
८ साल पहले एक पत्थर की आँख में आँसू देख कर ये कविता लिखी थी। बाद में ये कुछ लोकल पत्रिकाओं में छपी भी। मगर जैसा मैने लिखा था वैसा इसे समझा नही गया। इसलिये ब्लॉग पर लगाने का मन नही हुआ। बहुत दिनो बाद फिर अभी पिछले रविवार इस गीत को फिर किसी पत्थर के सामने गाया और दो पंक्तियाँ गाते ही, पत्थर नम हो गया....! मुझे लग रहा है ये गीत बना ही पत्थरों के लिये है शायद......!
दस्तक हुई द्वार खोला तो देखा द्वार खुशी आई,
किंतु हाय मजबूरी मेरी, बंद किवाड़े कर आई।
बार बार उस खुशी ने फिर भी द्वार हमारा खटकाया,
किंतु हमारी मजबूरी से कोई ना उत्तर पाया।
मैं नारी करती क्या आखिर खुशी तो चीज़ पराई थी,
मज़बूरी मेरी अपनी थी. साथ सदा दे आई थी।
मंदिर मंदिर जा कर जिसकी खातिर जोत जलाई थी,
वही मेरा घर मान के मंदिर, जोत जलाने आई थी।
पहली बार हुआ था ऐसा कैसा आर्द्र नज़ारा था,
हाय खुशी ने आँखों में आँसू भर मुझे पुकारा था।
देख खुशी की आँख में आँसू हृदय हमारा भर आया,
बता नही सकती, कि कैसे खुद पर फिर काबू पाया।
खोल दिये दरवाज़े मैने खुद पर जब काबू पाया,
झड़क दिया उस खुशी को मैने कड़े शब्द में समझाया,
"कैसी मेरी शुभचिंतक है, ये क्या करने आई है,
नारी और खुशी की जग में प्रीत भला निभ पाई है ?
हृदय धड़कता है सीमा में. सीमा में देखे दृष्टि,
जीवन के समझौतों में ही मुझको मिलती संतुष्टि।
घर मेरा मर्यादाओं का लगी रवाज़ों की देहरी,
अपनी सहज भावनाओं की मैं हूँ बनी स्वयं प्रहरी।
बड़ा सहज होता है जग में, तुम से रिश्ता कर लेना,
पर नारी के जीवन में है कहाँ सहजता से जीना।"
लौट गई धीमे कदमों से बात समझ उसके आई,
नारी और खुशी की जग में प्रीत भला कब निभ पाई।
भर आई आँखों की कोरें दूर, तलक देखा उसको,
कौन सांत्वना देता आखिर खुद ही समझाया खुद को,
बंद किये दरवाजे मैने और चुपचाप चली आई
बता नही सकती कि खुद में कितनी संतुष्टी पाई
नोटः ब्लॉगिंग शुरु करने के पहले मनीष जी के सुझाव पर मैंने कुछ दिनों तक परिचर्चा मे अपनी कविताएं डाली थी। उसी समय यह भी कविता डाली थी। जिस पर कुछ लोगों को नारी को इतनी अबला दिखाने पर ऐतराज़ हुआ था। उन सब लोगो से पहले ही क्षमा..! मेरा ऐसा कोई उद्देश्य नही है..! परंतु ये कविता मेरे मन के बहुत करीब है।
दूसरी बात जब मैने ये कविता लिखी थी तो मुझे लगा था कि बड़ी हिम्मती कविता है ये, क्योंकि अपनी सुख सुविधाएं बटोर लेने से ज्यादा हिम्मत का काम है पा कर भी त्याग देना...!
36 comments:
kancha ji aapki ye rchna vastav me lajvab me hai. Behtrin rchna ke liye bdhai
कंचन जी आपने नारी का यथार्थवादी प्रस्तुति करण किया है अपनी इस रचना में...इसके लिए आप बधाई की पात्र हैं...सच वोही है जो आपने लिखा है इसे चाहे कोई पसंद करे न करे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता...
नीरज
कमाल है. लाजवाब कर देने वाली .... बहुत ही उम्दा कविता ..... Keep it up.
कंचन जी!
सादर वन्दे ,
आपकी रचना अपने में एक ऐसी कहानी है जिसको पढ़कर पत्थर तो नहीं किन्तु नारी और सुख ऐसे दो किनारों का आभाष होता है जो साथ-साथ तो चलते है किन्तु मिल नहीं पाते, इनमे पत्थरो कि जगह इस समाज का चित्रण दिखाई देता है,( जैसी मेरी समझ है).
