Sunday, August 2, 2009

मेरा पहला दोस्त



ये संजोग ही था कि मेरे जन्म के कुछ पहले से जो त्रासदियाँ परिवार के ऊपर आई थीं वो लवली के जन्म के साथ ही सुधरीं। जिसका कभी न मुझे ताना मिला ना उसे बधाई।

वो मुझ से तीन साल छोटा है। अपनी जनरेशन में मैं सबसे छोटी और अगली जनरेशन में वो सबसे बड़ा। मेरा सबसे बड़ा भतीजा। हमेशा से बहुत हिम्मती। शुरु से ही इंजेक्शन लगने पर भी रोता नही था। बड़े बच्चों के साथ खेलते हुए जब सिर फूट गया तो बुलंदी से कहा "ये देखो ये हिम्मत का खून है।" सिर में छः टाँके और रोने का नाम नही। क्रांति फिल्म देखने में एकदम से उत्साह आ जाता है उसे "कलांति लिख दूँगा।"

हम साथ साथ खेले। दीदी वाला खेल। मै दीदी बनती और वो और पिंकी मेरे छोटे भाई बहन। मैं घर में खाना बनाती और वो पायलट बनता। जहाज उड़ाता और घर आ कर कहता खाना दो जल्दी।

तब वो एकदम सच बोलता था। कुछ भी झूठ नही और मैं कल्पनाओं की दुनिया में रहती, दिन भर झूठ बोलती। पता नही कब बदलाव आया, जब उसे लगा कि झूठ के बिना दुनिया में गुजारा नही है और मुझे लगा कि झूठ बोलना पाप है। शुरुआती दौर में समस्या तो मेरे ही साथ थी। अम्मा कहती वो झूठ बोलता ही नही है और ये बहुत झूठ बोलती है और मैं पिट जाती :)।

साथ में भी खूब झगड़े होते। वो मारता और जीत जाता, मैं थोड़ी सी धूल झाड़ कर उसके शरीर की हार जाती। मेरे पास एक हथियार था। खुट्टी..! और उसकी एक ही कमजोरी। वो बिना बोले रह नही सकता था मुझसे। ..और मैं हार कर जीत जाती।

मेरा एड्मिशन सीधे चौथी में हुआ, वो वहीं नर्सरी बी में। धूप में बच्चो की बेंच लगा कर स्वेटर बुनते हुए मेरी क्लास के बगल में जब माधुरी मैडम उसे स्केल पर स्केल मार रही थीं और ये जान कर कि मैं उसे देख रही हूँ, वो हलका सा सी बोल कर हाथ हटा ले रहा था, तो उसके बदले आँसू मैं गिरा रही थी और जब माधुरी मैडम से मैने कहा था कि मैडम उसके तो पहले से बुखार रहता है उसे मत मारा कीजिये तो कई दिन तक व्यंग्य सुनने पड़े थे मुझे उनके।

हम लोग १० पैसे में पाँच टाफियाँ खरीदते और ढाई ढाई बाँट लेते। बाबूजी उसको शेक पिला कर लाते और कहते कि गुड्डन को ना बताना। तो वो बार बार मेरे सामने आ कर डकारें लेता और मुँह पोंछता तब तक जब तक मैं पूछ ना लूँ कि कुछ खिलाया क्या बाबूजी ने और वो कहता "हम नही बतायेंगे बाबा ने मना किया है।" ... इतना तो बहुत था मेरे रोने के लिये।

अब उसके पास सायकिल आ गई। वो मुझे आगे बैठा कर शाम को टहला लाता। दूर दूर तक जहाँ तक मैं कहती। मेरी सहेलियों के घर, अपने दोस्तों के घर, विकास की दुकान पर से हेयरबैड और कापियाँ भी दिला देता।

हमारी दुनिया बदल रही थी। हम इस बदलती दुनिया के गूढ़ रहस्य भी सबसे पहले आपस में ही पूछ लेते। और अपनी ताकत भर कोई एक दूसरे को निराश ना करता। अब मन ही मन हँस भी लेते हैं, उन बेवकूफियों पर।

सुबह से चल रहा था...... वो चलते हुए एक टीप मार देता और आगे बढ़ जाता। फिर मैं अपनी बुद्धि का प्रयोग कर के किसी तरह एक बार मारती, २ मिनट बाद वो फिर मार कर आगे बढ़ जाता। मैं शांत हो गई। वो कॉलेज जा रहा था। मुझे दरवाजा बंद करना था। मैंने सीधा निशान साध कर चप्पल फेंकी और झट दरवाजा बंद कर लिया। अब क्या करोगे ? अब तो शाम को आना है। और मैजिक आई से अपनी विजय का नजारा देखा तो वो अपने दोस्त के साथ हँस रहा था और दोस्त धूल झाड़ रहा था। वो हट गया था, चप्पल दोस्त को लगी थी। बहुत दिनो तक वो दोस्त आने पर कहता "बुआ चप्पल पूछ कर चलाना।"

रात को उसने मेरी फोटो पर माला चढ़ा दी। सुबह दिखा दिखा कर हँस रहा था। मैं भी मुस्कुरा रही थी। झूठ मूठ का चिढ़ कर। तभी विक्की आता है, उसका दोस्त मैं अंदर चली गई थी थोड़ी देर को। फोटो देखते ही चौंक जाता है " अरे ये क्या....??" वो आज ही जयपुर से आया है। लवली सीरियस हो जाता है " तुम जयपुर में थे।" " अरे यार बताना तो चाहिये था।" कहते हुए गला भर आता है विक्की का। तब तक चीजों से अंजान मैं बाहर निकल आती हूँ। और विक्की टूट पड़ता है लवली पर।

