Tuesday, June 1, 2010

पाज़ के बटन

उन्होने मुझसे कहा था " दो शेरों की बहन किसी चीज की चिंता नही करती"

उस सड़क छाप बैद्य ने जब जाने कौन कौन सी दवा बता कर कहा था कि ये ६ महीने में दौड़ने लगेगी तो मैने रो कर विरोध किया था कि "मुझे तमाशा मत बनाओ, ये कुछ नही कर पायेगा।" और उन्होने समझा के कहा था। " बच्ची पता तो हमें भी है कि ये कुछ नही कर पायेगा पर बस इस लिये खा लो कि रात को जब हम सोये तो ये सोच कर नींद ना उड़े कि शायद वो बैद्य सही कह रहा हो...."

उन फक़ीर से जब उन्होने कहा था " बाबाजी मैं बादशाह-ए-हिंदुस्तान हो जाऊँ मगर जैसे मोर अपने पैर की तरफ देख कर खुश नही रह सकता उसी तरह जब तक ये खुश नही रहती मैं खुश नही रह सकता। बाबा जी इसे इज्जत की रोटी ......" और आँसुओं ने उनका वाक्य पूरा नही होने दिया था।

उस दिन मैं बहुत रोई थी। मुझे लगा कि मेरे वो भईया जो ४०० लोगो के हुज़ूम के बीच दहाड़ के कहते हैं कि "मै निहत्था खड़ा हूँ आपके सामने जिसे जो करना हो करे। मैं भाग नही रहा.....!! मेरी माँ ने शेर पैदा किया है।" जिसके ऊपर गोली चल जाती है और वो शाम को मेरे रोने पर कहते है " ये देखो बस छिला है।" वो मेरे कारण यूँ किसी के सामने ऐसे बिलख रहे हैं। मैं शायद लोगो को रुला ही सकती हूँ।

और एक साल के अंदर ही जब मैने उन्हे बताया कि मेरा सेलेक्शन हो गया है तो फिर वैसे ही आँसू बह चले उनकी आँख से ...... बार बार वो कहते जा रहे थे " बेटा हम तुम्हे बहुत चाहते हैं।" और मैं बार बार जवाब दे रही थी " हम जानते हैं भईया "

तब जब सबको लगा कि ये नही जा पायेगी इतनी दूर अकेले। तब वो साथ खड़े हुए और कहा मैं तुम्हे ले के चलूँगा।

आप ने ही तो बताय था मुझे कितनी ही गज़लो के मानी.... सुनाये थे कितने सूफी गीत.....

सबके साजन साँझ भये लौटे घर की ओर
लेकिन तुम्हरी आज तलक साँझ भई ना भोर
मोरे रो रो के बहि गये नयनवा
बलम हाय॥तुम तो होई गये गुलरी के फुलवा.....


आज एक माह हो गया
























हम कैसे
करे विश्वास कि हाँ तुम चले गये

नोटः अनुराग जी कि पोस्ट को जाने कितनी बार देखा और खुद पॉज़ हुई ....... और बार बार सुना हिमांशु जी का ये गीत.... मेरे सामने जो था उसमे राम और लखन की भुमिका बदल गई थी। लखन की गोद मे राम और असहाय लखन का कथन हाय दईया करूँ का उपाय विरन तन राखे बदे

Wednesday, April 7, 2010

जेठ और बैसाख की ये दोपहर


जेठ और बैसाख की ये दोपहर,
तुमको अपने साथ अब भी खींच लाती है।

सामने अंबर तले धरती जले,
और हम तुम शांत थे महुआ तले।
प्रेम की शीतल छवि वह याद कर
ये धरा अब भी स्वयं का जी जलाती है।

लू हुई थी साँझ की मलयज पवन,
ताप यूँ पावन कि ज्यों दहका हवन,
पांव जलते, ले प्रतीक्षा की घड़ी,
घास की नर्मी का मन में सुख जगाती है।

झील के काई लगे उस कूल पे,
झाड़ का वो इक अजूबा फूल ले,
मेरी चोटी में सजाने की ललक,
आज भी मुझमें अजब सिहरन जगाती है।

तेरा आ पाना नही होता था जब,
दोपहर होती थी वो कितनी गजब,
तब जला करती थी खस की टांटियां,
अब भी वे यादें पसीना आ बहाती है।

