Saturday, August 16, 2008

कितने हसीन रिश्ते हैं यहाँ पर-2



परफ्यूम की खुशबू घर मे आते ही दोनो दीदियाँ कह उठतीं " अनिल भईया आ गये"


और अनिल भईया के आते ही घर में खुशी की लहर दौड़ जाती। मैं तो बहुत छोटी थी, पर सब के मुँह से सुनती आ रही हूँ। हमारा संयुक्त परिवार था जिसमें नौकरी के लिये अलग अलग शहरों में रहते हुए भी हम सब बँधे हुए थे। बड़े ताऊ जी गोरखपुर में थे, और छोटे ताऊ जी के बेटे " नरेंद्र भईया" भी उन्ही के साथ थे। अनिल भईया को घर पर लाने वाले यही नरेंद्र भईया थे। मोहक व्यक्तित्व के स्वामी अनिल भईया ने बहुत जल्दी घर में अपना स्थान बना लिया। स्मार्ट अनिल भईया मेरे बड़े भईया के दोस्त और अम्मा के लड़के का रोल शीघ्र ही निभाने लगे। ऐसे में जब राखी आई तो अनिल भईया का दीदी लोगों से प्रश्न था " मुझे राखी नही बाँधोगी, बहन" वो अक्सर उन लोगों को उनके नाम की जगह बहन से ही संबोधित करते थे। और दीदी लोगों ने राखी बाँध दी।


एक तार का क्या महत्व है रिश्तों में ये तो वही जानता है जो इसे जीता है। अनिल भईया भी अब उसी श्रेणी में आ गये थे। अब बातें व्यक्तिगत स्तर पर होने लगीं, भाई हो और भाभी को देखने की लालसा ना हो ऐसा कैसे हो सकता है? दीदी लोग भाभी से मिलने की जिद करती तो भईया अपनी बेचारगी जताते कि वो बहुत अमीर घर की है, वो हम सब के साथ adjust नही कर पाएगी। दो कुत्ते लिये, बेलवाटम शर्ट पहने एक लड़की की फोटो दिखाई गई कि यही हैं भाभी। दीदी लोगो को भी लगा कि हाँ शायद भाभी हमारे साथ adjust नही कर पाएंगी।वो तो भईया ही हैं इतने down to earth ....!भईया फलों की पेटी ले कर आते और बताते कि अभी अभी मम्मी पापा लैंड किये हैं और वो ये फल की पेटी ले के आये थे। पूरा घर सम्मोहित .... ! इतने बड़े घर का लड़का और हमारे जैसे निम्नतर मध्यम वर्गीय परिवार की सेवा में लगा हुआ है।


इन्ही सब के बीच, मेरे बड़े भतीजे का जन्म हुआ। मेरे पोलियो का अटैक आने के बाद से परिवार जिस दुखद काल में चल रहा था उससे उबरने का एक बहुत बड़ा आश्रय मिला सभी को। घर में खुशी की लहर दौड़ गई। उसका जन्मोत्सव होना था और हमारे परिवार का गेट टुगेदर। खूब सामान खरीदे जा रहे थे। सभी उत्साह पूर्ण भागदौड़ मे लगे थे। अम्मा को चूड़ियाँ खरीदनी थी, वे अनिल भईया के साथ जा रही थीं और उधर से बड़े ताऊ जी गोरखपुर से आ रहे थे। अम्मा को अनिल भईया के साथ जाते देख ताऊ जी के तेवर चढ़ गए। " वीरेंद्र की अम्मा किस के साथ जा रही थी।" उन्होने बाबूजी से प्रश्न किया। बाबूजी ने अनिल भईया का परिचय दिया। लेकिन अनिल भईया तो असल में ताऊ जी के पास का ही प्रोडक्ट थे न। ताऊ जी उनके विषय में हम से अधिक जानते थे।


उन्होने बताया कि जिस लड़के को तुम लोगो ने अपने परिवार का सदस्य बना रखा है, उसने असल में अपनी पत्नी को छोड़ दिया है। सो काल्ड भाभी जी की फोटो दिखाई गई तो पता चला कि ये तो मील के हेड आफ डिपार्टमेंट की बेटी है। जहाँ अनिल भईया का अक्सर आना जाना होता है। बिहार के एक साधारण परिवार के अनिल भईया यहाँ घर छोड़ के आ गए हैं।