उसने मुझे बताया कि एक लड़की उसे बहुत अच्छी लगने लगी है। मैं उसके घर फोन कर के उसे बुला दूँ। मैने झट फोन कर के बुला दिया। वो भी जब घर पर फोन करती तो मुझे ही बुलाती फिर मैं लवली को बुला देती। मेरी तो सारी सहेलियाँ उससे बात करती थीं। इसमे किसी को पूछना भी नही था।

भईया की शादी तय थी। मुझे इस बार खूब तैयार होना था। मनोरमा और गृहशोभा बताते थे कि बाहर अम्मा के काजल और छोटी सी बिंदी से अलग भी बहुत सी चीजें हो गई हैं। सुबह जब वो स्कूल जाता तब मैं उसे पैसे पकड़ा देती और शाम को वो शर्ट के अंदर से आई लाइनर और लिपस्टिक निकाल लाता अकेला पा कर।

वो रात में देर से आता। घर में भईया गुस्से में आग बबूला रहते। एक आध पड़ते पड़ते मैं धीमे से अम्मा से बताती और अम्मा कसम दिला कर छुड़ा लातीं। वो खाना लेता और थाली लिये मुस्कुराते हुए मेरी रजाई हटा देता। उसे पता होता कि मैं सोई नही हूँ। और वो मुसकुरा देता। "पागल हो तुम, तुम्हे डर नही लगता।" वो हँस के कहता "क्या करेगे मारेंगे ही ना..??" " ढीठ" मैं मन मे कहती। और वो कहता " अच्छा सुनो” और सिरहाने बैठ जाता पूरे दिन की कहानी सुनाने "किसी को बताना नही" कह कर बहुत कुछ बताता।

एक दिन फोन वाली लड़की के विषय में मैने पूछा "क्या तुम उसके साथ दूर तक जा सकोगे। घर से विरोध कर के। अगर हाँ तो कोई बात नही, अगर ना तो बात बिगड़ने के पहले संभाल लो" और उसने कहा ना और बात बिगड़ने के पहले संभाल ली। फोन वाली लड़की उसे और मुझे और अधिक चाहने लगी।

फिर रोज के किस्से। जाने कितनी नई लड़कियाँ, जाने कितने लेटर, जाने कितने गिफ्ट। मेरे पास सब इकट्ठा। मेरा अपना सीक्रेट था उसका सीक्रेट संभालना। उस छोटे से घर में। एक तो वो सुंदर था, दूसरे बात करने में बहुत चतुर। लाइन क्यों ना लगती।

उसने कराटे ज्वॉइन किया। दरवाजे, खिड़कियाँ, दीवाल और जितना बर्दाश्त हो सके उतना मैं उसके प्रैक्टिस क्षेत्र बने। " आज मैने ब्रिक तोड़नी सीखी"
"अरे तो पतली वाली ना"
"अरे पतली मोटी क्या" और वो घर के बाहर से तीन ईंटे ले आया, दो पर एक को रखा और एक जोरदार हाथ के साथ ईंट टूट गई। वाह...!!!! मैं चकित...!!मगर कुछ दर्द भी हो रहा है हाथ में। एक्सरे कराया गया। हाथ भी टूट गया है। आपरेशन करना पड़ेगा, रॉड डालनी पड़ेगी।

मैं उसे देखने हॉस्पिटल जाती हूँ वो हँस देता है मैं भी हँस देती हूँ " जॉनी आपके दाँत बहुत खूबसूरत हैं, इन्हें जमीन पर मत रखियेगा।" वो अपने अंदाज में कहता है।
उसके दोस्त की मम्मी मुझे एकटक देख रही हैं। थोड़ी देर में पूछती हैं "कोई एक्सीडेंट हो गया था ? "
"नहीं..! पोलियो..!"
" तो दाँत कैसे टूट गये।"
"दाँत...?? दाँत टूट गया क्या मेरा ?" मैने हड़बड़ा कर शीशा ढूँढ़ना चाहा।
"वो कह रहा है ना ..नकली दाँत...!!!" उन्होने कन्फ्यूज़ होते हुए कहा।
ओह याद आया " जॉनी आपके दाँत बहुत खूबसूरत हैं, इन्हें जमीन पर रखियेगा।" उन्होने समझा नये दाँतो का सेट है, लड़का मुझे हिदायात दे रहा है। ठहाका..! ज़ोर ज़ोर से ठहाका लगा रहा है वो। और मैं अपनी हँसी दबाते हुए उन मम्मी जी की सिचुएशन संभाल रही हूँ...!
" मेरे साथ भी हो जाता है।" कह कर।

उसके कोच आते हैं " अविनाश ये क्या बेवकूफी है ? नेशनल टूर्नामेंट सामने है और तुम ये बेवकूफी कर रहे हो।"
" अरे सर टूर्नामेंट को तीन महीने हैं और ये एक महीने में फिट।"
टूर्नामेंट होता है। वो भारत दौरा करता हुआ सारे राउंड निकालता हुआ फाईनल ट्राफी ले कर घर लौटता है। गले में मैडल हाथ में ट्राफी। और वही हाथ मेरे पैर छू रहे हैं। मैं गदगद हूँ।

