Wednesday, August 22, 2007

मुक्ति भाग‍ -५

मैं आगे बढ़ कर पीछे के रास्ते निकली और पड़ोस का पिछला दरवाजा खटखटाने लगी गाँवों के लिये तो उस समय आधी रात का समय था। एक अधेड़ उम्र की महिला ने दरवाजा खोला। मैने उन्हे देखते ही सारिका को उनके पैरों पर रख दिया।

"चाची जिऊ ! एकर जिनगी बचाइ लें।"

" का भै ?"

" हमरे इजती पे आइ गै है चाची जिऊ ! कुँवर जी हम्मै बरबाद करै चाहत हिन। हमसे ई पाप नाही होई। हम तो मरे के तैयार हई चाची जिऊ ! बकिर एकर का करी ? हम्मै अपने घर के एक कोना में जगह दइ दीन जाये। आपके हियाँ मजूरी कइ के हम आपन औ यह बिटिया के पेट पालि लेब। एकर जिनगी बनि जाये, फिर हम कहूँ कुँआ ईनार लई लेब।" कहते हुए मैने उनके पैर पकड़ लिये थे। लेकिन जिस पर दीन दयालु ईश्वर को दया नही आई उस पर ला सामान्य मनुष्य को दया क्यों आती ?

चाची जी ने मुझे बरे प्यार से समझा दिया था " देखा दुलहिन ! ई पट्टीदारी के मामला बाय। काल्हि के पूरा गाँव कही कि हम तोहरे आदमी के जमीनी के खातिर तुहैं अपने घर में राखे हई। तोहरे कुँवर ज्यू से बिना मतलबै मे दुश्मनी होइ जाई। नीक होई कि घर के बात घर हि मे सुलझाइ ल्या।"

मेरे लिये सारे दरवाजे बंद हो चुके थे। मैं पीछे के ही रास्ते से फिर से आ गई। आँगन में पहुँची तो सामने ही कुँवर जी खड़े थे। आँखे लाल थीं। जो इस बात का परिचायक थीं कि शराब की कई बोतलें खाली हो चुकी हैं। उन्होने मेरी बाँहें पकड़ते हुए मुझे घसीटा। " हमरे साथ रहे में तोर इज्जत जात है, आधी रात में दुसरे के घरे मुँह मारत तोर इज्जत नाही जात।"

उन्होने सारिका को एक कमरे में बंद कर दिया..... वो चीखती रही...... और फिर मेरे साथ क्या हुआ......? नही !...नही...! मैं आज भी वो नही बता पाऊँगी। जो मैं झेल गई वो मैं कह नही पाऊँगी...! वो मैं याद भी नही कर पाती हूँ ..... और एक क्षण को भी मेरी जिंदगी उससे मुक्त भी नही हो पाती। आज २५ साल बाद भी वो ज़ख्म छुआ जाता है तो उतना ही तेज दर्द होता है।

उस वक्त भी ऐसा नही था कि मैं सब सामान्य रूप से सह गई थी। बहुत विरोध किया था। बहुत छटपटाई थी। लेकिन क्या तड़फती मछली को देख कर खाने वालों को उस पर दया आती है....? उन्हे तो बस उसके स्वाद से मतलब होता है। बस आत्मतृप्ति से...........!

अपने ही शरीर से नफरत हो गई थी मुझे। एक एक अंग काट कर फेंक देने का मन होता था। लेकिन बस..... बस मन ही होता था.....कर नही पाई कुछ भी। कौन विश्वास करता मेरा ? सबके लिये तो बस ए चटकारे दार खबर थी, " अमीन के मेहरारू अपने देवरे पे बइठि गईं।" कैसे पिघले शीशे जैसा वाक्य था। वो चाची जी जिन्होने एक रात का भी सहारा नही दिया था उन्होने कितने चाव से घोर कलजुग की ये गाथा पूरे गाँव को सुनाई थी।

"अरे अईसन जवानी आगि लागे बहिनी ! मर्दे के मरे के सालौ पूर होये के इंतिजार नाही किहीं।"

