Wednesday, March 10, 2010

गली में आज चाँद निकला



सबकी तरह मैं भी माँ से कहानियाँ सुनते बड़ी हुई। उन कहानियों के विषय अधिकतर देशभक्ति के हुआ करते थे। राणा प्रताप का राष्ट्र प्रेम से मौत तक समझौता ना करना। उनकी बच्ची का कहना

वो कौन शत्रु है जिसने,
हम सब को वनवास दिया है

एक छोटी सी पैनी सी तलवार मुझे भी दे दो
क्षण मुझको रण करने दो, मैं उसको मार भगाऊँ।

भगत सिंह का बंदूकें बोना, आजाद का कपड़ों की गठरी में बारूद बाँध कर धोबी के रूप में अंग्रेजों को धता बताना, दुर्गा भाभी का मेम बनना, सब मैने माँ से ही सुना।

वीर रस की कविताएं यूँ भी जल्दी याद होती और खाली मन में ओज भरती तो भी देशभक्ति का संचार होता। फिर टीन एज में जब पुरानी शहीद देखी तब तो विश्वास ही हो गया कि मैं पिछले जन्म में कोई क्रांतिकारी गुट की ही थी। तभी तो ये देशभक्त दिमाग से नही उतरते।

युवावस्था में आया कारगिल। जब टी०वी० पर दिखते शहीदों के माता पिता को भरी आँखों को छलकने से पूरी ताकत से रोकते हुए यह कहते देखती कि हम रो के अपने बेटे की शहादत को कलंकित नही करेंगे। और कई दिनो तक अपनी आँखें नम रहतीं। जाने क्यों फौजी अच्छे ही लगते थे। ऐसा लगता था कि जीने का शऊर इन्हे ही आता है

इसी तारतम्य में देखा नाम मेजर गौतम राजरिशी का असल में कुछ भी खास नही लगा पहली बार क्योंकि जाने कितने मेजर हैं यहाँ लखनऊ में और कुछ लोगो से मिलना हुआ तो लगा कि बस नाम को मेजर और देश के लिए जज्बे से कोसो दूर। देश के लिये कुछ करने का जज़्बा नही, बस फौजी होने का रुतबा..! सो बस एक नये ब्लॉगर जिसका वास्ता गुरुकुल से है ऐसा ही कुछ सामान्य भाव आया। फिर लगा कि जो पोस्ट लगाई जाती हैं वे कुछ खास होती हैं, तो ब्लॉग पर लगातार जाना और भाने पर कमेंट करना ये रीत बन गई।कुछ अखरा तब जब एक टिप्पणी आई कंचन जी आपसे शिकायत है कि आप टिप्पणी रोमन में करती हैं।

अजीब आदमी है ज्यादा टिप्पणियाँ ना करने वाली मैं इन्हे टिप्पणी कर देती हूँ यही बहुत नही है क्या? खैर शालीनता का लबादा ओढ़ कुछ जवाब दिय कि अगर देवनागरी में टिप्पणी करूँ तो शायद बिलकुल टिप्पणियाँ कर ही ना पाऊँ।

एक अतुकांत कविता वर्षा वन आने के बाद कुछ अधिक प्रभावित हुई इस ब्लॉगर से और इनकी पोस्टों का इंतज़ार रहने लगा।

मगर खास तो तब हुआ जब २६/११ की घटना हुई। सबकी तरह मेरे मन भी आक्रोश और कुछ ना कर पाने की पीड़ा थी।कितने निर्दोष असहाय मारे जा रहे थे। इसी बीच संदीप उन्नीकृष्णन का जाना देख देख अजीब सा मन होता। दुःख और आक्रोश के मिश्रित भाव आते।

तभी राजरिशी जी की पोस्ट आती है उन्नीकृष्णन पर। पढ़ा कि कमांडो ट्रेनिंग साथ साथ की थी दोनो ने।

ओह तो इन्होने कमांडो ट्रेनिंग कर रखी है। यानी नाम के लिये फौजी नही हैं लड़ने वाले फौजी हैं। इस के बाद एक अलग सम्मान हो गया मन में इनके लिये।

