Tuesday, September 22, 2009

मिलना अजीज़ों का

पिछले दिनो मौका मिला दिल्ली जाने का जिस सुबह ९ बजे पहुँची और रात नौ बजे चल दी। मिलना तो बहुत लोगो से था मगर मिल पाई कुछ ही लोगो से। मगर हाँ जिन से मिली उनका मिलना जीवन भर ना भुला पाऊँगी।

वरुण की तबीयत के चलते मीनाक्षी दीदी से अक्सर मिलने की बात हुआ करती ही थी। कई बार मन हुआ कि बस शनिवार रविवार का कर्यक्रम बना कर पहुँच जाया जाये। मीनू दी माँ का असल रूप हैं। मैं लखनऊ से कानपुर शायद उतनी जल्दी नही पहुँच पाती होऊँगी, जितनी जल्दी वो दुबई से दिल्ली पहुँच जाती हैं। कई बार दीदी का भी प्रोग्राम कानपुर तक आने का बन कर रद्द हुआ। ऐसे में जब ये खबर लगी की हमें दिल्ली जाना है तो उन्हे खबर देना अपना पहला कर्तव्य था। यूँ मिलने की उम्मीदे शुरू से अंत तक नही ही थी। मगर लोकेशन मैं देती रह रही थी उन्हें।

दूसरा व्यक्ति था अर्श.. जिससे रोज चैट पर एक बार बुज़ हो ही जाती है और साथ तो उसे भी बतान ही था।

और तीसरा था राकेश... जिससे मिलना नही था.. बस मिल गई..... अपनी किस्मत और उसकी पता नही किस चीज़ से

तो मेरी ये यात्रा शुरु हुई ३ सितंबर की रात से। अच्छी बात ये है कि हम खुद चाहे कुछ कर पाये या नही मगर हमारे ५-६ साल ही बाद पैदा हुए बाल बच्चे बहुत कुछ कर गये है। तो अब हमें करना बस इतना होता है कि हम अपने मातृत्व की दुहाई दे कर उन्हे कहीं भी बुला लेते हैं और ऐश करते हैं। तो जाते समय इसी प्रकार का मेरा सुपुत्र अमित अपनी आइटन लेकर पहुँच गया था और दिल्ली स्टेशन पर मेरा दूसरा सुपुत्र (भांजा) एस्टिलो ले कर खड़ा पाया गया। फिर उसने अपना पुत्र धर्म निभाते हुए मुझे मेरी कज़िन (दीदी)के घर सरोजिनी नगर छोड़ा,कार और एक दिन के लिये एक्सप्लोर किये गये ड्राइवर को मेरी सेवा में छोड़ा और खुद बस पकड़ कर कैसे गया ये उसकी अपनी समस्या रही।

यहाँ से मैं विजू (विजित)को तो अपने साथ ले ही गई थी, जो मेरा छोटा भांजा है और मेरे साथ ही रहता है वर्तमान में। स्टेशन से सरोजिनी नगर के बीच मैं हर फोन पर अपना डायलॉग दोहराती रही " मुझे इतने बजे यहाँ, इतने बजे यहाँ और इतने बजे यहाँ पहुँचना है तो मुझे जहाँ कैच कर सको कर लेना" जिस का अब तक मजाक उड़ाया जाता है घर में लड़कों द्वारा।

मैने लखनऊ से राकेश को अपने प्रोग्राम के विषय मे बताया था, तो उसने बेचारगी के साथ कहा कि "दीदी जाना तो दिल्ली मुझे भी है, मगर आपके दिल्ली से लोट आने के बाद। मगर जब मैने जाने के दो दिन पहले बात की तो पता चला कि उसका कार्यक्रम अचानक बदल गया और वो दिल्ली पहुँच गया है।

तो मेरा काम मालवीय नगर के आस पास कहीं था। जो कि उम्मीद से अधिक जल्दी निपट गया। मीनू दीदी के हाथ से तो मैं छूट ही चुकी थी। मुझे लगा कि अब तो मुझे वो कैच कर नही पाएंगी। मैने अर्श को फोन किया कि हम यहाँ से अक्षरधाम मंदिर जा रहे हैं तो तुम मुझे वहीं पर कैच कर लो। वो बेचारा तुरंत अक्षरधाम के मंदिर की तरफ चल दिया। इधर मैं जब लगभग २० मिनट की यात्रा कर चुकी तो मुझे लगा कि ये तो वही गलियाँ हैं जहाँ से हम अभी गुज़रे थे। मैने ड्राइवर भाई से पूछा तो उसने बताया कि सही समझा आप सरोजिनी नगर के पास हैं। यह पूछने पर कि अभी कितनी देर लगेगी अक्षरधाम मंदिर पहुँचने में उसने बताया ४५ मिनट..... हमे लगा कि इतना भागने दौड़ने से अच्छा है कि घर चल कर चाय पी जाये और थोड़ी पीठ सीधी की जाये। तो तुरंत हमने अक्षरधाम की ओर अग्रसर अर्श को फोन किया कि हमने अपना इरादा बदल दिया है और वो अपना रास्ता बदल दे। उसने तुरंत एक आज्ञाकारी अनुज की तरह बिना शिकायत अपना रास्ता बदल दिया।

मेरे दीदी के घर पहुँचने के मुश्किल से १० मिनट बाद ही अर्श ने ढेर सारे गुलाबों से सजे बुके के साथ प्रवेश
किया और जुमला फेंका " Lots of rose for a for a rose" हमने उसे समझाया कि भईया हम लड़कियों का बड़ा प्राबलम ये है कि हम लोग जानते हैं कि अगला झूठ बोल रहा है और फिर भी खुश हो जाते हैं। तो उसने तुरंत मेरी गलतफहमी दूर करते हुए कहा " आप इसे खूबसूरती से क्यों ले रहीं हैं ? मेरा मतलब है कि जो काँटो मे भी खिला रहे और अपनी खुशबू बिखेरता रहे" तो हम जितना चढ़े थे उससे दोगुना नीचे उतर आये।


खैर अर्श के आने के साथ ही साथ मेरा विजू जो थोड़ी देर को नीचे चल गया था वो भी आया और आते ही अपनी नान स्टाप कॉमेडी शुरु कर दी। अर्श ने आश्चर्य से मुझे देखते हुए कहा " आप से भी ज्यादा कोई बोल सकता है क्या.....?" मैने उससे कहा "भईया जिस घर मे भगवान ने मुझे जन्म दिया है वहाँ खेती होती है बातों की।"
अभी वो इस विषय पर सोच ही रहा था कि मेरा दिल्ली निवासी एमबीए रत भतीजा आशीष भी पहुँच गया वहाँ और उस बालक की खास बात ये है कि जिस खेती की बात मैं कर रही थी वो उस फसल का सर्वश्रेष्ठ खेत है। अर्श फिर आश्चर्य में आ गया "आप दोनो से भी ज्यादा कोई बोलता है क्या...?????" अब कौन समझाये उस शख्स को हम लोग खानदानी मितभाषी लोग हैं।

चलिये मैं अर्श के साथ कम बोलने की कोशिश कर ही रही थी कि तभी मीनू दी का फोन आ गया...! "तुम तो बाउंड्री लाइन पार कर गई, अब तुम्हे कहाँ कैच किया जाये ?" हमने कहा "हम दर्शक दीर्घा मे है, जो चाहे कैच कर सकता है अब.. अब हम उड़ नही रहे।"

बस थोड़ी ही देर में मीनू दीदी भी एक उधार के ड्राइवर के साथ पधार गईं। ढेर सारे मातृत्व की धनी मीनू दी भी मेरी मितभाषिता की शिकायत करती रहीं...! कह रहीं थीं कि कभी कभी तो हम फोन लिये बैठे रहते हैं कंचन बोलने का कोई मौका ही नही देती। अब मतलब कि हम कुछ बोलेगे तभी ना अगला कुछ जवाब देगा।हम कुछ बोलते ही नही हैं किसी से अपनी मितभाषिता के चलते।