कॉलेज से रिक्शे से लौट रही हूँ। पीछे से कोई सायकिल की घंटी बजा रहा है। मुझे लग रहा है कि मैं सुन ही नही रही। कोई बनावटी खाँसी से ध्यान आकृष्ट कर रहा है। मैं फिर भी नही मुड़ती। कोई व्हिसिल के साथ धुन निकाल रहा है "रुक जा ओ जाने वाली।" मेरा खून खौल रहा है। कान से गरम गरम हवा निकल रही है। धड़कन तेज, बहुत तेज। अब तो मोहल्ला शुरु होने वाला है। अब क्या होगा ? कोई समझेगा थोड़े ना कि मैं इसे नही जानती। तो क्या हुआ कि अम्मा ने मना किया है इन जैसे लोगो के मुँह लगने को। आज तो पानी सिर से ऊपर गुजर गया है। मैं गुस्से में पलटती हूँ। देखती हूँ कि वो मुसकुरा रहा है। "बदतमीज" धड़कन कंट्रोल होती है और गुस्सा बढ़ जाता है। " पागल हो क्या तुम" गुस्से में समझ ही नही आ रहा क्या कहें। वो हँसे जा रहा है। घर आ गया, वो मुझे सहारा दे कर उतार रहा है। "हटो यहाँ से" कह कर मैं गुस्सा दिखा रही हूँ। "हुआ क्या" अम्मा पूछ रही हैं। "कुछ नही अम्मा, इन्होने कहा था कॉलेज लेने पहुँच जाना हम नही पहुँच पाये।" मैं कुछ नही बोलती गुस्से में। अंदर मुझसे पहले पहुँच कर भाभियों को बता बता कर खूब हँस रहा है " आज बुआ को खूब परेशान किया।" भाभी लोग हँस हँस कर उस पर गुस्सा हो रही हैं।

भईया ने उसे बाईक दिलवा दी। मेरा घूमने का क्षेत्र बढ़ गया।

कालेज में उसने झगड़ा कर लिया। घर में सब नाराज हैं। वो रात भर घर नही आया। मुझे रात भर नींद नही आई। दूसरे दिन जब आया मैने बात नही की।
"अरे यार हमने कुछ थोड़े ना किया था।"
मैं चुप। वो पता नही क्या क्या बताता है़, मुझे लगता है, उसने सच में कुछ नही किया था।

वो तनाव में है। "मै कुछ भी कर दूँगा"
"ये ठीक नही है, कुछ सोचा समझा करो।"
"हे भगवाऽऽऽऽऽन" वो चिढ़ कर हाथ जोड़ कर मत्थे पर लगाता है। " हमसे ये उपदेश वाली भाषा दूर रखा करो।"
मैं चुप हो जाती हूँ। सुबह वो वही करता है जो मैं कह रही थी।


मुझे आपरेशन कराने गोरखपुर जाना है। "तुम जरूर आ जाना...! आपरेशन वाले दिन वहीं रहना..! ठीक..!"
"हम्म्म् ठीक"
मैं स्टेशन के लिये जा रही हूँ। वो अचानक दौड़ता हुआ आता दिखता है। मैं रिक्शा रुकवाती हूँ। वो हाँफता हुआ आ कर कहता है " ये लो ये जब जब अचानक बोलेगी ना समझ लेना कि हम तुम्हे याद कर रहे हैं।" और वो दिल के शेप की की रिंग के बीच में लगी बटन को दबा देता है, आवाज आती है "आई लव यू" मैं मुस्कुरा देती हूँ। "लेकिन आना जरूर" कह कर उसे भेज देती हूँ।

मैं आपरेशन थियेटर में जाने वाली हूँ, वो नही आया। सिरहाने वो की रिंग रखी है। लोगो के आने जाने या बैठने पर वो अचानक बोल उठती है "आई लव यू" मुझे उसकी याद और गुस्सा एक साथ आता है। वो नही आया। होश में आने पर आधी बेहोशी में वो आवाज़ सुनाई देती है। दूसरे दिन किसी का हाथ लगता है, की रिंग टूट जाती है। मैं रोने लगती हूँ....!

दीदी मुझे केयर के लिये अपने साथ ले गई हैं। फोन की घंटी बजती है, मैं लेटे लेटे हेलो बोलती हूँ
"हेलो" उधर से आवाज़ आती है।
"दुष्ट, नालायक, बदतमीज..तुम रखो फोन"
"आई लव यू यार"
"तुम रखो बस...!"
"अरे बस बस..! समझा करो...!"
और मेरा रोना शुरू......! सिसक सिसक कर..! लीगल गालियाँ दे दे कर।

हम दोनो का १० दिन से अबोला चल रहा है। समझ में ही नही आता कब चिढ़ जाये। अब नही बात करूँगी मैं। काम से काम बस....! सुबह सुबह मेरा रिज़ल्ट निकल आता है। मेरी सर्विस लग गई। उसे खबर लगती है, तो दौड़ कर आता है। हम दोनो गले लग जाते हैं। वो हँस कर कहता है " कुछ तो अच्छा किया करो यार हम लोगो के लिये। अब ताना मिलेगा हम लोगो को। देखो वो इतने के बावजूद कंपटीशन निकाल ले गईं और तुम लोग..!!!" हम लोग फिर हँसने लगते हैं।

पोस्टिंग आंध्रा आई है। इतनी दूर...! अम्मा भेजने को राजी नही हैं। " रोज पेपर पढ़ते हो, कैसे जाने दें ? अरे ये तो अपनी रक्षा भी नही कर पायेगी।"

वो मेरे साथ जायेगा। अपनी पढ़ाई और काम छोड़कर। हम आंध्रा पहुँच जाते हैं। हम दोनो.....। यहाँ कानपुर में सुबह आठ बजे से रात १२ बजे तक उसके पैर में चक्की लगी रहती थी। वहाँ कोई जान पहचान नही। भाषा की समझ नही। वो सुबह मेरी व्हीलचेयर को धक्का लगाता हुआ आफिस पहुँचाता है। व्हीलचेयर छोड़कर जब मैं खड़ी होती हूँ, तो मेरे दुपट्टे में पीछे से गाँठ देता है। और आफिस के रूम तक पहुँचा कर वापस आ जाता है। घर लौट कर स्केच बनाता है।
फिर १ बजे पहुँच जाता है लेने। मैं घर लौट कर चावल चढ़ाती हूँ। हम दोनो खाना खाते है..! मैं उसके बनाये स्केच को एक शेर देती..! और वो फिर मुझे ले कर आफिस छोड़ने जाता है २ बजे। फिर ५.३० बजे पहुँच जाता है लेने। यही उसकी दिनचर्या है। वो कभी शिकायत नही करता। मगर अगर उसे नींद आ गई है और १० मिनट लेट है तो मैं गुस्सा हो जाती हूँ।