श्रद्धेय श्री राकेश खंडेलवाल जी के संशोधन एवं आशीष के साथ।

Tuesday, April 6, 2010

ये प्यार नहीं है।


किसी खूबसूरत परों वाली चिड़िया को
चुगाओ हीरे के दाने,
पिलाओ झरनों का पानी,
उसके लिये बनाओ,
सोने का एक विशाल महल,
जड़ो,
शीशे के दरवाजे खड़कियाँ
सजाओ उसमें,
जन्नत के फूल, कलियाँ, हरियाली।

और उसके उड़ने के लिये आसमान
तुम करो निर्धारित


ये प्यार नहीं है।

Thursday, April 1, 2010

शहीद को श्रद्धांजली में ना पसंद क्या ?

अभी दो दिन पहले मेजर गौतम राजरिशी ने एक पोस्ट लगाई, जो कि एक मेजर की शहादत पर थी। एक साथी फौजी का अचानक जाने से शायर फौजी का दुखी होना लाज़मी था। ब्लॉग जगत के टिप्पणी व्यवहार से हम सभी परिचित हैं। इसी के चलते मेजर राजरिशी ने इस संवेदनशील पोस्ट पर टिप्पणी का विकल्प नही रखा। जिसका हर संवेदनशील व्यक्ति ने स्वागत भी किया। मगर आज जब यूँ ही ब्लॉगवाणी की सैर कर रही थी तो पाया कि इस पोस्ट को १० लोगो ने पसंद किया और दो लोगो ने नापसंद भी।





अपनी इस पोस्ट से मैं पूँछना चाहती हूँ उन किसी भी अतिसक्रिय महोदय/महोदया से कि इस साधारण संवेदनशीलता में ना पसंद सा क्या लगा ?


साथी मेजर की शहादत पर भावुक होना ?
या
टिप्पणी का विकल्प ना रखना ?


या
किसी "nice" या "वाह, अच्छी रचना" जैसे शब्दों से बचने का प्रयास करना ?



विरोध किसका



मेजर राजरिशी का
या
मेजर जोगेंदर की शहादत का


व्यथित हूँ। आक्रोशित हूँ।

अपने स्वार्थ में हम क़लम के पुजारी कितना गिर सकते हैं ? देश के लिये हुई शहादत को ब्लॉग के व्यक्तिगत विरोध में शामिल करना ?? आह॥! कितना घृणित और ओछा है हमारा व्यवहार।


पोस्ट लिखने का ध्येय गौतम राजरिशी के पक्ष विपक्ष में बैठना नही। मेजर जोगेंद्र शेखावत जैसे शहीदों से क्षमा माँगना है। वो ब्लॉगर नही थे। वो सैनिक थे। हमारी पसंद ना पसंद की राजनीति से ऊपर था उनका लक्ष्य....!



गौतम राजरिशी की गज़ल को जितना मन चाहे नापसंद कीजिये। देश के लिये शहीद किसी फौजी को श्रद्धांजली ना दे कर उस लेख पर नापसंद का चटका लगा कर आपने अपमानित किया है। लज्जित किया है।

शर्मसार हूँ कि मैं इस ब्लॉगजगत का हिस्सा हूँ।


Wednesday, March 10, 2010

गली में आज चाँद निकला



सबकी तरह मैं भी माँ से कहानियाँ सुनते बड़ी हुई। उन कहानियों के विषय अधिकतर देशभक्ति के हुआ करते थे। राणा प्रताप का राष्ट्र प्रेम से मौत तक समझौता ना करना। उनकी बच्ची का कहना

वो कौन शत्रु है जिसने,
हम सब को वनवास दिया है

एक छोटी सी पैनी सी तलवार मुझे भी दे दो
क्षण मुझको रण करने दो, मैं उसको मार भगाऊँ।

भगत सिंह का बंदूकें बोना, आजाद का कपड़ों की गठरी में बारूद बाँध कर धोबी के रूप में अंग्रेजों को धता बताना, दुर्गा भाभी का मेम बनना, सब मैने माँ से ही सुना।

वीर रस की कविताएं यूँ भी जल्दी याद होती और खाली मन में ओज भरती तो भी देशभक्ति का संचार होता। फिर टीन एज में जब पुरानी शहीद देखी तब तो विश्वास ही हो गया कि मैं पिछले जन्म में कोई क्रांतिकारी गुट की ही थी। तभी तो ये देशभक्त दिमाग से नही उतरते।