एक मिनट में परिवार के लिये हीरो भईया विलेन बन गए। जो दीदी लोग बड़े भाई की सुरक्षात्मक जगह अनिल भईया में पाती थीं वो उनसे डरने लगीं।


सब के चेहरे पर मन के भाव अनिल भईया को बताने लगे कि अब कुछ गड़बड़ है। लेकिन अम्मा अपना व्यवहार सामान्य रखे रहीं।


सभी लोग अनपढ़ फिल्म देखने गए अनिल भईया फिल्म बीच में ही छोड़ आये।


दूसरे दिन फिर उनका आगमन हुआ। अम्मा ने पूँछा " अनिल कल तुम फिल्म बीच में ही क्यों छोड़ आये थे"
भईया ने बात का उत्तर ना देते हुए कहा " मम्मी मुझे कई दिन से आप से कुछ कहना चाहता हूँ,लेकिन कह नही पा रहा हूँ।"
"तो लिख के दे दो" अम्मा ने सुझाव दिया।


अनिल भईया सिर नीचे कर के अपनी कहानी बताने लगे। उन्होने बताया कि उनकी शादी हो चुकी है और एक बेटा भी है। बिहार में शादी के बाद एक माह तक दामाद ससुराल में ही रहता है। पत्नी का साथ उतने दिन का ही रहा है उनका। इसी बीच उन्हे पता चला कि लड़की बिलकुल पढ़ी लिखी नही है, और वो गर्भवती पत्नी को छोड़ यहाँ चले आये।भईया कहानी सुना रहे थे और दोनो दीदियाँ और अम्मा की आँखें गंगा जमुना हो रहीं थी। इतनी सी बात की एक औरत को इतनी बड़ी सजा....? दीदी उठ कर अपने कमरे में चली आईं और फूट फट कर रोने लगीं।


भईया कमरे में आये और दीदी के सिर पर हाथ रख के बोले
" मुझे तेरी राखी की कसम है बहन मैं होली तक तुम लोगो के साथ तुम्हरी भाभी को ले आऊँगा।"
और वो बिहार चले गए।


इतना झूठ बोलने वाले आदमी के लिये कसम का क्या महत्व? किसी को विश्वास नही था,लेकिन होलिका दहन के दिन भईया एक सुंदर सी औरत और ८ साल के बच्चे के साथ रिक्शे से उतर रहे थे। किसी की राखी ने किसी की होली मनवा दी थी .......!




इस बात को आज लगभग २९ साल हो गये। दोनो दीदियों की विदाई की चूनर भईया ही लाए। भाई के किसी भी कर्तव्य मे वो पीछे नही रहे। वो बच्चा जो आठ साल का था, आज उसके अपने बच्चे आठ साल से ऊपर के हो रहे हैं।




और ये सब किया राखी के एक तार ने। राखी के तार से संबंधित दूसरी कहानी यहाँ भी पढ़ सकते हैं।





Tuesday, July 29, 2008

जमीन अपनी जगह,आसमान अपनी जगह,


आज सुबह ११.३० बजे पारुल से चैट हुई और मजाक मजाक में कही गई बात ज़ेहन में ऐसी छाई रही कि ३.०० बजे मैं कविता लिखने बैठ गई और ४.०० बजे कविता पूरी हो गई, वैसे धन्यवाद बिजली सेवा को भी देना पड़ेगा जिसने १.३० बजे साथ छोड़ा तो बस अभी ४.३० बजे आई है, जिससे सारे यू०पी०एस० डंप हो गए और मुझे खाली समय मिल गया वर्ना जाने कितनी ही कविताओं की इसी समय के चलते दिमाग में ही भ्रूणहत्या हो जाती है। लेकिन क्रेडिट तो पारुल को ही जाता है,जिससे मैने बाय करते समय कहा कि अब बहुत उड़ चुकी तुम आभासी दुनिया के आसमान में, जमीन पर आओ और जा के बच्चे संभालो और उसने जवाब दिया "मैं अपनी जमीन कभी नही छोड़ती, जमीन पर पैर रख कर ही आसमान को देखती हूँ क्यों कि मुझे अपनी जमीन से प्यार भी बहुत है.... " वाह वाह वाह लेडी गुलज़ार, क्या बात कही, सबसे अच्छी बात तो ये कि इस बात ने कविता का एक प्लॉट दे दिया..तो सुनिये.... और क्षमा पहले कर दीजिये ...क्योंकि बस भाव भाव हैं और कुछ नही... :(