खैर मिलते मिलाते वक़्त कैसे फुर्र हुआ कुछ पता ही नही चला। मीनू दीदी सीमित समय के लिये आई थीं चली गईं और मैं स्टेशन जाने को तैयार होने लगी।

उधर राकेश का फोन आ गया था कि वो गुड़गाँव से दिल्ली स्टेशन के लिये कूच कर चुका है। और उधर हम जब स्टेशन को निकलने लगे तो पता चला कि ट्रेन पुरानी दिल्ली आयेगी। राकेश बस नई दिल्ली पहुँचा ही था कि हमने फोन पर उसे निदेश दिया पुरानी दिल्ली पहुँचने का। बेचारा करता ही क्या ? तुरंत ड्राइवर को इन्स्ट्रक्शन दिया पुरानी दिल्ली पहुँचने का।

दिल्ली स्टेशन हम दोनो के लिये नया ही था। हम दोनो कम से कम १५ मिनट तो एक ही जगह पर एक सरे को ढूँढ़ते रहे। मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था। मेरी ट्रेन का समय हो गया था और वो नज़र ही नही आ रहा था। मैने झुँझला कर कहा "तुम लौट जाओ, मेरी तुमसे मुलाकात लिखी ही नही है।" तो ज़ाहिर सी बात है कि किसी को भी बहुत खराब लगेगा ये सुनकर। राकेश ने कहा कि "मैं आपका तो कुछ नही कर सकता था, मगर मेरा मन हुआ कि मैं इस फोन को उठा के फेंक दूं जहाँ से ये सुनने को मिल रहा है।"और अँत में अर्श ने ही राकेश को पहचाना और आखिर दो मिनट के लिये हम स्टेशन पर मिले।

मुझे वहाँ से सिद्धार्थनगर अपनी बड़ी दीदी के घर निकलना था। मेरे साथ मेरा भांजा विपुल भी आ रहा था। वो आफिस से सीधे स्टेशन पहुँच चुका था। मुझे लेकर दोनो भांजे (विपुल और विजू)प्लेटफॉर्म पर पहुँचे दोनो अनुज साथ थे...! हम ट्रेन छूटने के अंतिम समय पर ही पहुँचे थे राकेश के लिये मैं समझ ही नही पा रही थी कि मिली हूँ या बिछड़ रही हूँ...!

अभी सब बैठे ही थे मैने विपुल से अपने दोनो अनुजों का परिचय कराया ही था कि ट्रेन हिल पड़ी...! और दोनो अनुजों को उतरना पड़ गया.. ! शहीद एक्सप्रेस की हालत भी शहीदों की समाधि जैसी ही है कुछ। अँधेरा बहुत था वहाँ। जाते जाते राकैश जो कह गया वो ठीक से तो उसे भी नही याद है...!तरंत जो मन में आया वो..! मगर था कुछ इस तरह...



ये माना कि उस तरफ अँधेरा बहुत है,
मगर जितनी हमे चाहिये थी,
रोशनी इस तरफ मिलती रही
और दोनो चले गये..! मैं मन से दोनो को आशीष देती रही बस...!

और ये प्रिय और प्यारे जूनियर्स से मिलने का दौर अभी शायद खतम नही होना था।

जाने के बहुत पहले एक दिन अर्श ने बताया था कि अंकित आपके शहर में पहुँचे है, मिले कि नही?? मुझे लगा कि वो आ कर चला गया होगा...! मगर फिर जब उसके ब्लॉग पर गई तो पता चला कि वो तो लंबे समय के लिये आया है और बहुत से लोगो ने मेरे लिये उनसे सलाम भी भेज रखा था..! तो मैने तुरंत गुरुकुल की सीनियर होने की धौंस देते हूए कहा कि थोड़ा डरा करो..सीनियर हैं तुम से रैगिंग वैगिंग ले लेगे तो लेने के देने पड़ जायेंगे बिना मतलब..! घर आने पर उसने एक बार दबी ज़ुबान से कहना चाहा कि " गुरु जी से शिकायत हो जायेगी..!" तो हमने तुरंत हड़का लिया...!"ये बातें गुरु जी तक नही पहुँचनी चाहिये..! वर्ना.....!!!!

खैर दिल्ली से आने के बाद अंकित से मिलने की तारीख तय हुई और मैने उसे अपनी दीदी के घर बुला लिया चूँकि उस दिन अचानक हमे दीदी ने अपने घर बुला लिया था।

अंकित से मिलने के पहले उससे कोई भी कम्युनिकेशन नही था। मगर मिलने के बाद लगा ही नही..! बहुत अच्छा बच्चा है..!संस्कारी.. जैसा कि मैने उसके ब्लॉग पर भी लिखा " ऐसा बच्चा जिसके अंदर पहाड़ी भोलापन अब भी बरकरार है।

अंकित के साथ घर में अकित की शेर ओ शायरी का भी दौर चला जो कि काफी रोचक था..!


लीजिये सब से पहले बालक की खिंचाई अंदाज़ देखिये



और फिर ये शेर



अजीब हालातों से गुज़र रहा हूँ,
अपनी ही बातों से मुकर रहा हूँ,
मेरी बातें मेरी बदमिजाज़ी नही
खाली बरतन हूँ अभी भर रहा हूँ

और कैट की तैयारी कर रहे विजू और आईआईटी की तैयारी कर रही सौम्या के लिये उसने कहा




जो बीता है भुला उसको, जो आगे है सुनहरा है,
नया जज़्बा नसों मे भर, नया आया सवेरा है,
भरोसा ही है इंसाँ का, खुदा को खींच लाया जो,
कहीं वो दूध पीता है,कहीं पत्थर पे उभरा है।

और फिर रिश्तों पर शेर के ठहाकों के बाद सुनाये गये दीदी को समर्पित ये शेर




मैं ग़लत था ये बात उसे काट रही थी,
इसलिये मेरी माँ मुझको डाँट रही थी

और ये जो विजू की ज़ुबाँ पर आज भी है


चाँद खिलौना तकते थे,
जब यारों हम बच्चे थे.
रिश्तों मे एक बंदिश है,
हम आवारा अच्छे थे...!

ऐसे ही बहुत से शेर ....रात के ११.०० बज चुके थे मुझे अपने घर निकलना था और अंकित को अपने होटल..! मैं और विजू उसे आटो तक छोड़ने गये...! जाते समय अंकित का पैर छूना ...बहुत सारा स्नेह उमड़ पड़ा और जाते जाते एक रिश्ता बना उससे...!

अनोखे लोग अनोखा अंदाज़..! राकेश ने जो विदा दी आपने सुनी..! अर्श ने जो कहा वो यूँ था

मैं खुश हूँ के तुने मुझे हाशिये पे रक्खा है
कम-से-कम वो जगह तो पूरी की पूरी मेरी है ...

और अंकित ने आटो मे ही लिखा

झूठे रिश्ते सच्चे लोग,
मिल जाते हैं अच्छे लोग
रिश्ते शायद तब हो ना हों,
जब समझेंगे रिश्ते लोग

दुआएं...दुआएं..दुआएं..जाने कितनी बार दुआएं निकल रही हैं इन प्यारे प्यारे अनुजों के लिये...सो आप भी शामिल हो जाइये मेरी दआ में

Friday, September 11, 2009

अपील एक माँ की


ज़रा सोचिये....! एक बार अपनी जिंदगी पर नज़र डालिये...! आपकी जिंदगी में भी कोई ना कोई तो ऐसा होगा ही ना जो हर मंदिर में जा कर आपके लिये प्रार्थना करता होगा, हर दरगाह पर आपके लिये धागा बाँधता होगा, हर मज़ार पर आपकी लंबी उम्र के लिये चराग जलाता होगा। दुनिया के सारे व्रत सारे टोटके इस उम्मीद पर कर रखे होंगे कि एक दिन सारी तपस्या रंग लायेगी, हर दुआ काम आयेगी और आप उन रास्तो को छोड़ कर लौट आयेंगे उस जिंदगी की तरफ जहाँ हर पल एक खटका सा नही लगा होगा....!