कंचन जी, द्वार आई खुसी को यह कहकर लौटा देना कि तेरी( खुशी) और मेरी ( नारी) नहीं निभ पायेगी, यदि किसी की कोई बहुत बड़ी मजबूरी ना हो तो मेरे हिसाब से यह सरासर गलत है मनुष्यों में भगवान् ने दो रूप बनाए है पुरुष और नारी ! हरेक की अपनी अपनी सीमाए है, अपनी मजबूरिया है मगर यह कह देना कि नारी को खुशी नहीं मिल सकती मैं समझता हूँ, गलत है ! नारी की अपनी खुसिया है जो उसे अपने विभिन्न चरणों में मिलती है और जीने वाले उसका भरपूर फायदा भी उठाते है ! खैर, कविता अच्छी है और गीत पत्थरो की नहीं इंसानों का है !
उचित तो नहीं है कि किसी के लिखे में कुछ जोड़ा-घटाया जाए पर इस भाव को थोड़ा विस्तार देने का लोभ संवरण करना मुश्किल है। आपने द्वार तो बंद कर लिया पर खुशी लौटी नहीं, वहीं देहरी पर ही आसन जमा लिया। इसलिये जो आपके घर आता है सबसे पहले उसे दरवाजे पर आते ही खुशी मिलती है।
बहुत ही सुन्दर लिखा है नारी ...........भावो के मद्देनजर एक यथार्थ भाव को दर्शाती रचना ........अतिसुन्दर
वो पत्थर क्यूं रोया था, पत्थर के गीतों को सुनकर
दर्द को देखा औ पहचाना था इक रिश्ते को बुनकर
और कुछ लोगों काम ही होता है एतराज दिखाने का...
इन पंक्तियों ने जैसे स्वर छीन लिये "नारी और खुशी की जग में प्रीत भला निभ पाई है/हृदय धड़कता है सीमा में,सीमा में देखे दृष्टि/जीवन के समझौतों में ही मुझको मिलती संतुष्टि/घर मेरा मर्यादाओं का लगी रवाज़ों की देहरी/अपनी सहज भावनाओं की मैं हूँ बनी स्वयं प्रहरी/बड़ा सहज होता है जग में, तुम से रिश्ता कर लेना/पर नारी के जीवन में है कहाँ सहजता से जीना"
और तुम्हें जो लगा कि ये बड़ी हिम्मती कविता है, तो इसमें कोई दो राय नहीं...फिर से आता हूँ सकून से पढ़ने।
badhai.
मन के भावों को बहुत ही अच्छी तरह से सुन्दर रुप में लिख दिया।
लौट गई धीमे कदमों से बात समझ उसके आई,
नारी और खुशी की जग में प्रीत भला कब निभ पाई।
बहुत उम्दा।
बस....साधुवाद..
क्या मजाल है मेरी कुछ कहूँ ... मेरे सारे शब्द आपने ले लिए है .. इस गीत के बारे में क्या कहूँ... कितने दर्द है .. कितनी समझ है .. एक हद .. और फिर उसमे संतुष्टि.. .. उफ्फ्फ कितनी संभावनाएं और उनकी अभिब्यक्ति... दर्द और आंसू नारी के लिए ही है क्युनके उसके आलावा कोई इसे संभाल ही नहीं सकता किसी की हिम्मत ही नहीं ... ऊपर वाले को क्या कहूँ इस बात के लिए उसे आभार दू के किसी को तो बनाया है जो सलीके से और तरीके से इन दुक्खों को और आंसू को सह जाता है ... धरती पे धन्य है नारी... सलाम...
अर्श
कंचन जी
नमस्कार
आपको मेल करना चाह रहा पर कर नहीं पाया आपका मेल मुझे मिला पर गलती से मिट गया आपसे निवेदन है की अपना मेल मुझे दे दे . आप से मुझे आपके ब्लॉग के प्रकाशन के बारे में बात करनी है .(arun.om3@gmail.com)9335356115
कंचन जी,
द्वार पर ख़ुशी हो और द्वार बंद करना क्या कम साहस का काम है..नारी और ख़ुशी के रिश्तो के अन्तर्विरोध की बारीकी को आपसे बेहतर कौन समझा सकता है...समझौतों से भरे जीवन की सच्चाई को एक नारी से बेहतर कौन समझ सकता है...और फिर अपनी स्वयम पोषित मर्यादाओं में रहकर अपनी सहज भावनाओं का अनुसरण करने जैसी गूढ़ बातों को कितनी बारीकी से आपने कहा है...ख़ुशी से रिश्ता बना लेना बहुत आसान होता है पर उसकी कीमत चुकानी पड़ती है....और फिर ख़ुशी को लौटाकर संतुष्ट होना..आपने अपनी कविता में इतना कुछ कह दिया है कि उसकी टीका लिखी जा सकती है...आपका लेखन वैसे ही बहुत स्तरीय है,पर यह कविता पाठक को बहुत गहरे से प्रभावित करती है.
