Friday, March 7, 2008

नारी मुक्ति


अभी जुलाई में अचानक घर शिफ्ट करना पड़ा...जाते ही पहली समस्या थी काम की.... घर देखने गई थी तभी देखा था कि servent room में एक नवविवाहित जोड़ा रहता है.... आंटी (landlord)से बात की तो उन्होने कहा कि एक बार उसी से बात कर के देखो...संजोग से नाम उसका भी कंचन ही था...!

गोरा रंग..बड़ी बड़ी आँखें..जो खींचतीं थी..और जिसका उसे अहसास भी था, इसीलिये तो बातें करते हुए उन आँखों को बीच बीचे में भोलेपन से झपकाती सी रहती थी...

मैने उसे और उसके पति को एक साथ बुलवाया और काम के लिये पूँछा..उसने चट से हामी भरते हुए कहा कि " लेकिन दीदी जब हमें काम करना था तो रंजीत का काहें बुलायो..?"

अरे .. ? समाज के इस तबके में नारी मुक्ति, नारी सशक्तिकरण और आत्मनिर्णय लेने की ये भावना... मैं तो दंग रह गई। फिर भी बात टालने की गरज़ से कहा कि " अरे तुम दोनो मियाँ बीबी हो, दोनो को ही एक दूसरे से पूँछ कर ही फैसले लेने चाहिये ना"

" तो का भवा..हम अपना काम करिबे, रंजीत अपना काम करें।" उसने तुनक कर जवाब दिया और रंजीत बस मुस्कुराता ही रहा..!

मन ही मन बहुत प्रसन्न हुई मैं इस आपसी सामंजस्य को देख कर, आज जब मध्यमवर्ग की आत्मनिर्भर औरतें भी ९९ प्रतिशत फैसले कल पर यही कह कर छोड़ती है कि ज़रा इनसे पूँछ लूँ फिर बताऊँ। वहाँ वो अनपढ़ लड़की किस आत्मविश्वास के साथ कह रही है कि मेरे फैसले मैं खुद लेने में सक्षम हूँ..!

खैर दूसरे ही दिन से कंचन का काम पर आना शुरू हो गया..काम भी साफ और बाते भी लच्छेदार..मैने बातों ही बातों में अपनी शंका का समाधान कर लिया " क्यों कंचन तुम्हारी love marrige है क्या?"

कहते ही उसके चेहरे पर लालिमा आ गई, उसकी सुंदर आँखें यूँ झपकीं कि उसे मुँह से जवाब देना ही नही पड़ा कि "हाँ"

"घर वाले नही राजी हुए थे क्या?" मैने अपनी अगली जिग्यासा सामने रखी।

"रंजीत के घर वाले तो राजी थे दीदी, लेकिन हमारे घर वाले नही राजी थे, वो रंजीत हमसे छोटी जात का था ना दीदी !...तबै..! बताओ जात से कुछ होता है दीदी..?"

"ऊँहुह्" कह कर मै अपना काम करने लगी.! फिर अलग अलग दिन की बातों से पता चला कि किसी दिन रंजीत के साथ चोरी से घूमने गई कंचन की चोरी का पता चल जाने पर उसकी बिरादरी के लोग उसके घर पर रंजीत को मारने के लिये इकट्ठा हो गये ‌और जब इन दोनो को पता चला तो ये दोनो डर से उस रात घर पर नही आये... दूसरे दिन खबर मिली कि इनके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट कर दी गई है तो उनके पास यही रास्ता था कि वे रंजीत के पिता के पास दिल्ली चले जाएं और वही उन्होने कोर्टमैरिज कर ली और रोटी पानी के जुगाड़ मे लखनऊ आ गए.... कंचन पढ़ी लिखी नही थी, रंजीत हाईस्कूल पास था..सो वो मजदूरी करता था और कंचन आंटी और मेरे घर काम।