कहीं घूम कर आते हैं सॉउथ में। उसका बैंग्लौर जाने का मन है। मेरा तिरुपति। वो कहता है तिरुपति चलो। हरी भरी पहाड़ियाँ...! मैं सब देखे जा रही हूँ और वो मुझे देख रहा है। वो गोद में उठा कर मुझे तिरुपति दर्शन कराता है। शाम को सीढ़ियों पर बैठे हैं। मैं खुश हूँ..! "वो देखो लवली" "इधर देखो" कह रही हूँ। वो सब देखता जा रहा है।
"मेरा मन होता है कि मैं तुम्हे गोद में ले कर उस सबसे ऊँची पहाड़ी पर ले चलूँ। कभी तुम्हे ये ना लगे कि तुम नही जा पाई" अचानक वो कहता है। मैं इस वाक्य को अपने मन में कैद कर लेती हूँ। मुझे लग रहा है कि मै दुनिया की सबसे ऊँची पहाड़ी पर बैठी हूँ।
उसकी परीक्षा है। मैं मेडिकल लगा कर आ जाती हूँ। जाती हूँ तो जिद कर के उसके साथ नही जाती मैने अपना इंतजाम कर लिया है। मैं रह लूँगी अब।

मेरा ट्रांसफर लखनऊ हो गया। उसने दिल्ली में कंपनी ज्वॉइन कर ली। कानपुर हम दोनो से छूट गया।

मैने कायनेटिक खरीद ली है और उसने कार...!

" अरे यार..! तुम तो उड़ाती हो गाड़ी...! दुनिया से बदला ले रही हो क्या ?"
"तुम पागल हो। चुप रहो...!" मैं अपना सधा सधाया जवाब देती हूँ।


वो मुझे कानपुर से लखनऊ छोड़ने आता है। हम लोग अपनी गाड़ियाँ छोड़कर रिक्शे पर घूमते हैं...! पुरानी बातों पर हँसते हैं।

उसकी शादी देखी जा रही है। वो कहता है तुम लोग देख लो। मुझे नही देखनी। मेरी पसंद से तो अच्छी ही है तुम लोगो की पसंद। भाभी ने लड़की पसंद कर ली है। हम लोग देखने गये हैं। जब मैं लड़की के ही घर पर हूँ तभी उसके दोस्त का फोन आता है। "हम्म्म् ... देख ली लड़की..??
मुझे पता है स्पीकर आन होगा। "हाँ" मैं कहती हूँ
“कैसी है ?”
"अब मुझसे सुंदर तो तुम जानते ही हो....!"
"कि सब होते हैं..! आगे बताओ..??
" तो जाओ फिर जो सुंदर है, उसी से बात कर लो"
" अरे मतलब समझो.. कि तुम से सुंदर तो कोई हो ही नही सकता। मगर उसके बाद फस्ट रनर अप हैं ना।"
"हाँ वो है।" और फोन ठहाकों से गूँज जाता है।


उसका तिलक है...! मुझे सबसे पहले तैयार हो कर खड़े रहने की हिदायत मिली थी। मगर मैं नही हो पाई। साड़ी पहननी थी। बहुत देर लगती है। फिर स्पेशली तैयार भी होना था। सब चिल्ला रहे हैं। फोन मैने सायलेंट पर लगा दिया है। भीड़ को हटाती हुई पहुँचती हूँ...! वो तैयार हो चुका है। कितना खूबसूरत लग रहा है। हमारी नज़र मिलती है।


नज़र मिलते ही मैं आदतन आँख दबा कर अँगूठे और तर्जनी का गोला बना कर सुपर्ब का इशारा करती हूँ और ठीक उसी समय बिकलकुल वैसा ही इशारा उस तरफ से होता है। हमें अपनी बेवकूफी का अहसास भी एक साथ होता है और हम दोनो एक साथ जीभ काट लेते हैं। कैमरे अचानक ये कैद करने को मुड़ जाते हैं....! मगर जो होना था वो तो हो चुका...!सब हँसने लगते हैं। पारुल (होने वाली बहू) के पास पहुँचने पर ये बात उसके भाई हँस हँस कर बताते हैं। वो भी हँसती है। "वो बुआ जी तो उनकी बेस्ट फ्रैंड हैं।" कह कर

कल उसकी शादी है। मैं बहुत व्यस्त हूँ। गाना बजाना..! कल की तैयारी करना ड्रेस संभाल कर रखना। कोना कोना मेहमानो से भरा सब को इंटरटेन करना। अचानक वो आता है और मुझे उठा कर कही ले जाने लगता है।
" अरे पागल हो क्या ? कहाँ ले जा रहे हो ? अभी अम्मा गुस्सा होने लगेंगी।"
वो कुछ नही बोलता। चुपचाप अपनी कार में बैठा कर शीशे चढ़ा देता है। गाड़ी स्टार्ट हो जाती है।
"कर क्या रहे हो ?"
"घूमने चल रहे हैं हम लोग..!" कार एक भीड़ भरी मार्केट के बीच में खड़ी हो जाती है।
"यहीं घूमना था?"
"तुम क्या समझ रही थी, पार्क चलेंगे ?"
वो बाहर से चाट ले आता है। शीशे चढ़ा कर फिर हम हँसते हैं " अजीब है यार..! तुम हमेशा हमें झेलती रही। हमारी गलतियों को। हमारी बेवकूफियों को। हम झल्ला गये कितनी बार ? कितनी बार तुम्हे गलत बोल दिया और तुम नाराज़ नही हुई। हम तो कभी थैंक्स भी नही दे पाये तुम्हे ? "
मैं कुछ नही बोल पाती " पागल हो क्या" मैं फिर से कहती हूँ। और उसके कंधे पर सर रख के अपने आँसू छिपाने की कोशिश करती हूँ। वो मेरे आँसू पोंछता रहता है। हम शांत उस कार के अंदर बैठे हैं।