जमीन अपनी जगह,आसमान अपनी जगह,

मुझे दोनो से मोहब्बत, ये बात अपनी जगह।


वो आसमान जैसे,खान कोई नीलम की,

औ उसपे तैरते बादल,कि मोतियों के पहाड़,

वो आफताब, वो मेहताब, वो सितारों के हुज़ूम,

खुदा क्या कर सकूँगी इनमें कभी खुद को शुमार..?


इशारे कर रहा है,मुझको बहुत दे से वो,

मैं उड़ तो जाऊँ, मेरे पंख में नही है कमी,

मगर जो बात है, वो बात सिर्फ इतनी है,

कि मुझको रोक रोक लेती है ये मेरी जमीं।


ये ज़मीं वो,कि जिसने खुद के बहुत अंदर तक,

मुझे संभाल के रक्खा, मुझे सँवारा है,

कभी कभी तो लगता है, मेरे अंदर भी,

इसी जमीन के होने का खेल सारा है।


वो साफ साफ फलक और ये पाक़ पाक़ ज़मी

कहीं पे पैर मेरे और कहीं निगाह थमी,

किसी को खोना न चाहूँ, ये चाह अपनी जगह,

ये पैर अपनी जगह हैं, निगाह अपनी जगह।

Monday, July 14, 2008

अब तुम मुझको छोड़ न जाना...!


२७ अक्टूबर २००१ को लिखी गई ये कविता आप के साथ बाँट कर के फिर से याद कर रही हूँ ......!


दोस्त तुम्हारे दम पर मैने ये सारा जग छोड़ दिया है,

अब तुम मुझको छोड़ न जाना...!


न जीने की चाह थी कोई, न मरने का कोई डर था,

मंजिल कहाँ, मेरी कोई थी , सूना लंबा एक सफर था !

पर तुमसे मिल कर जाने क्यों, अब जीने का जी करता है,

मौत जुदा कर देगी तुमसे, अब मरने से डर लगता है..!

दोस्त तुम्हारे पथ पर मैने, इन कदमों को मोड़ लिया है,

अब तुम ही मुख मोड़ ना जाना...!


जाने कितने अंजाने, दरवाजों पर दस्तक दी हमने,

तब जा कर तुम में पाया है, मन चाहा अपनापन हमने !

ठहर गई मेरी तलाश, अब साथी तेरे दर तक आ कर,

खत्म हुआ एक सफर मेरा, अब मंजिल पाई तुमको पा कर !

दोस्त तुम्हारी खातिर दुनिया से नज़रों को मोड़ लिया है,

अब तुम नज़रे मोड़ ना जाना

तुम हो तो हैं कितने सपने, तुम हो तो हैं कितनी बातें,

तेरी सोच में दिन कट जाये, तेरी सोच में कटती रातें !

तुम मेरे अपने हो जानूँ, फिक्र नही अब कौन है अपना,

दिन में मेरी हक़ीकत हो तुम, रातों में तुम मेरा सपना।

जीवन का लमहा लमहा तेरी यादों से जोड़ लिया है,

तुम इनमे गम जोड़ न जाना


सूचनाः कल महावीर शर्मा जी के ब्लॉग पर एक कवि सम्मेलन/मुशायरा का आयोजन, हम भी पहुँचेंगे, आप भी पहुँचियेगा

Thursday, July 10, 2008

मत करें ऐसा



घर और आफिस की दौड़भाग में लाख चाहेने के बावजूद कोई भी पोस्ट दे पाना संभव नही हो पा रहा था.....! आज के फास्टफूड कल्चर में समस्याएं भी रोज इंस्टैंट आती हैं, शाम तक का समय हल ढूढ़ने में निकल जाता है सुबह दूसरी समस्या...! लिखूँ तो क्या लिखूँ...! कविता की संवेदनशीलताओं तक मन पहुँच ही नही पाता।

