Friday, August 17, 2007

मुक्ति भाग‍-3

ये आवाज तो इनकी थी। मैने सारिका को जहाँ का तहाँ छोड़ा और दौड़ कर दरवाजा खोलते ही इनसे लिपट कर फिर उसी बेग से रोने लगी। ये कुछ भी समझने में असमर्थ थे।

ऐसी स्थिति अब तक कभी नही हुई थी। इन्होने मुझे पकड़े हुए ही दरवाजा धीरे से लगाया और एक मजबूत रक्षक की तरह मेरे शरीर के गिर्द अपने हाथों के घेरे का कवच बना दिया। मेरा डर अब धीरे धीरे कम हो रहा था। इन्होने मुझे धीरे से बिस्तर पर बिठाया और मेरे आँसू पोंछते हुए बोले "पहले तो तुम शांत हो! फिर बताओ कि हुआ क्या ?"

मेरी हिचकियाँ बँध गईं। मेरी समझ में नही आ रहा था कि मैं कैसे इन्हे इनके ही भाई की पशुता बताऊँ ये क्या सोचेंगे ? अगर कहीं इन्हे क्रोध आ गया तब तो अनर्थ हो जाएगा ? जो बात रात के अँधेरे में दब गई वो पूरे गाँव में फैल जाएगी। चार लोग कुँवर जी को गलत कहेंगे तो चार मुझे भी कहेंगे। और कुँवर जी के ऊपर चार लोगों की सच्चाई का उतना दाग नही लगेगा, जितना मेरे ऊपर एक झूठे आरोप का। मैं क्या करूँ मेरे कुछ समझ में नही आ रहा था।

इनका प्रश्न बार-बार आ रहा था, "हुआ क्या कुछ पता तो चले।"

मैने बिलखते हुए कहा "देखीं हम जौन कुछ बताइब आप नाराज ना होवा जाई !"

"बताओ तो पहले।" इन्होने धैर्य के साथ कहा।

मैने अपनी बात कहनी चाही, लेकिन उसके पहले ही फिर आँसू उमड़ पड़े "हम कईसे बताई, हमरे मुँहा से नाही निकरत बाय।"

इस वाक्य के पूरा होते ही इनके चेहरे की रंगत बदल गई, "कल छोटे आए थे क्या " इन्होने मेरी तरफ चिंता के साथ देखते हुए कहा।

इस वाक्य को इनके मुँह से सुनते ही मैं इनका हाथ पकड़ कर बिलखने लगी। हाँ का शब्द मेरे मुँह से निकल ही नही रहा था।

"मुझे नही पता था कि मैं जो सुन रहा हूँ वो सच है।" कहते हुए इन्होने मुझसे हाथ छुड़ा लिया।

इससे पहले कि ये आगे बढें मैं दौड़ कर दरवाजे के पास गई और कुंडी लगा कर दरवाजे से लग कर खड़ी हो गई "ना ना बाहर ना जायें आप। हमार किरिया है।" कहते हुए मैने इनके पैर पकड़ लिये " देखें अबहीं ले त कुछ नाही भै। ऊ देखीं... ऊ हसिया बाय ना, उहै उठाय लेहे रहेन हम। कुँवर जी आगे नाही बढ़ि पाइन। बकिर अब आप बाहर जाई के रिसियइहैं त गउँवा भर में ऊ बात फईलि जाई जौन भईबे नाही कीन। गाँव के मनई मेहरारुन के तो आप जनिबै करथिन। तनी हमरे इजती के सोची सारिका के पापा। आपके सारिका के मूड़ेक् किरिया।" आवेग के साथ कही जा रही मेरी बात उनकी समझ में आ गई थी। इन्होने धीरे से अपना हाथ छुड़या और सारिका के बगल में जा कर लेट गए।

इन्होने कुँवर जी से क्या कहा, मुझे नही पता। लेकिन कुँवर जी अब खाने के लिए भी अंदर नही आते थे। कुँवर जी को ईश्वर की तरफ से काला रंग, मोटी नाक, छोटी छोटी आ¡खें, मिली थीं। इसके बाद जो अपनी तरफ से बनता है वो होता है स्वभाव उसे कुँवर जी ने अपनी सूरत से भी अधिक खराब बना लिया था। जब इन्होने पढ़ाई की कुँवर जी ने गाँव के बिगड़ैल लड़कों के साथ आवारगी की। इन्हे जब नौकरी मिली, कुँवर जी तब तक भाँग, गाँजा, ताड़ी लेने के आदी हो गए थे। उनके चरित्र के विषय में खबर कान में पड़ चुकी थी, लेकिन गाँव में तो बिना आग के ही धुँआ होने लगता है, यह सोच कर मैं इस बात पर ध्यान नही देती थी। कुँवर जी की सूरत और सीरत के कारण कोई लड़की वाला रिश्ता ले कर नही आता था।इस बात की चिंता शायद इन्हें भी थी। लेकिन उनकी नीचता की हद यहाँ तक होगी यह कोई नही जानता था।