युवावस्था में आया कारगिल। जब टी०वी० पर दिखते शहीदों के माता पिता को भरी आँखों को छलकने से पूरी ताकत से रोकते हुए यह कहते देखती कि हम रो के अपने बेटे की शहादत को कलंकित नही करेंगे। और कई दिनो तक अपनी आँखें नम रहतीं। जाने क्यों फौजी अच्छे ही लगते थे। ऐसा लगता था कि जीने का शऊर इन्हे ही आता है

इसी तारतम्य में देखा नाम मेजर गौतम राजरिशी का असल में कुछ भी खास नही लगा पहली बार क्योंकि जाने कितने मेजर हैं यहाँ लखनऊ में और कुछ लोगो से मिलना हुआ तो लगा कि बस नाम को मेजर और देश के लिए जज्बे से कोसो दूर। देश के लिये कुछ करने का जज़्बा नही, बस फौजी होने का रुतबा..! सो बस एक नये ब्लॉगर जिसका वास्ता गुरुकुल से है ऐसा ही कुछ सामान्य भाव आया। फिर लगा कि जो पोस्ट लगाई जाती हैं वे कुछ खास होती हैं, तो ब्लॉग पर लगातार जाना और भाने पर कमेंट करना ये रीत बन गई।कुछ अखरा तब जब एक टिप्पणी आई कंचन जी आपसे शिकायत है कि आप टिप्पणी रोमन में करती हैं।

अजीब आदमी है ज्यादा टिप्पणियाँ ना करने वाली मैं इन्हे टिप्पणी कर देती हूँ यही बहुत नही है क्या? खैर शालीनता का लबादा ओढ़ कुछ जवाब दिय कि अगर देवनागरी में टिप्पणी करूँ तो शायद बिलकुल टिप्पणियाँ कर ही ना पाऊँ।

एक अतुकांत कविता वर्षा वन आने के बाद कुछ अधिक प्रभावित हुई इस ब्लॉगर से और इनकी पोस्टों का इंतज़ार रहने लगा।

मगर खास तो तब हुआ जब २६/११ की घटना हुई। सबकी तरह मेरे मन भी आक्रोश और कुछ ना कर पाने की पीड़ा थी।कितने निर्दोष असहाय मारे जा रहे थे। इसी बीच संदीप उन्नीकृष्णन का जाना देख देख अजीब सा मन होता। दुःख और आक्रोश के मिश्रित भाव आते।

तभी राजरिशी जी की पोस्ट आती है उन्नीकृष्णन पर। पढ़ा कि कमांडो ट्रेनिंग साथ साथ की थी दोनो ने।

ओह तो इन्होने कमांडो ट्रेनिंग कर रखी है। यानी नाम के लिये फौजी नही हैं लड़ने वाले फौजी हैं। इस के बाद एक अलग सम्मान हो गया मन में इनके लिये।

जब जब ये क़लम सरहदों के, फौज के, देश के विषय में लिखती कुछ अलग सा हो जाता मन। मन में आता कि एक लंबा खत लिखूँ इस आभासी अजनबी को। कमेंट लिखने में प्रयोग हृदयतल की सीमा और गहरी होती गई और इसी मार्च माह के उस दिन जब पोस्ट में पढ़ा कि ये काश्मीर को शोभित करने आखिर पहुँच गये, उस दिन खुद को रोक ना पाई और एक खत लिख ही दिया

गौतम जी !
कहा था ना कि आपको पढ़ते ही मन होता है, कि एक लंबी मेल लिखने बैठ जाऊँ आपको....! आज की पोस्ट पढ़ने के बाद नही रोक पाई खुद को।


एक जमाना था .... कारगिल युद्ध तक। जब मन होता था कि काश..! मेरे घर से कोई युद्ध के लिये जाता, वीर क्षत्राणियों की तरह तिलक लगा कर भेजती मैं, हाथ में बंदूक दे कर, आखों की कोरों पर आये आसुओं को ज़ब्त करते हुए कहती " विजयी हो कर लौटना, हमारी चिंता मत करना, देश की उन बहनों की चिंता करना, जिनकी अस्मत तुम्हारे हाथ है। उन दुश्मन मेमेनों पर सिंह की तरह टूटना....! उस भारत भूमि को दूसरों के हाथ में मत जाने देना जिस की संस्कृति सब से पुरानी है।"

हाँ तब जब कारगिल युद्ध हुआ था मैने अपने सबसे प्यारे दोस्त और मेरी नज़र सबसे खूबसूरत और वीर भतीजे 'लवली' से कहा था कि तुम लड़ने चले जाओ। उसका दोस्त मेरा मुँह बोला भाई था और दोस्त की बहन इसकी मुँह बोली बहन। उस बहन ने छूटते ही क्रोध से कहा था "अरे क्या बात करती हो, दुनिया भर में मेरा ही भाई मिला है शहीद होने को।" मैने गंभीरता से मुस्कुराते हुए कहा था " जो शहीद होते हैं, वो भी किसी के भाई होते हैं...!"