प्रकाश पाखी
प्रशंसनीय रचना।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
हिम्मती लड़की की सुन्दर कविता है ये कंचन ...खुशी पे द्वार कौन बंद कर पाया है ?
"कैसी मेरी शुभचिंतक है, ये क्या करने आई है,
नारी और खुशी की जग में प्रीत भला निभ पाई है ? lajwaab panktyan hen
बहुत ही उम्दा रचना. सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति.
मन की एक सहज स्थिति प्रसन्नता के बहाने समाज में नारी कि स्थिति पर एक कठोर बयान देती है कविता. मैंने जब इसे पढ़ना आरम्भ किया तो कुछ दूर तक यह किसी अज्ञात के द्वारा किये जाने वाले किसी उपकार का विरोध करती सी प्रतीत हुई आगे इसमें धरातल की पठारी सच्चाइयां उपस्थित थी. कविता में प्रसन्नता एक पलड़े में रख कर दूसरे में स्त्री के साथ किया जाने वाला लोक व्यवहार प्रकट किया गया है. कविता किसी समयकाल से बंधी हुई नहीं है क्योंकि आदम से ले कर आधुनिक तक, नारी कि स्थिति में महज इतना ही बदलाव आया है कि अब वह अपनी समस्याओं और चुनौतियों पर चर्चा करने के लिए स्वतंत्र है. सुना तब भी नहीं जाता था और अब भी नहीं. कविता वैयक्तिक होते हुए भी सार्वजनिक है. कंचन कविता के माध्यम से कुछ गहरी चोट भी करना चाहती है वह जन्म के साथ जुड़ जाने वाले आग्रहों का समर्थन कर सामाजिक व्यवस्था का उपहास करती है.
कंचन, आपको बहुत बधाई और ये तस्वीर , बिलकुल ऐसा लगता है जैसे राजस्थान के किसी पुराने तालाब पर बनी स्मृति छतरी में कोई किसी कि याद में खोया सा है.
kanchan ji
kuch to laog kahenge....logon ka kaam hai kehna
aap kisi ki parvaah kiye bina apne bhavon ko vyakt kijiye........aur is kavita mein to aapne jo chot ki hai wo lajawaab hai.........uski gahrayi ,wo anubhuti samajhna har kisi ke bas ki baat nhi.
हृदय धड़कता है सीमा में. सीमा में देखे दृष्टि,
जीवन के समझौतों में ही मुझको मिलती संतुष्टि।
घर मेरा मर्यादाओं का लगी रवाज़ों की देहरी,
अपनी सहज भावनाओं की मैं हूँ बनी स्वयं प्रहरी।
.........
क्या बात कही तुमने कंचन....... क्या कहूँ,समझ नहीं पा रही....
नारी जीवन की पूरी कहानी तुमने इन सधे शब्दों में बयान कर दी....कितने गहरे जाकर तुम्हारी इस रचना ने झकझोरा है,मैं कह नहीं सकती....
शाबाश !!! सदा ऐसे ही सुन्दर लिखती रहो......अनंत शुभकामनायें...
कैसा घडा ये मन ईश्वरने नारी का ? कभी पत्थरकी तरह मज़बूत कभी मोम की तरह पिघलता हुआ ...
aap likhtee bhee usee nazakat ke saath hain!
ऐ ख़ुशी, कनखियों से फिर भी मै तुम्हे देखती रही
जानती थी रात भर तुम मेरे दरवाज़े को तकती रही
क्या जानो तुम चौखट के भीतर मै भी तो सिसकती रही
पर तुम्हारे बैरंग लौटने का जशन भी मानती रही
कभी नहीं जान पाओगी तुम, और शायद मै भी नहीं
क्या मै करती रही और क्या मै करना चाहती रही....
आप बेहद सुंदर लिखती हैं. मै तो आपकी पिछली फ्रेंडशिप डे वाली post के बाद से इंतज़ार ही कर रही थी. :)
मेरे ब्लॉग पर आप सादर आमंत्रित हैं...
http://nanhilekhika.blogspot.com
Rashmi.
whoopsy ! comment posted four times ! baap re ! I m so sorry ! I wasn't that !
plz...
:)
"कैसी मेरी शुभचिंतक है, ये क्या करने आई है,
नारी और खुशी की जग में प्रीत भला निभ पाई है ?