दो दिन से कंप्यूटर मे नेट कनेख्शन खराब पड़ा था। किसी तरह दूसरे किसी के कंप्यूटर पर मेल चेक कर रही थी ऐसे में परसों शाम को जब एक लेटर का प्रिंटआउट निकालने पहुँची तो देखा इंटरनेट कनेक्शन काम करने लगा है। आदतानुसार अपने मूल एकाउंट याहू पर लाग इन किया तो पाया कि मेरे ब्लॉग पर पोस्ट आई है। मामला समझने के लिये अपने ब्लॉग की लिंक क्लिक की तो दिमाग से सन्नन्न्न की आवाज़ आने लगी, थोड़ी देर को किंकर्तव्यविमूढ़ सी जहाँ की तहाँ बैठ गई। मेरे ब्लॉग पर अंग्रेजी में एक फालतू बातों से भर हुई पोस्ट पड़ी हुई थी। अब तक कितने लोग क्लिक कर चुके होंगे...? कितनो की निगाह पड़ी होगी..?

कुछ सूझ ही नही रहा था कि क्या करूँ क्या करूँ...सबके संज्ञान में लानी चाहिये ये बात या बस खतम करूँ यहीं पर..कुछ नही समझ मे आ रहा था। जैसा कि हमेशा होता है कि ब्लॉग से संबंधित कोई भी परेशानी होने पर मैं तुरंत मनीष जी को फोन करती हूँ, वही किया। हैलो के साथ मैने उनसे पूँछा

"मेरा ब्लॉग देखा है आज"
" नही, सुबह से काम में लगा हूँ, समय ही नही मिला" उन्होने सोचा कि शायद मैं अपनी कोई नई पोस्ट पढ़ने को कह रही हूँ।
" मेरे ब्लॉग पर किसी ने पोस्ट डाल रखी है।"
"क्या.????"
"हाँ..और मुझे बहुत रोना आ रहा है।" कह कर मैं रोने लगी।
" let me see, I'll call you latter" कह कर उन्होने फोन काट दिया।


अभी मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सी बैठी ही थी कि मीत जी का नंबर मोबाइल पर डिस्प्ले होने लगा। मैने फोन उठाया

"हैलो"
"कंचन..! ये क्या है..?"
"मैने नही पोस्ट किया है" मैने रुआँसे स्वर मे कहा
"obviously you have not written it, but delete it immediately first"
"O.K." कह कर मैने फोन काट दिया।

पोस्ट तो डिलीट हो गई, कुछ देर तक लोग ब्लोगवाणी के जरिये आते रहे। लेकिन मैं उतनी ही देर में कितने तनाव से गुजरी ये मैं ही जानती हूँ।

क्यों करते हैं ऐसा प्रकृति ने, आज की लाइफ स्टाइल ने पहले ही बहुत सारे तनावों की व्यवस्था कर दी है,फिर अलग से आप लोग क्यों एफर्ट्स करते है। इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण दे दूँ कि कल से ये पोस्ट पब्लिश करने की सोच रही हूँ और अब जा के कर पा रही हूँ।

फिलहाल मैं तकनीकी लोगों से पूँछना चाहूँगी कि ऐसी सावधानियाँ बताएं जिनसे इस तरह की समस्याओं से मेरे साथ अन्य लोग बच सकें

चलते चलते दो कविताओं के अंश, जो कि कल मुझसे मिलने आये सज्जन ने मुझे सुनाई..(पूरी उन्हे भी नही पता थी)

जीवन संगति का नाम नही,
यह सूत्र असंगति का पहला।
हम सींच थके मधु से वलरी,
फल हाथ लगा केवल जहरी,
जो द्वार लगी सुख की देहरी
वह पीर जगा लाई गहरी
अपवाद न सीता शकुंतला

(कविः महिपाल, फूल आपके लिये से)

अफसोस नही इसका हमको,
जीवन में हम कुछ कर न सके।
झोलियाँ किसी की भर न सके,
संताप किसी का हर ना सके
अपने प्रति सच्चा रहने का,
जीवन भर हमने यत्न किया,
देखा देखी हम जी न सके,
देखा देखी हम मर न सके

(कविः गोपाल सिंह नेपाली)