और पता नही कितना कितना कितना कुछ घूम रहा है। पारुल हम दोनो को देख कर खूब खुश होती है। हम अब भी वैसे ही लड़ते हैं और वैसे ही प्यार करते हैं।

होली पर उसने बताया था कि उसका ट्रांसफर जयपुर होने वाला है। मैने कुश से वादा किया था कि मैं घूमने आऊँगी जब वो वहाँ आ जायेगा। अम्मा ने बताया कि उसका ट्रांसफर हो गया। मुझे बहुत गुस्सा आया। मुझे बताया भी नही। मई से उसका कोई फोन नही। फोन नं० तो बदल गया होगा। मैं चाहूँ तो फोन नं० ले लूँ किसी से ? मगर क्यों लूँ ? बस मुझे ही गरज हैं क्या ? उसे मेरी याद नही आती तो मैं ही क्यों याद करूँ ?

मेरा बर्थडे...सब सरप्राईजिंगली कमरे में आते हैं केक कट रहा है। फोन पर फोन आ रहे हैं। अचानक उसका नाम डिसप्ले होता है। मैं हेलो की जगह कहती हूँ " अरे तुम्हारा नं० नही चेंज हुआ ?"
" मैनी मैनी हैप्पी रिटर्न्स आफ द डे...!"
"अरे"
"छोड़ो वो सब..तुम फोन कर के कर लेना वो सब बातें..! फिलहाल तो सुनो..! I LOVE YOU...! I MISS YOU....LOVE YOU THE MOST..MISS YOU THE MOST..AND CAN NEVER FORGET YOU...!
" तुम मुझे रुला रहे हो..! आज मेरा जनमदिन है।"
"NOT AT ALL BABY...! लो पारुल से बात करो...."

आज जब अपने दोस्तों को याद करने को सोचा, तो लगा कि सबसे पहले उसका नाम ना लूँ तो बेइमानी होगी....! उसे गुस्सा बहुत आता है। वो मूडी है। झूठ भी बोलता है। अचानक गायब हो जाता है। but he is my first friend ......FIRST BOY FRIEND .....:)





नोटः दोनो स्केच आंध्रा में लवली के बनाये हुए हैं। ये सीढ़ी वाला उसने मेरे लिये बनाया था। मैने उस पर शेर लिखा
"बस किसी के वास्ते गिरते संभलते चल दिये,
और जब मंजिल पे पहुँचे, साथ बस वो ही ना था।"

उसने कहा मेरी सारी सकारात्मकता की दिशा ही बदल दी तुमने। फिर मैने उस पर ये शेर लिखा। उसके स्केच पर लिखे शेरो मेंबस एख वो ही मेरा था। बाकी ना जाने किसके है ? बस मेरी मेमोरी में थे।

50 comments:

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन संस्मरण कथा... एकदम भावविभोर करती हुई... शाबास कंचन शाब्बास...

Nirmla Kapila said...

सुन्दर संस्मरण मन को अंदर तक भिगो गया कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें शायद ये आज की सब से बडिया पोस्ट है ्

गौतम राजरिशी said...

आज इस फ्रेंडशिप-डे की सुबह-सुबह तुमने रूला दिया, बदमाश! पहला दोस्त इतना न्यारा होगा और उसकी कहानी...उफ़्फ़! तुमसे जलन भी हो रही है और खूब सारा स्नेह भी उमड़ रहा है...अभी फिर से पढ़ूँगा इसे आकर!

गौतम राजरिशी said...

कुछ रिश्ते कैसे होते हैं ना...एकदम से आकर जुड़ जाते हैं हमसे....खुद-से...अपने-से...
और यहाँ इस खूबसूरत संस्मरण में लवली को जानना-पहचानना, उसे मुझसे भी जोड़ गया..

क्यों मगर?

अभिषेक ओझा said...

कुछ पोस्ट पढने के बाद टिपण्णी में कुछ लिखने को नहीं सूझता. अभी भी वैसे स्टेज में चल रहा है दिमाग.

mehek said...

sach man ki gehrai ko chu gayi post.aisa laga jaise ye padhna kabhi khatam hi nahi ho,bas padhte hi jaye aur....

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र said...

सुन्दर संस्मरण
आपको मित्र दिवस की शुभकामना

"अर्श" said...

अब ये होता है के तन्हाई में हम तंग आकर ...
खुद ही दरवाजे की जंजीर हिला देते है ,,...

आज दोस्ती के दिन पे आपकी ये रचना जो खुद की है सुबह ही पढ़ रहा था मगर लाइट चली गयी दिन भर बेचैन रहा इसे पढने के लिए कारण की आधी ही पढ़ पाया था अभी जब फिर से शुरू से पढ़ना शुरू किया तो आँखे रो पड़ी ... बहोत ही खूबसूरती से आपने पूरी कहानी कही है अपनी...
ऊपर वाला शे'र बहोत कुछ बयान करता है ... बहोत ही हृदयस्पर्शी कुछ सार्थक कहने के लायक नहीं हूँ निशब्द करदिया आपने...
जी चाहता है के तुम्हे गोद में उठा के उस सबसे उचे पहाडी पे ले चलूँ ताकि तुम जिन्दगी भर ये अफ़सोस ना करो के तुम वहाँ नहीं गयी... कितनी भावनात्मक बात है ये .... आप दोनों का प्यार और दोस्ती हमेशा रहे ... वाकई बहोत ही कम होते है के जिनको सच्चे दोस्त मिलते है .... और आप उसमे सर्वप्रथम हो...
लवली को मेरे तरफ से बहोत बहोत बधाई...


