Tuesday, February 23, 2010

काकः काकः, पिकः पिकः


ये आवाज़ अक्सर परीक्षा के समय कूजती थी। जब सारी दुनिया से ध्यान हटा कर एक लक्ष्य परीक्षा होती दिन रात के परिश्रम में जब इसकी आवाज़ कान में पड़ती तो मन कुछ हलका सा प्रतीत होता था। अब भी जब ये आवाज़ सुनती हूँ तो हाथ में पु्स्तक लिए बाउंड्री के भीतर पड़ी खटिया पर खुद को औंधी पाती हूँ।
सर्विस के बाद जब दोबारा एम०ए० हिंदी कर रही थी उस समय भी अचानक ये बोली उस दिन रमेश भईया आये हुए थे। तो अनायास ही मुँह से निकला, "देखो कितना अच्छा लगता है जब ये बोलती है।"
वो मुस्कुरा कर बोले "मगर मुझे कोयल पसंद नही आती।"


अजीब सी बात लगी मुझे ये, भला कोई ऐसा भी हो सकता है जिसे कोयल न अच्छी लगती हो ? फिर उन्क्स्होने कुछ कारन बताये..... उसी आधार पर लिखी गई है ये लम्बी तुकबंदी। लीजिये पढ़िए ०९.०४.२००६ को लिखा गया ये कुछ


मेरी बगिया में पेड़ हैं दो, इक आम और इक कटहल का,

कटहल में वास काग का है और आम घरौंदा कोयल का।

इक दिन सूरज ढलने को था और मै बैठी थी बगिया में,

संग में मेरा था प्रिय मित्र और मै सपनीली दुनिया में।

ऋतु भी बसंत कुछ ऐसी कि, सब कुछ रूमानी होता है,

उस पर कोयल कि कुहू कुहू फिर खुद पे कहाँ वश होता है।

मै काँधे पर धर शीश मीत के आँखों को थी बंद किये,

जीती थी उस हर इक पल को, हर आहट पर थी कान दिए।

पर जैसे मिश्री की डालियों में इक नीम गिलौरी आ जाए,

वैसे ही वहाँ एक स्वर गूँजा, इक कौवा बोला काँय काँय।

मै खीझ बहरे स्वर में बोली, मेरा मुँह था कुछ तना ताना ,

भगवान् तुझे ये क्या सूझी, कोयल संग कागा दिया बना।

इतने में मेरे कानो में रूखा पर भीगा स्वर आया,

ये स्वर उस कागा का ही था उसका था गला कुछ भर आया।

उस भीगे स्वर में वो बोला "देवी मेरा अपराध कहो,

तुम तो दर्शन में जीती हो कम से कम तुम तो ये न कहो।

ना काम कोई भी बुरा किया, किस्मत में जो था उसे लिया,

फिर भी तुम जैसे कहते हैं क्यों, काकः काकः, पिकः पिकः।

न ठिठुरन सर्दी की झेले, न जेठ दोपहरी में आये

ये कोयल सबको प्यारी है, जो बस बसंत ऋतु में गाये।

मैंने गर्मी कि तपन सही, ठिठुरन सर्दी कि झेली है,

पर कहीं पलायन नहीं किया, विपदा सर आँखों पर ली है,

वो कोयल जो अपने अंडे तक मेरे घर रख जाती है,

मातृत्व बोध भी नहीं जिसे, वो सबके मन को भाती है।

अपने शिशुओं की नही हुई जो, वो समाज की क्या होगी,

मै एक समूह में रहता हूँ, ये बात गौर की ही होगी।

जिसको समूह में रहना है, उस पर एक जिम्मेदारी है,

खुद में जीना गाने गाना ये बात कौन सी भारी है।

जूठा कूठा साँझा कच्चा, जो भी मिलाता है खाता हूँ।

इस पर सब मुझको कहते हैं, मै बिना बात चिल्लाता हूँ।

मेरा स्वर मीठा नहीं सही, संदेशे मीठे लाता हूँ,

आने वाला है परदेसी सजनी को जा बतलाता हूँ।

वो जो इठलाई फिरती है, जो फुदक रही डाली डाली,

उसकी बस किस्मत अच्छी है, पर वो मन से भी है काली।

जब आम बौरने लगते हैं, मीठा सा मौसम आता है,

अनुकूल सभी कुछ होने पर, ये पंचम सुर लहराता है।

मीठे सुर से छलने वाली पर दुनिया मोहित रहती है,

पर मेरे मन कि सच्चाई मुझमे ही तिरोहित रहती है।

सब कुछ किस्मत की बाते हैं, सहना पड़ता है भाल लिखा,

ज्ञानीजन ठोकर खाते हैं, मूरख देते हैं राह दिखा।

देवी तुम से ये विनती है, फिर से पढ़ना ये शाष्त्र लिखा,

और नया अर्थ देना इसको है काकः काकः, पिकः पिकः "




