Tuesday, March 18, 2008

नीरज के गीतों का कमाल फिल्म "शर्मीली" में

नीरज के गीतों की तलाश इंटरनेट पर करते समय पाया कि १९७१ में प्रदर्शित हुई फिल्म शर्मीली के गीत भी नीरज द्वारा ही लिखे गये हैं... यूँ तो इस फिल्म के हर गीत के बोल अलग अलग मानसिक स्थिति के हिसाब से क़माल करते हैं ...और साथ में जब संगीत दिया हो एस० डी० वर्मन ने तो वही समस्या जो हमेशा आती है कि चुनें तो किसे..?



प्यार का नशा जब अपने आस पास हर तरफ नज़र आता है, ऐसी स्थिति में नीरज का नायिका से कहलाना कि


आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन,
बिना ही बात मुस्कुराए रे मेरा मन।



और फिर उसी नायिका का विरहावस्था में कहना


मेघा छाये आधी रात बैरन बन गई निंदिया
नायक की छेड़छाड़ और नायिका को संबोधित ही शर्मीली से करते हुए गाना


ओ मेरी शर्मीली


और फिर प्यार मे धोखा खाने के बाद कहना


कैसे कहे कि प्यार ने हमको क्या क्या खेल दिखाए
यूँ शरमाई किस्मत हमसे, खुद से हम शरमाए



और दार्शनिकता से भरा गीत


खिलते हैं गुल यहाँ खिल के बिखरने को
मिलते हैं दिल यहाँ, मिल के बिछड़ने को



सभी उम्दा...लेकिन जब सुनवाना हो अपनी एक पसंद तो खिलते हैं गुल यहाँ खिल के बिखरने को और मेघा छाये आधी रात बैरन बन गई निंदिया में टाइ हो जाता है और राग भीमपालासी पर आधारित गीत मेघा छाये आधी
रात की तरफ मेरा व्यक्तिगत झुकाव थोड़ा अधिक हो जाता है तो सुनिये यही गीत।

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मेघा छाये आधी रात, बैरन बन गई निंदिया
बता दे मैं क्या करूँ,


सब के आँगन दिया जले रे
मोरे आँगन जिया,(२)
हवा लागे शूल जैसी,
ताना मारे चुनरिया
आई है आँसू की बारात
बैरन बन गई निंदिया
बता दे मैं क्या करूँ,

रूठ गए मेरे सपने सारे
टूट गई रे आशा,(२)
नैन बहें गंगा मेरे,
फिर भी मन है प्यासा,
कासे कहूँ मैं मन की बात
बैरन बन गई निंदिया
बता दे मैं क्या करूँ,

मेघा छाये आधी रात, बैरन बन गई निंदिया


नीरज से संबंधित पिछली पोस्ट यहाँ देखें
http://kanchanc.blogspot.com/2008/03/blog-post_14.html
http://kanchanc.blogspot.com/2008/03/blog-post_12.html
http://kanchanc.blogspot.com/2008/02/blog-post.html

नोटः पिछली पोस्ट में मनीष जी ने ध्यान दिलाया था फिल्म और गीतकार का भी जिक्र करने के विषय में...पिछली पोस्ट को तो नही संपादित किया ..इस बार ध्यान दिया है

10 comments:

अजय यादव said...

कंचन जी!
आज ही मनीष जी के चिट्ठे पर आपके बारे में पढ़ा तो पता लगा कि आप नीरज जी की प्रशंसक हैं और पहली बार आपके चिट्ठे पर आते ही आपने इतना मधुर गीत सुनवाया कि अब लगता है कि यहाँ आना लगा रहेगा.
नीरज जी के लिखे कुछ अपने मनपसंद गीत चिट्ठे पर डालने का विचार मेरा भी है. शायद क़ैफ़ी आज़मी की वर्तमान श्रंखला के बाद ये संभव हो पाये.
फिलहाल बहुत बहुत शुक्रिया इस मधुर गीत के लिये!

- अजय यादव
http://merekavimitra.blogspot.com/
http://ajayyadavace.blogspot.com/
http://intermittent-thoughts.blogspot.com/

परमजीत बाली said...