अर्श

Manish Kumar said...

शानदार, भावनात्मक, प्रवाहपूर्ण यानि कुल मिलाकर अद्भुत लेखन !
जिस बेबाकी और साफगोई से आपने अपने दोस्त की कहानी हमें बताई उससे मन अभिभूत हो गया। आपके लिखने का लहज़ा इतना सुरुचिपूर्ण था कि इतने लंबे लेख को शुरु से अंत तक पढ़ते हुए एक बार भी ध्यान नहीं भटका। मेरे ख्याल से इस चिट्ठे पर लिखा गया अब तक का ये सर्वश्रेष्ठ गद्य आलेख है। आप दोनों की दोस्ती जीवन पर्यन्त बनी रहे इन्हीं शुभकामनाओं के साथ !

ओम आर्य said...

bahut hi badhiya ........saarthak lekh ......prerak hai

Mired Mirage said...

कंचन, इतनी देर रात तक शायद इसीलिए बैठी रही क्योंकि यह पोस्ट बुला रही थी। रह जाती तो बहुत दुख होता।
लवली का इतना स्नेह! आश्चर्य नहीं होता क्योंकि तुम हो ही इतनी प्यारी।
घुघूती बासूती

yunus said...

कंचन, मनीष ने सच कहा...मैंने आज सुबह ही इस संस्‍मरण को पढ़ा...तुम्‍हारी कलम खूब चली है । तुम्‍हारे जन्‍मदिन पर एक गीत भेजना था मेल से । जो अब तक छूटा हुआ है । जल्‍दी भेजता हूं । तुम्‍हारी इस पोस्‍ट पर बार बार लौटना होता रहेगा ।

नन्हीँ लेखिका said...

इतना खूबसूरत कि तारीफ करने को शब्द ही नहीं... एक बार नहीं कई बार पढ़ा मैंने...
belated happy friendship day.
Rashmi.

poemsnpuja said...

behad pyaari post lagi...itni gahri soti vakai kam logon se ho sakti hai.
aapke saath bachpan se bade hone tak ki kahani sunna bahut accha laga.

aakhiri sher bahut khoobsoorat hai.

पंकज सुबीर said...

कंचन कविताओं का चक्‍कर छोड़ो कहानियां लिखना प्रारंभ करो तुम तो बहुत अच्‍छा गद्य लिखती हो । एक बार पढ़ना प्रारंभ किया तो पूरा ही पढ़ना पड़ा । संस्‍मरण लेखन की कला वैसे भी लुपत हो रही है । लेकिन तुम्‍हारा ये संस्‍मरण बहुत सुंदर तरीके से लिखा गया है ।

अनूप शुक्ल said...

हमने ये लेख पहली बार डरते-डरते पढ़ा। सोचते रहे कि अब कहीं ट्रैजिक मोड़ न आ जाये। अंत तक पहुंचे तब सुकून मिला। फ़िर दुबारा खुशी-खुशी पढ़ा। बहुत अच्छा लगा। शानदार। ऐसे लेख बहुत मुश्किल से पढ़ने को मिलते हैं। एकदम माउसतोड़ लेखन। -" जॉनी आपके दाँत बहुत खूबसूरत हैं, इन्हें जमीन पर मत रखियेगा।" पढ़कर आनन्दित हुये। बहुत खूब!

Parul said...

शानदार....एक गीत याद आया कंचन

वो खेल वो साथी वो झूले
वो दौड़ के कहना आ छू ले
हम आज तलक भी ना भूले
वो ख़ाब सुहाना बचपन का .. :)

कंचन सिंह चौहान said...

योगेंद्र जी, निर्मला जी, अभिषेक जी, महक जी, महेंद्र जी, ओम जी, रश्मि, पूजा जी और पारुल आप सब का बहुत बहुत आभार

मनीष जी सुधार तो कर लिया है, मगर टिप्पणी नही मिटा रही हूँ, क्योंकि सच में आपके इतनी बार टोकने पर भी मेरे अचेतन मस्तिष्क में बैठी इस पूँछ को मै निकाल ही नही पाती और सहजता से लिखती चली जाती हूँ। सार्वजनिक रूप से टोके जाने पर शायद इस बार याद रहे। इसलिये टिप्पणी नही मिटायी..बार बार याद दिलायेगी ये मेरी भूल :)

वीर जी शायद इसलिये भी ऐसा हुआ हो क्योंकि जिस मेल से आपसे रिश्ता जुड़ा,उस मेल में भी मैने इस लवली का जिक्र किया था। मेल दोबारा पढ़ियेगा......! मैं हमेशा चाहती थी कि इसकी ऊर्जा सही जगह लगे और ये देश के लिये इसका प्रयोग करे। वो भी चाहता था, मगर कुछ चीजें ऐसी हुईं कि काम बन नही पाया।

अर्श वो शेर मेरा नही है मेरे भाई...! पता नही किसका है :)

यूनुस जी ..! समझ सकती हूँ, नये मेहमान के आने के बाद से समय कम ही पड़ जाता होगा, आपके गीत की प्रतीक्षा रहेगी।

गुरु जी ये तो पता है कि आप अपने शिष्यो की तारीफ जल्दी नही करते, इसके बावजूद ये टिप्पणी...!! मैं उड़ चली...! :)

अनूप जी माउसतोड़ लेखन...?? अद्भुत कांप्लीमेंट है :) :)

अर्कजेश said...

वाह !
सचमुच ह्रदय गवाक्ष खोल दिए !

कुश said...

वाकई कोई दिल की बालकनी होगी.. तो उसमे से ऐसा ही नज़ारा होगा.. क्या ये वही है. जिनके बारे में हम बात कर चुके है.. ?
अब जब नंबर आ ही गया है तो तशरीफ़ ले आओ मैडम..