२३ २४ साल की वो उम्र शायद सिर्फ भावुकता वाली थी। जब मैने कारगिल राखियाँ भेजी थीं और एक दूर के रिश्ते के भाई ने लौटती डाक से कहा था कि "मुझे अपनी नौकरी के १६ सालो में इतनी भावुक चिट्ठी कोई नही मिली। मुझे विश्वास हो गया कि तेरी राखी के आगे दुश्मनो की गोली मेरा कुछ नही बिगाड़ पायेगी" और लौटते समय सारे दोस्त मेरे घर पर मुझसे मिलने आये थे, उस अंजान बहन से जिस ने राखी भेज कर उनकी सलामती की दुआ की थी।

मगर अब जीवन के इस मोड़ पर शायद भावनाएं अब कोरी नही रह गईं, दुनिया के बहुत से स्वार्थी रंग इस पर चढ़ गए। तभी तो एक अंजान व्यक्ति जिस से न मेरी मुलाकात है, ना बात..बस कुछ नज़्मों का रिश्ता, उस के ट्रांसफर विषय में जब से सुना था तब से मन में आशंका थी कि कहीं जम्मू मे तो पोस्टिंग नही मिल रही और आज जब आपकी पोस्ट पढ़ी,तो कहने की तो बात नही मगर आँसू यूँ निकलने लगे जैसे लवली की ही पोस्टिंग वहाँ हो गई हो। जितने कमेंट पढ़ रही थी भावुकता उतनी ही बढ़ रही थी। मन हुआ कि झट तनया को गोद ले कर कहूँ "पापा जब तक नही आते, तब तक बुआ से सारी जिद करना"

सच गंगोत्री की गंगा, कानपुर आते आते कितनी मिट्टी साथ ले आती है। कुछ भी पहले सा साफ नही रह जाता? वो उम्र कितनी भोली थी जब किसी को भी कोई संबोधन देते हिचक नही होती थी। मगर आज हो तो रही है, फिर भी कहूँगी..कि पता नही आप मुझसे एक दो साल बड़े हैं या छोटे या फिर हम उम्र...! मगर जो मेरी रक्षा में वहाँ खड़ा है, वो रक्षक मेरा वीर ही होगा। जाने क्यों एक छोटी बहन सा भावुक हो कर कहने को मन हो रहा है " जल्दी आना भईया, मैं इंतज़ार करूँगी। अपना ध्यान रखना और मेरा भी।"

कभी लखनऊ से निकलना हो तो ज़रूर मिलने आइयेगा। साथ में भाभी जी और तनया रहें तो और भी अच्छा.....!
खुदा हाफिज़
आपकी
कंचन

रोज उत्सुकता से मेल चेक करने के परिणाम में तीन दिन बाद जवाब आया

कंचन तुम,
स्नेहाशिष !


तुम मुझसे छोटी हो और फिर तुमने "वीर" तो कहा ही है.....ये रूलाने वाली आदत जो है ना तुम्हारी, एकदम गलत है वो भी एक फौजी को रूलाती हो...लोग क्या कहेंगे !!!

पता है ब्लौग पर आते ही तुम संग कुछ जुड़ गया था ये रिश्ता....तुम्हारे शब्दों को देख कर लगा कि कुछ है जो खिंचता है मुझे....

देखो फिर से रो पड़ा हूँ....

कश्मीर के इस सुदूर कोने में बैठा, इस इंटरनेट को शुक्रिया अदा करता हूँ....इससे पहले भी दो पोस्टिंग काट चुका हूँ किंतु ये सुविधा पहले नहीं थी...

जिंदगी थोड़ी सी कठिन जरूर है मगर मजा आता है, सच पूछो तो....