Friday, June 20, 2008

नदी के द्वीप



१६ जून की दोपहर में मुझे मेरी सहेली ज्योति मिश्रा ने सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" का प्रसिद्ध उपन्यास "नदी के द्वीप" दिया और १७ जून की रात से मैने इसे पढ़ना शुरू किया। फिर इसके बाद तो इसे पढ़ने के लिये समय निकालने की ज़रूरत ही नही थी क्योंकि इसके पात्र कहीं भी रहो आवाज़ दिया करते थे.... और समय खुद-ब-खुद निकल आता था....रात के १ बजे तक, सुबह चाय चढ़ा कर, आफिस से निकलते समय पानी बरस रहा है, तो समय का उपयोग करते हुए.... और नदी के द्वीप कल रात १२.३० बजे खतम हो गई। पूरी रात उसके पात्र दिमाग में घूमते रहे।

सच यूँ ही तो नही ओशो ने कहा होगा



"This novel is for those who want to meditate; it is a
meditator's novel.

७ मार्च १९११ में जन्मे तथा ४ अप्रैल १९८७ को महाप्रयाण करने वाले "अज्ञेय" ने मेरे ज्ञान के अनुसार मात्र ३ उपन्यास लिखे है



१.शेखर एक जीवनी २.नदी के द्वीप ३. अपने अपने अजनबी



मैने तो पहला ही नॉवेल पढ़ा है...लेकिन मुरीद हो गई। चार पात्रों डॉ० भुवन,. श्रीमती रेखा, चंद्रमोहन और गौरा के मध्य ही चलने वाली कथा में प्रेम और समर्पण का हर रूप दीख जाता है।


रेखा थोड़ी रहस्यमयी महिला है जो क्षणों मे जीने में विश्वास रखती है, वर्तमान में विश्वास रखती है, भविष्य उसके लिये वर्तमान का प्रस्फुटन है।



गौरा कुछ नही जानती शिवाय भुवन दा के जो उसके मास्टर भी रह चुके है, तभी तो विज्ञान में शोध करने वाले डॉ० भुवन से वह संस्कृत के नाटकों का मंचन भी करवाने आ जाती है।



डॉ० भुवन एक वैज्ञानिक है..समाज से तटस्थ..जब मन आया समाज में शामिल जब मन आया किसी के पत्र का कोई जवाब नही..लेकिन रेखा और गौरा का प्रेम पूर्ण समर्पण मजबूर कर देता है उन्हे... और तटस्थता छोड़नी ही पड़ती है।

चंद्रमोहन एक पत्रकार हैं और एक कुंठाग्रस्त पात्र है... ऐसा पढ़ने वाला तो शुरू से ही समझने लगता है परंतु अंत में उपन्यासकार डॉ० भुवन के माध्यम से कहला भी देता है "चंद्रमाधव भी अत्यंत कुंठित व्यक्ति है, जब तक नही था, तब तक बहुत असंतुष्ट था : अब कुंठित हो चुका है और उसका असंतोष युक्ति से परे हो गया है- कुंठित होना अब उसके जीवन की आवश्यकता बन गया है, उसकी कुंठा और उसका वाद परस्पर पोषी हैं। किसी पर दया करना पाप है, नही तो मैं चंद्र को दया का पात्र मान लेता।"





"अज्ञेय" का जीवन लखनऊ, काश्मीर, दक्षिण भारत एवं विदेशों मे बीता जिसकी झलक उपन्यास में दिखाई देती है। १९२९ में बी०एससी० के बाद उन्होने अंग्रेजी साहित्य से एम०ए० में प्रवेश लिया अंग्रेजी साहित्य की यह रुचि भी नदी के द्वीप में प्रचुर मात्रा में दीखती है..जगह जगह लॉरेंस, ब्रॉउनिंग, बाइबिल की वर्सेज़ उद्धृत हैं। उनका अंग्रेजी साहित्य से एम०ए० पूर्ण होने के पहले ही वो स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे... डॉ० भुवन भी कॉस्मिक किरणों पर अपने शोध को छोड़ कर राष्ट्र के लिये सेना में भर्ती हो जाते है और दलील ये कि " मैं नही सोच सकता कि मैं कैसे किसी भी प्रकार की हिंसा कर सकता हूँ, या उसमें योग दे सकता हूँ-पर अगर कोई काम मैं आवश्यक मानता हूँ, तो कैसे उसे इस लिये दूसरों पर छोड़ दूँ कि मेरे लिये घृण्य है? मुझे मानना चाहिये कि वो सभी के लिए- सभी सभ्य लोगो के लिये एक सा घृण्य है, और इसी लिये सब का सामान्य कर्तव्य है..।"