१०-१२ दिन तो सब ठीक चला लेकिन इसके बाद अचानक कंचन का आना कम होने लगा और मेरी रूटीन्ड लाईफ में तो कुछ भी इधर उधर होने की गुंजाइश होती नही...! मैं आवाज लगाती और ऐसा लगता कि सुन के अनसुना कर दिया जा रहा है...! अब हालात ये थे कि ना तो मैं कंचन के बिना मैनेज कर सकती थी और न ही उस की तरफ से कोई निर्णय मिले बिना दूसरी मेड रख सकती थी...! खीझ इतनी लगती कि क्या कहें...? हर काम लटकने लगा..खाना, बरतन सब..! जब सामने पड़े तब तो बात की जाये..यूं तो बगल के ही पोर्शन में रहती थी लेकिन उसे आवाज़ दो तो रंजीत निकल कर कहता कि " उसकी तबियत खराब है वो काम पर नही आएगी"

उस में एक दिन कंचन के रोने और रंजीत के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी, तो लगा कुछ गड़बड़ है। उसी के दूसरे दिन अचानक कंचन सूजी आँखों के साथ, हाथ में कटोरी लिये रसोई की तरफ आई। मैने उसकी तरफ प्रश्नपूर्ण निगाहों से देखा.." क्या हुआ कंचन"

" दीदी रंजीत तुम्हरे हियाँ काम करे का मना कर रहे हैं"

" क्यों..?"

"......"


ओह मामला अब कुछ कुछ समझ में आने लगा था मुझे.."क्या कहता है.."

" दीदी ऊ हमाए ऊपर सक्कात है"

असल में मेरे साथ मेरे दो nephews भी रहते हैं दोनो ही बड़े हो चुके हैं....! मैने बात को समझते हुए कहा " हम्म्म्म ..फिर...?"

" हम कहा दीदी कि दूनो भईया लोग तो हमसे बातौ नही करते है....दीदी का हमाई बहुत जरूरत है....! बकिर...." कहते हुए उसने अपने कंधे से कुरता जरा सरका दिया... और कंधों पर का कालापन दिखने लगा ...! " कल तो मारा भी दीदी..कहता है कि तुम खुदै चहती हो हुँआ जाना.." और उसकी आँखें भर आईं।

उफ..सिहर गई मैं...अपनी मनगढ़ंत कुंठा के चलते कितना निर्दयी हो गया ये बंदा...! सच जानने समझने की कोई कोशिश नही..! और इसके लिये ये अपना घरबार छोड़ कर आ गई....? मारते समय ये भी खयाल नही आया उसे..!

मैं कमरे से दवा की टयूब ले आई...उसके कंधे पर लगाते हुए मैने कहा " और तुम कहती हो कि ये तुम्हे प्यार करता है? ऐसे किया जाता है प्यार?"

"दीदी रंजीत मारत हैं..तो दुलरउते भी है...बप्पा औ भईया जब मरते थे तब हम रात भर रोआ करें हमका पूँछे भि नही अऊते थे...! हम से खाली काम करउते थे औ तनुखाह धर लेते थे... हम खावा कि नाही कबौ नही पूँछा...कम से कम रंजीत भूखा तो नही सोने देते.... मरद की जात है तो गुस्सा तो अईबे करी..... लेकिन गुस्सा उतरे पर मनईबौ तो करते है"

मेरे हाथ उसके कंधों पर यंत्रवत् चल रहे थे.... कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या कहूँ..... जिसने आज तक कड़ी धूप के शिवाय कुछ देखा ही न हो, वो मूसलाधार बारिश की माँग करे भी तो कैसे । वो तो चंद बूंदों से ही खुश है...! बाहरी आवरण ही बहुत है उसके लिये...... बराबरी का दावा करने तक तो उस औरत की सोंच जा भी नही सकती यही कहाँ कम है कि पैरों के नीचे रौंदी नही जा रही.... पहले दिन का सामंजस्य देखने के बाद अभिभूत हुई मैं आज की घटना से सिर्फ भावहीन हो गई थी...मेरा कोई भी अभिभाषण काम आने वाला नही था, अतः दवा लगाने के बाद मैने पास रखा अपना पर्स उठाया और उसका हिसाब करते हुए कहा " कोई बात नही कंचन, तुम अब मत आना मैं दूसरे किसी को देखती हूँ...!"