Wednesday, February 17, 2010

एक मुक्तक




बहरे मुतकारिब सालिम मक़बूज असलम (१६ रुक्नी) जिस पर इस बार की तरही भी है और गुरु जी ने ढेरों गीत इस बहर पर बता रखे हैं। इसी बहर पर ये ताज़ा ताज़ा मुक्तक गुरु जी के आशीष से....


मिलो किसी से तो अपना दिल तुम,
ना पूरा पूरा उठा के रखना।
वो जैसा दिखता है, हो कि ना हो,
ये मन को अपने बता के रखना।
जो ज्यादा समझा किसी को तुमने,

तो दाग फितरत के सब दिखेंगे,
ज़रा सी दूरी बना के रखना,

ज़रा सा खुद को बचा के रखना।

Sunday, February 14, 2010

तुमने इश्क का नाम सुना है, हम ने इश्क किया है


बेतहाशा चूमते हुए होंठो पर

अपना हाथ रख के,

उस दिन जब पूंछा था तुमने

कि

"अब क्यों नहीं लिखता मै कविता तुम पर"

कहना चाहता था

कि

"लिख ही तो रहा था अभी

जब तुमने अचानक रख दिया हाथ.......!!"


नोट: किसी ने किसी से कहा ऐसा और मैंने जस का तस लिख दिया कभी कभी यूँ भी हो जाती है कविता

Sunday, February 7, 2010

बाबुल तेरे प्यार ने तो मुझे सिर पर चढ़ा लिया



और आज फिर याद आया सब कुछ .....! पांडे जी की बेटियों को उनकी थाली में खाते देख याद आया आपका कौर तोड़ कर मिर्च अलग कर कर के खाना खिलाना। उन सबका मचलना देख कर याद आया अपना बचपन जो शायद आज ही के दिन बहुत हद तक खतम हो गया था।

ऐसा नही कि आपके जाने के बाद ही आपकी कीमत समझ आई। आपके रहने पर भी तो आप उतने ही प्रिय थे। अम्मा हमेशा कहतीं कि जाते हम दोनो हैं और लौटने पर बाबूजी को पकड़ के रोती है ये। १४ साल की उम्र में ये तो उद्गार थे मेरे बाल मन के

नही प्रतीक्षा अब होली की इंतजार दीवाली का,
लौटा दो जो साथ ले गये प्यार तुम अपनी लाडली का।

वही लाडली जिसकी आँखें क्षण भर जो भर आती थीं,
तो मानो रग रग में आपके पीड़ा सी भर जाती थी

जिस घटना की कल्पना कर ना सोई सारी रात
वो घटना चरितार्थ हो गई और मैं रह गई मलती हाथ।

आऊँगा मैं लौट अभी फिर, वादा कर के गये थे आप,
आये तो पर चक्षु बंद थे, जाने क्यों ना बोले आप

वो ही आँखें जिन आखों मे बस दुलार था मेरी खातिर,
वो ही कर थे जिन हाथों में लाड़ बहुत था मेरी खातिर

वो ही चेहरा, वो ही पलकें, वो ही थे सब अंग तुम्हारे,
पर जाने क्यों सब कहते थे, बाबूजी ना रहे तुम्हारे।

कितना चिल्लाई बाबूजी, एक बार दो आँखें खोल,
जाओ मैं ना रोकूँगी पर एक बार दो गुड्डन बोल

जाने किन पुण्यों का फल था पिता मिले जो आपसे,
जाने किन पापों का फल था अलग हुई जो आपसे

दो पैसा मुझको जिद करना, वो लड़ना, वो चिल्लाना,
हैं सारी अतीत की बातें पास रहा अब कुछ भी ना

है जीने की चाह नही अब, ले लो मेरा सारा जीवन,
पर उसके बदले में दे दो, बाबूजी के संग गुजरे क्षण।

वो क्षण जिसमें मैं नाराज़ थी और बाबूजी मुझे मनाते
वो क्षण जिसमें मैं रोती थी बाबूजी मुझको फुसलाते।