फिर उस रिश्ते का चाहे जो नाम हो... वो आपकी माँ हो, पिता हों, भाई हो, बहन हो, पत्नी हो, दोस्त हो या कोई भी पवित्र सा प्यारा सा रिश्ता....! कोई ना कोई तो होगा ही ना आपके जीवन में भी, जो चाहता होगा कि आप चलें तो आपके सिर पर कड़ी धूप भी न हो...! और आप..?? आप भी तो चाहते होंगे कि उसे धूप भी छुए तो शीतल बन कर। आप भी तो चाहे दुनिया के लिये कितने ही कठोर क्यों न हों, एक शख़्स है जिसका नाम आते ही कुछ भीग जाता है आपके अंदर। ज़रा गंभीरता से उसके बारे में सोच कर देखिये ना। आप जानते हैं....?? जब आप जेल में होते हैं ना, तो वो अपना बिस्तर ज़मीन पर डाल लेता है, क्योंकि वो सुख उसके लिये किसी काम का नही, जो आपको ना मिल रहा हो। वो जानता है, कि आप बहुत बुरे आदमी हैं, लेकिन फिर भी आप उसके लिये दुनिया में सबसे खास शख़्स हैं। वो आपकी हर हक़ीकत जानता है, लेकिन फिर भी वो आपके हर झूठे वादे को हक़ीकत ही मानता है। वो जानता है कि आपकी किसी भी बात का विश्वास नही करना चाहिये, लेकिन वो चाहता आपकी हर बात पर विश्वास करना। वो जानता है कि वो भ्रमों मे जी रहा है, लेकिन उसने मान लिया है कि उसका ये भ्रम कभी नही टूटेगा.....

आप जानते हैं ? कि जब जब आप अपना वादा तोड़ते हैं, उसका दिल तिड़ते हैं, उसका विश्वास तोड़ते हैं, तो वो भी अपने आप में टूट जाता है,लेकिन फिर से वो जुड़ने की कोशिश करता है हर बार..! नई उम्मीद जोड़ कर, आपके वादों से फिर से जुड़ कर, अपने टूटे विश्वास जोड़ कर, अपना दिल संभालता है, लेकिन उस दिन, जिस दिन उसका वो भरम टूटता है,जिसके लिये उसने मान रखा है कि कभी नही टूटेगा, उस दिन वो बिखर जाता है...बिलकुल बिखर जाता है। और आप जानते हैं ना..टूटी चीज जुड़ सकती है, बिखरी चीज कहाँ...?? फिर वो जुड़ने की स्थिति में होता ही नही और सम्हल पाता ही नही

हाँ, हाँ पता है मुझे...! पता है आपको मौत से डर नही लगता। मौत तो एक दिन सबको आनी है। तो क्या होगा ..? कल ना सही आज सही, लकिन सोचिये ज़रा मेरे जैसे उस शख़्स के बारे में, जिसे आप रोज़ मरने के लिये छोड़ जाते हैं। जिसके एक आँसू पर आप खून बहा सकते हैं, वो जिंदगी भर खून के आँसू रोता रह जाता है।

कोई भी शख़्स बुरा नही बनना चाहता, परिस्थितियाँ उसे बुरा बना देती हैं। आप भी शायद खुशी से किसी निर्दोष का घर ना उजाड़ते हों।...हाथ तो आपके भी काँपते ही होंगे, मन तो आपका भी मसोसता ही होगा....!

लेकिन मैं ये भी जानती हूँ कि दुनिया का कोई काम आपके लिये कठिन नही है, तो ये काम इतना कठिन क्यों..??? ये काम जिसका वास्ता दूसरों से नही बल्कि आपके अपनो की खुशी से है।

मैं आपको उनका वास्ता नही देती जिन्हे आप किन्ही कारणों से कष्ट देते हैं। जिनका जीवन आपने जीने काबिल नही रखा। जिन्हे कई बार आप ऐसे मोड़ पर छोड़ आते हैं, कि आप जैसा एक और शख़्स अपने को, अपनों को और दुनिया को तबाह करने को तैयार हो जाता है।

मैं तो वास्ता देती हूँ आपको उनका जिन्हे आप हमेशा खुश देखना चाहते हैं। जिनके आँसू आप जैसे पत्थर को भी रुला देते हैं। आप चाहे खुद पे गोलियाँ झेल लें लेकिन उसके पैर में काँटा भी चुभे तो दर्द आपको होता है...! उसके आँसू पर आप अपना खून बहा देना चाहते है...! उसकी हँसी के लिये आप खजाने लुटा देना चाहते हैं...! मैं उन लोगों का वास्ता देती हूँ आपको। उन्हे मेरी तरह अकेला मत छोड़िये... दुनिया के लिये आप एक शख्स होंगे, लेकिन एक शख़्स के लिये आप सारी दुनियाँ हैं। उस शख्स की दुनिया मत सूनी कीजिये। आपके बाद जीना वो चाहता नही और मर वो पाता नही। मैं आपके हाथ जोड़ती हूँ, मुझे वो आख़िरी शख्स बन जाने दीजिये। अब किसी और को ये दुख झेलने के लिये मात छोड़ जाइये आप....! ये दुःख सहा नही जाता... ये दुःख कहा नही जाता...!!!!!


नोट : बहुत पहले एक कहानी लिखी थी....! ११ साल पहले...! कहानी क्या लघु उपन्यास था। मेरे दिल के बहुत करीब....! मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट था वो...! कभी कोई छपने को भेजने के लिये कहता भी तो मैं नही देती। मुझे उस पर फिल्म बनानी थी। या फिर जेलों में जा कर प्ले करवाना था। और कहानी के अंत में ये मोनोलॉग नायक की माँ से बुलवाना था। मैने तो बहुत हिफाज़त से रखा था उसे.....जाने कैसे मेरी शेल्फ में अब नही है वो...! मैने कहाँ कहाँ नही ढूँढ़ा...! मन्नत भी मानी...मगर मैं जिस के लिये मन्नत मान लूँ, वो तो पक्का नही पूरा होना है। ये मानी बात है। हँसी तो तब आई जब किसी ने मुझसे कहा कि अगर कोई चीज खो जाये तो दुपट्टे में गाँठ बाँध कर छोड़ दो..चीज मिल जायेगी। मैने अपने प्रिय सूट को छोड़ ही दिया तब तक के लिये जब तक वो मिल ना जाये...! थोड़े दिन बाद ढूँढ़ा तो वो दुपट्टा ही गायब था, जिस में गाँठ डाली थी....!
आज जब लिखने बैठी तो कई बार लगा कि इस वाक्य को बदल दूँ तो ज्यादा असर पड़ेगा...मगर फिर हिम्मत नही हुई। ये तब की बात है जब मैं सिर्फ अपने लिये लिखती थी....!

Friday, August 28, 2009

कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।



ये गीत जिसे मैने गज़ल बनाया था, अचानक जैसे पैदा हो गया था। कमज़ोर गणित के कारण बिल्स सम्मिट करने का काम हमेशा मुझे तनावपूर्ण ही लगता है और उस तनाव में अचानक जाने कहाँ से इन्हे जन्म लेने की ज़िद आ गई। मैं मना कर रही हूँ, मगर ये बस अभी की जिद लगाये पड़ी है। जल्दी से मुखड़ा कागज पर उतार कर दूसरा काम करना शुरू किया और घर पहुँचते ही पूरा किया। अब ये भी पता था कि ये बहर में नही है। बहर में लाने के लिये छूने चलो तो ये बिगड़ैल बच्ची की तरह हाथ झटक देती। मैं कहती आ सँवार तो दूँ और ये फिर हाथ झटक कर कोने में खड़ी जाती। नईईई कह कर। अब अभी अभी जन्मी इसकी जिद ना मानूँ तो कैसे और मानूँ तो कैसे। मुझे पता था कि ये ऐसे ही अगर बाहर निकल आई तो इसका तो कुछ नही, मेरे ऊपर गुरु जी के डंडे पड़ जायेंगे। इनका क्या ये तो वाह वाह देख कर इतराती रहेंगी। यहाँ गुरुजी का ना बोलना भी बहुत कुछ बोल जायेगा।

खैर तीन दिन बाद मैने गुरु जी से इजाजत माँगी कि क्या इनकी जिद पूरी करी जा सकती है तो गुरु जी ने कहा कि इसे गीत बना दो। और इनका दूसरे तरीके से इलाज़ किया उन्होने। तो अब ये जो पैदा हुई तो गज़ल थी मगर जींस शर्ट पहना कर अब गुरु जी ने इसे गीत बना दिया है...! और जहाँ जहाँ ये पावडर लिपिस्टिक दिख रहा है भूल से वो इनका गज़लापा झलक जा रहा है।

तो लीजिये पढ़िये ये गीत। जो हरी लाइनें हैं वो गुरु जी ने बढ़ाई है। हर अंतरे कि पहली और तीसरी पंक्ति मेरी है। अब इतनी जिद तो माननी ही पड़ेगी ना इसकी...! क्या करें जैसी भी है अपनी है ....



