Thursday, August 9, 2007

मुक्ति

हास्पिटल के उस कमरे के बेड पर पड़ा वो शरीर जिसमें खून की बोतल चढ़ रही है, उसके शरीर के रोम-रोम में सुइयों का दर्द है। उसे कुछ भी नही याद। पिछली सुबह कब हुई थी, अगली शाम कब होगी! महीनों से उसे कुछ पता नही। वो सन्निपात के दौर में है। लेकिन एक चीज वो अब भी उसी तरह करता है जैसे पचीस बरस पहले..........मेरा नाम ले कर दस गालियाँ उसके मुँह से अब भी उसी तरह निकलती है और मैं पचीस बरस पहले की तरह आज भी उन गालियों के जवाब में देखने लगती हू¡ कि अब मेरी सेवा में क्या कमी रह गई है।

नही..नही! आप सभी लोग बिलकुल गलत समझ रहे है। मै कोई पतिव्रत धर्म निभाने या भारतीय नारी की आदर्शवादिता सिद्ध करने के लिए ऐसा नही करती हूँ। असल में ये वो मजबूरियाँ हैं जो अब आदत बन चुकी हैं।

मैं भी कभी अल्हड़ हुआ करती थी। कितने कम दिन के लिए पर कितना प्यारा था वो सुख। माँ बथुए तोड़ने का आदेश देती और मैं अपने खेत से दीनू चाचा के खेत तक दौड़ आती। बथुआ, पालक सोया, मेथी जो-जो मिलता, जहाँ जहाँ, मिलता, आसरे काका की सीख, कुसुमा काकी की फटकार समेत आधा सड़क पर बिखेरते, आधा अपनी चुन्नी में समेटते, दालान से आँगन तक पहुँचती तो बड़की अम्मा के चेहरे पर गुस्सा और चिंता दोनो झलक जाते,

"अरे कपड़ा सम्हाल मलिच्छिन!"

कहती हुई वो सर पर हाथ धर कर दादी को देखती हुई कहतीं, "बारह की पूरी होइ के तेरहे में लागि गईं औ भगवान
अक्किल
अबहींनौ नाही दिहिन"
और मैं ठुनकती हुई दादी की खटिया पर जा बैठती, क्योंकि वही मेरी सुरक्षित शरणस्थली थी। दादी के गले में हाथ डाल कर जब मैं उनकी तरफ शिकायत भरे लहजे में देखती तो वो तुरंत मेरी तरफ से बोल उठतीं " मेहरारुन का तो वइसे जिनगी भर अक्किल के काम करे के होत है। बाद में तो सब बिटियन के भाग एक्कै कलम से लिख्खा जात है।" कहती हुई दादी धीमे से मुस्कुरा कर बात का रूख मोड़ने की गरज से कहतीं "जब बियाह कई के आए रह्यू तो केतना कपड़ा सम्हारि लेत रह्यू तूँ "

" हमार बात तो छोड़ि दें अम्मा जी। दस के होते आपके घर मा आइ गै रहेन औ एतनी उमर में तो कूटे पीसे से लई के गिरहस्ती के सारा काम आप हमरे सिरे छोड़ि दिहे रहीं" और इसी के साथ झुँझलाहट बढ़ जाती बड़की अम्मा की "हम्मै का करेक है अइसे रहिहैं तो अपुनै भुगतिहैं।" इतना कह कर बड़की अम्मा काम करने लगतीं और मै दादी की चादर से मुँह ढक कर ऐसे पड़ जाती जैसे कुछ हुआ ही नही था।