जब जब ये क़लम सरहदों के, फौज के, देश के विषय में लिखती कुछ अलग सा हो जाता मन। मन में आता कि एक लंबा खत लिखूँ इस आभासी अजनबी को। कमेंट लिखने में प्रयोग हृदयतल की सीमा और गहरी होती गई और इसी मार्च माह के उस दिन जब पोस्ट में पढ़ा कि ये काश्मीर को शोभित करने आखिर पहुँच गये, उस दिन खुद को रोक ना पाई और एक खत लिख ही दिया

गौतम जी !
कहा था ना कि आपको पढ़ते ही मन होता है, कि एक लंबी मेल लिखने बैठ जाऊँ आपको....! आज की पोस्ट पढ़ने के बाद नही रोक पाई खुद को।


एक जमाना था .... कारगिल युद्ध तक। जब मन होता था कि काश..! मेरे घर से कोई युद्ध के लिये जाता, वीर क्षत्राणियों की तरह तिलक लगा कर भेजती मैं, हाथ में बंदूक दे कर, आखों की कोरों पर आये आसुओं को ज़ब्त करते हुए कहती " विजयी हो कर लौटना, हमारी चिंता मत करना, देश की उन बहनों की चिंता करना, जिनकी अस्मत तुम्हारे हाथ है। उन दुश्मन मेमेनों पर सिंह की तरह टूटना....! उस भारत भूमि को दूसरों के हाथ में मत जाने देना जिस की संस्कृति सब से पुरानी है।"

हाँ तब जब कारगिल युद्ध हुआ था मैने अपने सबसे प्यारे दोस्त और मेरी नज़र सबसे खूबसूरत और वीर भतीजे 'लवली' से कहा था कि तुम लड़ने चले जाओ। उसका दोस्त मेरा मुँह बोला भाई था और दोस्त की बहन इसकी मुँह बोली बहन। उस बहन ने छूटते ही क्रोध से कहा था "अरे क्या बात करती हो, दुनिया भर में मेरा ही भाई मिला है शहीद होने को।" मैने गंभीरता से मुस्कुराते हुए कहा था " जो शहीद होते हैं, वो भी किसी के भाई होते हैं...!"

२३ २४ साल की वो उम्र शायद सिर्फ भावुकता वाली थी। जब मैने कारगिल राखियाँ भेजी थीं और एक दूर के रिश्ते के भाई ने लौटती डाक से कहा था कि "मुझे अपनी नौकरी के १६ सालो में इतनी भावुक चिट्ठी कोई नही मिली। मुझे विश्वास हो गया कि तेरी राखी के आगे दुश्मनो की गोली मेरा कुछ नही बिगाड़ पायेगी" और लौटते समय सारे दोस्त मेरे घर पर मुझसे मिलने आये थे, उस अंजान बहन से जिस ने राखी भेज कर उनकी सलामती की दुआ की थी।

मगर अब जीवन के इस मोड़ पर शायद भावनाएं अब कोरी नही रह गईं, दुनिया के बहुत से स्वार्थी रंग इस पर चढ़ गए। तभी तो एक अंजान व्यक्ति जिस से न मेरी मुलाकात है, ना बात..बस कुछ नज़्मों का रिश्ता, उस के ट्रांसफर विषय में जब से सुना था तब से मन में आशंका थी कि कहीं जम्मू मे तो पोस्टिंग नही मिल रही और आज जब आपकी पोस्ट पढ़ी,तो कहने की तो बात नही मगर आँसू यूँ निकलने लगे जैसे लवली की ही पोस्टिंग वहाँ हो गई हो। जितने कमेंट पढ़ रही थी भावुकता उतनी ही बढ़ रही थी। मन हुआ कि झट तनया को गोद ले कर कहूँ "पापा जब तक नही आते, तब तक बुआ से सारी जिद करना"

सच गंगोत्री की गंगा, कानपुर आते आते कितनी मिट्टी साथ ले आती है। कुछ भी पहले सा साफ नही रह जाता? वो उम्र कितनी भोली थी जब किसी को भी कोई संबोधन देते हिचक नही होती थी। मगर आज हो तो रही है, फिर भी कहूँगी..कि पता नही आप मुझसे एक दो साल बड़े हैं या छोटे या फिर हम उम्र...! मगर जो मेरी रक्षा में वहाँ खड़ा है, वो रक्षक मेरा वीर ही होगा। जाने क्यों एक छोटी बहन सा भावुक हो कर कहने को मन हो रहा है " जल्दी आना भईया, मैं इंतज़ार करूँगी। अपना ध्यान रखना और मेरा भी।"

कभी लखनऊ से निकलना हो तो ज़रूर मिलने आइयेगा। साथ में भाभी जी और तनया रहें तो और भी अच्छा.....!
खुदा हाफिज़
आपकी
कंचन

रोज उत्सुकता से मेल चेक करने के परिणाम में तीन दिन बाद जवाब आया

कंचन तुम,
स्नेहाशिष !