ये घटना कुछ दिनों तक मेरे दिमाग से उतरी ही नही, लेकिन इन्होने अपने मौन स्नेह से धीरे-धीरे मुझे सामान्य कर दिया।

मैं अपनी सारिका में रम गई। अब तो मैं जोड़ जोड़ कर अंग्रेजी भी पढ़ लेती थी। सारिका ढाई साल की थी तब। अपनी तोतली भाषा में खूब बातें करने लगी थी वो। इन्होने मुझे सारिका से किताबी भाषा (जिसे गाँव में अड़बी तड़बी कहा जाता था) बोलने का निर्देश दे रखा था!उस दिन शाम को जब मैने उससे दूध पीने को कहा तो वो बोली "पापा हाथ छे पीना ऐ"

उसकी बोली के साथ साथ ही मेरी ढेर सारी ममता उमड़ पड़ती। मैने उसे चूमते हुए कहा "पापा तो रात में आएंगे" उसने सिर हिलाते हुए कहा "नई दल्दी आएंगे।"

वो रोज अपने पापा से जाते समय जल्दी आने का वादा लेती थी और उसके पापा अपना वादा निभाने की कोfशश भी करते थे। अब वो जितनी जल्दी हो सके अपनी बिटिया के पास आ जाते थे। आज वो पास के ही गाँव में गए थे, मुझसे भी कहा था जल्दी आने को। इसीलिए मैने सारिका को दूध पीने के लिए अधिक बार नही कहा और प्यार से उसके गाल हिला कर दूध रखने चली गई।

इन्हे जल्दी आना था, इस हिसाब से कुछ खाना बनाने की तैयारी कर रही थी तभी बाहर से शोर सुनाई दिया। मैं ड्यौढ़ी तक आई लेकिन कुछ भी समझ में नही आया कि हुआ क्या है।

ओसारे में बाबूजी के चिल्लाने की आवाज आ रही थी। वो पूरी तरह से दूसरे पर आश्रित थे। सब शोर के साथ भाग गए थे और वे अकेले चिल्ला रहे थे। मैने घूँघट खींचा और और ओसारे की चौखट पर पहुँच कर धीमे से बोली "का भै बाबू जी ? "
बाबूजी चिल्लाते हुए बोले "कुछ नाही, कुछ नाही भै। सब अईसे कहत है। क्यौ अऊर होई। अरे भगवान एतना निर्दई नाही हईन। ऊ हमरे बुढ़ापा में हम पर अईसन पहाड़ नाही गिरईहै।"

बाबू जी की सांत्वना से मैं अंदर तक सिहर गई। क्या कह रहे हैं बाबूजी ............? क्या सारिका के पापा को कुछ हो गया ? मेरा स्वयं पर से नियंत्रण छूटने लगा। मैं ओसारा पार कर के दरवाजे पर दलान में पहुँच गई। गाय भैंस की मड़ईया के पास कँहार का लड़का खड़ा था। मैने उससे पूँछा "का भै रे किसना ? "

"सब कहत हैं कि बड़का भई या के डकईत गोली मार दिहिन।"

" है S S S" और मैं अपनी सुध-बुध खो बैठी।

7 comments:

हरिराम said...

आपका क्रमशः लेखन पाठकों को बाँधे रखनेवाला है। प्राञ्जल भाषा अब बन्द हो चुकी विशिष्ट हिन्दी पत्रिका "सारिका" की कहानियों की शैली की याद ताजा कर देती है।

रवीन्द्र रंजन said...