Monday, March 3, 2008

मुलाकात गवाक्ष के प्रेरक पवन मनीष जी से

२९ फरवरी का दिन, जो कि ४ साल में एक बार ही आता है... और जो भी चीज rarely हो वो खास तो हो ही जाती है, लेकिन मेरे लिये ये तारीख खास इसलिये थी क्योंकि यह ले के आई थी उस शख्स को जिसने आप सबसे मेरा परिचय कराया. मेरी खुशकिस्मती यह थी कि मेरी पहल ब्लॉगर्स मीटिंग उसी व्यक्ति के साथ हो रही थी जिसने मुझे यहाँ आने के लिये प्रेरित किया...! वह प्रेरक व्यक्ति थे एक शाम मेरे नाम के मनीष जी की जिन्होने अपनी एक दोपहर करी थी मेरे नाम !




जैसा कि मैने अपने बारे में बताया कि एक साधारण से परिवार की साधारण सी लड़की मै, बिलकुल अनभिग्य थी इस ब्लॉग नामक चीज से और  ई-मित्रता एवं चैटिंग जैसी चीजें तो खैर टोटल बकवास ही थीं...! भला मेरे जैसी so called कवयित्री, इन चीजों में indulge हो भी कैसे सकती थी ? किसी को हो न हो मुझे तो अपनी कदर है ना...! :)

ऐसे में जब नाम सुना आर्कुट का, तो यह भी सुना कि बहुत दिनों के बिछड़े मित्र इसमें मिल जाते हैं.  यूँ तो हमने दर्जा ८ तक की पढ़ाई जहाँ से की थी वहाँ कुल मिला कर ५ लड़कियाँ थीं, जिसमें से आगे की पढ़ाई मात्र ३ लोगो को ही करनी थी. उन तीनो से मेरा आज भी मेल मिलाप है. इसके बाद हाईस्कूल से लेकर एम०ए० तक का भी हाल यही कुछ था कि आर्कुट में तो तब ढूँढ़ें जब किसी को फोनियाना छोड़ा हो. लेकिन फिर भी लगा कि शायद कोई निकल ही आये. मुझे नही तलाश हो तो शायद उसे ही हो. फिर भाई-भतीजे इतनी दूर दूर तक फैले हैं उनसे रोज hi करने के लिये भी श्रेयस्कर था यह आर्कुट. तो यही सब सोच कर हमने भी खाता खोल ही लिया.

अब वहाँ पहुँची तो कम्युनिटीज़ भी ज्वाइन की. उसमें एक थी गोपाल दास नीरज की जो कि मेरे बहुत प्रिय कवि थे और वहीं से शायद मनीष जी ने मुझे पाया...! शुरुआत इसी बात से हुई, " क्या आप अपना चिट्ठा बनाना चाहती हैं ?"
अब यह चिट्ठा क्या बला होती है ये मुझे क्या पता...? लेकिन कुछ लिखने से संबंधित चीज़ है शायद तो मैने खुशी- खुशी कहा कि हाँ-हाँ करना तो चाहती हूँ''

लेकिन समस्याएं बहुत सारी थीं जैसे मेरे पास यूनीकोड सॉफ्टवेअर नही था, घर पर पी०सी० नही था, कंप्यूटर में भी इतनी कुशलता नही थी कि कुछ किया जा सके..लेकिन हाँ चस्का ज़रूर था..! वही कमजोर नस शायद पकड़ में आ गई थी मनीष जी को तो उन्होने उस समय लिंक दिया परिचर्चा का. वहाँ रोमन में कविता के लिखने के बाद जो चस्का लगा तो चाह कर भी उतर नही पाया

१२ जून को मैने जिस ब्लाग के जरिये इस विश्व मे कदम रखा उसकी असलियत यह है कि मैं उस का क ख ग घ भी नही जानती थी. शायद मैं खुद भी नही जानती थी कि मैं यहाँ लिखने का समय निकाल पाऊँगी.