माँ जब खाना परोस कर बुलाती तो धीमे से समझाती "काँहे रे! काँहे हम्मै सबसे बोली सुनवावत हे! तोरे उमिर के बिटिये आधा काम सम्हारि लेत हीं गिरिहस्ती के।"
मैं तुनक के खाना छोड़ देती "सुरू होइ गयू बड़की अम्मा के तरह।"
माँ फटाक से हाथ पकड़ लेतीं "अरे तो बड़की अम्मौ तोरे भलईये खातिर कहत हीं। तोसे दुई महीना बड़ी बाय मलतिया, लेकिन देख कईसे धीरा पूरा रहत है।........... अच्छा खाना न छोड़। अन्न के निरादार नाही करेक् चही। ई देख केतना बढियाँ परवर भूजे हई तोहरे खातिर।

फिर ढेरो मान-मनावन के बाद मैं खाना शुरू करती। वो मान मनावन, वो मीठी झिड़कियाँ वहीं खतम हो गईं एक बार घर से निकली तो दोबारा बुलाई भी नही गई।
कौन बड़ी दूर शादी हुई थी। चार घंटे का सफर था, वो भी बैलगाड़ी से लेकिन चार युग तक शायद कोई ना याद करे। माँ कितना प्यार करती थी। मैं गुस्से में भूखी सो जाती तो रात में मेरा पेट टटोल कर देखती। उसने सुनी तो होगी ना मेरी व्यथा-कथा। कैसे शांत रही होगी वो...... शायद उसने भी अपनी सोच को समाज के अनुसार ढाल लिया होगा! लेकिन मैं तो उसका अंश थी। मेरे विषय में वो गलत धारणा कैसे बना पाई होगी
और अगर बना भी ली होगी तो कितना कष्ट हुआ होगा उसे! शायद मुझसे अधिक उसे अपने आप से घृणा हुई होगी। इतना समझाने सिखाने के बाद भी लड़की संस्कारों से गिर गई। कितना घुट-घुट कर रही होगी वो! लोगों के ताने सिर्फ सुनती होगी और जवाब ढूँढ़ ही नही पाती होगी वो।

पता है ? बहुत खुश थी मै ये सुनकर कि मेरी शादी होगी अब। गाँव में शादी होती थी तो खूब मिठाई बनती थी। ढेरों रिश्तेदार आते थे। शामियाना डाला जाता था। वो सब अब मेरे घर में भी होगा। मेरे ससुराल से भी जेवर आएंगे। सावित्री को कितना तैयार किया गया था। मुझे भी तैयार किया जाएगा। जेवर पहनूँगी, पियरी पहनूँगी, गाना होगा। सब कुछ सोच-सोच कर खुश हो रही थी।

गेहूँ बीनने, धान कूटने, चूरा कूटने के लिए मेरे घर में अब गाँव भर की बहू-बेटियाँ इकट्ठी होने लगी थी। खूब हँसी-मजाक होता। गाने होते। मैं भी उनके साथ गाने लगती। सब खूब हँसती और बड़की अम्मा दौड़ कर मुँह पर हाथ रख देती "अरे पगलिया! गाँव भर मा हँसी करवाई का"
रिश्ते की भाभियाँ चुटकी काट कर कहतीं "अब जाइ के अमीन साहब के सुनायू आपन गीत"
मुझे उन पर खूब गुस्सा आता। अपना तो सब खूब हँस रही हैं, गा रही हैं, मैं जरा सा वही काम करती हूँ तो सब मुझ पर गुस्साने लगते हैं। अब तो दादी भी मेरे पक्ष में नही बोलती। मैं चुप-चाप अपनी कोठरी में चली जाती।

लेकिन एक बात मुझे न समझ में आती थी, इतनी खुशी के माहौल में भी माँ, दादी और अक्सर बड़की अम्मा भी अपनी आँखें क्यों पोंछती रहती हैं...? वो दिन भी आ गया जब मुझे खूब तैयार किया गया। आज की तरह ब्यूटीशियन तो नही आईं थी, लेकिन गाँव की लड़कियों और बहुओं को जितना ज्ञान था उस हिसाब से पूर्ण श्रृंगार किया गया। पहले तो खुशी हुई लेकिन जब रात भर घूँघट डाल के जाने क्या क्या करना पड़ा और उस पर नाउन थी कि जरा सा सिर उठाओ तो फिर से धँसा देती। उफ! गर्दन दर्द होने लगी थी। बड़ी अम्मा का डर न होता तो मैं तो नाउन को धक्का दे देती।

