Friday, August 28, 2009

कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।



ये गीत जिसे मैने गज़ल बनाया था, अचानक जैसे पैदा हो गया था। कमज़ोर गणित के कारण बिल्स सम्मिट करने का काम हमेशा मुझे तनावपूर्ण ही लगता है और उस तनाव में अचानक जाने कहाँ से इन्हे जन्म लेने की ज़िद आ गई। मैं मना कर रही हूँ, मगर ये बस अभी की जिद लगाये पड़ी है। जल्दी से मुखड़ा कागज पर उतार कर दूसरा काम करना शुरू किया और घर पहुँचते ही पूरा किया। अब ये भी पता था कि ये बहर में नही है। बहर में लाने के लिये छूने चलो तो ये बिगड़ैल बच्ची की तरह हाथ झटक देती। मैं कहती आ सँवार तो दूँ और ये फिर हाथ झटक कर कोने में खड़ी जाती। नईईई कह कर। अब अभी अभी जन्मी इसकी जिद ना मानूँ तो कैसे और मानूँ तो कैसे। मुझे पता था कि ये ऐसे ही अगर बाहर निकल आई तो इसका तो कुछ नही, मेरे ऊपर गुरु जी के डंडे पड़ जायेंगे। इनका क्या ये तो वाह वाह देख कर इतराती रहेंगी। यहाँ गुरुजी का ना बोलना भी बहुत कुछ बोल जायेगा।

खैर तीन दिन बाद मैने गुरु जी से इजाजत माँगी कि क्या इनकी जिद पूरी करी जा सकती है तो गुरु जी ने कहा कि इसे गीत बना दो। और इनका दूसरे तरीके से इलाज़ किया उन्होने। तो अब ये जो पैदा हुई तो गज़ल थी मगर जींस शर्ट पहना कर अब गुरु जी ने इसे गीत बना दिया है...! और जहाँ जहाँ ये पावडर लिपिस्टिक दिख रहा है भूल से वो इनका गज़लापा झलक जा रहा है।

तो लीजिये पढ़िये ये गीत। जो हरी लाइनें हैं वो गुरु जी ने बढ़ाई है। हर अंतरे कि पहली और तीसरी पंक्ति मेरी है। अब इतनी जिद तो माननी ही पड़ेगी ना इसकी...! क्या करें जैसी भी है अपनी है ....



मेरे संग ही होता है या तेरे संग भी होता है,

अब तन चाहे जहाँ कहीं हो मन तेरे संग होता है


बात करें तो करें कौन सी, बातें होती कोई नही,

और छुपानी हो तुमसे बातें ऐसी भी कोई नही

लेकिन बातें तुमसे हों दिन रात, यही मन होता है।


सूरज, चंदा, रात, दोपहरी सब वैसे के वैसे हैं,

पर्वत, सागर, नदिया, बादल भी जैसे के तैसे हैं

पर कुछ है जो बदल रहा है, ये संशय क्यों होता है ?


भोर भये से रात गये तक एक अजीब सी हलचल है,

मन को लाख संभाला लेकिन होता फिर भी बेकल है

कुछ है जो मिलता है हर पल और कुछ हर पल खोता है।


छोटे छोटे संदेशे हर पल तुमको पहुँचाने हैं,

लिक्‍खे अनलिक्‍खे काग़ज़ तुमको कितने भिजवाने हैं

कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।


रोने को हो काँधा तेरा, हँसने को हो साथ तेरा,

गिरने से पहले ही मुझको आकर थामे हाथ तेरा

तेरे साथ रहूं जब भी तो असर दुआ में होता है



नोटः चित्र में जो बच्ची है वो मेरे बहुत ही प्यारे रमेश भईया की बेटी है....., जो मुझे छोड़ कर लंदन चले गये हैं...! इसके पैदा होने के दो साल पहले ही इसका नाम मैने उदिशा रख दिया था। और ये भी तमन्ना थी कि इसके नाम के आगे सिंह नही सूर्यवंशी लगे जिस से पता तो चले कि हम मातृ पक्ष से राम जी के खानदानी हैं। तो ये हैं उदिशा सूर्यवंशी...! घर में इसे सब मिष्टी बुलाते हैं...! ये जो गीत बना वो भी इसी सा नटखट लगा मुझे..! देखिये ना कैसे बिना कपड़ों के खुश है...! जिद्दी...! और जब सँवारो तो कैसा मुँह बना रही है..! इसे नही पता कि इसके भले के लिये ही कहा जा रहा है सब...!