हृदय धड़कता है सीमा में. सीमा में देखे दृष्टि,
जीवन के समझौतों में ही मुझको मिलती संतुष्टि।
घर मेरा मर्यादाओं का लगी रवाज़ों की देहरी,
अपनी सहज भावनाओं की मैं हूँ बनी स्वयं प्रहरी।
बड़ा सहज होता है जग में, तुम से रिश्ता कर लेना,
पर नारी के जीवन में है कहाँ सहजता से जीना।"
सहजता से न जी पाने की नारी की विवशता को जिस सहजता से आपने अभिव्यक्त किया है वह कोई सरल कार्य नहीं है ,एक एक शब्द जीवंत है ! कथ्य कवि का अपना होता है उससे सहमत या असहमत हुआ जा सकता है परन्तु इससे उसकी संवेदना को नकारा नहीं जा सकता ! बहुत मन से लिखती है आप कंचन जी और साथ ही सुन्दर चित्र भी आपके मनोभावों को बखूबी व्यक्त करता है !
कंचन जी आज मैंने बहुत दिनों के बाद आपका ब्लॉग पढ़ा ...पहले भी आपको पढ़कर ऐसा ही प्रतीत हुआ था जैसा की आज लगा ..
"कैसी मेरी शुभचिंतक है, ये क्या करने आई है,
नारी और खुशी की जग में प्रीत भला निभ पाई है ?
.बड़ा सहज होता है जग में, तुम से रिश्ता कर लेना,
पर नारी के जीवन में है कहाँ सहजता से जीना।
इन पंक्तियों से आपने नारी जीवन की हकीकत और उथल पुथल को सामने लाकर खडा कर दिया
भावुक मन !
"कैसी मेरी शुभचिंतक है, ये क्या करने आई है,
नारी और खुशी की जग में प्रीत भला निभ पाई है ? "
wakai patthar ko mom kar dene wali kavita.
bahut sundar....
...is badhiya lekhan hetu badhai...
...haan par kehna chahoonga ki mahilaayien abal nahi.
:)
कंचन,
आज पहली बार आप के ब्लाग पर आई हूँ.
मेरा पहला दोस्त -संस्मरण और पत्थरों के गीत ने रुला दिया.
बहुत अच्छा लिखती हो -क्या भाव प्रवाह है.
बहुत- बहुत शुभ कामनाएँ.
सुंदर रचना.... वाह..
मै ये नहीं कहूँगा की कविता शानदार है .बेमिसाल है...बस ये कहूँगा .उम्र तजुर्बे ओर वक़्त के साथ हम ओर हमारे लिखने में कुछ अंतर आते रहते है ..सोच पर भी उम्र का असर पड़ता है...तुम्हारी कविता भी ऐसी है जैसी मेरी डायरियों के शुरूआती पानो में है ... .दर्द ओर आदर्शवाद में डूबी...
ख़ुशी और नारी का छत्तीस का आंकडा है जिसे आपने शब्दों में सहजता से पिरोया है
मैं नारी करती क्या आखिर खुशी तो चीज़ पराई थी,
मज़बूरी मेरी अपनी थी. साथ सदा दे आई थी।
पहली बार हुआ था ऐसा कैसा आर्द्र नज़ारा था,
हाय खुशी ने आँखों में आँसू भर मुझे पुकारा था।
बहुत उम्दा कंचन जी , बढ़िया !!
कविता की अपनी जैसी भी समझ है उसके हिसाब से इसे अच्छी रचना मान रहा हूँ , वैसे मेरे खुद के मानने का कोई खास मतलब भी नहीं है. यह तो कवि को ही पता होता है कि अमुक रचना का मतलब और मायने क्या हैं.
आपका लिखा बताता है यह अच्छी और उत्कृष्ट है तो फिर है !
आजकल 'द मांक हू सोल्द हिज फ़ेरारी' पढ़ रहा हूँ ,आपने अपनी पोस्ट के आखीर में लिखा है -
" अपनी सुख सुविधाएं बटोर लेने से ज्यादा हिम्मत का काम है पा कर भी त्याग देना..."
इस किताब में भी कुछ ऐसा ही है !
आपकी पोस्ट पढ़कर एक शेर जेहन के जंगल में नमूदार हुआ है ,आपकी बस्ती की तर्फ भेज रहा हूँ -
आज पत्थर को पिघलते देखा'
छाँव को धूप में चलते देखा .
sach to esa hi hai,,,,,Di..
अपनी सहज भावनाओं की मैं हूँ बनी स्वयं प्रहरी।
बड़ा सहज होता है जग में, तुम से रिश्ता कर लेना,
पर नारी के जीवन में है कहाँ सहजता से जीना।"
नारी जीवन की सच को दर्शाती,प्रभावशाली रचना
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