पिछले गुरुवार को 'मुक्ति' की पहली कड़ी पढ़ने के बाद मैं तो यही सोच रहा था कि गुरुवार से पहले कंचन जी अब कुछ लिखेंगी ही नहीं। हालांकि मुझे नीचे लिखा हुआ क्रमशः शब्द अच्छा नहीं लग रहा था। फिर भी रचनाकार का निर्णय सर आंखों पर की तर्ज पर हमने उसे स्वीकार कर लिया और हम अगले गुरुवार की प्रतीक्षा करने लगे। सोचा अब अगले हफ्ते ही 'ह्दय गवाक्ष' पर जायेंगे, लेकिन यह क्या आज जब हम यहां पहुंचे तो 'मुक्ति' की तीसरी कड़ी देखकर आश्चर्यमिश्रित खुशी हुई। दूसरी कड़ी से पढ़ना शुरू किया तो पढ़ता ही गया। कई चौंकाने बातें थीं। कभी मन वात्सल्य से भर उठा तो कभी घृणा से। अगर ये कहानी सच है तो मेरी तरफ से इस कहानी की नायिका को सलाम। उम्मीद करता हूं अब आगे की दास्तां पढ़ने के लिये लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

Udan Tashtari said...

बहुत ही बढ़िया प्रवाह चल रहा है बँधा हुआ. इन्तजार है अगली कड़ी का. इसमें क्रमशः नहीं लिखा-कहीं प्रश्नों में खत्म तो नहीं हो गई??

Manish said...

बढ़िया ! जारी रखें।

महावीर said...

एक ही सांस में तीनों भाग पढ़ गया।पढ़ने के बाद कम्प्यूटर के सामने कुछ क्षणों तक स्तब्ध सा बैठा रहा जैसे मस्तिष्क को कहानी के पात्रों ने जकड़ लिया हो - और फिर जैसे अचानक से किसी झंझावात ने मस्तिष्क को झंझोड़ दिया हो। बहुत
ही प्रभावशाली कहानी है, वार्तालाप की भाषा से तो ऐसा लगने लगा जैसे हम पढ़ नहीं रहे, बल्कि साक्षात कोई घटना हमारे सामने हो रही है और हम कुछ कर नहीं पा रहे।
यह कहानी नहीं, यथार्थ है, साक्षात है।
अगले भाग की बेसबरी से प्रतीक्षा है।
महावीर

महावीर said...

हां, यदि यह अंतिम कड़ी है तो भी गहरा प्रभाव छोड़ जाती है। अंतिम पंक्ति पाठक को फिर से हास्पिटल के कमरे में ले जाती है जहां उसकी उत्सुक्ता से भरे हुए प्रश्न का उत्तर मिल जाता है।
दूसरी ओर, यदि अगले भाग शेष हैं तो दोबारा कह रहा हूं कि बेसरी से इंतज़ार है।

कंचन सिंह चौहान said...

हरिराम जी! इतनी बड़ी पत्रिका की कहानियों के साथ मेरी कहानी की तुलना करना लड़खड़ाते हुए बच्चे को ताली बजाकर चलने की प्रेरणा देने जैसा ही है। अच्छा लगा। मैं पूर्व में ही बता चुकी हूँ कि कहानी विधा पर मेमरे हाथ बहुत सधे हुए नही हैं, तथापि आप सब का प्रोत्साहन कम से कम अंत तक पहुँचाने के लिये सहायक हो जाता है। धन्यवाद!

रवीन्द्र जी आपका अंदाज़ अच्छा लगा, किसी भी रचना पर आपकी टिप्पणी, ऐसा लगता है कि उसी स्तर पर महसूस कर के की जा रही है जिस स्तर पर जा कर के रचना लिखी गई है। कोई कहानी हो या कविता कहीं न कहीं सत्य और कल्पना का सम्मिश्रण ही होते हैं। रचना समाप्त होने दीजिये आपको अपने ही इर्द गिर्द कोई नायिका नज़र आ जायेगी

उड़न तश्तरी का अंदाज़ ए बयाँ तो खैर लाजवाब है ही, मुझे बता भी दिया कि क्रमशः न लिखने की गलती पाठकों को भ्रमित कर सकती है और शिकायत भी नही हुई! धन्यवाद। अभी शुरू किया है, अपना मार्गदर्शन यूँ ही देते रहियेगा।

मनीष जी धन्यवाद!

महावीर जी! आपकी टिप्पणियाँ सदैव ही प्रेरक होती हैं। क्रमशः न लिखने के कारण जो भ्रम हुआ उसके लिये क्षमा चाहती हूँ। अपने पाठकों को इतने सारे प्रश्न दे कर छोड़ देने की धृष्टता नहीं करूँगी। हाँ कुछ सवाल तो छोड़े ही जा सकते है जनता के ऊपर, लेकिन अभी तो शायद बहुद से पात्रों के आने का कारण भी नही स्पष्ट हुआ। आगे से खयाल रखूँगी कि ऐसी त्रुटि न हो!