
अभी जुलाई में अचानक घर शिफ्ट करना पड़ा...जाते ही पहली समस्या थी काम की.... घर देखने गई थी तभी देखा था कि servent room में एक नवविवाहित जोड़ा रहता है.... आंटी (landlord)से बात की तो उन्होने कहा कि एक बार उसी से बात कर के देखो...संजोग से नाम उसका भी कंचन ही था...!
गोरा रंग..बड़ी बड़ी आँखें..जो खींचतीं थी..और जिसका उसे अहसास भी था, इसीलिये तो बातें करते हुए उन आँखों को बीच बीचे में भोलेपन से झपकाती सी रहती थी...
मैने उसे और उसके पति को एक साथ बुलवाया और काम के लिये पूँछा..उसने चट से हामी भरते हुए कहा कि " लेकिन दीदी जब हमें काम करना था तो रंजीत का काहें बुलायो..?"
अरे .. ? समाज के इस तबके में नारी मुक्ति, नारी सशक्तिकरण और आत्मनिर्णय लेने की ये भावना... मैं तो दंग रह गई। फिर भी बात टालने की गरज़ से कहा कि " अरे तुम दोनो मियाँ बीबी हो, दोनो को ही एक दूसरे से पूँछ कर ही फैसले लेने चाहिये ना"
" तो का भवा..हम अपना काम करिबे, रंजीत अपना काम करें।" उसने तुनक कर जवाब दिया और रंजीत बस मुस्कुराता ही रहा..!
मन ही मन बहुत प्रसन्न हुई मैं इस आपसी सामंजस्य को देख कर, आज जब मध्यमवर्ग की आत्मनिर्भर औरतें भी ९९ प्रतिशत फैसले कल पर यही कह कर छोड़ती है कि ज़रा इनसे पूँछ लूँ फिर बताऊँ। वहाँ वो अनपढ़ लड़की किस आत्मविश्वास के साथ कह रही है कि मेरे फैसले मैं खुद लेने में सक्षम हूँ..!
खैर दूसरे ही दिन से कंचन का काम पर आना शुरू हो गया..काम भी साफ और बाते भी लच्छेदार..मैने बातों ही बातों में अपनी शंका का समाधान कर लिया " क्यों कंचन तुम्हारी love marrige है क्या?"
गोरा रंग..बड़ी बड़ी आँखें..जो खींचतीं थी..और जिसका उसे अहसास भी था, इसीलिये तो बातें करते हुए उन आँखों को बीच बीचे में भोलेपन से झपकाती सी रहती थी...
मैने उसे और उसके पति को एक साथ बुलवाया और काम के लिये पूँछा..उसने चट से हामी भरते हुए कहा कि " लेकिन दीदी जब हमें काम करना था तो रंजीत का काहें बुलायो..?"
अरे .. ? समाज के इस तबके में नारी मुक्ति, नारी सशक्तिकरण और आत्मनिर्णय लेने की ये भावना... मैं तो दंग रह गई। फिर भी बात टालने की गरज़ से कहा कि " अरे तुम दोनो मियाँ बीबी हो, दोनो को ही एक दूसरे से पूँछ कर ही फैसले लेने चाहिये ना"
" तो का भवा..हम अपना काम करिबे, रंजीत अपना काम करें।" उसने तुनक कर जवाब दिया और रंजीत बस मुस्कुराता ही रहा..!
मन ही मन बहुत प्रसन्न हुई मैं इस आपसी सामंजस्य को देख कर, आज जब मध्यमवर्ग की आत्मनिर्भर औरतें भी ९९ प्रतिशत फैसले कल पर यही कह कर छोड़ती है कि ज़रा इनसे पूँछ लूँ फिर बताऊँ। वहाँ वो अनपढ़ लड़की किस आत्मविश्वास के साथ कह रही है कि मेरे फैसले मैं खुद लेने में सक्षम हूँ..!
खैर दूसरे ही दिन से कंचन का काम पर आना शुरू हो गया..काम भी साफ और बाते भी लच्छेदार..मैने बातों ही बातों में अपनी शंका का समाधान कर लिया " क्यों कंचन तुम्हारी love marrige है क्या?"
कहते ही उसके चेहरे पर लालिमा आ गई, उसकी सुंदर आँखें यूँ झपकीं कि उसे मुँह से जवाब देना ही नही पड़ा कि "हाँ"
"घर वाले नही राजी हुए थे क्या?" मैने अपनी अगली जिग्यासा सामने रखी।
"रंजीत के घर वाले तो राजी थे दीदी, लेकिन हमारे घर वाले नही राजी थे, वो रंजीत हमसे छोटी जात का था ना दीदी !...तबै..! बताओ जात से कुछ होता है दीदी..?"