मेरे संग ही होता है या तेरे संग भी होता है,

अब तन चाहे जहाँ कहीं हो मन तेरे संग होता है


बात करें तो करें कौन सी, बातें होती कोई नही,

और छुपानी हो तुमसे बातें ऐसी भी कोई नही

लेकिन बातें तुमसे हों दिन रात, यही मन होता है।


सूरज, चंदा, रात, दोपहरी सब वैसे के वैसे हैं,

पर्वत, सागर, नदिया, बादल भी जैसे के तैसे हैं

पर कुछ है जो बदल रहा है, ये संशय क्यों होता है ?


भोर भये से रात गये तक एक अजीब सी हलचल है,

मन को लाख संभाला लेकिन होता फिर भी बेकल है

कुछ है जो मिलता है हर पल और कुछ हर पल खोता है।


छोटे छोटे संदेशे हर पल तुमको पहुँचाने हैं,

लिक्‍खे अनलिक्‍खे काग़ज़ तुमको कितने भिजवाने हैं

कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।


रोने को हो काँधा तेरा, हँसने को हो साथ तेरा,

गिरने से पहले ही मुझको आकर थामे हाथ तेरा

तेरे साथ रहूं जब भी तो असर दुआ में होता है



नोटः चित्र में जो बच्ची है वो मेरे बहुत ही प्यारे रमेश भईया की बेटी है....., जो मुझे छोड़ कर लंदन चले गये हैं...! इसके पैदा होने के दो साल पहले ही इसका नाम मैने उदिशा रख दिया था। और ये भी तमन्ना थी कि इसके नाम के आगे सिंह नही सूर्यवंशी लगे जिस से पता तो चले कि हम मातृ पक्ष से राम जी के खानदानी हैं। तो ये हैं उदिशा सूर्यवंशी...! घर में इसे सब मिष्टी बुलाते हैं...! ये जो गीत बना वो भी इसी सा नटखट लगा मुझे..! देखिये ना कैसे बिना कपड़ों के खुश है...! जिद्दी...! और जब सँवारो तो कैसा मुँह बना रही है..! इसे नही पता कि इसके भले के लिये ही कहा जा रहा है सब...!

Monday, August 17, 2009

पत्थरों का गीत



८ साल पहले एक पत्थर की आँख में आँसू देख कर ये कविता लिखी थी। बाद में ये कुछ लोकल पत्रिकाओं में छपी भी। मगर जैसा मैने लिखा था वैसा इसे समझा नही गया। इसलिये ब्लॉग पर लगाने का मन नही हुआ। बहुत दिनो बाद फिर अभी पिछले रविवार इस गीत को फिर किसी पत्थर के सामने गाया और दो पंक्तियाँ गाते ही, पत्थर नम हो गया....! मुझे लग रहा है ये गीत बना ही पत्थरों के लिये है शायद......!

दस्तक हुई द्वार खोला तो देखा द्वार खुशी आई,
किंतु हाय मजबूरी मेरी, बंद किवाड़े कर आई।


बार बार उस खुशी ने फिर भी द्वार हमारा खटकाया,
किंतु हमारी मजबूरी से कोई ना उत्तर पाया।

मैं नारी करती क्या आखिर खुशी तो चीज़ पराई थी,
मज़बूरी मेरी अपनी थी. साथ सदा दे आई थी।

मंदिर मंदिर जा कर जिसकी खातिर जोत जलाई थी,
वही मेरा घर मान के मंदिर, जोत जलाने आई थी।

पहली बार हुआ था ऐसा कैसा आर्द्र नज़ारा था,
हाय खुशी ने आँखों में आँसू भर मुझे पुकारा था।

देख खुशी की आँख में आँसू हृदय हमारा भर आया,
बता नही सकती, कि कैसे खुद पर फिर काबू पाया।

खोल दिये दरवाज़े मैने खुद पर जब काबू पाया,
झड़क दिया उस खुशी को मैने कड़े शब्द में समझाया,

"कैसी मेरी शुभचिंतक है, ये क्या करने आई है,
नारी और खुशी की जग में प्रीत भला निभ पाई है ?
हृदय धड़कता है सीमा में. सीमा में देखे दृष्टि,
जीवन के समझौतों में ही मुझको मिलती संतुष्टि।
घर मेरा मर्यादाओं का लगी रवाज़ों की देहरी,
अपनी सहज भावनाओं की मैं हूँ बनी स्वयं प्रहरी।
बड़ा सहज होता है जग में, तुम से रिश्ता कर लेना,
पर नारी के जीवन में है कहाँ सहजता से जीना।"

लौट गई धीमे कदमों से बात समझ उसके आई,
नारी और खुशी की जग में प्रीत भला कब निभ पाई।

भर आई आँखों की कोरें दूर, तलक देखा उसको,
कौन सांत्वना देता आखिर खुद ही समझाया खुद को,
बंद किये दरवाजे मैने और चुपचाप चली आई
बता नही सकती कि खुद में कितनी संतुष्टी पाई

नोटः ब्लॉगिंग शुरु करने के पहले मनीष जी के सुझाव पर मैंने कुछ दिनों तक परिचर्चा मे अपनी कविताएं डाली थी। उसी समय यह भी कविता डाली थी। जिस पर कुछ लोगों को नारी को इतनी अबला दिखाने पर ऐतराज़ हुआ था। उन सब लोगो से पहले ही क्षमा..! मेरा ऐसा कोई उद्देश्य नही है..! परंतु ये कविता मेरे मन के बहुत करीब है।

दूसरी बात जब मैने ये कविता लिखी थी तो मुझे लगा था कि बड़ी हिम्मती कविता है ये, क्योंकि अपनी सुख सुविधाएं बटोर लेने से ज्यादा हिम्मत का काम है पा कर भी त्याग देना...!

Sunday, August 2, 2009

मेरा पहला दोस्त



ये संजोग ही था कि मेरे जन्म के कुछ पहले से जो त्रासदियाँ परिवार के ऊपर आई थीं वो लवली के जन्म के साथ ही सुधरीं। जिसका कभी न मुझे ताना मिला ना उसे बधाई।

वो मुझ से तीन साल छोटा है। अपनी जनरेशन में मैं सबसे छोटी और अगली जनरेशन में वो सबसे बड़ा। मेरा सबसे बड़ा भतीजा। हमेशा से बहुत हिम्मती। शुरु से ही इंजेक्शन लगने पर भी रोता नही था। बड़े बच्चों के साथ खेलते हुए जब सिर फूट गया तो बुलंदी से कहा "ये देखो ये हिम्मत का खून है।" सिर में छः टाँके और रोने का नाम नही। क्रांति फिल्म देखने में एकदम से उत्साह आ जाता है उसे "कलांति लिख दूँगा।"

हम साथ साथ खेले। दीदी वाला खेल। मै दीदी बनती और वो और पिंकी मेरे छोटे भाई बहन। मैं घर में खाना बनाती और वो पायलट बनता। जहाज उड़ाता और घर आ कर कहता खाना दो जल्दी।

तब वो एकदम सच बोलता था। कुछ भी झूठ नही और मैं कल्पनाओं की दुनिया में रहती, दिन भर झूठ बोलती। पता नही कब बदलाव आया, जब उसे लगा कि झूठ के बिना दुनिया में गुजारा नही है और मुझे लगा कि झूठ बोलना पाप है। शुरुआती दौर में समस्या तो मेरे ही साथ थी। अम्मा कहती वो झूठ बोलता ही नही है और ये बहुत झूठ बोलती है और मैं पिट जाती :)।