वो क्षण जिसमें मैं ज़िद करती और बाबूजी गुड़िया लाते
जो कुछ उनसे कह दो ला कर मेरे सारे स्वप्न सजाते।

वो क्षण जिसमें मैं और दीदी कहते बाबूजी मुझे चाहते
और हमारी बातें सुन कर बाबूजी केवल मुसकाते

और ये गीत जब आता था तो कितनी छोटी थी मैं ....पाँचवीं क्लास में थी शायद। मैं और दीदी दोनो ही खुश हो जाते थे ये गीत सुनकर। हम दोनो को लगता कि ये गीत मेरे बाबूजी गा रहे हैं।




बाबुल तेरे प्यार ने तो मुझे सिर पर चढ़ा लिया।

Monday, February 1, 2010

इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।


कौन है जो जिंदगी तनहा बिताना चाहता है,
जिदगी को चुन लिया तनहाइयों नें किंतु मेरी,
अब मुझे जैसी मिली, वैसी बिताना चाहती हूँ,

इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।

छूट जाने के लिये ही मीत जब सारे मिले हैं,
दिल जलाने के लिये ही दीप जब सारे जले हैं,
क्यों न फिर जलते हुए इस दिल की लौ रोशन करूँ मैं,
और उस लौ से किसी के दिल के तम को अब हरूँ मैं।

इस तरह जलते हुए मैं जगमगाना चाहती हूँ।

इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।

मैं किसी की प्रार्थना में हूँ न हूँ शामिल भले ही,
पर मेरी हर प्रार्थना, शुभकामना सबको मिले ही।
हो न हो मेरे लिये आँखें किसी की नम यहां पर,
पर सभी के पीर पर नम हो मेरी आँखें पिघल कर।
मैं सभी के अश्क ले कर मुस्कुराना चाहती हूँ।

इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।

उस विधाता ने किसी इक ध्येय से सबको गढ़ा है
और अपना ध्येय मैने भाल पर ये ही पढ़ा है।
पैर के काँटे न रोकें होंठ की खिलखिल हँसी को,
फूल का मतलब बताना,लक्ष्य मेरा हर किसी को
इसलिये ही हर चुभन में गुनगुनाना चाहती हूँ

इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।

नोटः रविकांत जी और शार्दूला दी को धन्यवाद के साथ जिन्होने पढ़ने लायक बनाया इसे। और चित्र साभार गूगल जिसका शीर्षक था Might Be Laughing :)

Tuesday, January 12, 2010

मुझे नज़र से डर लगता है।

प्यार तुम्हारा मुझ में रम कर,
नित मुझको सुंदर करता है,
मुझे नज़र से डर लगता है।

आँखों में काजल बन बैठे, होंठों पर लाली बन साजन,
तिल बन कभी कपोल सजाते,कभी दृष्टि बन पूरा तन मन,
कभी मुझे प्रतिबिंबित करते,
यूँ जैसे दर्पण करता है,
मुझे स्वयं से डर लगता है।

तुमने मन में फूल खिलाये, चुनने का अधिकार तुम्हे है,
रंगो रंग में और गंध में घुलने का अधिकार तुम्हे है,
मर्दन का अधिकार उसे है,
जो सर्जन का दम भरता है।
किसे अंत से डर लगता है ??

सुबह बहुत छोटी होती है, लंबी होती रात, दुपहरी,
कौन भला ऐसा जीवन है, जिसमें मधुॠत हर पल ठहरी,
मधुॠतु को सारथी बना कर,
पतझड़ अपना रथ धरता है,
अब बसंत से डर लगता है।

डर के सारे द्वार तोड़ कर, प्रिय तुम मेरा साथ निभाना,
अंतहीन अपनापन ले कर, विरहहीन इक मिलन सजाना,
वह इक मिलन सॄष्टि की रचना
का आधार हुआ करता है,
और मिलन से डर लगता है..!!