मनीष जी ने ही एक ब्लॉग बना कर मुझे गिफ्ट कर दिया. हाँ ब्लॉग का नाम वह था जो मुझे भविष्य में आने वाले अपने कविता संग्रह को देना था.  इस ब्लॉग की जो पहली कविता पोस्ट हुई वह मनीष जी ने ही पोस्ट की और इसके बाद कभी फोन कभी चैट से मैने सीखी एक-एक बातें....! कभी बच्चों की तरह उत्साहित हुई तो कभी निराश...और मनीष जी ने बताया, "यह सब तो इस दुनियाँ के नियम हैं जी...!"

ऐसे व्यक्ति से मिलने का मन क्यों न होगा ? मैं तो मौके की तलाश में ही थी। जब पता चला कि महोदय कानपुर से लखनऊ बाराती बन कर आ रहे हैं लेकिन मेरे घर से काफी दूर होने के कारण मुझसे नही मिल पाएंगे उन्होंने समझाया,  " क्यों इतना परेशान होंगी ? फोन पर तो बातें वगैरह हो ही जाती है..!"

अब कौन समझाये कि फोन फोन ही होता है. सो मैने कहा कि आप बस ये बताओ कि आना कहाँ तक है ? और पता चला कि स्टेशन तक.अब आगे काम मुझे करना था. इसके लिये मेरे लखनऊ के घर के दोनो सदस्यों की मदद चाहिये थी. खैर अच्छा था कि दोनो मेहरबान थे और मनीष जी के नाम से खुश भी. तो अपने सारे कार्यक्रम रद्द कर के वो मनीष जी की सेवा में लग गए.


सबसे अच्छी बात यह थी कि मिलने के बाद भी उनके भरम नही टूटे और जाने के बाद मुझसे ही बार-बार कहा गया कि फोन कर के पता तो कीजिये कि रास्ते में कोई परेशानी तो नही हुई. :)

तो चूँकि मुझे आफिस अटेंडेंस के बाद परमीशन ले कर मिलने आना था तो घर पर तो बुला नही सकती थी अतः बीच में एक रेस्तराँ मे मिलने का फैसला लिया गया जहाँ मेरा पिंकू मनीष जी को ले कर आये और मैं पहुँची दीदी के बेटे विजू के साथ.

समझ में नही आ रहा था कि बाते कैसे शुरू की जाएं कि दोनो enclosures भी न बोर हों और हम भी. इसलिये ब्लॉग की बातों से बचना चाह रहे थे लेकिन बातें प्रवाह में आईं तो तभी जब ब्लॉग की एक पोस्ट की चर्चा हुई. मनीष जी को घर वालों द्वारा बताया गया कि ये जो ब्लॉग पर एंटी विमेन के रूप में प्रसिद्ध हो गई हैं वो असल में घर में नारी सशक्तीकरण का प्रतीक है.

 comment आया कि "हाँ वो तो मुझे भी पता है कि गलत बायाना ले लिया है...!" और हमारी फिर से वही स्थिति कि कैसे समझाएं कि न हम नारी विरोधी हैं और न ही सशक्तीकरण के प्रतीक. हमें तो जब जो उचित लगता है वो बोल देते हैं. मुझे कभी इससे अलग भी रख के देख लिया जाए.  खैर हम इतनी शालीनता का परिचय दे रहे थे तब भी इल्जाम आया, " पता लग रहा है कि आप घर में dominate करती हैं"

खैर मेरे खयाल से जाते-जाते तो यह भरम टूट ही गया होगा जब रास्ते में बाईक तेज चलाने पर मुझे सड़क की चिंता किये बगैर गाड़ी रोक कर पिकू ने खूब लथाड़ लगाई .....!