इस पोस्ट में एक अजब सा फ्लो था.. एक शब्द भी मिस नहीं कर पाया मैं.. फेंटास्टिक

वैसे पहली फोटो पर शेर मस्त लिखा है..

डाकिया बाबू said...

Nice one.

जितेन्द़ भगत said...

बेमि‍साल। दि‍ल को छू गई ये नि‍श्‍छल संस्‍मरण।

kshama said...

Kanchanji..padhte,padhte pata nahee kab rone lag gayee..aur bamushkil poora padh payee...

sidheshwer said...

यह पोस्ट =

उम्दा गद्य और अपनत्व की उष्मा से भरी हुई एक दुनिया से साक्षात्कार.

आपके पास सहज और सच्ची संवेदना को अभिव्यक्त करने की समर्थ भाषा है.

और क्या कहूँ?

डॉ .अनुराग said...

दिल्ली के एक होटल में एक उबाऊ सेमिनार में कल रात मोबाइल से तुम्हारा ब्लॉग खोला ....सामने एक बोर करने वाला शख्स था ...आस पास ढेरो लोग .ओर मै मोबाइल के सहारे बचपन से अब तक के एक समय की छलांग को फासलों से तय कर रहा था.....तब कमेन्ट नहीं कर सका था .ओर फौरी कमेन्ट इस पोस्ट को करना गुस्ताखी होता..... अब जब रिश्तो में सूखा उगने लगा है .. ...ऐसे वाक़ये बचपन ओर बीस से पच्चीस की उम्र के के उस दौर की याद दिलाते है ...जब दोस्ती -रिश्ते पायदान में सबसे ऊपर थे .. दुनियादारी की गली में कदम नहीं रखा था ....अपने अपने अलग रास्ते .अलग मंजिले तय नहीं की थी....हम सबने वो जिंदगी जी है ....ओर सच कहूँ उसी जिंदगी को जीने के लिए आज भी तरसते है .इसलिए रिचार्ज होने के लिए ..साल में एक बार उन लम्हों को दुबारा जीने की कोशिश करते है .....
वक़्त ओर हालात रिश्तो की इबारत लिखते है ....आजकल मसरूफियत भी उनमे अपना रोल अदा करने लगी है....
जिस फ्लो ओर अंदाज से तुमने लिखा है ...पूरे स्क्रीन पे .जज़्बात दिखते है इमानदारी में भीगे हुए ....ओर सच कहूँ तो एक खाका सा खींचता है....जो तुम्हारी तस्वीर को ओर मुकम्मिल करने में मदद करता है ....ओर मुझे कंचन दिखाई देती है .वैसी ही जैसी वो है......पारदर्शी...मन के भीतर -बाहर

रचना. said...

क्या कहूं कन्चन!! समझ ही नही पा रही...ऊपर सब लोगों के द्वारा जो भी सारी अच्छी बातें कही गयी हैं वो सब कहना चाह रही हूम मै भी!इस ईमानदार और उत्कृष्ट अभिव्यक्ति पर हमारा स्नेह स्वीकार करो! और तुम और तुम्हारे ’ब्वाय फ़्रेंड" का रिश्ता इतना ही प्यारा बना रहे यही दुआ है..:)

Kishore Choudhary said...

असामयिक व्यस्तता ने मुझे कुछ दिनों के लिए दूर कर दिया था अब भी सिर्फ एक नज़र के लिए आया तो मालूम हुआ कि आपने फ्रेंडशिप डे का एक शानदार तोहफा हमें दे रखा जो कब का पहुँच चुका है. मैं किन्ही उलझे हुए सूत्रों की संभावनाओं को नकार नहीं सका और फिर धीरे धीरे उस गहराई तक पहुंचा जहाँ खुद की आवाज़ सुनी जा सकती है एक दम साफ़ एकदम पास. बहुत पसंद आई पोस्ट बहुत सुंदर. तस्वीरें भी बहुत कुछ कहती हैं.

sanjay vyas said...

सीधे सच्चे स्नेहसिक्त रिश्ते का बड़ा आख्यान. अद्भुत तरलता से लिखा गया विरल गद्य,जिसकी आर्द्रता पढ़कर गुज़रते हुए महसूस होती है...

रविकांत पाण्डेय said...

बहुत सुंदर और प्रभावी!!! कुछ कहते नहीं बनता बस ये शेर सुन लें-

खामुशी भी मिरी इबादत है
यूं भी मैं उसका जिक्र करता हूं

लेखनी पर आपका अधिकार अद्भुत है।

गौतम राजरिशी said...

रात के दो से ऊपर होने जा रहे हैं। रात कहूँ कि सुबह? अभी-अभी किशोर साब की अद्‍भुत कहानी "बिल्लियां" पढ़ कर फिर से आ गया इस दोस्ती की अप्रतिम दास्तान को पढ़ने...

कई-कई जगह लवली खुद जैसा लगा था....लगा है...लग रहा है! कुछ रिश्ते कैसे तमाम शब्दों परिभाषाओं से ऊपर उठ जाते हैं और हम ता-उम्र ऋणि हो जाते हैं उनके, उन रिश्तों के होने के लिये। उधर ऊपर आसमान में या हमारे आसपास छुपा हुआ कोई सर्वशक्तिमान परमपिता परमेश्वर है सचमुच, ऐसे रिश्ते इस विश्वास को और-और प्रगाढ़ कर देते हैं ना कंचन?
god bless u dear sis....और इस धागे के लिये क्या कहूँ, डोर तो पहले ही जुड़ गयी थी, इस धागे ने उस डोर को और मजबूत कर दिया कभी न टूटने के लिये!

रवीन्द्र रंजन said...