"ऊँहुह्" कह कर मै अपना काम करने लगी.! फिर अलग अलग दिन की बातों से पता चला कि किसी दिन रंजीत के साथ चोरी से घूमने गई कंचन की चोरी का पता चल जाने पर उसकी बिरादरी के लोग उसके घर पर रंजीत को मारने के लिये इकट्ठा हो गये और जब इन दोनो को पता चला तो ये दोनो डर से उस रात घर पर नही आये... दूसरे दिन खबर मिली कि इनके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट कर दी गई है तो उनके पास यही रास्ता था कि वे रंजीत के पिता के पास दिल्ली चले जाएं और वही उन्होने कोर्टमैरिज कर ली और रोटी पानी के जुगाड़ मे लखनऊ आ गए.... कंचन पढ़ी लिखी नही थी, रंजीत हाईस्कूल पास था..सो वो मजदूरी करता था और कंचन आंटी और मेरे घर काम।
१०-१२ दिन तो सब ठीक चला लेकिन इसके बाद अचानक कंचन का आना कम होने लगा और मेरी रूटीन्ड लाईफ में तो कुछ भी इधर उधर होने की गुंजाइश होती नही...! मैं आवाज लगाती और ऐसा लगता कि सुन के अनसुना कर दिया जा रहा है...! अब हालात ये थे कि ना तो मैं कंचन के बिना मैनेज कर सकती थी और न ही उस की तरफ से कोई निर्णय मिले बिना दूसरी मेड रख सकती थी...! खीझ इतनी लगती कि क्या कहें...? हर काम लटकने लगा..खाना, बरतन सब..! जब सामने पड़े तब तो बात की जाये..यूं तो बगल के ही पोर्शन में रहती थी लेकिन उसे आवाज़ दो तो रंजीत निकल कर कहता कि " उसकी तबियत खराब है वो काम पर नही आएगी"
उस में एक दिन कंचन के रोने और रंजीत के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी, तो लगा कुछ गड़बड़ है। उसी के दूसरे दिन अचानक कंचन सूजी आँखों के साथ, हाथ में कटोरी लिये रसोई की तरफ आई। मैने उसकी तरफ प्रश्नपूर्ण निगाहों से देखा.." क्या हुआ कंचन"
" दीदी रंजीत तुम्हरे हियाँ काम करे का मना कर रहे हैं"
" क्यों..?"
"......"
ओह मामला अब कुछ कुछ समझ में आने लगा था मुझे.."क्या कहता है.."
" दीदी ऊ हमाए ऊपर सक्कात है"
असल में मेरे साथ मेरे दो nephews भी रहते हैं दोनो ही बड़े हो चुके हैं....! मैने बात को समझते हुए कहा " हम्म्म्म ..फिर...?"
" हम कहा दीदी कि दूनो भईया लोग तो हमसे बातौ नही करते है....दीदी का हमाई बहुत जरूरत है....! बकिर...." कहते हुए उसने अपने कंधे से कुरता जरा सरका दिया... और कंधों पर का कालापन दिखने लगा ...! " कल तो मारा भी दीदी..कहता है कि तुम खुदै चहती हो हुँआ जाना.." और उसकी आँखें भर आईं।
उफ..सिहर गई मैं...अपनी मनगढ़ंत कुंठा के चलते कितना निर्दयी हो गया ये बंदा...! सच जानने समझने की कोई कोशिश नही..! और इसके लिये ये अपना घरबार छोड़ कर आ गई....? मारते समय ये भी खयाल नही आया उसे..!
मैं कमरे से दवा की टयूब ले आई...उसके कंधे पर लगाते हुए मैने कहा " और तुम कहती हो कि ये तुम्हे प्यार करता है? ऐसे किया जाता है प्यार?"
"दीदी रंजीत मारत हैं..तो दुलरउते भी है...बप्पा औ भईया जब मरते थे तब हम रात भर रोआ करें हमका पूँछे भि नही अऊते थे...! हम से खाली काम करउते थे औ तनुखाह धर लेते थे... हम खावा कि नाही कबौ नही पूँछा...कम से कम रंजीत भूखा तो नही सोने देते.... मरद की जात है तो गुस्सा तो अईबे करी..... लेकिन गुस्सा उतरे पर मनईबौ तो करते है"
मेरे हाथ उसके कंधों पर यंत्रवत् चल रहे थे.... कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या कहूँ..... जिसने आज तक कड़ी धूप के शिवाय कुछ देखा ही न हो, वो मूसलाधार बारिश की माँग करे भी तो कैसे । वो तो चंद बूंदों से ही खुश है...! बाहरी आवरण ही बहुत है उसके लिये...... बराबरी का दावा करने तक तो उस औरत की सोंच जा भी नही सकती यही कहाँ कम है कि पैरों के नीचे रौंदी नही जा रही.... पहले दिन का सामंजस्य देखने के बाद अभिभूत हुई मैं आज की घटना से सिर्फ भावहीन हो गई थी...मेरा कोई भी अभिभाषण काम आने वाला नही था, अतः दवा लगाने के बाद मैने पास रखा अपना पर्स उठाया और उसका हिसाब करते हुए कहा " कोई बात नही कंचन, तुम अब मत आना मैं दूसरे किसी को देखती हूँ...!"
14 comments:
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बचपन में एक कहानी पढी थी.. 'लड़की' कहानी के अंत में लेखक ने जब लड़की से उसके ख़िलाफ़ हो रहे भेदभाव के बारे में पूछा तो उसने बस इतना ही कहा... 'मैं लड़की हूँ न !' इन लाइनों ने उसकी याद दिला दी..
