Wednesday, March 11, 2015

नारी पीड़ा लेखन के पीछे -शिवमूर्ति जी के जन्मदिन परिवार का साक्षात्कार भाग-3

पाँचवी पुत्री मधूलिका से मिलते ही मैने पूछा  "मैने सुना है कि आप बड़ी दुलारी बेटी हैं शिवमूर्ति जी की?"उन्होने हँस कर जवाब दिया "मुझे तो ऐसा लगता ही है कि मैं ज्यादा दुलारी हूँ उनकी, लेकिन क्या दूसरों को भी लगने लगा ?"

मैने कहा "सुना तो मैने ये भी है मधूलिका तो बचपन में काफी तेज और बदमाश थी। "इस बात को एडिट करते हुए शिवानी कहती हैं "तेज और बदमाश हैं अभी भी।" मुझे बताया गया कि मम्मी जब वनस्थली में एड्मीशन करा कर चली आईं तो वार्डेन ने कहा कि क्यों तुम दो बहने दो अलग कमरों में रहोगी। तुम दोनो एक कमरे में रहो। लेकिन मधूलिका टस से मस नही "मेरी मम्मी मुझे जहाँ रहने को कह गई हैं, मैं वही रहूँगी।" उधर श्वेता का कहना था "मम्मी उन्हे जहाँ कह कर गई हैं वही रहे।" श्वेता को तो जल्दी समझ में गई ये बात, उन्होने कहा भी " जाओ बेबी हम दोनो बहन साथ में रहेंगी" लेकिन ना मधूलिका अपनी बात पर क़ायम "मेरी मम्मी मुझे जहाँ रहने को कह गई हैं, मैं वही रहूँगी।" बड़ी मना मनौव्वल के बाद वॉर्डेन उन्हे इस बात के लिये राजी कर पाईं थीं।


बहुत ही हँसमुख स्वभाव की मधूलिका डॉक्टर होने के साथ साथ एक छोटी बच्ची मैत्रेयी की माँ और अच्छी पत्नी भी है।" पिता की उनके जीवन में क्या भूमिका रही उनके लिये " प्रश्न के उत्तर में वे कहती हैं कि "मेरे पिता मेरे लिये एक अच्छे दोस्त हैं, जिनसे मैं कोई भी बात बड़ी आसानी से कह सकती हूँ। साथ ही वो मेरे रोल मॉडल भी हैं, वे जो भी बात करते हैं, मुझे हमेशा ही सही लगती है। कोई विरोध भी करे, तो मुझे लगता नही कि उनकी बात ग़लत भी हो सकती है। और इन सब से बढ़ कर मेरे पिता मेरे लिये बहुत अच्छे पिता हैं।"

वे आगे कहती हैं " मुझे उनमें कभी कोई अवगुण दिखा ही नही। सिर्फ विशेषताएं ही हैं, उनमें।"

"विशेषताएं ही ? जैसे ??" मैं प्रश्नचिह्न लगाती हूँ।

"जैसे हर किसी का ध्यान इस तरह रख लेना जिस तरह कोई बहुत अपनो का नही रख सकता। जैसे इतने संयम से जीवन जी लेना। किसी दूसरे की परेशानी को ऐसे देखना जैसे उनकी अपनी परेशानी हो और पूरी शिद्दत के साथ उस समस्या का समाधान खोज कर उस व्यक्ति की मदद करना। किसी भी चीज को देखने का उनका जो नज़रिया होता है, वो बिलकुल अलग है। एक उदाहरण के रूप में कि मान लीजिये, किसी बाइक पर अगर चार लोग जा रहे हैं, तो हम लोग कहेंगे कि "देखो कैसे एक के ऊपर एक लदे हैं, अभी एक्सीडेंट हो जायेगा तो ट्रैफिक को दोष देंगे या फिर कि अब पुलिस वाले चालान क्यों ना करे इन पर" लेकिन पापा कहेंगे कि " अरे सब यार दोस्त होंगे, नही होगी सबके पास बाइक, अब स्टूडेंट लाइफ में कहाँ इतने पैसे होते हैं कि सबके पास अपनी अपनी बाइक हो। सबके बीच एक बाइक होगी, एक ही जगह जाना होगा तो कौन किसे छोड़ सकता है भला। लड़के हैं मौज मस्ती की उम्र है।" मुझे लगा कि यही अंतर होता है एक कहानीकार और एक सामन्य व्यक्ति की नज़र का अंतर।