कंचन जी,एक अच्छा गीत सुनवाने के लिए धन्यवाद।

yunus said...

कंचन सुंदर श्रृंखला और सुंदर गीत । इस गाने के बारे में काफी समय से लिखना चाहता था मैं भी । मेरे मोबाइल पर स्‍टोर है और अनगिनत बार सुना है इसे । दरअसल इस गाने में भारतीय शास्‍त्रीय संगीत और वेस्‍टर्न म्‍यूजिक का शानदार मिलन है । तुम धयान से सुनो तो पाओगी कि जब लता जी गाती हैं तो पृष्‍ठभूमि में भारतीय साज़ हैं । शुद्ध भारतीय लेकिन जैसे ही इंटरल्‍यूड आते हैं तो पहले वेस्‍टर्न ऑरकेस्‍ट्रा आता है और फिर भारतीय साज़ों में एकमेक हो जाता है । फिर लता जी की आवाज़ और फिर भारतीय साज़ । इस गाने में अंतरों के बीच बीच का संगीत बहुत कमाल का है । ग्रुप वायलिन,मेटल फ्लूट और पारंपरिक बांसुरी सब हैं इसमें । मेरे बहुत ही प्रिय गीतों में से एक है ।
नीरज के लिखे गीतों में इसके बाद कैसे कहें हम की बारी आती है । और हां एक गीत और । प्रेम पुजारी का । बादल बिजली चंदन पानी वाला । याद आया ना ।

mamta said...

कंचन जी बहुत ही प्यारा गीत सुनवाने का शुक्रिया।

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

नीरज जी के फिल्मी गीतों को याद करें तो मेरा नाम जोकर का ए भाई ज़रा देख के चलो कैसे याद नहीं आएगा? अद्भुत गीत है.

वैसे नीरज जी के गीत के बहाने से बहुत बढिया चर्चा पढने को मिली. सभी मित्रों को धन्यवाद. यूनुस भाई ने तो बहुत सूक्ष्म विश्लेषण किया है, जो वे ही कर सकते हैं.

sanjay patel said...

शायद कहीं पहले भी लिखा है मैंने कि हम हिन्दी वालों ने मंचीय गीतकार,फ़िल्म गीतकार और साहित्य के गीतकारों की अलग अलग कैटेगरी बना कर अपनी मातृभाषा की हत्या ही की है. नीरज जी का साहित्यिक अवदान रेखांकित करने में हमें ज़ोर आ रहा है....एक ख़ास तबका है या यूँ कहूँ तयशुदा साज़िश सी है कि हम नीरजजी को मंचीय या फ़िल्मी गीतकार बना कर उनकी रचनाओं को साहित्य में अछूत का दर्ज़ा दे रहे हैं...उर्दू,मराठी,बांग्ला और गुजराती में ऐसा नहीं है.जो फ़िल्म में सम्मानित है उसे साहित्य में स्वीकृति देने में गुरेज़ नहीं करतीं ये भाषाएं....हम हिन्दी वाले अपनी ही क़ब्र खोदना कब ख़त्म करेंगे...क्या नीरजजी के जीवनकाल में ऐसा हो पाएगा ?

रवीन्द्र प्रभात said...

मधुर गीत सुनवाने का शुक्रिया।

Sandeep Singh said...

कंचन जी आज पहली बार ब्लॉग देखने का अवसर मिल सका...सबसे पहले दिखा अंधेरे लड़ता रोशनी का टुकड़ा (फोटो पर)।
आगे बढ़ने पर ज़िदगी के रंगो से सरोबोर हो गया।
होली मुबारक हो।

Gardagami said...
This comment has been removed by a blog administrator.
सुनीता शानू said...

होली का मौसम और यह मधुर गीत बहुत सुन्दर...कंचन जी मनीष जी के चिट्ठे पर आपके बारे में पढ़ा बहुत अच्छा लगा...होली के मौसम में बस यही मनोकामना है आप जिन्दगी में हमेशा आगे बढ़ती रहे...रंगीली होली आपके जीवन में रंगीनियाँ भर जाये...