहला जाना ।।
किस दिन तुम ये समझ सकोगे, रीत प्रीत की क्या होती है,
जब जब मैं हारी हूँ तुम से, जीत सदा मेरी होती है।
मैं तो कोशिश खूब करूँगी, जीतो तुम्ही सदा मेरा मन,
लेकिन तुम भी कोशिश करना
मैं हारूँ तो सहला जाना ।।
शिख से नख तक बाँध लिया है, जिस पर तुमने अपना बंधन,
वो तुम से क्या अहम् करेगा, जिस पर तेरा ही है शासन,
मैं तो कोशिश खूब करूँगी, ये बंधन खुलने न पाए,
लेकिन तुम भी कोशिश करना,
रोज़ डोर कसने आ जाना ।।
13 comments:
bhut sunder rachna hai....basant panchami ke apko subhkamanaye
बहुत सुन्दर .........
क्या बात है. मेरे पास सच में शब्द नहीं ..... . यूँ ही कमाल करती रहें .....
जब जब मैं हारी हूँ तुम से, जीत सदा मेरी होती है।...बहुत खूब। एक और अच्छी रचना के लिये शुक्रिया। शब्दों का प्रयोग बहुत अच्छा है। बसंत पंचमी की शुभकामना।
लेकिन तुम भी कोशिश करना
मैं हारूँ तो सहला जाना ।।
आह! क्या बात कही है ………कोमल,नर्म भाव
शिख से नख तक बाँध लिया है, जिस पर तुमने अपना बंधन,
वो तुम से क्या अहम् करेगा, जिस पर तेरा ही है शासन,
मैं तो कोशिश खूब करूँगी, ये बंधन खुलने न पाए,
कंचनजी
बहुत दिनों के बाद पढ़ी है मैने कोई सुन्दर रचना
शब्दों का श्रॄंगार किया है भावों का पहना कर गहना
मेरी कोशिश यही रहेगी ऐसी रचना पधूँ नित्य ही
लेकिन तुम भी कोशिश करना
हाँ इस क्रम को जारी रखना
भावों की सुंदर अभिव्यक्ति!
बसंत पंचमी पर माँ से प्रार्थना है की आने वाले समय में आपके कलम का जादू सर चढ़कर बोले.
आमीन!
अजीत
माज़ी से न कोई शिक़वा, न उम्मीदें कोई कल की,
रिश्ता तुम से जो है, उसमें बातें हैं बस इसी सफर की।
मैं तो कोशिश खूब करूँगी, आज हमारा मैला न हो,
लेकिन तुम भी कोशिश करना,
रोज आज को नहला जाना ।।
वाह क्या बात है।
बहुत अच्छा लिखा आपने या यूँ कहें कि मन खुश कर दिया ।
अति उत्तम...आनन्द आ गया. बधाई.
किस दिन तुम ये समझ सकोगे, रीत प्रीत की क्या होती है,
जब जब मैं हारी हूँ तुम से, जीत सदा मेरी होती है।
मैं तो कोशिश खूब करूँगी, जीतो तुम्ही सदा मेरा मन,
लेकिन तुम भी कोशिश करना
मैं हारूँ तो सहला जाना ।।
बहुत सुंदर रचना है।
aaj pehli baar aapka blog dekha. aapke shabd seedhe dil par asar kar gaye.
kis din tum ye samajh sakoge, reet preet ki kya hoti hai,
jab jab mein haari hoon tumse jeet sada meri hoti hai.
mujhe ye panktiyaan behad pasand aayi. itni pyari rachna ki rachnakaar ko mera haardik abhinandan.
yar ye itne khoobsurat chitr tum kahan se lati ho????
कुछ लोग कलम के जादू से दुनिया को बेकल करते हैं...
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