साथ में भी खूब झगड़े होते। वो मारता और जीत जाता, मैं थोड़ी सी धूल झाड़ कर उसके शरीर की हार जाती। मेरे पास एक हथियार था। खुट्टी..! और उसकी एक ही कमजोरी। वो बिना बोले रह नही सकता था मुझसे। ..और मैं हार कर जीत जाती।

मेरा एड्मिशन सीधे चौथी में हुआ, वो वहीं नर्सरी बी में। धूप में बच्चो की बेंच लगा कर स्वेटर बुनते हुए मेरी क्लास के बगल में जब माधुरी मैडम उसे स्केल पर स्केल मार रही थीं और ये जान कर कि मैं उसे देख रही हूँ, वो हलका सा सी बोल कर हाथ हटा ले रहा था, तो उसके बदले आँसू मैं गिरा रही थी और जब माधुरी मैडम से मैने कहा था कि मैडम उसके तो पहले से बुखार रहता है उसे मत मारा कीजिये तो कई दिन तक व्यंग्य सुनने पड़े थे मुझे उनके।

हम लोग १० पैसे में पाँच टाफियाँ खरीदते और ढाई ढाई बाँट लेते। बाबूजी उसको शेक पिला कर लाते और कहते कि गुड्डन को ना बताना। तो वो बार बार मेरे सामने आ कर डकारें लेता और मुँह पोंछता तब तक जब तक मैं पूछ ना लूँ कि कुछ खिलाया क्या बाबूजी ने और वो कहता "हम नही बतायेंगे बाबा ने मना किया है।" ... इतना तो बहुत था मेरे रोने के लिये।

अब उसके पास सायकिल आ गई। वो मुझे आगे बैठा कर शाम को टहला लाता। दूर दूर तक जहाँ तक मैं कहती। मेरी सहेलियों के घर, अपने दोस्तों के घर, विकास की दुकान पर से हेयरबैड और कापियाँ भी दिला देता।

हमारी दुनिया बदल रही थी। हम इस बदलती दुनिया के गूढ़ रहस्य भी सबसे पहले आपस में ही पूछ लेते। और अपनी ताकत भर कोई एक दूसरे को निराश ना करता। अब मन ही मन हँस भी लेते हैं, उन बेवकूफियों पर।

सुबह से चल रहा था...... वो चलते हुए एक टीप मार देता और आगे बढ़ जाता। फिर मैं अपनी बुद्धि का प्रयोग कर के किसी तरह एक बार मारती, २ मिनट बाद वो फिर मार कर आगे बढ़ जाता। मैं शांत हो गई। वो कॉलेज जा रहा था। मुझे दरवाजा बंद करना था। मैंने सीधा निशान साध कर चप्पल फेंकी और झट दरवाजा बंद कर लिया। अब क्या करोगे ? अब तो शाम को आना है। और मैजिक आई से अपनी विजय का नजारा देखा तो वो अपने दोस्त के साथ हँस रहा था और दोस्त धूल झाड़ रहा था। वो हट गया था, चप्पल दोस्त को लगी थी। बहुत दिनो तक वो दोस्त आने पर कहता "बुआ चप्पल पूछ कर चलाना।"

रात को उसने मेरी फोटो पर माला चढ़ा दी। सुबह दिखा दिखा कर हँस रहा था। मैं भी मुस्कुरा रही थी। झूठ मूठ का चिढ़ कर। तभी विक्की आता है, उसका दोस्त मैं अंदर चली गई थी थोड़ी देर को। फोटो देखते ही चौंक जाता है " अरे ये क्या....??" वो आज ही जयपुर से आया है। लवली सीरियस हो जाता है " तुम जयपुर में थे।" " अरे यार बताना तो चाहिये था।" कहते हुए गला भर आता है विक्की का। तब तक चीजों से अंजान मैं बाहर निकल आती हूँ। और विक्की टूट पड़ता है लवली पर।

उसने मुझे बताया कि एक लड़की उसे बहुत अच्छी लगने लगी है। मैं उसके घर फोन कर के उसे बुला दूँ। मैने झट फोन कर के बुला दिया। वो भी जब घर पर फोन करती तो मुझे ही बुलाती फिर मैं लवली को बुला देती। मेरी तो सारी सहेलियाँ उससे बात करती थीं। इसमे किसी को पूछना भी नही था।

भईया की शादी तय थी। मुझे इस बार खूब तैयार होना था। मनोरमा और गृहशोभा बताते थे कि बाहर अम्मा के काजल और छोटी सी बिंदी से अलग भी बहुत सी चीजें हो गई हैं। सुबह जब वो स्कूल जाता तब मैं उसे पैसे पकड़ा देती और शाम को वो शर्ट के अंदर से आई लाइनर और लिपस्टिक निकाल लाता अकेला पा कर।

वो रात में देर से आता। घर में भईया गुस्से में आग बबूला रहते। एक आध पड़ते पड़ते मैं धीमे से अम्मा से बताती और अम्मा कसम दिला कर छुड़ा लातीं। वो खाना लेता और थाली लिये मुस्कुराते हुए मेरी रजाई हटा देता। उसे पता होता कि मैं सोई नही हूँ। और वो मुसकुरा देता। "पागल हो तुम, तुम्हे डर नही लगता।" वो हँस के कहता "क्या करेगे मारेंगे ही ना..??" " ढीठ" मैं मन मे कहती। और वो कहता " अच्छा सुनो” और सिरहाने बैठ जाता पूरे दिन की कहानी सुनाने "किसी को बताना नही" कह कर बहुत कुछ बताता।

एक दिन फोन वाली लड़की के विषय में मैने पूछा "क्या तुम उसके साथ दूर तक जा सकोगे। घर से विरोध कर के। अगर हाँ तो कोई बात नही, अगर ना तो बात बिगड़ने के पहले संभाल लो" और उसने कहा ना और बात बिगड़ने के पहले संभाल ली। फोन वाली लड़की उसे और मुझे और अधिक चाहने लगी।

फिर रोज के किस्से। जाने कितनी नई लड़कियाँ, जाने कितने लेटर, जाने कितने गिफ्ट। मेरे पास सब इकट्ठा। मेरा अपना सीक्रेट था उसका सीक्रेट संभालना। उस छोटे से घर में। एक तो वो सुंदर था, दूसरे बात करने में बहुत चतुर। लाइन क्यों ना लगती।

उसने कराटे ज्वॉइन किया। दरवाजे, खिड़कियाँ, दीवाल और जितना बर्दाश्त हो सके उतना मैं उसके प्रैक्टिस क्षेत्र बने। " आज मैने ब्रिक तोड़नी सीखी"
"अरे तो पतली वाली ना"
"अरे पतली मोटी क्या" और वो घर के बाहर से तीन ईंटे ले आया, दो पर एक को रखा और एक जोरदार हाथ के साथ ईंट टूट गई। वाह...!!!! मैं चकित...!!मगर कुछ दर्द भी हो रहा है हाथ में। एक्सरे कराया गया। हाथ भी टूट गया है। आपरेशन करना पड़ेगा, रॉड डालनी पड़ेगी।

मैं उसे देखने हॉस्पिटल जाती हूँ वो हँस देता है मैं भी हँस देती हूँ " जॉनी आपके दाँत बहुत खूबसूरत हैं, इन्हें जमीन पर मत रखियेगा।" वो अपने अंदाज में कहता है।
उसके दोस्त की मम्मी मुझे एकटक देख रही हैं। थोड़ी देर में पूछती हैं "कोई एक्सीडेंट हो गया था ? "
"नहीं..! पोलियो..!"
" तो दाँत कैसे टूट गये।"
"दाँत...?? दाँत टूट गया क्या मेरा ?" मैने हड़बड़ा कर शीशा ढूँढ़ना चाहा।
"वो कह रहा है ना ..नकली दाँत...!!!" उन्होने कन्फ्यूज़ होते हुए कहा।
ओह याद आया " जॉनी आपके दाँत बहुत खूबसूरत हैं, इन्हें जमीन पर रखियेगा।" उन्होने समझा नये दाँतो का सेट है, लड़का मुझे हिदायात दे रहा है। ठहाका..! ज़ोर ज़ोर से ठहाका लगा रहा है वो। और मैं अपनी हँसी दबाते हुए उन मम्मी जी की सिचुएशन संभाल रही हूँ...!
" मेरे साथ भी हो जाता है।" कह कर।