उपन्यास के सर्ग पात्रों के नाम पर हैं, बीच में तीन बार अंतराल आता है..४१६ पृष्ठ की इस पुस्तक के पत्र आपको निश्चय ही उस जमाने में ले के चले जाएंगे जब पत्रों की प्रतीक्षा बड़ी बेसब्री सेहम करते थे और लिखने में अपना मन सजा देते थे।

उपन्यास के कुछ अन्य उद्धरण जो मुझे पसंद आये



" 'क''ख' से प्रेम करता है ये कह देना कितना आसान है, और 'मैं तुमसे प्रेम करता हूँ' ये कह पाना कितना कठिन-कितना पेनफुल। क्योंकि एक तथ्य है, दूसरा सत्य-और सत्य न कहना आसान है, न सहना"--भुवन




" द पेन आफ लिविंग यू इज़ मोर दैन आई कैन बेयर"




"प्रेम को धोखा रोमांटिकों ने बताया है, और आप कितने भी ॠषि भक्त क्यों न हों, रोमांटिक ॠषि को नही पसंद करेंगे। मैं तो यही जानती थी कि ॠषियों ने प्रेम और सत्य को एक माना हैं क्योंकि दोनो को ईश्वर का रूप माना जाता है।"--रेखा




"कुछ जड़ें वास्तव में जीवन का आधार होती हैं और सतही जड़ों का बहुत बहुत बड़ा जाल भी एक गहरी जड़ की बराबरी नही करता।"--रेखा




" अध्यापन का श्रेष्ठ संबंध वही होता है, जिसमें अध्यापक भी कुछ सीखता है।"




"मैत्री साख्य प्रेम इनका विकास धीरे धीरे होता है ऐसा हम मानते हैं, 'प्रथम दर्शन से ही प्रेम' की संभावना स्वीकार कर लेने से भी इसमें कोई अंतर नही आता"




"तुम ने एक ही बार वेदना में मुझे जना था माँ
पर मैं बार बार अपने को जनता हूँ
और मरता हूँ
पुनः जन्म और पुनः मरता हूँ
क्योंकि वेदना में मैं अपनी ही माँ हूँ"--रेखा





"तुम चले जाओगे- मैं जानती हूँ तुम चले जाओगे। मैं आदी हूँ कि जीवन में कुछ आये और चला जाये..मैने हाथ बढ़ा कर उसे पकड़ना चाहना भी छोड़ दिया"--रेखा



"यह कि दाँव दोनो खेलते है,लेकिन हम अपना जीवन लगाती है और आप हमारा"




"किसी अनुभव को दुबारा चहना भूल है"

Monday, June 16, 2008

तुम्हारे जन्मदिन पर

उसके जन्मदिन पर जो पता नही कहाँ है, लेकिन जहाँ भी है मेरी बहुत सारी दुआएं आज भी उसी तरह वहाँ पहुँचती होंगी जैसे तब, जब टीका लगा के मैं सामने आशीर्वाद देती थी....! उसकी बहुत सारी भूलों को क्षमा करने की प्रार्थना तब भी करती थी और अब भी..जब ६ साल हो गए उसने शकल नही दिखाई..!



तुम जहाँ भी हो वहाँ पहुँचे मेरी शुभकामना..!
काश ईश्वर मान लें अबकी मेरी ये प्रार्थना...!

जन्म जन्मों तक तुम्हें विधि दे हृदय की शांति
अब ग्रसित ना करने पाये तुमको कोई भ्रांति!


पूर्व सा भावुक हृदय हो, प्रेम स्वजनो के लिये,
खुद पे हो विश्वास अद्भुत, साहसी मन में लिये।
किंतु अबकी मानना मानव धरम का मर्म तुम,
धैर्य धारण करके प्यारे, करना अपना कर्म तुम
तेरी भूलों को भुला दे वो पतित पावन प्रभू,
दीनबंधु ये है मेरी दीन सी इक आरजू।
वो जहाँ भी है, अकेला है उसे तुम देखना,
बद्दुआओं से बचा लेना, ये है मेरी दुआ।
माँ के आँखों की नमी तुमसे सही जाती नही,
कैसे सहते हो मेरे आँखों की ये बहती नदी
आसुओं के अर्घ्य मेरे, दिल की मेरी प्रार्थना,
शेष अब कुछ भी नही है, शेष है ये चाहना,

तुम जहाँ भी हो वहाँ पहुँचे मेरी शुभकामना..!
काश ईश्वर मान लें अबकी मेरी ये प्रार्थना....!