आभारः राकेश् खण्डेलवाल जी, शार्दूला दी एवं रविकांत जी जिनके कारण गीत पढ़ने काबिल हुआ

Thursday, December 17, 2009

एक इंसान हूँ मैं तुम्हारी तरह


हरिश्चंद्र श्रीवास्तव जी पूर्णतः दृष्टिहीन हैं। उनकी दवा के पर्चे पर देखकर मुझे पता चला कि उनकी उम्र ७० वर्ष है, अन्यथा मुझे तो ५५ ही लगती थी। और इसके बावज़ूद वो एक दृष्टिबाधित विद्यालय चलाते हैँ। जिसमें कभी ४० विद्यार्थी पढ़ा करते थे।

कई बार सोचा था आप लोगो से उनके विषय में बाँटने को, मगर कुछ न कुछ दूसरा आ जाता तो श्रीवास्तव जी पीछे रह जाते। ये तो मुझे भी नही याद आ रहा है कि किस तरह श्रीवास्तव जी से मुलाकात हुई। पर जब से हुई तब से दिमाग से उतरे नही वो। एक दुबला पतला शरीर। जिसे अपने रास्ते पर चलने के लिये किसी और से मार्गदर्शन लेना पड़ता हो, वो शख़्स ४० ऐसे बच्चो का मार्गदर्शन कर रहा है, जो अँधेरों में भटक रहे हैं।

मोहित, आकाश, विजेंद्र, जैसे जाने कितने बच्चे, जिनमे किसी के पिता ठेला लगाते हैं, किसी के फेरी, किसी के दिहाड़ी की मज़दूरी। उनके लिये किसी काम के नही है वो बच्चे। 7-8 की तादात में की गई उनकी वंशवृद्धि का रुतबा इस एक के होने से ज़रूर बिगड़ता है, ना होने से नही। जितने बच्चे होंगे, उतने हाथ कमाई कर के लायेंगे। मगर बदकिस्मती से हुए फाउल जैसी ऐसी संतान का वो करें क्या? ये ला कर तो कुछ ना देगी मगर इसे खिलाने में एक तो बिना रिटर्न का इनवेस्टममेंट दूसरे तीमारदारी में एक और व्यक्ति को लगने से दोहरा नुकसान...! ऐसे में जो बच्चा श्रीवास्तव जी के विद्यालय में आ जाता है उसे माँ बाप वापस ना ले जाने की ही पूरी कोशिश करते हैं।

विद्यालय मे पहुँचते ही बच्चों के चेहरे पर आई खुशी को देख कर आप को लगेगा कि हम कहाँ बिना मतलब की औपचारिक मुस्कानों में फँसे है। असली मुस्कान तो यहाँ बसी है।

"दीदी अबकी आप किस चीज से आई हो।... वो बंदूक आप राहुल को दे गईं थी, अबकी हमे देना।...बहुत बहुत दिन बाद आती हैं आप...अब कब आयेंगी.. १० दिन बाद आ जायेंगी..ठीक १० दिन बाद ना...!"

और मै झूठा वादा कर के आ जाती। १० दिन बाद कौन कहे महीनो नही जा पाती। श्रीवास्तव जी ने लगभग २ साल पहले बताया कि सरकारी सहायता जो थोड़ी बहुत मिलती थी,वो बंद हो गई, नई सरकार आने पर। अब तो रेगुलर डोनेटर्स का ही सहारा है। मैं आश्चर्य में पड़ जाती, रेगुलर डोनेटर्स के बल पर इतना बड़ा जिम्मा... और डोनेटर्स कितने रेगुलर हैं ये तो मैं खुद से ही जानती हूँ।

इसके बावज़ूद विद्यालय चलता रहा। बीच बीच में श्रीवास्तव जी की खबर ले ली जाती या वो खुद दे देते। "बस गवर्नमेंट एड फिर से मिलनी शुरु हो जाये, फिर सब ठीक हो जायेगा।" श्रीवास्तव जी विश्वास से कहते या फिर हम लोगो को विश्वास दिलाते।

अधिकतर मेरी समस्याओं के चलते वे किसी को आफिस भेज देते, अगर कोई काम होता। जुलाई तक की खबर थी, इस बार सोचा कि चलो चलके देख आते हैं बच्चों को। मैने श्रीवास्तव जी की लोकेशन जानने के लिये फोन मिलाया। तो फोन विद्यालय के एक लड़के वीरेंद्र ने उठाया जो देख सकता था। (दो ऐसे बच्चे जो गरीब घरों के हैं और देख सकते हैं वे इस विद्यालय में बाजार और दृष्टि से संबंधित काम करते हैं) और उसने बताया "मैम जी अब तो विद्यालय वहाँ नही रहा जहाँ था।"