उसके कोच आते हैं " अविनाश ये क्या बेवकूफी है ? नेशनल टूर्नामेंट सामने है और तुम ये बेवकूफी कर रहे हो।"
" अरे सर टूर्नामेंट को तीन महीने हैं और ये एक महीने में फिट।"
टूर्नामेंट होता है। वो भारत दौरा करता हुआ सारे राउंड निकालता हुआ फाईनल ट्राफी ले कर घर लौटता है। गले में मैडल हाथ में ट्राफी। और वही हाथ मेरे पैर छू रहे हैं। मैं गदगद हूँ।

कॉलेज से रिक्शे से लौट रही हूँ। पीछे से कोई सायकिल की घंटी बजा रहा है। मुझे लग रहा है कि मैं सुन ही नही रही। कोई बनावटी खाँसी से ध्यान आकृष्ट कर रहा है। मैं फिर भी नही मुड़ती। कोई व्हिसिल के साथ धुन निकाल रहा है "रुक जा ओ जाने वाली।" मेरा खून खौल रहा है। कान से गरम गरम हवा निकल रही है। धड़कन तेज, बहुत तेज। अब तो मोहल्ला शुरु होने वाला है। अब क्या होगा ? कोई समझेगा थोड़े ना कि मैं इसे नही जानती। तो क्या हुआ कि अम्मा ने मना किया है इन जैसे लोगो के मुँह लगने को। आज तो पानी सिर से ऊपर गुजर गया है। मैं गुस्से में पलटती हूँ। देखती हूँ कि वो मुसकुरा रहा है। "बदतमीज" धड़कन कंट्रोल होती है और गुस्सा बढ़ जाता है। " पागल हो क्या तुम" गुस्से में समझ ही नही आ रहा क्या कहें। वो हँसे जा रहा है। घर आ गया, वो मुझे सहारा दे कर उतार रहा है। "हटो यहाँ से" कह कर मैं गुस्सा दिखा रही हूँ। "हुआ क्या" अम्मा पूछ रही हैं। "कुछ नही अम्मा, इन्होने कहा था कॉलेज लेने पहुँच जाना हम नही पहुँच पाये।" मैं कुछ नही बोलती गुस्से में। अंदर मुझसे पहले पहुँच कर भाभियों को बता बता कर खूब हँस रहा है " आज बुआ को खूब परेशान किया।" भाभी लोग हँस हँस कर उस पर गुस्सा हो रही हैं।

भईया ने उसे बाईक दिलवा दी। मेरा घूमने का क्षेत्र बढ़ गया।

कालेज में उसने झगड़ा कर लिया। घर में सब नाराज हैं। वो रात भर घर नही आया। मुझे रात भर नींद नही आई। दूसरे दिन जब आया मैने बात नही की।
"अरे यार हमने कुछ थोड़े ना किया था।"
मैं चुप। वो पता नही क्या क्या बताता है़, मुझे लगता है, उसने सच में कुछ नही किया था।

वो तनाव में है। "मै कुछ भी कर दूँगा"
"ये ठीक नही है, कुछ सोचा समझा करो।"
"हे भगवाऽऽऽऽऽन" वो चिढ़ कर हाथ जोड़ कर मत्थे पर लगाता है। " हमसे ये उपदेश वाली भाषा दूर रखा करो।"
मैं चुप हो जाती हूँ। सुबह वो वही करता है जो मैं कह रही थी।


मुझे आपरेशन कराने गोरखपुर जाना है। "तुम जरूर आ जाना...! आपरेशन वाले दिन वहीं रहना..! ठीक..!"
"हम्म्म् ठीक"
मैं स्टेशन के लिये जा रही हूँ। वो अचानक दौड़ता हुआ आता दिखता है। मैं रिक्शा रुकवाती हूँ। वो हाँफता हुआ आ कर कहता है " ये लो ये जब जब अचानक बोलेगी ना समझ लेना कि हम तुम्हे याद कर रहे हैं।" और वो दिल के शेप की की रिंग के बीच में लगी बटन को दबा देता है, आवाज आती है "आई लव यू" मैं मुस्कुरा देती हूँ। "लेकिन आना जरूर" कह कर उसे भेज देती हूँ।

मैं आपरेशन थियेटर में जाने वाली हूँ, वो नही आया। सिरहाने वो की रिंग रखी है। लोगो के आने जाने या बैठने पर वो अचानक बोल उठती है "आई लव यू" मुझे उसकी याद और गुस्सा एक साथ आता है। वो नही आया। होश में आने पर आधी बेहोशी में वो आवाज़ सुनाई देती है। दूसरे दिन किसी का हाथ लगता है, की रिंग टूट जाती है। मैं रोने लगती हूँ....!

दीदी मुझे केयर के लिये अपने साथ ले गई हैं। फोन की घंटी बजती है, मैं लेटे लेटे हेलो बोलती हूँ
"हेलो" उधर से आवाज़ आती है।
"दुष्ट, नालायक, बदतमीज..तुम रखो फोन"
"आई लव यू यार"
"तुम रखो बस...!"
"अरे बस बस..! समझा करो...!"
और मेरा रोना शुरू......! सिसक सिसक कर..! लीगल गालियाँ दे दे कर।

हम दोनो का १० दिन से अबोला चल रहा है। समझ में ही नही आता कब चिढ़ जाये। अब नही बात करूँगी मैं। काम से काम बस....! सुबह सुबह मेरा रिज़ल्ट निकल आता है। मेरी सर्विस लग गई। उसे खबर लगती है, तो दौड़ कर आता है। हम दोनो गले लग जाते हैं। वो हँस कर कहता है " कुछ तो अच्छा किया करो यार हम लोगो के लिये। अब ताना मिलेगा हम लोगो को। देखो वो इतने के बावजूद कंपटीशन निकाल ले गईं और तुम लोग..!!!" हम लोग फिर हँसने लगते हैं।

पोस्टिंग आंध्रा आई है। इतनी दूर...! अम्मा भेजने को राजी नही हैं। " रोज पेपर पढ़ते हो, कैसे जाने दें ? अरे ये तो अपनी रक्षा भी नही कर पायेगी।"

वो मेरे साथ जायेगा। अपनी पढ़ाई और काम छोड़कर। हम आंध्रा पहुँच जाते हैं। हम दोनो.....। यहाँ कानपुर में सुबह आठ बजे से रात १२ बजे तक उसके पैर में चक्की लगी रहती थी। वहाँ कोई जान पहचान नही। भाषा की समझ नही। वो सुबह मेरी व्हीलचेयर को धक्का लगाता हुआ आफिस पहुँचाता है। व्हीलचेयर छोड़कर जब मैं खड़ी होती हूँ, तो मेरे दुपट्टे में पीछे से गाँठ देता है। और आफिस के रूम तक पहुँचा कर वापस आ जाता है। घर लौट कर स्केच बनाता है।
फिर १ बजे पहुँच जाता है लेने। मैं घर लौट कर चावल चढ़ाती हूँ। हम दोनो खाना खाते है..! मैं उसके बनाये स्केच को एक शेर देती..! और वो फिर मुझे ले कर आफिस छोड़ने जाता है २ बजे। फिर ५.३० बजे पहुँच जाता है लेने। यही उसकी दिनचर्या है। वो कभी शिकायत नही करता। मगर अगर उसे नींद आ गई है और १० मिनट लेट है तो मैं गुस्सा हो जाती हूँ।