बेहतरीन और भावुक कर देने वाला संस्मरण।

raj said...

mujhe pata nahi chal raha ki main kya comment dun...kuch hairan si hun,,abhi tak post se bahar nahi aa pa rahi hun,sirf ye kah dena ki achhi post hai,,nainsafi honga.apne man me uthne wale bawo ko main hi bta nahi pa rahi hun..etne achhe se bhi man ke baw kahe ja sakte hai....wish u very gud luck.may god bless u...its really my true feelings...

Harkirat Haqeer said...

कंचन जी आपने निशब्द कर दिया अपनी लेखनी से ...सुबीर जी ने सही कहा आप गद्य लिखा करें ....आपने जिस काबलियत से इस रचना को लिखा मैं तो नतमस्तक हूँ .....बहुत बहुत बधाई ....!!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

प्रिय कंचन बिटिया ,
बहुत मधुर रिश्तों पर आज लिखा आपने
पढ़कर मन प्रसन्न है -- सुखी रहो
रक्षा बंधन पर स्नेह
- लावण्या

Udan Tashtari said...

बहुत भावपूर्ण संस्मरण. डूब कर पढ़ते चले गये और पता ही नहीं चला कि कब खत्म हो गया. संपूर्ण प्रवाहमय. बांधे रखा पूरे समय.

आनन्द आ गया पढ़कर.

Vijay Kumar Sappatti said...

bahut hi marmsparshi post . dil ko bahut bheetar choo gayi ji .. kya kahun kuch samajh nahi aa raha hi ..
naman


regards

vijay
please read my new poem " झील" on www.poemsofvijay.blogspot.com

राकेश जैन said...

Di, ese ehsaas,,,, jeene ka jo tajurba apne likha hai, jab wo beete honge to un palon ki keemat kya hoti hogi.. Sach kahi hansi chhutti hai to kahi ankhen dabdabaa jati hain.

नीरज गोस्वामी said...

इस अद्धभुत भावनात्मक पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाई..."बचपन के दिन भी क्या दिन थे...." आपकी लेखनी से निकला ये संस्मरण सीधा दिल में उतर जाता है...बधाई.
नीरज

Sweta said...

very sentimental......
bahut hi aacha hai di..mujhe to ye sab baatein pata hi nahi thi ki lavli bhaiya aapke itne aache frnd hain...

abhivyakti said...

आपकी यह पोस्ट पांचवी बार पढ़ी है...पढ़ कर कुछ भी नहीं कह पाने की स्थिति में आ जाता हूँ.हर बार सोचता हूँ इस पर सोच कर लम्बी सी प्रतिक्रिया दूंगा...पर हर बार रुक जाता हूँ...कुछ रचनाएं इतनी प्रभावित करती है कि आप का मन उसे आत्मसात कर लेता है...फिर उस पर कोई प्रतिक्रिया देना आपके बस में नहीं रह जाता है..
बस इतना ही कहता हूँ कि भावुक होने का जी करता है..

पुनीत ओमर said...

क्षण भर के लिए भी नहीं लगा की कोई पोस्ट पढ़ रहा हूँ. लगा की जैसे जैसे कहानी बढ़ रही है, मैं खुद भी एक बार फिर से बचपन को जीता हुआ फिर बड़ा हो रहा हूँ. भले ही वक्त और हालत थोड़े बहुत अलग रहे हों पर न जाने क्यों बहुत सी बातें याद आ गयीं और बहुत से लोग आखों के सामने से गुजर गए. झूठ कहते हैं वो लोग जो कहते हैं की दिल के रिश्तों का कोई नाम नहीं होता. जिंदगी हमे भले ही कितना भी दूर ले जाये, कुछ रिश्ते कुछ यादें हमें वापस अपनी जमीन पर ले ही आते हैं.

बस एक बात पूछनी है आपसे.. क्या आपका ही नाम गुड्डन है? वजह बाद में बताऊंगा..

कंचन सिंह चौहान said...

Punit....!Merer Babuji mujhe hameshaha Guddan hi kahate the.... ab bas badi didi kahati haiN

neera said...

ख़ुशी, वात्सल्य और भावनाओं से भरी खूबसूरत पोस्ट सर से पाँव तक भिगो गई ....

"MIRACLE" said...

बहुत ही भावः पूर्ण संस्मरण .वाकई आपका दोस्त लाखो मे एक , ऐसी दोस्ती को सलाम .....यह दोस्ती कहाँ जनम लेती है .....दोस्ती तो मोती होती है है जो जिंदगी से परिचय करती है ....इसका तो अंत ही नहीं ... कंचन जी आप को बधाई इतने अच्छे से दोस्त के बारे मे लिखा ....

Anonymous said...

कल्पनाओ में सोचा था की ए़सा वक्तित्व होता है ,आप भाग्यसाली की आपके पास लवली जेसा भतीजा है

Rohit Tripathi said...

is post pe to ek movie ban sakti hai puri :) bahut pyari post bachpan se jawani.. dekhe the tumne jawani mein sapne dekho ab tum sapno mein jawani :) nice to knw him aur wo karate wala scene to awesome tha ekdum :D, bahut bahut bhaut pyari post

कमलेश वर्मा said...

बहुत सुंदर रचना मर्म को छूने वाली ,कंचन जी

Suneel R. Karmele said...

bahut khubsurat sansmaran, dil ko chhu dene wala, aur phir tumhare lekhan shaili ka jawab nahi, go ahed. badhai....

vishal said...

आपके विलक्षण व्यक्तित्व की झलक मिली इसमें। बधाई! अच्छे दोस्त नसीब वालों को ही मिलते हैं।

कंचन सिंह चौहान said...

Vishal...!! mere bhai apna ata pata to de do...!! roz ek prashansha pane ke baad ye to janu chitthi aa kidhar se rahi hai ?