तुम मुझसे छोटी हो और फिर तुमने "वीर" तो कहा ही है.....ये रूलाने वाली आदत जो है ना तुम्हारी, एकदम गलत है वो भी एक फौजी को रूलाती हो...लोग क्या कहेंगे !!!

पता है ब्लौग पर आते ही तुम संग कुछ जुड़ गया था ये रिश्ता....तुम्हारे शब्दों को देख कर लगा कि कुछ है जो खिंचता है मुझे....

देखो फिर से रो पड़ा हूँ....

कश्मीर के इस सुदूर कोने में बैठा, इस इंटरनेट को शुक्रिया अदा करता हूँ....इससे पहले भी दो पोस्टिंग काट चुका हूँ किंतु ये सुविधा पहले नहीं थी...

जिंदगी थोड़ी सी कठिन जरूर है मगर मजा आता है, सच पूछो तो....

हाँ शादी हो गयी है और फिर तनया एक साल की हो गयी है तो उस वजह से कुछ भावुक अवश्य हो जाता हूँ कभी-कभी...

लखनऊ आने का अब तो बहाना ढ़ूंढ़ना पड़ेगा अपनी इस अलबेली बहना की खातिर...

"कंचन" रहो हमेशा अनवरत...

तुम्हारा वीर
-गौतम

और फिर जाने कब ऐसा हुआ कि लगा ही नही कि ये शख्स आभासी दुनिया का हिस्सा है। जो बाते कभी किसी को नही कही होगी वो भी जाने किस तरह बताती चली जाती हूँ, इस जादुई रिश्ते को। बात का हेलो कहते ही समझदारी जाने कहाँ चली जाती है और मैं एकदम से छोटी हो जाती हूँ। ऐसा लगता है कि शायद बहुत दिनों का साथ है।

कितनी बार पानी को अचानक चट्टान बनते और पत्थर को पिघलते देखा।

जब गोली खाई तब तो सबने जाना मगर इससे ज्यादा भयंकर दिन जिन्हे वो खुद कभी बयाँ नही करेंगे और मुझे करने नही देंगे। ७२ घंटे लागातार बारिश और एक चट्टान की आड़ में हथियार लिये बैठा एक फौजी शायर क्या करता होगा उन घंटों के मिनटों और मिनटों के सेकण्डों में। कभी एक बहन की तरह सोच के देखियेगा। लिहाफ के अंदर तड़ तड़ बूँदे चेहरे को तीखी लगने लगती हैं।

कल्पना और हक़ीकत में बड़ा अंतर होता है। आप मुझे कमजोर कह सकते हैं, मैं हूँ भी। कल्पना में फौजी की बहन बनना जितना बहादुरी का काम लगता था, उतनी ही कमजोरी से हर बार बस एक बात निकलती है "अपना खयाल रखना।"


लगा ही नही कि मिली नही हूँ अपने वीर से मगर उस दिन सारे दिन जुबाँ पर ये गीत रहा जो शीर्षक में है....! गली में आज चाँद निकला
वो दिन ही कुछ ऐसा था....










आज आप के जन्मदिन पर आप को बताना चाहती हूँ कि आप जैसे लोगो को जिंदगी में पाने के बाद ईश्वर से नज़र मिला के शिकायत नही की जा सकती.... और ये भी कि कभी कभी अपनी फीलिंग्स न जताना, फीलिंग सही मायने में रखना बताता है... और ये भी कि एक सच्चे और अच्छे भाई के सारे गुण हैं आप में (अवगुण भी).... और ये भी कि आप को वीर के रूप में पाना मुझ को गौरवान्वित करता है... इस गौरव को बनाए रखना... अपना ख़याल रखना



आपकी प्रेमिकाओं को ढूँढ़ने निकली तो पता चला सब इंगेज हो चुकी हैं। कुछ कुछ इनकी शक्ल-ओ-सूरत मिल रही थी तो आपको केक खिलाने के लिये इन्हे ही पकड़ लाई