34 comments:

ओम आर्य said...

अतिसुन्दर .......बहुत बहुत बधाई

रंजना said...

छोटे छोटे संदेशे हर पल तुमको पहुँचाने हैं,

लिक्‍खे अनलिक्‍खे काग़ज़ तुमको कितने भिजवाने हैं

कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।


रोने को हो काँधा तेरा, हँसने को हो साथ तेरा,

गिरने से पहले ही मुझको आकर थामे हाथ तेरा

तेरे साथ रहूं जब भी तो असर दुआ में होता है



वाह !!! वाह !!! वाह !!!

लाजवाब !!! लाजवाब !!!! बेहतरीन !!!

प्रवाह ने अपने साथ बहा लिया तो भाव ने एकदम से बाँध लिया...वाह !!! मुग्ध कर लिया तुम्हारी रचना ने.....और जब सुबीर भाई की सरपरस्ती हो तो फिर कोई पारस क्योंकर न बनेगा...

Udan Tashtari said...

छोटे छोटे संदेशे हर पल तुमको पहुँचाने हैं,

लिक्‍खे अनलिक्‍खे काग़ज़ तुमको कितने भिजवाने हैं

कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।

-बेहतरीन !!!आनन्द आ गया!

मिष्टि बड़ी प्यारी बच्ची है.

गौतम राजरिशी said...

हाँ, इस ग़ज़ल की पैदाइश का साक्षी रहा हूँ, तो समझ सकता हूँ तुम्हारी उधेड़-बुन और भी बहुत कुछ...

वैसे इस जींस-पैंट वाले वक्तव्य पे खूब खुल कर हँसा हूँ। गुरूदेव की प्रतिक्रिया को जानना रोचक रहेगा।

कहीं-कहीं प्रवाह खटक रहा है...और आखिरी अंतरा अपना-सा लगा।

तो ये हैं मिस उदिशा!! अहा, सचमुच सँवारे जाने के बाद खुद से बोर हुई दिख रही है।

नीरज गोस्वामी said...

कंचन जी यूँ तो पूरी की पूरी रचना अद्भुत असर पैदा करती है...आनंद से भर देती है...लेकिन ये पंक्तियाँ तो बस...क्या कहूँ...जादुई हैं...

सूरज, चंदा, रात, दोपहरी सब वैसे के वैसे हैं,
पर्वत, सागर, नदिया, बादल भी जैसे के तैसे हैं
पर कुछ है जो बदल रहा है, ये संशय क्यों होता है ?

वाह...वा...ये पंक्तियाँ प्रशंशा के परे हैं क्यूँ की ऐसे अद्भुत भावों के लिए प्रशंशात्मक शब्द हैं ही नहीं...बने ही नहीं...इश्वर आपकी लेखनी में हमेशा ऐसी रवानी रखे....गुरूजी को इस "मिडास टच" के लिए नमन....

नीरज
पुनश्च: आपने अपने ब्लॉग की रूप सज्जा बदल उसे बहुत ही मनोहारी बना दिया है...मेरी बधाई स्वीकारें...उसपर...खरा सोना वाली पंक्ति तो सोने पर सुहागा जैसी हैं...

पी.सी.गोदियाल said...

सुन्दर गीत !

vikram7 said...

सूरज, चंदा, रात, दोपहरी सब वैसे के वैसे हैं,
पर्वत, सागर, नदिया, बादल भी जैसे के तैसे हैं
पर कुछ है जो बदल रहा है, ये संशय क्यों होता है
बहुत ही सुन्दर गीत,खासकर ये पंक्तियाँ

Manish Kumar said...

सूरज, चंदा, रात, दोपहरी सब वैसे के वैसे हैं,
पर्वत, सागर, नदिया, बादल भी जैसे के तैसे हैं
पर कुछ है जो बदल रहा है, ये संशय क्यों होता है ?


छोटे छोटे संदेशे हर पल तुमको पहुँचाने हैं,
लिक्‍खे अनलिक्‍खे काग़ज़ तुमको कितने भिजवाने हैं
कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।

बेहतरीन लगे ये छंद..पंकज और नीरज जी की जुगलबंदी तो देख ही चुके हैं ये भजुगलबंदी भी खूब रही।

महावीर said...