मुझे आश्चर्य हो रहा था कि मेरा विजू कैसे चुप है.लेकिन आश्चर्य बरकार रहा उसने मनीष जी के जाने तक बस बस मंदमंद मुस्कुराहट ही देने का काम किया...!

११.३० बजे शुरू हुई मीटिंग १.३० बजे समाप्ति की और बढ़ने लगी. चूँकि मनीष जी की भी ट्रेन थी और मुझे भी कार्यालय पहुँचना था.

तो मीट को एक शुभ विश्राम देते हुए अगली बार सपत्नीक मिलने का आमंत्रण दे कर और वादा लेते हुए हम ने विदा ली ...

इस मुलाकात की कहानी मनीष जी की ज़बानी पढ़ने के लिये यहाँ जा सकते हैं। मुलाकात की यादें कुछ इस तरह हैं



Wednesday, February 27, 2008

फर्क़ इतना ही है शायद कहीं हममें, तुम में...!



फर्क़......!

फर्क़ इतना ही है शायद कहीं हममें, तुम में...!

फर्क़ इतना ही है शायद कहीं हममें, तुम में...!

कि तुम्हारी जिंदगी में तब तलक है मेरा वज़ूद,

जब तलक और कोई आ न जाए जिंदगी में

और जब तक रहेगा दिल में मेरे तेरा वज़ूद,

तब तलक कोई नही आ सकता दिल में मेरे...!!


तो जिंदगी का क्या है...? रोज कई मिलते है,

मै आज हूँ तुम्हें कल ही कोई मिल जाएगा।

कहा है तुमने, तुम्हें चीज नई भाती है,

तुम्हारी जिंदगी में ज़ूक* नया आएगा
(ज़ूक* taste)


और मै...?

और मै क्या हूँ, ये तो तुम भी जानते ही हो,

तुम्ही तो कहते हो माज़ी से निकल पाती नही,

मुझे जो भाता है एक बार भा ही जाता है,

मैं रोज़ रोज़ अपना जू़क बदल पाती नही।


और खिड़की जो है दिल की मेरे मेरे हमदम..!

वो बड़ी देर देर बाद खुला करती है,

इसमें आता है बड़ी देर में आने वाला,

और जाने क्यों उसे जाने नही देती है।


तो.. फर्क़ इतना ही है शायद कहीं हममे, तुम में,

कि तुम्हारी जिंदगी में मैं फक़त लम्हों को हूँ,

और जन्मों के लिये तुम मेरे वज़ूद में हो,

मेरी हर साँस तुम्हारी फक़त तुम्हारी है,

तुम मेरी ज़ीस्त मे, दिल में हो, मेरे ज़ूक में हो..!


तेरी जुबान पे मैं हूँ, मेरे लबों पे तुम,

तुम्हारे सीने पे मैं हूँ, मेरी धड़कन में तुम,

तुम्हारे इर्द गिर्द मैं हूँ और तुम मुझमें....!

फर्क़ इतना ही है शायद कहीं हममें, तुम में...!

Wednesday, February 20, 2008

नारी बनाम पुरुष क्यों .....? क्यो नही नारी संग पुरुष...?

हाँ...! क्यों नही है हम साथ साथ...? जैसे शरीर के पाँच तत्व पूरक हैं एक दूसरे के उसी भाँति सृष्टि के पूरक इन दोनो तत्वों का ब्लॉग पर इतना विरोध क्यों...?