कहीं घूम कर आते हैं सॉउथ में। उसका बैंग्लौर जाने का मन है। मेरा तिरुपति। वो कहता है तिरुपति चलो। हरी भरी पहाड़ियाँ...! मैं सब देखे जा रही हूँ और वो मुझे देख रहा है। वो गोद में उठा कर मुझे तिरुपति दर्शन कराता है। शाम को सीढ़ियों पर बैठे हैं। मैं खुश हूँ..! "वो देखो लवली" "इधर देखो" कह रही हूँ। वो सब देखता जा रहा है।
"मेरा मन होता है कि मैं तुम्हे गोद में ले कर उस सबसे ऊँची पहाड़ी पर ले चलूँ। कभी तुम्हे ये ना लगे कि तुम नही जा पाई" अचानक वो कहता है। मैं इस वाक्य को अपने मन में कैद कर लेती हूँ। मुझे लग रहा है कि मै दुनिया की सबसे ऊँची पहाड़ी पर बैठी हूँ।
उसकी परीक्षा है। मैं मेडिकल लगा कर आ जाती हूँ। जाती हूँ तो जिद कर के उसके साथ नही जाती मैने अपना इंतजाम कर लिया है। मैं रह लूँगी अब।

मेरा ट्रांसफर लखनऊ हो गया। उसने दिल्ली में कंपनी ज्वॉइन कर ली। कानपुर हम दोनो से छूट गया।

मैने कायनेटिक खरीद ली है और उसने कार...!

" अरे यार..! तुम तो उड़ाती हो गाड़ी...! दुनिया से बदला ले रही हो क्या ?"
"तुम पागल हो। चुप रहो...!" मैं अपना सधा सधाया जवाब देती हूँ।


वो मुझे कानपुर से लखनऊ छोड़ने आता है। हम लोग अपनी गाड़ियाँ छोड़कर रिक्शे पर घूमते हैं...! पुरानी बातों पर हँसते हैं।

उसकी शादी देखी जा रही है। वो कहता है तुम लोग देख लो। मुझे नही देखनी। मेरी पसंद से तो अच्छी ही है तुम लोगो की पसंद। भाभी ने लड़की पसंद कर ली है। हम लोग देखने गये हैं। जब मैं लड़की के ही घर पर हूँ तभी उसके दोस्त का फोन आता है। "हम्म्म् ... देख ली लड़की..??
मुझे पता है स्पीकर आन होगा। "हाँ" मैं कहती हूँ
“कैसी है ?”
"अब मुझसे सुंदर तो तुम जानते ही हो....!"
"कि सब होते हैं..! आगे बताओ..??
" तो जाओ फिर जो सुंदर है, उसी से बात कर लो"
" अरे मतलब समझो.. कि तुम से सुंदर तो कोई हो ही नही सकता। मगर उसके बाद फस्ट रनर अप हैं ना।"
"हाँ वो है।" और फोन ठहाकों से गूँज जाता है।


उसका तिलक है...! मुझे सबसे पहले तैयार हो कर खड़े रहने की हिदायत मिली थी। मगर मैं नही हो पाई। साड़ी पहननी थी। बहुत देर लगती है। फिर स्पेशली तैयार भी होना था। सब चिल्ला रहे हैं। फोन मैने सायलेंट पर लगा दिया है। भीड़ को हटाती हुई पहुँचती हूँ...! वो तैयार हो चुका है। कितना खूबसूरत लग रहा है। हमारी नज़र मिलती है।


नज़र मिलते ही मैं आदतन आँख दबा कर अँगूठे और तर्जनी का गोला बना कर सुपर्ब का इशारा करती हूँ और ठीक उसी समय बिकलकुल वैसा ही इशारा उस तरफ से होता है। हमें अपनी बेवकूफी का अहसास भी एक साथ होता है और हम दोनो एक साथ जीभ काट लेते हैं। कैमरे अचानक ये कैद करने को मुड़ जाते हैं....! मगर जो होना था वो तो हो चुका...!सब हँसने लगते हैं। पारुल (होने वाली बहू) के पास पहुँचने पर ये बात उसके भाई हँस हँस कर बताते हैं। वो भी हँसती है। "वो बुआ जी तो उनकी बेस्ट फ्रैंड हैं।" कह कर

कल उसकी शादी है। मैं बहुत व्यस्त हूँ। गाना बजाना..! कल की तैयारी करना ड्रेस संभाल कर रखना। कोना कोना मेहमानो से भरा सब को इंटरटेन करना। अचानक वो आता है और मुझे उठा कर कही ले जाने लगता है।
" अरे पागल हो क्या ? कहाँ ले जा रहे हो ? अभी अम्मा गुस्सा होने लगेंगी।"
वो कुछ नही बोलता। चुपचाप अपनी कार में बैठा कर शीशे चढ़ा देता है। गाड़ी स्टार्ट हो जाती है।
"कर क्या रहे हो ?"
"घूमने चल रहे हैं हम लोग..!" कार एक भीड़ भरी मार्केट के बीच में खड़ी हो जाती है।
"यहीं घूमना था?"
"तुम क्या समझ रही थी, पार्क चलेंगे ?"
वो बाहर से चाट ले आता है। शीशे चढ़ा कर फिर हम हँसते हैं " अजीब है यार..! तुम हमेशा हमें झेलती रही। हमारी गलतियों को। हमारी बेवकूफियों को। हम झल्ला गये कितनी बार ? कितनी बार तुम्हे गलत बोल दिया और तुम नाराज़ नही हुई। हम तो कभी थैंक्स भी नही दे पाये तुम्हे ? "
मैं कुछ नही बोल पाती " पागल हो क्या" मैं फिर से कहती हूँ। और उसके कंधे पर सर रख के अपने आँसू छिपाने की कोशिश करती हूँ। वो मेरे आँसू पोंछता रहता है। हम शांत उस कार के अंदर बैठे हैं।

और पता नही कितना कितना कितना कुछ घूम रहा है। पारुल हम दोनो को देख कर खूब खुश होती है। हम अब भी वैसे ही लड़ते हैं और वैसे ही प्यार करते हैं।

होली पर उसने बताया था कि उसका ट्रांसफर जयपुर होने वाला है। मैने कुश से वादा किया था कि मैं घूमने आऊँगी जब वो वहाँ आ जायेगा। अम्मा ने बताया कि उसका ट्रांसफर हो गया। मुझे बहुत गुस्सा आया। मुझे बताया भी नही। मई से उसका कोई फोन नही। फोन नं० तो बदल गया होगा। मैं चाहूँ तो फोन नं० ले लूँ किसी से ? मगर क्यों लूँ ? बस मुझे ही गरज हैं क्या ? उसे मेरी याद नही आती तो मैं ही क्यों याद करूँ ?

मेरा बर्थडे...सब सरप्राईजिंगली कमरे में आते हैं केक कट रहा है। फोन पर फोन आ रहे हैं। अचानक उसका नाम डिसप्ले होता है। मैं हेलो की जगह कहती हूँ " अरे तुम्हारा नं० नही चेंज हुआ ?"
" मैनी मैनी हैप्पी रिटर्न्स आफ द डे...!"
"अरे"
"छोड़ो वो सब..तुम फोन कर के कर लेना वो सब बातें..! फिलहाल तो सुनो..! I LOVE YOU...! I MISS YOU....LOVE YOU THE MOST..MISS YOU THE MOST..AND CAN NEVER FORGET YOU...!
" तुम मुझे रुला रहे हो..! आज मेरा जनमदिन है।"
"NOT AT ALL BABY...! लो पारुल से बात करो...."