सरल शब्दों में एक सुन्दर प्रवाहमयी गीत है. बीच बीच में गुरुदेव की पंक्तियों से तो गीत बोलने लगा है.
मिष्टी के फोटो जब इतने प्यारे लग रहे हैं तो मिष्टी कितनी प्यारी होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता ही. जिद्दी होने से तो और भी प्यारी लगती होगी.
महावीर
मंथन

गौरव मिश्रा said...

adbhut aur bhaavpravan rachna. bahut bahut dhanyavaad itni sunder rachna ke liye..aur haasya ka put to vaakayi laajwaab hai..

पंकज सुबीर said...

दादा भाई आदरणीय महावीर जी के कमेंट के बाद कुछ और कहने को नहीं रह जाता । किन्‍तु फिर भी ये कि रचनाकार की जिद कविता में नहीं चलती यहां पर जिद चलती है पाठक की क्‍योंकि रचना तो उसी के लिये लिखी जाती है । जिद जब सकारात्‍मक होती है तो रचना कर जाती है किन्‍तु जब नकारात्‍मक हो तो विध्‍वंस करती है । इसलिये जिद के पहलू पर भी ध्‍यान देना चाहिये । गीत अच्‍छा बन पड़ा है । ये अलग बात है कि मूलत: वो ग़ज़ल था लेकिन पाउडर क्रीम और जींस पहनाकर की गई धृष्‍टता के कारण वो गीत हो गया ।

अनिल कान्त : said...

बेहद खूबसूरत लगी....पसंद आई बहुत

सुशील कुमार छौक्कर said...

सुन्दर प्यारे गीत की तरह मिष्ठी भी सुन्दर और प्यारी है।
सूरज, चंदा, रात, दोपहरी सब वैसे के वैसे हैं,

पर्वत, सागर, नदिया, बादल भी जैसे के तैसे हैं

पर कुछ है जो बदल रहा है, ये संशय क्यों होता है ?

बहुत सुन्दर। और हाँ मिष्ठी को हमारी तरफ से खूब सारा प्यार और आशीर्वाद।

विनय ‘नज़र’ said...

सरस गीत है
---
तख़लीक़-ए-नज़र

अंकित "सफ़र" said...

नमस्कार कंचन जी,
बहुत अच्छा गीत है, कुछ पंक्तियाँ तो जादू कर देती है जैसे
छोटे छोटे संदेशे हर पल तुमको पहुँचाने हैं,

लिक्‍खे अनलिक्‍खे काग़ज़ तुमको कितने भिजवाने हैं

कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।

"अर्श" said...

हुन्म्म्म्म .. आखिर कार ये रचना आ ही गयी और आई भी तो ऐसे सज के आए हाय ... कमाल की सजी है.. भावः खुद बात कर रहे है ... मजाल है के कुछ कही जाये ... गवाह तो कुछ हद तक मैं भी रहा हूँ आप जिस तरह से विचलित थी इसे पोस्ट करने के लिए और क्या क्या नहीं सोच लिया था ... मगर गुरु जी के कृपा से ग़ज़ल को गीत में डाल कर खूब बनाया है आपने केसरिया और हरा रंग खूब भा रहा है ... बहुत बढ़िया सामंजस्य है मैं कुछ कहूँ तो गलती कर बैठूँगा इसलिए सबको सलाम करते चलता हूँ.... बधाई तो लेलो जी आप....

आपका
अर्श

मीनू खरे said...

छोटे छोटे संदेशे हर पल तुमको पहुँचाने हैं,

लिक्‍खे अनलिक्‍खे काग़ज़ तुमको कितने भिजवाने हैं

कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।



बहुत अच्छा गीत है कंचन जी!

Dr. Sudha Om Dhingra said...

छोटे छोटे संदेशे हर पल तुमको पहुँचाने हैं,

लिक्‍खे अनलिक्‍खे काग़ज़ तुमको कितने भिजवाने हैं

कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।


रोने को हो काँधा तेरा, हँसने को हो साथ तेरा,

गिरने से पहले ही मुझको आकर थामे हाथ तेरा

तेरे साथ रहूं जब भी तो असर दुआ में होता है

कंचन बहुत सुंदर गीत बना है.
बधाई.

गौतम राजरिशी said...

हा! हा!!

गुरूजी के डंडे ...वाह! मजा आ गया!!

रविकांत पाण्डेय said...

