पहले यूनियन लीडरशिप में और अपने सस्पेंशन में, फिर दीदी लोगो की शादी ढूँढ़ने में अक्सर ही तो बाहर जाना होता था उनका, गुड़िया के दिन पूरी तरह से जाते इससे पहले ही तो वो खुद चले गये। और मैं अब भी, आज बीस साल बाद भी यही कहती हूँ
चाहे गुड़िया ना लाना, पर पापा जल्दी आ जाना।
उस समय जब मैं छोटी थी बाबूजी कभी कोलकाता, कभी दिल्ली जाते थे और वापसी में गुड़िया भले ना हो कोई ना कोई खिलौना ज़रूर होता था उनके हाथ में।
कल से सोच रही हूँ, कहीं कोई रिमाइंडर तो नही लगा रखा है मोबाइल में फिर भी ये तारीख आने के पहले क्या क्या याद दिलाने लगती है। उनका हँसते हुए आना, मुझे देखते ही आह्लादित होना, सायकिल की गद्दी से उतरने से पहले ही मेरी तहकीकात. "सुबह कहा था, पेन लाने को लाये ???" और फिर शाम की सुइयों के साथ सड़क पर रखे कान..... मोपेड का हॉर्न....... और शिकायतों का पुलिंदा........! उनको देखते ही बातो में झगड़ालूपन अपने आप आ जाता था। मैं जितना लड़ के बोलती वो उतना मुस्कुराते। दुनिया की सबसे सुंदर, सबसे इंटेलीजेंट, सबसे वर्सेटाईल, सबसे विट्टी बेटी उनकी है ....ये उनकी आँखे बताती थीं। और मैं खुद में फूली नही समाती थी। सारी दुनिया मिल के उपेक्षा करे फिर भी, उनका प्यार मुझे उपेक्षित नही होने देता था।
हर बार याद आता है वो स्वप्न, जो मैने उनके जाने के १३ साल बाद देखा था और गोद में बैठ के उन्हे बार बार रोकते हुए कहा था कि after thirteen years of your departure I stiil love YOU ........दिनों की संख्या बदलती जाती है और मैं अब भी वही वाक्य उतनी ही शिद्दत से दोहराती हूँ कि after twenty years of your departure I stiil love YOU
पिछले दिनो नीरज जी की पोस्ट पढ़ी तो लगा कि आलोक श्रीवास्तव ने मेरे बाबू जी के लिये लिखी है ये कविता
घर की बुनियादें दीवारें बामों-दर थे बाबू जी
सबको बाँधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी
तीन मुहल्लों में उन जैसी कद काठी का कोई न था
अच्छे ख़ासे ऊँचे पूरे क़द्दावर थे बाबू जी
अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज सब ज़ेवर थे बाबू जी
भीतर से ख़ालिस जज़बाती और ऊपर से ठेठ पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी
कभी बड़ा सा हाथ खर्च थे कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी
बस हथेली की सूजन का वायस कभी नही बने मेरे लिये, ...!
अनुराग जी का बरगद का पेड़ जैसे मेरे ही मन की आवाज़ थी, बस फर्क इतना था कि मैं अक्सर ही उन्हे I Love YOU बोल लेती हूँ। उस समय का ऐसा कुछ असर था उनके ऊपर कि अंग्रेजी जितनी अच्छी व्यक्ति उतना ही प्रभावशाली। याद नही कब से तो उनसे अंग्रेजी बोलने लगी थी। और आज भी जब वो सपने में आते हैं तो मेरा वो स्वप्न इंग्लिश मे ही होता है।
लावण्या दी जब जब अपने पिता जी के विषय में बात करती हैं तो लगता है, कि भले मेरे बाबूजी को इतने सारे लोग ना जानते हों लेकिन बातें तो सब उन्ही की करती हैं दी ......!!!
यूनुस जी की पोस्ट से कितने लोग जुड़े, मुझे नही पता, लेकिन मैं उससे टूटी ही नही थी......! फिर सुनती हूँ...फिर सुनती हूँ.....! और फिर सुनती हूँ...!
<
सात समंदर पार से,
गुडियों के बाज़ार से,
अच्छी सी गुड़िया लाना,
गुड़िया चाहे ना लाना
पापा जल्दी आ जाना,
तुम परदेस गये जब से,
बस ये हाल हुआ तब से
दिल दीवाना लगता है,
घर वीराना लगता है,
झिलमिल चांद-सितारों ने,
दरवाज़ों दीवारो ने
सबने पूछा है हमसे,
कब जी छूटेगा हमसे,
कब होगा उनका आना,
पप्पा जल्दी आ जाना ।।
मां भी लोरी नहीं गाती,
हमको नींद नहीं आती,
खेल-खिलौने टूट गए,
संगी-साथी छूट गये,
जेब हमारी ख़ाली है,
और आती दीवाली है,
हम सबको ना तड़पाओ,
अपने घर वापस आओ और
कभी फिर ना जाना,
पप्पा जल्दी आ जाना ।।
ख़त ना समझो तार है ये,
काग़ज़ नहीं है प्यार है,
ये दूरी और इतनी दूरी,
ऐसी भी क्या मजबूरी,
तुम कोई नादान नहीं,
तुम इससे अंजान नहीं,
इस जीवन के सपने हो,
एक तुम्हीं तो अपने हो,
सारा जग है बेगाना,
पप्पा जल्दी आ जाना ।।