जब सवेरा हुआ तब जा कर छुट्टी मिली। दूल्हे की खूब बड़ाई हो रही थी। लड़कियाँ औरते सब उनसे खूब मजाक कर रही थी।
" ई बताएं मेहमान! आप तो इतना सुंदर हईं बकिर ई आपके भई एतना करिया कइसे होइ गईन ?"
" काले रंग पे तो सब गोपी निछावर थीं। और आप सब भी तो हमसे जादा हमारे भाई को ही निहार रही हैं।" दूल्हे का तुरंत जवाब आया।
" हे भागवान! ई तो बड़ा तेज हईन।" एक महिला का स्वर आया और कई खिलखिलाहटें मिल गई उससे।

एक दिन जनवासा रोकने के बाद तीसरे दिन विदाई हो गई। मेरे साथ कई बक्से जा रहे थे। मैं खुश थी कि अभी मुझे डोली में बैठाया जाएगा। कँहार मुझे उठा के दूसरे गाँव में ले जाएंगे। मैने तो गाँव के दूसरे टोलों के अलावा कुछ देखा ही नही था। आज घूमने को मिलेगा। माँ आई और मुझे पकड़ कर चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगी। उसे चुप कराने जो भी आया वही अविरल आँसुओं के संग आया इतनी रूलाई देख कर मुझे भी रोना आ गया। छोटे बच्चे भी तो मा को रोता देख कर बिना कारण समझे रोने लगते हैं। बस उसी तरह।

फिर मैं ससुराल आ गई। पता नही कैसे ? लेकिन उसी दिन शायद मैं बड़ी हो गई। यहाँ भी वही भीड़ भाड़ थी जो मैं मायके में अभी छोड़ कर आ रही थी। लेकिन यहा¡ सब अपरिचित थे। वहाँ गाँव के भी लोग अपने लगते थे, यहाँ घर के भी लोग पराए लग रहे थे। कौन रिश्तेदार है? कौन गाँव का? कौन परिवार का ? कुछ पता ही नही चल रहा था। मैं घूँघटमें मशीन की तरह सब कुछ करती जा रही थी। सबको जल्दी थी दूल्हन देखने की। घूँघट खोलने के बाद अलग अलग तरह की आवाजें आतीं। कोई कहता "दुलहा दुलहिन के जोड़ा बढ़िया लाग है।" तो कोई आवाज आती "ठीक तो भऊज्यू हईं बकिर हमरे भईया यस नाही हईं" अगली बार घूँघट उठता तो आवाज आती "दुलहिनिया लड़िका से इक्कीसे पड़ी उन्नीस नाही।"
जितने लोग उतनी प्रतिक्रियाएं। इससे पहले मैं कभी डरी नही थी।आज मुझे इन सब लोगों से डर लगने लगा था।

फिर शुरू हुआ मेरे जेवरों और मेरे बक्सों का जायजा। "सीकड़ केतना हलकी बाय। "
"दुलहिन तोहार बाप यस सुनार कहाँ पाइ गइन जे एतना हल्लुक सीकड़ बनाइ दे।"
"सास के लिए जौन साड़ी आए बा ऊ तो जैसे परजौती होय।"

आँखें के आगे तो घूँघट का पर्दा था और कान में तरह तरह के तानों की आवाज। रात होते-होते मैं रोने लगी। आज मैं सचमुच रोई थी। दु:खी हो कर कैसे रोया जाता है, मुझे आज पता चला था और इसके बाद तो वो सिलसिला बन गया।