गीत की भूमिका तो जबरदस्त है बल्कि अपने आप में एक पोस्ट हो सकती थी....आपकी किस्सागोई साफ़ झलकती है। गीत सुंदर है, मुझे जो पंक्तियां अच्छी लगीं-

भोर भये से रात गये तक.........
...........................
...........................

और,
छोटे छोटे संदेशे हर पल ..........
...........................
...........................

अल्पना वर्मा said...

bahut hi sundar geet!

mishti ko pyar..badi sundar tasveeren hain.

poemsnpuja said...

geet to bahut pyaara hai...
लिक्‍खे अनलिक्‍खे काग़ज़ तुमको कितने भिजवाने हैं
कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।

ये पंक्तियाँ बड़ी लुभावनी और प्यारी हैं

Harkirat Haqeer said...

कंचन जी .....

आपके गीत से बेहतर मुझे आपकी भूमिका लगी ...शायद गुरु जी ने पहले भी कहा था आप गद्य भी लिखा करें....बहुत अच्छा लिखती हैं आप ......मिष्ठी बहुत प्यारी है .....!!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

कंचन काफी दिनों बाद आपके जाल घर पर आना हुआ है और सुन्दर रचना और मिष्टी बिटिया की छवि ने मन मोह लिया है
लिखती रहो ...खुश रहो ...
बहुत स्नेह के साथ
- लावण्या

शरद कोकास said...

हर् पंक्ति के लिये आपको और हरी पंक्ति के लिये गुरूजी को प्रणाम ।

Kishore Choudhary said...

आपका गीत बहुत सुंदर बन पड़ा है. मिष्टी की मोहक अदाओं के बारे में जान कर अच्छा लगा. इस प्यारी सी मुस्कान भरी फोटो ने आपके गीत को कड़ी टक्कर दी है, ढेर सारा स्नेह.

नन्हीं लेखिका - Rashmi Swaroop said...

wow ! बेहद खूबसूरत है... प्रत्येक लाइन...
:)
pictures भी so cute.. और.. गीत भी...
शुक्रिया.

डॉ .अनुराग said...

देर से आने के लिए मुआफी कंचन....कुछ जिम्मेदारियों में उलझा हुआ था ,,,,,,,ऐसा लगता है सभी मिष्टी खुदा की देन होती है ......एक दम जिंदगी से भरी हुई.....कुछ लाइने पूरे गीत से भी ज्यादा असर रखती है मसलन ये .....

कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।
या ये ......

तेरे साथ रहूं जब भी तो असर दुआ में होता है

क्रिएटिव मंच said...

सूरज, चंदा, रात, दोपहरी सब वैसे के वैसे हैं,
पर्वत, सागर, नदिया, बादल भी जैसे के तैसे हैं
पर कुछ है जो बदल रहा है, ये संशय क्यों होता है ?

बेहद खूबसूरत
बहुत सुंदर गीत है.

PRAN SHARMA said...

URDU MEIN EK SHABD HAI- AAMAD -
YANI BHAAV KAA APNE-AAP HRIDAY MEIN
PAIDA HONA.AAPKEE KAVITA BHEE AAMAD
HAI.KAVITA KAA EK EK SHABD SITAR
KEE SEE JHANKAAR PAIDA KAR RAHAA HAI.
MEREE BADHAAEE AUR SHUBH KAMNAYEN.

कविता said...

Prem ki praakaashtha ise hi kahte hain.
Think Scientific Act Scientific

पारूल said...

कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।
या ये ...is pankti ko na jane kitni baar padha ...poora geet isi me hai mere liye to

राकेश जैन said...

दी, मौलिकता मे ही यह कविता बड़ी ही भावः पूर्ण है, मुझे नहीं लगता भावों और mechanism के तारतम्य के चलते मूल विचारों मे इतना ज्यादा फेरबदल ........? कविता मे ग्रीन लाइंस कि को आवश्यकता नहीं थी...चासनी कई तरह से बनाते है, एक तार, दो तार,
हर व्यंजन के हिसाब से तय है, इसके अलावा और मीठा करने के लिए आप स्वेच्छा से कुछ बढा सकते हैं, पर वो हर किसी के स्वास्थ्य के अनुकूल हो कहा नहीं जा सकता..
प्रणाम !

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Kanchan ji,kya shrstha hai kya bataoon,aapka blog,pyari bitiya ya geet sabhi kuch sadha ,vyavasthit ,sunder hai.
aapki emotional spirit behad effective hai,
meri hardik mangal kamnayen,
sadar,
dr.bhoopendra