LONG LIVE DEAR BRO..... MANY MANY HAPPY RETURNS OF THE DAY


Tuesday, February 23, 2010

काकः काकः, पिकः पिकः


ये आवाज़ अक्सर परीक्षा के समय कूजती थी। जब सारी दुनिया से ध्यान हटा कर एक लक्ष्य परीक्षा होती दिन रात के परिश्रम में जब इसकी आवाज़ कान में पड़ती तो मन कुछ हलका सा प्रतीत होता था। अब भी जब ये आवाज़ सुनती हूँ तो हाथ में पु्स्तक लिए बाउंड्री के भीतर पड़ी खटिया पर खुद को औंधी पाती हूँ।
सर्विस के बाद जब दोबारा एम०ए० हिंदी कर रही थी उस समय भी अचानक ये बोली उस दिन रमेश भईया आये हुए थे। तो अनायास ही मुँह से निकला, "देखो कितना अच्छा लगता है जब ये बोलती है।"
वो मुस्कुरा कर बोले "मगर मुझे कोयल पसंद नही आती।"


अजीब सी बात लगी मुझे ये, भला कोई ऐसा भी हो सकता है जिसे कोयल न अच्छी लगती हो ? फिर उन्क्स्होने कुछ कारन बताये..... उसी आधार पर लिखी गई है ये लम्बी तुकबंदी। लीजिये पढ़िए ०९.०४.२००६ को लिखा गया ये कुछ


मेरी बगिया में पेड़ हैं दो, इक आम और इक कटहल का,

कटहल में वास काग का है और आम घरौंदा कोयल का।

इक दिन सूरज ढलने को था और मै बैठी थी बगिया में,

संग में मेरा था प्रिय मित्र और मै सपनीली दुनिया में।

ऋतु भी बसंत कुछ ऐसी कि, सब कुछ रूमानी होता है,

उस पर कोयल कि कुहू कुहू फिर खुद पे कहाँ वश होता है।

मै काँधे पर धर शीश मीत के आँखों को थी बंद किये,

जीती थी उस हर इक पल को, हर आहट पर थी कान दिए।

पर जैसे मिश्री की डालियों में इक नीम गिलौरी आ जाए,

वैसे ही वहाँ एक स्वर गूँजा, इक कौवा बोला काँय काँय।

मै खीझ बहरे स्वर में बोली, मेरा मुँह था कुछ तना ताना ,

भगवान् तुझे ये क्या सूझी, कोयल संग कागा दिया बना।

इतने में मेरे कानो में रूखा पर भीगा स्वर आया,

ये स्वर उस कागा का ही था उसका था गला कुछ भर आया।

उस भीगे स्वर में वो बोला "देवी मेरा अपराध कहो,

तुम तो दर्शन में जीती हो कम से कम तुम तो ये न कहो।

ना काम कोई भी बुरा किया, किस्मत में जो था उसे लिया,

फिर भी तुम जैसे कहते हैं क्यों, काकः काकः, पिकः पिकः।

न ठिठुरन सर्दी की झेले, न जेठ दोपहरी में आये

ये कोयल सबको प्यारी है, जो बस बसंत ऋतु में गाये।

मैंने गर्मी कि तपन सही, ठिठुरन सर्दी कि झेली है,

पर कहीं पलायन नहीं किया, विपदा सर आँखों पर ली है,

वो कोयल जो अपने अंडे तक मेरे घर रख जाती है,

मातृत्व बोध भी नहीं जिसे, वो सबके मन को भाती है।

अपने शिशुओं की नही हुई जो, वो समाज की क्या होगी,

मै एक समूह में रहता हूँ, ये बात गौर की ही होगी।

जिसको समूह में रहना है, उस पर एक जिम्मेदारी है,

खुद में जीना गाने गाना ये बात कौन सी भारी है।

जूठा कूठा साँझा कच्चा, जो भी मिलाता है खाता हूँ।

इस पर सब मुझको कहते हैं, मै बिना बात चिल्लाता हूँ।

मेरा स्वर मीठा नहीं सही, संदेशे मीठे लाता हूँ,

आने वाला है परदेसी सजनी को जा बतलाता हूँ।

वो जो इठलाई फिरती है, जो फुदक रही डाली डाली,

उसकी बस किस्मत अच्छी है, पर वो मन से भी है काली।

जब आम बौरने लगते हैं, मीठा सा मौसम आता है,

अनुकूल सभी कुछ होने पर, ये पंचम सुर लहराता है।

मीठे सुर से छलने वाली पर दुनिया मोहित रहती है,

पर मेरे मन कि सच्चाई मुझमे ही तिरोहित रहती है।

सब कुछ किस्मत की बाते हैं, सहना पड़ता है भाल लिखा,

ज्ञानीजन ठोकर खाते हैं, मूरख देते हैं राह दिखा।

देवी तुम से ये विनती है, फिर से पढ़ना ये शाष्त्र लिखा,

और नया अर्थ देना इसको है काकः काकः, पिकः पिकः "