यूँ तो ब्लॉगिंग का मेरा अपना नियम यह है कि शांति से जब भावनाएं उफान मारे तो कुछ लिख लिया जाये...वो भी ऐसे जैसे डायरी ही थोड़ी टेक्निकली डेवलप्ड हो गई हो और जैसे दो चार दोस्त डायरी पढ़ कर समालोचना कर देते हैं वैसे यहाँ भी एक आध लोग चले आते हैं.... मुझे भी कुछ अच्छा लगता है तो वाह बोल देती हूँ , अन्यथा चुपचाप चल देती हूँ... बाकि मेरा हृदय जानता है कि ध्यान आकृष्ट करने या किसी का विरोध करने अथवा समर्थन पाने के लिये कभी कुछ नही लिखा..!

लेकिन ये जो आजकल चल रहा है..जो मैं काफी दिनों से देख रही हूँ... कभी नारी होने का रोना.. कभी नारी होने का ब्लेम...कबी अहम्... कभी कायरता..ये क्या हो रहा है..? और हो ही क्यों रहा है...?

सृष्टि में अगर पुरुष नही रहेंगे तो क्या होगा..? सारी महिलाओं को चैन मिल जायेगा..? या महिलाएं नही होंगी तो पुरुषों को चैन आ जायेगा ..? क्या हम आग के बिना सृष्टि की परिकल्पना कर सकते है...? या फिर पानी के बिना......? नही न..? आवश्यकता तो दोनो की ही है..! बस ज़रूरत है अपनी सीमाओं मे रहने की। जिसने भी अपनी मर्यादा त्यागी, वही असंतुलन का कारक बन गया। प्रकृति मे जितनी भी चीज़ें होती हैं सबका अपना महत्व है, तो स्त्री पुरुष तो प्रधान तत्व हैं।

आप जो नारी को छल की मूर्ति मान रहे हैं...सच बताइये क्या आपके जीवन में कोई भी महिला ऐसी नही है जिसका आपके हृदय में एक कोमल कोना है या हम जो पुरुष को अहम् का पुतला मान रहे है, उन्हे किसी भी रूप में एक पुरुष सहारा नही देता..? ऐसा कैसे हो सकता है..? माँ, बहन पत्नी, प्रेमिका या कोई भी अनाम रिश्ता और पिता, भाई, पति प्रेमी या कोई भी अनकहा रिश्ता सबके जीवन में है तो हम क्यों पूरी पूरी जाति को दोष दे रहे हैं...?

वो पति जो बीमारी में भी पत्नी से काम ले रहा है ज़रा उसके इर्द गिर्द के पुरुषों से पूँछिये, वो उनके लिये भी अच्छा नही होगा और वो महिला जो पति के लिये कर्कशा है वो किसी के लिये मृदुल नही होगी। ये सब व्यक्तिगत स्वभाव की बात है न कि स्त्रीत्व अथवा पुरुषत्व की।हम ब्लॉगर्स क्यों इतनी छोटी सी बात में फँस गए है.. और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के शिवा। नही याद आ रहा मुझे कि इतनी ही तेजी से दो चार दस पोस्ट कई ब्लॉग पर निरक्षरता, बेरोजगारी, भुखमरी को ले कर आई हो.... जो हमारे राष्ट्र विकास को पीछे खींच रही हैं..क्या हमारे समाज में आज की सबसे बड़ी समस्या नर नारी वैमनस्य हो गई है..? जब कि व्यक्तिगत जिंदगी में हम कहीं न कहीं साथ ही हैं..!

