मत रो दीदी, मत रो, दीदी जा ससुराल,
अम्मा भी छूँटेंगी, बाबू जी छूटेंगे, छूटेगा सारा परिवार,
दीदी जा ससुराल,
सास मिलेंगी, ससुर मिलेंगे, मिलेगा नया संसार,
दीदी जा ससुराल....
अपने में मगन जब मैने सिर उठाया तो देखा कि मेरी चारपाई के गिर्द खड़े भईया, अम्मा और बाबू जी सब बड़े ध्यान से मुझे देखत हुए मुस्कुरा रहे हैं..... तब मुझे पता चला कि ये कोई अनोखी चीज है जिससे घर में सब खुश होते है..और अम्मा ने मुझ ककहरा से थोड़ा ऊपर उठी लड़की से कहा कि इसे नोट कर लो....!
तो लिखती तो मैं तब से हूँ, लेकिन जाने क्यों कभी कोई रचना प्रकाशित नही होती..... कादम्बिनी, दैनिक जागरण, वनिता, सरिता सब जगह से कविताएं वापस ही गई.. खैर कुछ कमी होती होगी तभी आ जाती होंगी ये सोच कर मैने अब कहीं भी कुछ भेजना ही बंद कर दिया..!
इसी बीच चैटिंग और ई-मेल मित्रता को टाईमपास समझने वाली मैने जाने क्या सोच कर आरकुट पर अपना खाता खोल लिया और वहीं मिले मनीष जी, जिन्होने मुझे वो दुनिया दिखाई जहाँ मैं सब से अधिक संतुष्ट महसूस करती हूँ....! और सिलसिला बढ़ निकला...!
तो मेरी खुशी कि कहानी शुरू होती है अब.... ! जब पिछली ३० सितंबर को एक कार्यालय के निजी समरोह में मुझे सम्मानित करने के लिये बुलाया गया और जिनके द्वारा मुझे स्मृति चिह्न मिलना था वो थे पद्मश्री श्री के०पी० सक्सेना.... मेरे लिये बहुत बड़ी अनुभूति थी कि मैं उनसे देखूँगी......! दिन की शुरुआत तो बड़ी बुरी हुई थी तो मुझे कार्यालय से छुट्टी लेनी पड़ी..किसी तरह नियत स्थान पर लेट लतीफ पहुँची तो कार्यक्रम शुरू हो चुका था..! मैं चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गई...और मुग्ध हो कर सक्सेना जी को सुनने लगी..! अपने ढेरों अनुभव हम सब से बँटाने के बाद उन्होने कहा कि आप सब अगर कुछ पूँछना चाहें तो पूँछ लें..! लोगो ने अपने प्रश्न शूरू किये और मैने सरस्वती मंत्र कि ऐसी शख्सियत से बात करने की हिम्मत जुटा सकूँ...और सारा साहस जोड़ कर मैने पहला शब्द कहा "सर"
तो जवाब मिला "आप मुझे या तो श्रीमान कहें या चाचा जी ! सर शब्द का प्रयोग न करें।"

लो अब क्या खाक बोल पाऊँगी मै, फिर भी खिसिया के अपनी बात शुरू की...." आज के दौर में नए कवि और लेखक कहाँ अपना स्थान बना पाएंगे? आपका समय था तब दिसंबर की सर्दी में लोग पूरी रात मधुशाला और नीरज़ को ठिठुरते हुए सुन लेते थे और हमारे समय में लोग कवि सम्मेलन टी०वी० पर आता हो तो भी चट से चैनेल चेंज कर देते हैं...ऐसे समय में हम जैसे लोग जिन्हे भूल से कविता करने की दीवानगी हो वो अपनी ऊर्जा कहाँ खपाएं.....!"
पहले शब्द ने जो छवि बिगाड़ी थी, लगा कि थोड़ा सा उससे निकली हूँ...! उन्होने बड़ी ममतामयी दृष्टि मुझ पर डाली और पूँछा
"कभी अपनी कविता भेजी है कहीं"
"हूँ...पाँच बार भेज चुकी हूँ, हर बार वापस आ जाती है"
"मेरी कहानी २० बार वापस आई थी और तुम ५ बार में ही हार मान गई। फिर से अपनी कविताएं भेजो और मेरा आशीर्वाद है कि जब मैं अगले ३० सितंबर को तुम से मिलूँगा तो ५-6 पत्रिकाओं में तुम्हारी प्रकाशित हो चुकी होंगी। ये मेरा आशीर्वाद है़।" मैं चित्रलखित सी उन्हे देखती रही मेरी आँखों में आँसू आ रहे थे...मै धन्यवाद ही बोल सकी...!

उसके बाद अब तक सक्सेना जी से बात तो नही हुई लेकिन मैं एक नए उत्साह के साथ कविताएं फिर से भेजने का उपक्रम किया और ५ जनवरी,२००८ को मुझे सीनियर मीडिया पत्रिका से मेल आया कि मेरी कविता प्रकाशित हो रही है...!
छोटी ही सही लेकिन मेरे लिये बहुत बड़ी खुशी की बात थी ये..!ये मेरा बचपन का स्वप्न था..सक्सेना जी को फोन तब से मिला रही हूँ परंतु वो मिल नही पा रहें हैं....! मैं अपनी इस पोस्ट के माध्यम से उन्हे धन्यवाद देना चाहूँगी और पूरा का पूरा श्रेय उनके आशीर्वाद को दूँगी।
नोटः बहुत देर से कोशिश कर रही हूँ स्कैन्ड कविता लगाने की लेकिन ११.३ एम० बी० की होने के कारण अटैच्ड नही हो रही है..विकास जी से परामर्श ले कर फिर संपादित कर दूँगी..फिलहाल आप इतना ही बाँटिये..!