धीरे-धीरे घर खाली होने लगा। घर में बचे लोग थे, मेरी सास( जो मेरी दादी से कुछ ही कम उम्र की थी ), मेरे ससुर( जो मेरी दादी से भी अधिक उम्र के थे ) मेरे पति जिनको मैं बहुत दिनों बाद शकल से पहचान पाई (क्यों कि वो जब आते तो कमरे की ढिबरी बुझ गई होती थी और सुबह उजाला होने के पहले वो दरवाजे पर पहुँच गए होते थे) और एक मेरे देवर थे (जो मुझसे करीब ५-६ साल बड़े होंगे)

ससुर मेरे बीमार ही थे। उनकी पूरी सेवा मेरी सास को करनी होती थी। लेकिन अचानक सास भी बीमार पड़ गईं। सास के रहते मुझे काम भले ही करने पड़ते थे लेकिन जिम्मेदारी कुछ खास नही पड़ी थी। लेकिन उनके बीमार पड़ने के साथ ही काम तो दोगुना बढ़ा ही जिम्मेदारियाँ भी आ गई। अम्मा जी को फालिज का अटैक पड़ा था। वे पूरी तरह बिस्तर पर पड़ गईं थीं। पिता जी तो पहले ही दमा के कारण अपना ही काम बड़ी मुश्किल से कर पाते थे। मैने तीन महीने तक अम्मा जी की अपने हिसाब से भरपूर सेवा की लेकिन उनका खाना छूटता चला गया और एक दिन वो शरीर भी छोड़ गईं।

पति देव माँ और पिता जी की सेवा के कारण अब घर में समय देने लगे थे। अब मेरा भी परिचय उनसे बढ़ चुका था। मेरी झिझक भी उनसे खुल चुकी थी क्योंकि इधर कुछ भी अम्मा जी के माध्यम से न कहला कर स्वयं कहना होता था।

अम्मा जी के जाने के बाद ही मुझे पता चला( बल्कि पड़ोस की काकी ने बताया) कि मुझमें कोई जीव पलने लगा है। अब तो याद भी नही कि उस समय कोई खुशी या उत्साह हुआ भी था या नही। लेकन ये याद है कि सारिका हुई तो मुझे जो खुशी मिली वो मेरी जिंदगी की पहली खुशी थी, याद तो ऐसा ही आ रहा है कि शायद आखिरी भी थी।

क्रमशः
फिर मिलिये अगले गुरुवार …..!

5 comments:

रवीन्द्र रंजन said...

सच्ची कहानी को बहुत ही सुरूचिपूर्ण तरीके से बयां किया है आपने, बस एक चीज पसंद नहीं आई। वो है नीचे लिखा हुआ एक शब्द क्रमशः, बहरहाल हम अगली कड़ी का इंतजार कर रहे हैं।

manish said...

कहानी की लंबाई एक भाग में छोटी रखें और हफ़्ते के बदले हर दो या तीन दिन में अगला भाग प्रकाशित करें।

कंचन सिंह चौहान said...

मनीष जी एवं रवीन्द्र जी! एवं इस कहानी को पढ़ने आने वाले सभी स्वजनों से सर्वप्रथम तो यह बात स्वीकारते हुए क्षमा माँगती हूँ कि कहानी लिखने में मुझे बहुत कुशलता नही हासिल है, फिर भी अपने इर्द गिर्द के समाज में हुए कुछ ऐसे घटनाक्रम जिन्होने आत्मा को छू लिया उन्हे अपने शब्दों मे बयाँ करने की धृष्टता ही है जो मैने कर दी, इस को क्षमा करते हुए भावों पर जाइयेगा!

मनीष जी भविष्य में आपकी सलाह के अनुसार ही संपकद करूँगी! धन्यवाद!

Udan Tashtari said...

बहुत अच्छी कहानी बन पड़ी है.

बाकी हमारी बात मनीष भाई कह चुके हैं और आपने सुन भी ली है. :)

कंचन सिंह चौहान said...

धन्यवाद जी! मशवरे का शुक्रिया!