Wednesday, February 17, 2010

एक मुक्तक




बहरे मुतकारिब सालिम मक़बूज असलम (१६ रुक्नी) जिस पर इस बार की तरही भी है और गुरु जी ने ढेरों गीत इस बहर पर बता रखे हैं। इसी बहर पर ये ताज़ा ताज़ा मुक्तक गुरु जी के आशीष से....


मिलो किसी से तो अपना दिल तुम,
ना पूरा पूरा उठा के रखना।
वो जैसा दिखता है, हो कि ना हो,
ये मन को अपने बता के रखना।
जो ज्यादा समझा किसी को तुमने,

तो दाग फितरत के सब दिखेंगे,
ज़रा सी दूरी बना के रखना,

ज़रा सा खुद को बचा के रखना।

Sunday, February 14, 2010

तुमने इश्क का नाम सुना है, हम ने इश्क किया है


बेतहाशा चूमते हुए होंठो पर

अपना हाथ रख के,

उस दिन जब पूंछा था तुमने

कि

"अब क्यों नहीं लिखता मै कविता तुम पर"

कहना चाहता था

कि

"लिख ही तो रहा था अभी

जब तुमने अचानक रख दिया हाथ.......!!"


नोट: किसी ने किसी से कहा ऐसा और मैंने जस का तस लिख दिया कभी कभी यूँ भी हो जाती है कविता

Sunday, February 7, 2010

बाबुल तेरे प्यार ने तो मुझे सिर पर चढ़ा लिया



और आज फिर याद आया सब कुछ .....! पांडे जी की बेटियों को उनकी थाली में खाते देख याद आया आपका कौर तोड़ कर मिर्च अलग कर कर के खाना खिलाना। उन सबका मचलना देख कर याद आया अपना बचपन जो शायद आज ही के दिन बहुत हद तक खतम हो गया था।

ऐसा नही कि आपके जाने के बाद ही आपकी कीमत समझ आई। आपके रहने पर भी तो आप उतने ही प्रिय थे। अम्मा हमेशा कहतीं कि जाते हम दोनो हैं और लौटने पर बाबूजी को पकड़ के रोती है ये। १४ साल की उम्र में ये तो उद्गार थे मेरे बाल मन के

नही प्रतीक्षा अब होली की इंतजार दीवाली का,
लौटा दो जो साथ ले गये प्यार तुम अपनी लाडली का।

वही लाडली जिसकी आँखें क्षण भर जो भर आती थीं,
तो मानो रग रग में आपके पीड़ा सी भर जाती थी

जिस घटना की कल्पना कर ना सोई सारी रात
वो घटना चरितार्थ हो गई और मैं रह गई मलती हाथ।

आऊँगा मैं लौट अभी फिर, वादा कर के गये थे आप,
आये तो पर चक्षु बंद थे, जाने क्यों ना बोले आप

वो ही आँखें जिन आखों मे बस दुलार था मेरी खातिर,
वो ही कर थे जिन हाथों में लाड़ बहुत था मेरी खातिर

वो ही चेहरा, वो ही पलकें, वो ही थे सब अंग तुम्हारे,
पर जाने क्यों सब कहते थे, बाबूजी ना रहे तुम्हारे।

कितना चिल्लाई बाबूजी, एक बार दो आँखें खोल,
जाओ मैं ना रोकूँगी पर एक बार दो गुड्डन बोल

जाने किन पुण्यों का फल था पिता मिले जो आपसे,
जाने किन पापों का फल था अलग हुई जो आपसे

दो पैसा मुझको जिद करना, वो लड़ना, वो चिल्लाना,
हैं सारी अतीत की बातें पास रहा अब कुछ भी ना