अभी परसों एक पोस्ट में पढ़ रही थी कि स्त्रियाँ तभी मायने रखती हैं जब वे युवती हो जायें, अन्यथा क्यों नही राधा सीता का बचपन बताया गया...? अच्छी पोस्ट थी मेरा उनसे कोई विरोध नही है...! सबने उनका समर्थन भी किया, लेकिन ज़रा रामायण पढ़ें तो पाएँगे कि सीता का उल्लेख यदि युवती बनने के बाद के बाद आया होता तो हम कैसे जानते जानकी का जन्म जनक द्वारा सोने का हल चलाने पर टकराए घड़े से हुआ...कैसे पता चलता कि बाल्यावस्था में ही उन्होने शिव धनुष पिनाक खेल खेल में ही हटा दिया था। ये तो रीतिकाल में आकर राधा का नखशिख वर्णन और राधा कृष्ण की आड़ में श्रृंगार रस का फूहड़ चित्रण होने लगा अन्यथा यह प्रेम इतना पवित्र इसिलिये है...इसीलिये मंदिरों में पूज्य है क्योंकि ये बाल्यावस्था का प्रेम था..वासना रहित प्रेम....किशोरावस्था के साथ तो श्रीकृष्ण मथुरा और फिर गुरुकुल चले गए थे। और अगर स्त्री के यौवन को ही शास्त्रों में जगह मिलती तो यशोदा, देवकी, कौशल्या, सुमित्रा के वात्सल्य, ममता और त्याग को हम कैसे जान पाते...अपाला, गार्गी, लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं के ग्यान से कैसे परिचित होते?

जब हमारे नायक मोहन दास कर्मचंद गाँधी होंगे तो कस्तूरबा उनके विवाह के बाद ही आएँगी ना...उनका बचपन हम कैसे जानेंगे..? और जब बात रानी लक्ष्मीबाई की होगी तो दामोदर राव का बचपन कहाँ मिलेगा..?

अच्छे बुरे लोग हर काल में हुए हैं, जब राम हुए तब रावण हुआ..जब सीता हुईं तब सूपनखा हुई..यदि सीता जैसी स्त्री को राम जैसे पुरुष के कारण वनवास मिला तो राम जैसे पुरुष को भी तो कैकेई जैसी स्त्री के कारण वनवास मिला..ये सब उनका स्वभाव था कैकेई का त्रियाचरित्र या राम अथवा उस धोबी का पुरुष अहम् नही।

अरे वो नारी जो पूज्य इसलिये है क्योंकि वो खुद मर्यादा और धैर्य दिखा कर आने वाली पीढ़ी को सुसंस्कारित बनाती है और समाज और राष्ट्र में अपना मूक योगदान देकर सब को ॠणी बना देती है वो कह रही है कि मुझे उन्नतशीलता नही पतनशीलता भा रही है। होड़ लग गई है पतित बनने की..! बड़ा कष्ट हो रहा है मुझे...! हम अपने राष्ट्र को २२वीं शताब्दी की ओर ले जाने का ये रास्ता अपना रहे हैं..?..उफ...!

मुझे पता है कि सब मेरा विरोध करेंगे, लेकिन मेरे अपने विचार थे कहे बिना नही रहा गया...! क्यों न हम दोनो मिलकर विरोध करे समाज के उन दोषों का जो हमारे राष्ट्र विकास को पीछे ले जा रहे हैं.....क्यो न हम पुरुषों की ताकत और नारी की संवेदान को मिला कर बनाएं एक अच्छा घर...फिर एक अच्छा समाज..फिर एक अच्छा ....फिर एक अच्छा राष्ट्र और फिर एक अच्छा विश्व.....क्यो नही..?

Monday, February 11, 2008

लेकिन तुम भी कोशिश करना.



बसंत की गुलाबी सर्दी में पढ़िये... मेरी ये emotinally warm कविता...!


चारों तरफ घना कोहरा है, ठिठुरन भरी कड़ी सर्दी है,
छोटे छोटे कोयले देकर आग अभी जिंदा रक्खी है..!
मैं तो कोशिश खूब करूँगी, आग मेरी बुझने न पाये,
लेकिन तुम भी कोशिश करना..
आग रहे तब तक आ जाना..!