हाँ शादी हो गयी है और फिर तनया एक साल की हो गयी है तो उस वजह से कुछ भावुक अवश्य हो जाता हूँ कभी-कभी...

लखनऊ आने का अब तो बहाना ढ़ूंढ़ना पड़ेगा अपनी इस अलबेली बहना की खातिर...

"कंचन" रहो हमेशा अनवरत...

तुम्हारा वीर
-गौतम

और फिर जाने कब ऐसा हुआ कि लगा ही नही कि ये शख्स आभासी दुनिया का हिस्सा है। जो बाते कभी किसी को नही कही होगी वो भी जाने किस तरह बताती चली जाती हूँ, इस जादुई रिश्ते को। बात का हेलो कहते ही समझदारी जाने कहाँ चली जाती है और मैं एकदम से छोटी हो जाती हूँ। ऐसा लगता है कि शायद बहुत दिनों का साथ है।

कितनी बार पानी को अचानक चट्टान बनते और पत्थर को पिघलते देखा।

जब गोली खाई तब तो सबने जाना मगर इससे ज्यादा भयंकर दिन जिन्हे वो खुद कभी बयाँ नही करेंगे और मुझे करने नही देंगे। ७२ घंटे लागातार बारिश और एक चट्टान की आड़ में हथियार लिये बैठा एक फौजी शायर क्या करता होगा उन घंटों के मिनटों और मिनटों के सेकण्डों में। कभी एक बहन की तरह सोच के देखियेगा। लिहाफ के अंदर तड़ तड़ बूँदे चेहरे को तीखी लगने लगती हैं।

कल्पना और हक़ीकत में बड़ा अंतर होता है। आप मुझे कमजोर कह सकते हैं, मैं हूँ भी। कल्पना में फौजी की बहन बनना जितना बहादुरी का काम लगता था, उतनी ही कमजोरी से हर बार बस एक बात निकलती है "अपना खयाल रखना।"


लगा ही नही कि मिली नही हूँ अपने वीर से मगर उस दिन सारे दिन जुबाँ पर ये गीत रहा जो शीर्षक में है....! गली में आज चाँद निकला
वो दिन ही कुछ ऐसा था....










आज आप के जन्मदिन पर आप को बताना चाहती हूँ कि आप जैसे लोगो को जिंदगी में पाने के बाद ईश्वर से नज़र मिला के शिकायत नही की जा सकती.... और ये भी कि कभी कभी अपनी फीलिंग्स न जताना, फीलिंग सही मायने में रखना बताता है... और ये भी कि एक सच्चे और अच्छे भाई के सारे गुण हैं आप में (अवगुण भी).... और ये भी कि आप को वीर के रूप में पाना मुझ को गौरवान्वित करता है... इस गौरव को बनाए रखना... अपना ख़याल रखना



आपकी प्रेमिकाओं को ढूँढ़ने निकली तो पता चला सब इंगेज हो चुकी हैं। कुछ कुछ इनकी शक्ल-ओ-सूरत मिल रही थी तो आपको केक खिलाने के लिये इन्हे ही पकड़ लाई

LONG LIVE DEAR BRO..... MANY MANY HAPPY RETURNS OF THE DAY


Tuesday, February 23, 2010

काकः काकः, पिकः पिकः


ये आवाज़ अक्सर परीक्षा के समय कूजती थी। जब सारी दुनिया से ध्यान हटा कर एक लक्ष्य परीक्षा होती दिन रात के परिश्रम में जब इसकी आवाज़ कान में पड़ती तो मन कुछ हलका सा प्रतीत होता था। अब भी जब ये आवाज़ सुनती हूँ तो हाथ में पु्स्तक लिए बाउंड्री के भीतर पड़ी खटिया पर खुद को औंधी पाती हूँ।
सर्विस के बाद जब दोबारा एम०ए० हिंदी कर रही थी उस समय भी अचानक ये बोली उस दिन रमेश भईया आये हुए थे। तो अनायास ही मुँह से निकला, "देखो कितना अच्छा लगता है जब ये बोलती है।"
वो मुस्कुरा कर बोले "मगर मुझे कोयल पसंद नही आती।"


अजीब सी बात लगी मुझे ये, भला कोई ऐसा भी हो सकता है जिसे कोयल न अच्छी लगती हो ? फिर उन्क्स्होने कुछ कारन बताये..... उसी आधार पर लिखी गई है ये लम्बी तुकबंदी। लीजिये पढ़िए ०९.०४.२००६ को लिखा गया ये कुछ