आज जब अपने दोस्तों को याद करने को सोचा, तो लगा कि सबसे पहले उसका नाम ना लूँ तो बेइमानी होगी....! उसे गुस्सा बहुत आता है। वो मूडी है। झूठ भी बोलता है। अचानक गायब हो जाता है। but he is my first friend ......FIRST BOY FRIEND .....:)





नोटः दोनो स्केच आंध्रा में लवली के बनाये हुए हैं। ये सीढ़ी वाला उसने मेरे लिये बनाया था। मैने उस पर शेर लिखा
"बस किसी के वास्ते गिरते संभलते चल दिये,
और जब मंजिल पे पहुँचे, साथ बस वो ही ना था।"

उसने कहा मेरी सारी सकारात्मकता की दिशा ही बदल दी तुमने। फिर मैने उस पर ये शेर लिखा। उसके स्केच पर लिखे शेरो मेंबस एख वो ही मेरा था। बाकी ना जाने किसके है ? बस मेरी मेमोरी में थे।

Friday, July 24, 2009

ज़रा सा और दो पल को.ज़रा सा और दो पल को-१०० वीं पोस्ट



कुछ आम से दिनो को कुछ अपनो का साथ खास बना देता है। उन्ही आम दिनो में ये भी दिन है..आज का दिन। जो खास बस इसलिये हो गया क्योंकि बहुत से अपने आज एक ही दिन दुआयें देते हैं। आज की पोस्ट मेरी १०० वीं पोस्ट है। आप मुस्कुरा रहे होंगे और मन ही मन कह रहे होंगे कि दो साल का ब्लॉगीय सफर और अब जा कर शतक ? शर्मिंदा होने वाली तो बात है ही। मगर क्या करें। सच भी यही है।

तो ये थी एक आम सी बात। मगर खास यूँ हुई कि आज जो गज़ल लगा रही हूँ उसमें बहुत से अपनो का साथ और हाथ है। ये पोस्ट आज ही के दिन डाली जाये ऐसा मेरे छुपेरुस्तम अनुज अर्श का सुझाव था। अब चूँकि इस गज़ल को वो आवाज़ देने वाला था, तो उसका सुझाव तो मानना ही था। ये है पहली बात जो इस पोस्ट को खास बनाती है। दूसरी खास बात ये कि इस गज़ल को गुरु जी ने न सिर्फ सँवारा है, बल्कि आशीष स्वरूप मुझे एक शेर भी भेंट किया है (आखिरी शेर), आप समझ सकते हैं कि ये बात कितनी सुखद है कि मेरे गुरुभाई इससे अवश्य जल रहे होंगे। but who cares ?? :) तीसरी खास बात ये कि इस में एक शेर गूढ़ रहस्यों के ज्ञाता रविकांत जी ने भेंट किया है।(8वाँ ) गूढ़ रहस्यो के ज्ञाता क्यों कहा ये तो आप जान ही रहे हैं और अगर नही जान रहे तो जान लीजिये यहाँ जा कर। And the last but not least reason....ये कि इस गज़ल को जिसने सबसे पहले जिसने दाद दी वो थी हमारी भाभी संजीता राजरिषी और इस गज़ल का 7वाँ शेर समर्पित है उन्ही को।

तो पढ़िये और सुनिये ये पंचमेल खिचड़ी। आवाज़ के विषय में यही कहना बहुत है कि मेरी दीदी ने इस आवाज़ को सुनने के बाद कहा कि तुम्हारे मृत शब्दों को जान दे दी इस आवाज़...! मेरे शब्द मृत...??? भाला ऐसे भी धोते है किसी को :( मगर क्या करे..?? यही तो कहा था उन्होने।

अर्श कहता है कि उसे सुरों का कोई ज्ञान नही है, मगर जिस तरह की शब्दावली उसने रिकॉर्डिंग के समय मुझसे चैट पर प्रयोग की, मैं मान ही नही सकती कि उसे संगीत का ज्ञान नही है। ये इसके छुपेरुस्तम होने का दूसरा उदाहरण गुरु जी के सामने पेश है। और शेष अंदाज़ आप गीत सुन कर ही लगा सकते हैं। अर्श ने इसमें बहुत मुश्किल सुरों का प्रयोग चुना है। और बिना किसी म्यूज़िकल सपोर्ट के ९ शेरों को गाना सभी समझ सकते हैं कितना मुश्किल रहा होगा। मैं इस खूबसूरत उपहार को कभी नही भुला सकती।

सुनिये और गुनिये।









सुबह की नींद जैसा वो, बहुत प्यारा लगे दिल को,
ज़रा सा और दो पल को.ज़रा सा और दो पल को।

तरीक़ा हम में होता ग़र, अगर हम भी अदा रखते,
तो तुम ना छोड़ पाते यूँ, मेरे मन पाक़ निश्छल को।

हमें जीने की आदत है, हर इक पल जी के जीते हैं,
सिसक कर खूब दुक्खों को, विहँस कर हर हसीं पल को।

किसी में कुछ,किसी में कुछ, सभी कुछ तुम में पाना है,
यही उलझन तुम्हे भी है, यही उलझन मेरे दिल को।

वो तुम में है न जाने क्या, कि जो भाने लगा हमको,
समझ पाते नहीं हम, दिल की इस अन्‍जान हलचल को।

कभी सबसे भले हो तुम, कभी सब से बुरे हो तुम,
असल में वो तुम्‍हीं हो जो, बदलते हो हर इक पल को।

किनारा तेरे सीने का, तेरी बाँहों की ये लहरें,
यही सागर है जिसकी प्‍यास थी जुल्‍फों के बादल को।

तुम्‍हें तो महफिलों की रौनकें ही दिख रहीं केवल,
कभी देखो जरा रोती हुई लाचार पायल को।

सलामत तुम रहो सौ साल तक ये है दुआ मेरी
मगर मत भूलना राखी पे अपने बीर पागल को


नोटः बहुत देर तक ढूँढ़ती रही, जैसा चाह रही थी वैसा चित्र नही मिला तो ये चित्र डाल दिया.... मैं और मेरे होने वाले दामाद जी :) (भांजी के होने वाले पति)

Wednesday, July 1, 2009

लहर की खामोशी



जान ले के जायेगी, ये कहर की खामोशी,
कब खुदारा टूटेगी, उस नज़र की खामोशी।

आँख भीग कर सारे भेद खोल जाती है,
हम छिपा न पाते हैं, दिल जिगर की खामोशी।

पैर के निशाँ बेशक, ले गई लहर लेकिन,
मन में अब भी बैठी है, रेत पर की खामोशी।

रोज आप आते हैं, रोज सोचते हैं हम,
आज आप समझेंगे, इस नज़र की खामोशी।

आपके मिजाजों से, और गर्म लगती है,
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

पा के शोर करता है, है अजब ये सागर भी,
दे के कुछ नही कहती, है लहर की खामोशी *

* इस शेर को खिताब मिला हासिल-ए-मुशायरा का


लीजिये पढ़िये आज वो गज़ल जिस के एक शेर को गुरु जी के ब्लॉग पर आयोजित तरही मुशायरा में हासिल-ए-मुशायरा का खिताब मिला। इस मुशायरे में आई सभी गज़लो के रचनानाकार का नाम ना बताते हुए स्वनामधन्य श्री प्राण शर्मा जी के पास हासिल-ए-मुशायरा का खिताब हेतु चुनने के लिये भेजा गया था। नतीजे के साथ गुरु जी को जो पत्र प्राण जी ने भेजा उसमे लिखा था "कृपया शेर लिखने वाले को मेरी हार्दिक बधाई अवश्य दीजियेगा। चूँकि उसमे बहुत संभावनाएं हैं इसलिये उससे बहुत आशाएं भी हैं।" और प्राण जी को व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद भेजने पर उन्होने मुझे जो मेल से आशीर्वाद दिया वो इस प्रकार था

प्रिय कंचन जी,

उम्दा शेर के लिए मेरी बधाई स्वीकार कीजिये.मुझे प्रसन्नता होती है जब कोई अच्छे
शेर कहता है.शायद ऐसा खूबसूरत शेर मैं न कह पाता.आप इसी तरह शेर कहते रहिये और सबकी "वाह,वाह" लूटते रहिये.शेर कहने का आपका अंदाज़ बड़ा प्यारा है.शब्दों के नाप-तौल से ,लगता है आप अच्छी तरह परिचित हैं.भविष्य में इतना ध्यान रखिये
कि आपकी शायरी में भारतीयता की सुगंध हो. आपके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ मैं. आशा है कि आप सानंद हैं.

आपका शुभ चिन्तक ,
प्राण शर्मा

इस आशीर्वाद से मै कितनी कृतकत्य हुई मैं ही जानती हूँ.......!
तो आप भी पढ़ें इस गज़ल को

ये रहा प्रमाण पत्र