संबंधित पोस्ट यहाँ भी है।

Thursday, June 12, 2008

"हे ईश्वर ....! धरती के इस मोती को अपनी करुणा की सीप में सम्हाल कर रखना...!"


शशि दी चली गईं .... सब के मुँह से यही निकला कि एक अध्याय का अंत हो गया और मुझे लगा कि एक इतिहास पूर्ण हुआ। सूरज बन के सारी दुनिया को रोशनी देना सब के वश की बात नही है लेकिन दीपक बन के एक छोटी सी दुनिया तो रोशन की ही जा सकती है न..! ये सिखाती थीं शशि दी....!



मेरे छोटे से मोहल्ले में निर्विवादित रूप से अच्छी मानी जाने वाली दी को जानती तो मैं पता नही कब से थी लेकिन उनके प्रभाव में आई १९८८ से जब मैने ९ वें दर्जे के लिये प्रवेश लिया और उन्होने कहा कि वैकल्पिक विषय के रूप में गायन ले लो, मैं तुम्हे सिखाऊँगी।


तीन बहन और एक भाई में दी सबसे बड़े भईया के बाद आती थीं, पिता जी बहुत जिम्मेदार व्यक्ति नही थे, लेकिन वे थीं.... बहुत कम उम्र से बहुत जिम्मेदार...! सबसे छोटी बहन यशी दीदी को फिट्स पड़ते थे, वो कहीं भी सुरक्षित नहीं थीं। दीदी ने निश्चित किया कि वे उनकी जिम्मेदारी उठाने के लिये आजीवन विवाह नही करेंगी। लोगो ने सलाह दी की इसी शर्त पर शादी की जा सकती है कि "आप अपनी बहन को अपने साथ रखेंगी तो उनका जवाब होता कि "लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि शर्त आजीवन निभाई ही जाएगी" बात अपने आप में बहुत व्यवहारिक थी।


दीदी ने अपने लिये जीवन का जो रूप चुना था उसमें अपने लिये कुछ नही था। सिर्फ दूसरों को देने की बात थी। बचपन में सुना करती थी लोगो से कि दीदी के पैसा बहुत है, इण्टर कॉलेज में लेक्चरर और फिर शाम को संगीत की जो कोचिंग चलती है उसमें कितने सारे बच्चे आते हैं..!ये तो जब मैं उस कोचिंग का हिस्सा बनी तब मुझे पता चला कि ७५ प्रतिशत लोगो की फीस माफ थी और जिनकी नही माफ थी उनके भी लेन देन का कोई हिसाब नही था।



वो दीदी का मंदिर था जहाँ शाम से वो साधना करती थीं, जहाँ जितने दुखी मिल सकते उन्हे बटोर कर कुछ खुशी देने की कोशिश की जाती थी...! शाम को प्रसाद चढ़ता, आरती होती, नवरात्र के नौ दिन वहाँ भंडारा होता और दीदी जो कुछ कॉलेज में कमाती इन्ही सब में लगा देती थी। कहीं किसी लड़की की शादी हो तो दीदी को ये नही सोचना पड़ता कि व्यवहार कितना देना है वो जितनी गरीब होती दीदी का गिफ्ट उतना मँहगा।


सोमनाथ सर जो कि होम्योपैथ के डॉक्टर हैं और समाजसेवा को उन्होने भी अपना धर्म चुना है, मेरे और दीदी के समान रूप से करीबी हैं। सबसे पहले उन्हे ही पता चली ये बात कि दीदी को लीवर कैंसर है। अब ये बात बताई किसे जाये..? और छिपाई कैसे जाये..? इस पशोपेश में उन्होने मुझसे ये बात बाँटी और कहा "लेकिन हम अपनी प्रार्थना से दीदी कि उम्र बढ़ा लेंगे।" आपरेशन के बाद सोमनाथ सर ने मुझसे कहा था कि दी का survival ४-५ साल तक भी हो सकता है, तब मैने ऐसा नही सोचा था कि इतनी जल्दी वो छूट जाएंगी। दीदी और उनके घर वालो से ये बात छिपा ली गई थी, क्यों कि उनकी ८५ वर्षीय माँ और यशी दी को ये बात बताई भी कैसे जाती।