इतनी प्रशंसा सुनने के बावज़ूद मैने पूछा "अगर मनुष्य है, तो कोई ना कोई कमी तो होगी ही।" दिमाग पर बहुत जोर डालने के बाद उन्होने कहा " मेरी नज़र में तो पापा में कोई अवगुण नही है, लेकिन जब आप कह ही रही हैं, तो मैं पापा के ही शब्दों को दोहरा देती हूँ कि वो कहते हैं कि मैं बहुत आलसी हूँ। तो शायद आलस उनका अवगुण हो, लेकिन मुझे नही लगा कभी कि वे आलसी हैं।"

इस से पहले शिवमूर्ति जी की जिस भी बेटी से मैने पूछा था कि " पिता आपका सबसे बड़ा संबल कब बने ?” तो लगभग सबने एक सा जवाब दिया कि "हमेशा ही वो मेरे साथ थे।" तो जो मैं विशेष रूप से जानना चाह रही थी, जिस घटना से शिवमूर्ति जी के अंदर का क्लासिक पिता झलक पड़े, उसे मैं नही खोज पा रही थी, परंतु मधूलिका के जवाबों ने मुझे उस खालिस पिता की झलक दी। उन्होने इस प्रश्न के उत्तर में कहा "मैं ऐसी दो घटनाएं बताना चाहूँगी आपको पहली तो ये कि हम दो बहनो का एड्मीशन मम्मी ने वनस्थली विद्या पीठ में कराया था। एक दिन जब हमारी एक्स्ट्रा क्लास खतम हुई, तो हमें बताया गया कि हमारे पिता जी हमसे मिलने आये हैं। हम जब उत्साह के साथ उनसे मिलने गये तो देखा कि पापा की आँखों में आँसू थे। अब ऐसा देख कर हमारी आँखों में आसू जाना तो नेचुरल ही था। इसके बाद मेरे पापा मुझे उसी दिन अपने साथ ये कह कर ले आये कि " ये भी कोई जगह है पढ़ने की।" मेरे लिये वो मेरी जिंदगी का सबसे खुशी का दिन था। यद्यपि मेरी बड़ी बहन को नही लाये थे वहाँ से, इसलिये शायद उनसे पूछने पर वो उनका सबसे दुखद दिन रहा हो। लेकिन मैं उस दिन को नही भूल पाती।"

और दूसरी घटना के बारे में वो बताती हैं कि " जब मेरा हाईस्कूल का रिज़ल्ट आया तो अखबार में उनका रोल नंबर नही था। मैं बहुत परेशान थी। जब पिताजी आये तो लोगो ने उन्हे बताया होगा। और कोई पिता होता, तो शायद गुस्सा होता, प्रश्न करता कि पढ़ाई क्यों नही की मन लगा कर ? लेकिन मेरे पिताजी मेरे कमरे में आये और कहा " हो गया होगा, जो हो गया, सो हो गया। फिर से मेहनत करना, निकाल ले जाओगी़" उस उदासी के समय में पिता जी का ऐसा कहना मेरे लिये बहुत बड़ा संबल था। यद्यपि जब स्कूल खुला, तो पता चला कि वो मिसप्रिंटिंग थी और मैं पास हो चुकी थी। लेकिन उन दो दिनो में पिता का महत्व बढ़ गया मेरे लिये।"


"पिता की कमी तब बहुत खली, जब ससुराल से पहली विदाई थी। मेरी कज़िन सिस्टर और मेरी बड़ी बहन मुझे विदा करा कर नोयडा बड़ी बहन के घर ले आये और मुझे शाम को पापा के पास भी जाना था, तभी मेरे ससुराल में शायद चर्चा हुई कि पहली बार में तो पिता या भाई के साथ ही भेजा जाना चाहिये और मुझे वापस बुला लिया गया और तब पहली बार मुझे महीने तक घर से अलग रहना पड़ा, तब तक, जब तक पापा लेने नही आये। उस समय बहुत खराब लगा था, पापा का ना आना। लगता था कि पापा जल्दी जाते, तो मैं जल्दी से अपने घर पहुँच जाती

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