आर्थिक सहयोग ना मिल पाने के कारण विद्यालय के पूर्व भवन का किराया नही दिया जा सकता था अतः घर बदलना पड़ा। खैर मैं पिंकू को ले कर फोन करके पता पूछते हुए वहाँ पहुँची। संस्था अब संकरी गलियों के बीच थी। एक बाउंड्री रहित घर...! जिसके छोटे से दरवाजे के अंदर प्रवेश करते ही बैठक कक्ष शुरु हो जाता है और वहीं बेड पर श्रीवास्तव जी पड़े थे। "कैसे है ?" का जवाब देने में ऐसा लगा कि उन्हे शरीर की पूरी ताकत लगा देनी पड़ी। वीरेंद्र ने बताया कि फेफड़ों में समस्या है। एक कंकाल पर पतला सा चमड़े का आवरण मात्र ही रह गया था शरीर के नाम पर....! पहले वाला भवन मेरे विद्यालय के पास ही था, तो मैं अकेले चली जाती थी। घर से पिंकू मेरे साथ पहली बार आया था। मैने देखा कि उसकी आँख में आँसू उमड़ रहे हैं और वो बार बार चेहरा घुमा ले रहा है।

वो पितृपक्ष के दिन थे। एक हाई प्रोफाईल दंपत्ति ने कमरे में प्रवेश किया। कल उनकी माता जी का श्राद्ध था और वो यहाँ खाना खिलाना चाह रही थीं। उन्होने ७०० रुपये का पेमेंट किया और मेन्यू पूछा आप क्या क्या खिलायेंगे ? वीरेंद्र ने बताना शुरु किया उससे पहले श्रीवास्तव जी ने हाँफती हुई आवाज़ में बताया।
"बस..? मिठाई नही" श्रीवास्तव जी के मेन्यू बताने के साथ ही उन्होने आश्चर्य से पूछा।
"आप कहेंगी तो मिठाई भी कर लेंगे।" वीरेंद्र ने कहा
"आपने तो चालीस बच्चे बताये है, यहाँ तो २८ हैं।"
" कुछ बच्चे सुबह पढ़ने आते हैं, विद्यालय में नही रुकते, मगर खाना तो उन्हे भी देना पड़ता है। फिर खाना बनाने जो आती हैं वो अम्मा। जो बर्तन झाड़ू पोंछा करती हैं वो और मैं और मोहित भी हैं।"
"ये लोग भी खायेंगे...! असल में हमे अपनी माँ का श्राद्ध करना है ना तो हम चाह रहे हैं कि खाना सही जगह पहुँचे।"
मेरा धैर्य जवाब दे रहा था। मगर शांत थी। ७०० रु में हम अपने घर में भी क्या इस मँहगाई के दौर में ४० लोगों को ठीक से भोजन करा सकते हैं ?

इसके बाद उन्होने प्रश्न किया "कितने बजे खिला देंगे"
"१०.००"
"फिर कितने बजे देते हैं कुछ खाने को ?"
"फिर ८.०० बजे रात में"
"इतना लंबा गैप?...बीच में कुछ भी नही...!"

मुझे शालीनता का लबादा ओढ़ कर बोलना पड़ा। "आप निश्चिंत रहें, आपकी माँ के श्राद्ध के लिये इससे बेहतर जगह और कोई नही हो सकती। और ये जो बच्चे हैं, ये अगर अपने घर में होते तो शायद चौबीस घंटे में एक बार भी ठीक से खाना ना नसीब होता इन्हे। यहाँ इस गैप के बाद मिल तो जा रहा है। आप सर की हालत तो देख ही रही हैं। ऐसा व्यक्ति इस संस्था को चला रहा है, गहराई से सोचिये तो बहुत आश्चर्यजनक है ये।"

उन्हे लगा कि मैं भी इस संस्था की सदस्य हूँ और हिकारत के साथ निगाह डालती हुई उन्होने कहा "आप भी यहीं रहती हैं।" श्रीवास्तव जी ने हाँफते हुए फिर से मेरा परिचय देने की कोशिश की मैने उन्हे रोकते हुए कहा " नही मैं श्रीवास्तव जी की शुभचिंतक हूँ और इन्हे देखने आई हूँ।"

चलते समय मैने श्रीवास्तव जी से पूँछा "आप सरकारी सहायता के लिये प्रयास कर रहे थे ?"
उन्होने बहुत ताकत लगा कर निकली हाँफती हुई मगर आत्म विश्वास से भरी आवाज़ में कहा " एक बार मुझे ठीक हो जाने दीजिये बस.."