मैने इधर कानपुर की विजिट बढ़ा दी थी। थोड़े दिन पहले सर ने फोन कर के बताया कि दीदी एड्मिट हैं और अब कोई निश्चित नही कि वे कब हमारा साथ छोड़ देंगी। मैं रोज सोने के पहले सर से उनका हाल लेती। दीदी जिस दिन एड्मिट हुईं उसके एक दिन पहले उन्होने खूब गीत गाये। उसमें एक गीत था "ये शाम की तन्हाइयाँ ऐसे में तेरा गम" सर लगभग रोज फोन रखने के पहले ये गीत सुनते,


"जिस राह से तुम आने को थे,

इसके निशाँ भी मिटने लगे"


और फिर कहते बस करो।



३ तारीख की रात भी ऐसा ही हुआ। मैने दीदी का हाल लेने को फोन किया। दीदी का हाल पूँछा ये गीत और कुछ और गीत जो उस समय परिस्थिति सम्यक थे, सर को बताया कि दीदी तो मना कर रही हैं लेकिन मैं शनिवार की सुबह आ रही हूँ। लाइट चली गई थी शायद १ बजे सोई होऊँगी.... तभी एक अद्भुत स्वप्न देखा जो कि दूसरे दिन पारुल से बाँटा भी ( मेरा प्रोग्राम संडे को पारुल से मिलते हुए कानपुर जाने का था।) मैने देखा कि भयंकर आँधी तूफान में फँसी मैं दीदी के पास जब नही पहुँच पाती तो एक व्यक्ति सहारा दे कर मुझे वहाँ पहुँचा देता है। वहाँ दीदी के ऊपर खूब ठंडा पानी डाला जा रहा है और वहीं ढेर सारे रंगबिरंगे कागज उड़ रहे हैं जिनमें लिखा है " हे ईश्वर धरती के इस मोती को अपनी करुणा की सीप में सम्हाल कर रखना" ..और अचानक मेरी नींद खुल जाती है... समय देखा तो ३.३० बज रहे थे...कैसा स्वप्न था ये, थोड़ी देर को हिला गया।


सुबह उठ कर सोचा कि सर को बताऊँ लेकिन आफिस जाने की हौच पौच में समय नही मिला। कैलीपर्स पहन ही रही थी कि सर का फोन बज गया और उन्होने बताया कि दीदी की हालत कल रात ३ बजे से गंभीर हो गई है। दिन कैसे बीता बता नही सकती, हर पल डर कही कुछ खबर ना आ जाए। दूसरे दिन दीदी के पास पहुँच गई। दीदी अब बहुत खास लोगो को ही पहचान पा रही थीं। लेकिन मेरी आवाज सुनते ही बोलीं "उसे मिल लेने दो मुझसे" और पास पहुँचते ही बोली " तुम्हें अभी बहुत ऊँचाई पर जाना है।"फिर चलते समय बोलीं "अब तुम मत आना हम ही आ जाएंगे जल्द ही।" मेरे आँसू दीदी की गज़ल गान चाहते थे


आओगे कहाँ लौट के जो जा रहे हो तुम,

नाहक ही मेरे सर की कसम खा रहे हो तुम


७ मई की रात ११.३० बजे सर का फोन आ गया कि "दीदी साँस नही ले रहीं" और मैने आँख बंद कर के कहा "हे ईश्वर ....! धरती के इस मोती को अपनी करुणा की सीप में सम्हाल कर रखना...!"


दीदी अपनी अगली यात्रा पर जा रहीं थी। कोई बूढ़ी महिला चिल्लाती हुई आतीं "अरे तुम तो कहती थी कि हम तो हैं, अब हमसे ये कौन कहेगा।" कोई गरीब औरत चिल्ला रही थी "कहती थी कि किसी से कुछ ना माँगा करो हमसे बताया करो जो जरूरत हो" कितने लोग खड़े ऐसी ही कतनी चीखें निकाल रहे थे। किसी को नही पता कि वो शशि दी के कौन थे लेकिन उनको पता था कि शशि दी उनकी अपनी थीं।