'वो तो चंद बूंदों से ही खुश है...! बाहरी आवरण ही बहुत है उसके लिये...... बराबरी का दावा करने तक तो उस औरत की सोंच जा भी नही सकती यही कहाँ कम है कि पैरों के नीचे रौंदी नही जा रही...'
परिवार के बिना इस पुरुष प्रधान समाज में जीने की मजबूरियां वह अनपढ़ जानती है और वह इसीलिए उसे बचाने को सब कुछ सहन करती है। वह बराबरी के हक में समझ भी लेती है। मौका पड़ने पर और वक्त आने पर वह अपने पति को मारपीट कर ठीक करने की ताकत भी रखती है। बस हौंसला दिलाने वाला चाहिए।
बहुत दिनों के बाद आज मौका मिला तो पोस्ट पढ़कर जहाँ मिली जुली भावनाएँ आईं...वहीं पर द्विवेदी जी की टिप्पणी ने भी प्रभावित किया..."मौका पड़ने पर और वक्त आने पर वह अपने पति को मारपीट कर ठीक करने की ताकत भी रखती है। बस हौंसला दिलाने वाला चाहिए"
बस वक्त आने पर इसी शक्ति का होना ज़रूरी है.
kabhi ek kavita likhi thi,aapko padhkar vahi yad aayi...
दुनिया भले ही पहुँच जाये चांद तारो पर
बस्ती भले ही बस जाये मंगल पर
बिल्डिंगे छूने लगे आसमानों को
ओर
हर कदम पर हो एयर कंडीशन ऑफिस
फिर भी
हर आदमी के भीतर बैठा मिलेगा एक "पुरुष "
बहुत अच्छा लिखा है कंचन्। कभी कभी इस वर्ग के लि्ये बड़ा दुख होता है ।
बहुत अच्छी तरह से इस दृष्टांत को यहाँ रखा है आपने। दरअसल हीन भावना से ग्रसित लोग अपनी कुंठा छिपाने के लिए ऍसा करते हैँ..कंचन के पति की भी यही समस्या दिखती है।
कँचन जी, बहुत ही अच्छा लिखा है आपने - अब, हमेँ खुशी है कि, आप ब्लोग लेखन से ज़ुड गयीँ हैँ
बहुत ही संवेदनशील हकीकत से रूबरू कराया आपने।
सुघड़ एवं संवेदनशील वृतांत..उम्दा.
कंचन जी ! यह 'प्रेम' नहीं है, यह आवश्यकता हो सकती है, समझौता हो सकता है पर 'प्यार' नहीं क्योंकि "बिनु परतीति होहिं नहि प्रीती" !
और हाँ, वह पुरुष नहीं क्योंकि पुरुष तो पुरुषार्थ से युक्त होता है और जब बात-व्यवहार का का पौरुष बना हो तो 'प्रियतमा' के दिल में कोई नहीं आ सकता फिर 'प्रेयसी' तो अपनी चाहत भी भूल जाती है ! बहुत पहले मैं ने लिखा था -
आँसू की गरमीं गई कहाँ ?
क्यों बर्फ-सी ठंडी साँस हुई ?
अपनी चाहत क्यों भुला गई ?
क्यों भीड़ में हो तुम एकाकी ?
अनुशासन सारा गया कहाँ ?
क्यों अपनी सुध-बुध भुला गई ?
तकिये में मुँह क्यों छुपा लिया ?
किसकी यादें फिर रुला गईं ?
आशीष जी धन्यवाद आपका जो सही समय पर चेताया वरना मैं त बड़े ही नुकसान में चली जाती।
ओझा जी धन्यवाद
द्विवेदी जी एवं मीनाक्षी जी मेरे खयाल से कमी जागरुकता की है...! जो शिक्षा द्वारा ही संभव है। अगर मार पीट ही सब चीज का हल होता तो फिर क्या था..?
अनुराग जी, पुरुषों में पुरुषत्व और नारी में नारीत्व समस्या नही है..समस्या है अपनी शक्ति और सीमा का उल्लंघन..!
पारुल जी एवं मनीष जी..शत प्रतिशत सहमत हूँ आपकी बात से ..दर-असल ये वर्ग जहाँ अभी भी शिक्षा की रोशनी नही पहुँची है...रूढ़िवादिताएं जस की तस हैं जहाँ..वहाँ जाति, लिंग इत्यादि को ले कर कुंठाएं पनपना ही आज हमारे राष्ट्र की समस्या है।
लावण्या जी धन्यवाद ..! और ब्लॉग से जुड़े तो अब ाफी दिन हो रहे हैं मुझे, शायद आपका ध्यान नही गया
राजीव जी एवं समीर जी धन्यवाद
दिवाकर जी बहुत बहुत खुबसूरत पंक्तियाँ....और बहुत सटीक दलील
SANSMARAN LIKHNE ME APKO EK VISHESH MAHARAT HASIL HAI AUR AISE SANSMARAN KI JINSE KUCCH SIKHA JA SAKE APNE JIVAN ME.
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