हम लोग चले आये मैने सोचा था कि इस बार ३ दिसंबर को विकलांग दिवस पर मैं उन्ही के आत्मविश्वास की गाथा लिखूँगी और साथ में उनका फोटो भी....!!


मगर....! २६ नवंबर को जब मैं नेहा की शादी में व्यस्त थी तभी उनका नंबर स्क्रीन पर आया। फोन उठाने पर आवाज़ वीरेंद्र की मिली। हाल पूछने पर उसने कहा "मैम श्रीवास्तव जी ५ अक्टूबर को दुनियाँ छोड़ गये। संस्था बहुत अधिक फाइनेंशल प्रॉबलम से गुज़र रही है। आप मेम्बर बनवा देतीं रेगुलर डोनेशन वाले।"

शादी के उत्साह में थोड़ी देर के लिये हाथ पैर रुक गये। शांत हो कर सोचा " शरीर का एक अंग कम होने से यदि जीवन इतने परिपूर्ण अर्थों में जी लिया जाये तो कमी अच्छी है। यदि वास्तव में मृत्यु के बाद लेखा जोखा ईश्वर के सामने खुल रहा होगा, तो जीवन भर कमियाँ झेल कर दूसरों की जिंदगी जीने के काबिल बनाने वाला ये व्यक्ति वहाँ के अमीरों में गिना जा रहा होगा।"

पुनःश्चः- तीन ३ दिसंबर को ये पोस्ट लिखने की सोची थी। मगर २ दिसंबर को शादी से वापस आने और आफिस मे कामो के चलते नही लिख सकी। देखा तो एक भी पोस्ट नही मिली विकलांग दिवस पर।
एक घटना और बाँटती हूँ

दीदी के घर के लॉन में मैं बैठी थी तभी एक सज्जन और उनकी विवाहित बहन जीजाजी के पास किसी कोर्ट के केस के सिलसिले में आते हैं। आने के बाद उनकी पहली नज़र मेरे पैरों पर पड़ती है और मुझे कुछ अजीब सा भी लग सकता है, इसकी परवाह किये बगैर वो मेरे पैरों को घूरते रहते हैं। मैं दीदी को आवाज़ दे कर बुलाती हूँ और वो उन्हे जब बैठक में ले जाती हैं, तो मुझे लगता है कि मेरा दम घुटते घुटते अचानक साँस आ गई।

वो अंदर जा कर मेरे विषय में पूछते हैं। दीदी बताती है कि "मेरी बहन है। लखनऊ से आई है।"
वो पूरे करुणानिधान बन कर कहते हैं "बड़ा अच्छा है। इसी बहाने थोड़ा मन बहल जायेगा। अब तो शादी तक रहेगी।"
"नही..! शादी में फिर आयेगी। सर्विस करती है ना तो एक साथ इतनी छुट्टी नही मिलती।"
उनकी आँखें चौड़ी हो जाती हैं "सर्विस करती है ?"
"हाँ...! केन डिपार्टमेंट में। सेंट्रल गवरमेंट का आफिस है।" जितनी आँखें चौड़ी हुई थी उतना ही दीदी के स्वर का उत्साह
"अच्छा..?? किस पद पर"
दीदी ने सगर्व बताया और साथ ही और भी बहुत कुछ जो उनके मन को मुझे ले कर खुश करता है, सेलरी भी बता दी गई। दीदी की हर बात के साथ उनका अच्छा कहने का तरीका बदलता रहा और हद तब हो गई जब वे उठ कर फिर से मुझे देखने बाहर लॉन में आ गये। इस बार निगाह पैर पर नही चेहरे पर थी.......।

मुझे जो नही मिला वो किस्मत से और जो मिला वो भी किस्मत से। सरकारी नौकरी तो तुक्के की बात है। व्यवस्थाएं इतनी आसान भी तो नहीं कि आसानी से सब कुछ मिल जाये। ना मिलता तो मेरी बुद्धि, मेरी भावना, मेरा व्यक्तित्व सब कुछ शून्य था। मिल गया तो किसी को ये जानने की जरूरत भी नही कि मैं मूलतः किस स्वभाव की हूँ।

सड़क पर बैसाखी लिये चिथड़ों में भागता व्यक्ति. पटरे पर पहिये लगा कर हाथ में चप्पल लिये सड़क पार करता किशोर, व्हीलचेयर पर पान मसाला बेचता युवक..... सब मेरे सामने थे....!! सब में मैं थी...मुझमे सब थे....!!!