मेरी बगिया में पेड़ हैं दो, इक आम और इक कटहल का,

कटहल में वास काग का है और आम घरौंदा कोयल का।

इक दिन सूरज ढलने को था और मै बैठी थी बगिया में,

संग में मेरा था प्रिय मित्र और मै सपनीली दुनिया में।

ऋतु भी बसंत कुछ ऐसी कि, सब कुछ रूमानी होता है,

उस पर कोयल कि कुहू कुहू फिर खुद पे कहाँ वश होता है।

मै काँधे पर धर शीश मीत के आँखों को थी बंद किये,

जीती थी उस हर इक पल को, हर आहट पर थी कान दिए।

पर जैसे मिश्री की डालियों में इक नीम गिलौरी आ जाए,

वैसे ही वहाँ एक स्वर गूँजा, इक कौवा बोला काँय काँय।

मै खीझ बहरे स्वर में बोली, मेरा मुँह था कुछ तना ताना ,

भगवान् तुझे ये क्या सूझी, कोयल संग कागा दिया बना।

इतने में मेरे कानो में रूखा पर भीगा स्वर आया,

ये स्वर उस कागा का ही था उसका था गला कुछ भर आया।

उस भीगे स्वर में वो बोला "देवी मेरा अपराध कहो,

तुम तो दर्शन में जीती हो कम से कम तुम तो ये न कहो।

ना काम कोई भी बुरा किया, किस्मत में जो था उसे लिया,

फिर भी तुम जैसे कहते हैं क्यों, काकः काकः, पिकः पिकः।

न ठिठुरन सर्दी की झेले, न जेठ दोपहरी में आये

ये कोयल सबको प्यारी है, जो बस बसंत ऋतु में गाये।

मैंने गर्मी कि तपन सही, ठिठुरन सर्दी कि झेली है,

पर कहीं पलायन नहीं किया, विपदा सर आँखों पर ली है,

वो कोयल जो अपने अंडे तक मेरे घर रख जाती है,

मातृत्व बोध भी नहीं जिसे, वो सबके मन को भाती है।

अपने शिशुओं की नही हुई जो, वो समाज की क्या होगी,

मै एक समूह में रहता हूँ, ये बात गौर की ही होगी।

जिसको समूह में रहना है, उस पर एक जिम्मेदारी है,

खुद में जीना गाने गाना ये बात कौन सी भारी है।

जूठा कूठा साँझा कच्चा, जो भी मिलाता है खाता हूँ।

इस पर सब मुझको कहते हैं, मै बिना बात चिल्लाता हूँ।

मेरा स्वर मीठा नहीं सही, संदेशे मीठे लाता हूँ,

आने वाला है परदेसी सजनी को जा बतलाता हूँ।

वो जो इठलाई फिरती है, जो फुदक रही डाली डाली,

उसकी बस किस्मत अच्छी है, पर वो मन से भी है काली।

जब आम बौरने लगते हैं, मीठा सा मौसम आता है,

अनुकूल सभी कुछ होने पर, ये पंचम सुर लहराता है।

मीठे सुर से छलने वाली पर दुनिया मोहित रहती है,

पर मेरे मन कि सच्चाई मुझमे ही तिरोहित रहती है।

सब कुछ किस्मत की बाते हैं, सहना पड़ता है भाल लिखा,

ज्ञानीजन ठोकर खाते हैं, मूरख देते हैं राह दिखा।

देवी तुम से ये विनती है, फिर से पढ़ना ये शाष्त्र लिखा,

और नया अर्थ देना इसको है काकः काकः, पिकः पिकः "




Wednesday, February 17, 2010

एक मुक्तक




बहरे मुतकारिब सालिम मक़बूज असलम (१६ रुक्नी) जिस पर इस बार की तरही भी है और गुरु जी ने ढेरों गीत इस बहर पर बता रखे हैं। इसी बहर पर ये ताज़ा ताज़ा मुक्तक गुरु जी के आशीष से....


मिलो किसी से तो अपना दिल तुम,
ना पूरा पूरा उठा के रखना।
वो जैसा दिखता है, हो कि ना हो,
ये मन को अपने बता के रखना।
जो ज्यादा समझा किसी को तुमने,

तो दाग फितरत के सब दिखेंगे,
ज़रा सी दूरी बना के रखना,

ज़रा सा खुद को बचा के रखना।