है जीने की चाह नही अब, ले लो मेरा सारा जीवन,
पर उसके बदले में दे दो, बाबूजी के संग गुजरे क्षण।

वो क्षण जिसमें मैं नाराज़ थी और बाबूजी मुझे मनाते
वो क्षण जिसमें मैं रोती थी बाबूजी मुझको फुसलाते।

वो क्षण जिसमें मैं ज़िद करती और बाबूजी गुड़िया लाते
जो कुछ उनसे कह दो ला कर मेरे सारे स्वप्न सजाते।

वो क्षण जिसमें मैं और दीदी कहते बाबूजी मुझे चाहते
और हमारी बातें सुन कर बाबूजी केवल मुसकाते

और ये गीत जब आता था तो कितनी छोटी थी मैं ....पाँचवीं क्लास में थी शायद। मैं और दीदी दोनो ही खुश हो जाते थे ये गीत सुनकर। हम दोनो को लगता कि ये गीत मेरे बाबूजी गा रहे हैं।




बाबुल तेरे प्यार ने तो मुझे सिर पर चढ़ा लिया।

Monday, February 1, 2010

इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।


कौन है जो जिंदगी तनहा बिताना चाहता है,
जिदगी को चुन लिया तनहाइयों नें किंतु मेरी,
अब मुझे जैसी मिली, वैसी बिताना चाहती हूँ,

इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।

छूट जाने के लिये ही मीत जब सारे मिले हैं,
दिल जलाने के लिये ही दीप जब सारे जले हैं,
क्यों न फिर जलते हुए इस दिल की लौ रोशन करूँ मैं,
और उस लौ से किसी के दिल के तम को अब हरूँ मैं।

इस तरह जलते हुए मैं जगमगाना चाहती हूँ।

इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।

मैं किसी की प्रार्थना में हूँ न हूँ शामिल भले ही,
पर मेरी हर प्रार्थना, शुभकामना सबको मिले ही।
हो न हो मेरे लिये आँखें किसी की नम यहां पर,
पर सभी के पीर पर नम हो मेरी आँखें पिघल कर।
मैं सभी के अश्क ले कर मुस्कुराना चाहती हूँ।

इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।

उस विधाता ने किसी इक ध्येय से सबको गढ़ा है
और अपना ध्येय मैने भाल पर ये ही पढ़ा है।
पैर के काँटे न रोकें होंठ की खिलखिल हँसी को,
फूल का मतलब बताना,लक्ष्य मेरा हर किसी को
इसलिये ही हर चुभन में गुनगुनाना चाहती हूँ

इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।

नोटः रविकांत जी और शार्दूला दी को धन्यवाद के साथ जिन्होने पढ़ने लायक बनाया इसे। और चित्र साभार गूगल जिसका शीर्षक था Might Be Laughing :)

Tuesday, January 12, 2010

मुझे नज़र से डर लगता है।

प्यार तुम्हारा मुझ में रम कर,
नित मुझको सुंदर करता है,
मुझे नज़र से डर लगता है।

आँखों में काजल बन बैठे, होंठों पर लाली बन साजन,
तिल बन कभी कपोल सजाते,कभी दृष्टि बन पूरा तन मन,
कभी मुझे प्रतिबिंबित करते,
यूँ जैसे दर्पण करता है,
मुझे स्वयं से डर लगता है।

तुमने मन में फूल खिलाये, चुनने का अधिकार तुम्हे है,
रंगो रंग में और गंध में घुलने का अधिकार तुम्हे है,
मर्दन का अधिकार उसे है,
जो सर्जन का दम भरता है।
किसे अंत से डर लगता है ??

सुबह बहुत छोटी होती है, लंबी होती रात, दुपहरी,
कौन भला ऐसा जीवन है, जिसमें मधुॠत हर पल ठहरी,
मधुॠतु को सारथी बना कर,
पतझड़ अपना रथ धरता है,
अब बसंत से डर लगता है।

डर के सारे द्वार तोड़ कर, प्रिय तुम मेरा साथ निभाना,
अंतहीन अपनापन ले कर, विरहहीन इक मिलन सजाना,
वह इक मिलन सॄष्टि की रचना
का आधार हुआ करता है,
और मिलन से डर लगता है..!!

आभारः राकेश् खण्डेलवाल जी, शार्दूला दी एवं रविकांत जी जिनके कारण गीत पढ़ने काबिल हुआ