माज़ी से न कोई शिक़वा, न उम्मीदें कोई कल की,
रिश्ता तुम से जो है, उसमें बातें हैं बस इसी सफर की।

मैं तो कोशिश खूब करूँगी, आज हमारा मैला न हो,
लेकिन तुम भी कोशिश करना,
रोज आज को नहला जाना ।।


किस दिन तुम ये समझ सकोगे, रीत प्रीत की क्या होती है,
जब जब मैं हारी हूँ तुम से, जीत सदा मेरी होती है।
मैं तो कोशिश खूब करूँगी, जीतो तुम्ही सदा मेरा मन,
लेकिन तुम भी कोशिश करना
मैं हारूँ तो सहला जाना ।।


शिख से नख तक बाँध लिया है, जिस पर तुमने अपना बंधन,
वो तुम से क्या अहम् करेगा, जिस पर तेरा ही है शासन,
मैं तो कोशिश खूब करूँगी, ये बंधन खुलने न पाए,
लेकिन तुम भी कोशिश करना,
रोज़ डोर कसने आ जाना ।।

Thursday, February 7, 2008

बाबूजी....!



बाबूजी....!
आप बहुत याद आते हो...! आज १८ साल बाद भी वो रिक्तता भरी नही जो आज के दिन हुई थी ......! आप वैसे ही याद आते हो...और हमेशा ऐसे ही याद आते रहना क्योंकि आप की याद के साथ याद आते हैं वो सपने जो मेरे लिये आपने देखे थे..वो आँखें जो मेरी असफलता पर सूनी हो जाती..और सफलता पर चमक जातीं....अब भी जब असफल होती हूँ तो लगता है कि आप उदास हो और आपकी आँखों की चमक के लिये फिर से प्रयास करने लगती हूँ...! अपनी हर उपलब्धि वाले दिन ..जब अम्मा की मिठाई खाती हूँ...दोस्तों के साथ पार्टी में शामिल होती हूँ... तो आप देखे लेते हो न...कि मन के अंदर कोई उदासी होती है....कि निगाह आपको ढूँढ़ रही होती है...!..कि कान सुनना चाहते हैं कि आप होते तो क्या कहते....!


तो आप ऐसे ही हमेशा याद आते रहना....मेरे अंदर की जिजीविषा बनी रहेगी

आपकी
गुड्डन

Tuesday, February 5, 2008

हो भी गया प्रेम हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा..?


"नीरज" मेरे बहुत प्रिय कवियों में एक है...और उनकी लिखी कविताओं में से एक प्रिय कविता आपके साथ बाँटना चाहूँगी...!

मै पीड़ा का राजकुँवर हूँ, तुम शहजादी रूपनगर की
हो भी गया प्रेम हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा..?
मेरा कुर्ता सिला दुखों ने,
बदनामी ने काज निकाले,
तुम जो आँचल ओढ़े उसमें
अम्बर ने खुद जड़े सितारे
मैं केवल पानी ही पानी, तुम केवल मदिरा ही मदिरा
मिट भी गया भेद तन का तो, मन का हवन कहाँ पर होगा

मैं जन्मा इसलिये कि,
थोड़ी उम्र आँसुओं की बढ़ जाए
तुम आई इस हेतु कि मेंहदी
रोज नए कंगन बनवाए,
तुम उदयाचल, मैं अस्ताचल, तुम सुखांत की
मिल भी गए अंक अपने तो रस अवतरण कहाँ पर होगा?

मीलों जहाँ न पता खुशी का,
मै उस आँगन का इकलौता,
तुम उस घर की कली जहाँ
नित होंठ करें गीतों का न्यौता
मेरी उमर अमावस काली और तुम्हारी पूनम गोरी
मिल भी गई राशि अपनी तो बोलो लगन कहाँ पर होगा?

इतना दानी नही समय कि
हर गमले में फूल खिला दे
इतनी भावुक नही जिंदगी
हर खत का उत्तर भिजवा दे
मिलना अपना सरल नही पर फिर भी ये सोचा करता हूँ,
जब ना आदमी प्यार करेगा जाने भुवन कहाँ पर होगा..?


हो भी गया प्रेम हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा..?