" अरे बियाह तो खाली नाव के लिये है, सुन्यू नाही सरिकवा के जोड़ा लागे के तईयारी होत बाय।"

मैं कैसे बताती ? किसे बताती ? कि ये रिश्ता बनाना तो मेरी मजबूरी थी। मुझे पता चला कि मैं गर्भवती हूँ तो मैं क्या करती ? मैं घर में कितने दिन तक बच कर रह सकती थी ? सारिका आज छोटी थी कल बड़ी होगी तो मैं क्या जवाब दूँगी ? इस लिये शादी का नाम इस रिश्ते को देना मेरी मजबूरी थी। मैं किस रूप में विख्यात थी मुझे पता था। लेकिन मेरे पास कोई रास्ता भी नही था।

समय बदल रहा था लेकिन मेरी किस्मत नही बदल रही थी। शारीरिक शोषण और साथ में शारीरिक प्रताड़ना मेरी रोज की जिंदगी में शामिल हो चुके थे। मुझे सब कुछ मौन हो कर सहना था।

सारिका पे मैं अपना सारा प्यार लुटा देना चाहती थी। वहीं संजीव मेरी कोख से जन्म लेने के बावजूद मेरे लिये सौतेला हो गया था। उसके साथ मैं उतना ही कर पाती थी जितना मेरा कर्त्तव्य होता था। लेकिन सारिका का उसे खूब स्नेह मिलता था और वो व्यक्ति जो अब मेरा पति था वो तो पता नही किस धातु से बना था उसका स्नेह न सारिका पर था, न संजीव पर और मुझ पर तो सवाल ही नही था। उसे मतलब था सिर्फ अपनी जरूरतों से।

सारिका बहुत कुशाग्र बुद्धि की थी। हर क्षेत्र में आगे। शुरू में उसे गाँव के पास के एक स्कूल में डाला गया। फिर वो सरकार की तरफ से स्कॉलरशिप पाने लगी। वो अपनी व्यवस्था खुद ही कर लेती थी। बहुत छोटी उम्र में ही बड़ी हो गई थी वो। कहाँ पढ़ना है ? क्या पढ़ना है ? वो खुद ही कर लेती थी और साथ में संजीव की भी व्यवस्था बना लेती थी। संजीव के लिये माँ का दिल तो उसके पास ही था। मुझे सारिका से अवकाश मिला तो मैने खुद को धर्म में व्यस्त कर लिया। दुःखों से निपटने का शायद इससे सरल उपाय कोई नही है। सब कुछ सहना आदत बन जाता है, स सह कर भी संतुष्टि बनी रहती है।

सारिका अब २० वर्ष की हो गई थी और संजीव १६ का। जीवन धीरे धीरे ऐसी नदी बन गया था, जिसमें पत्थरों के पड़ने से भी हलचल नही होती थी। लेकिन अचानक फिर हलचल हुई, जब सारिका कॉलेज से आई और मुझसे बिना कुछ बात किये ही जा कर अपने कमरे में लेट गई। मैने उसे खाना खाने के लिये बुलाया, लेकिन वो नही आई। मैं खाना ले कर उसके कमरे में गई लेकिन वो नही उठी। मैने लाड़ से उसे उठाना चाहा तो उसने मुँह फेर लिया। सारिका ऐसी थी ही नही। वो बहुत समझदार थी मुझे कुछ समझ में नही आ रहा था। लेकिन जल्द ही समझ में आ गया जब वो अचानक उठी और मुझसे पूँछा " मेरे पापा कौन हैं माँ..? "

क्रमशः

4 comments:

महावीर said...

आंखें नम होती जा रही हैं और मानव जाति पर रोष! इसे 'कहानी' कहने में झिझकता हूं। पढ़ते पढ़ते जीता जागता चित्र सामने आजाता है। सारिका को क्या कहा जाएगा, क्या होगा ? इंतज़ार है!!

Manish said...

अभी क्या कहूँ अंत की प्रतीक्षा है !

रवीन्द्र रंजन said...

सारिका के सवाल का जवाब देना कितना मुश्किल है यह आसानी से समझा जा सकता है। कहानी काफी हद तक हमारे समाज की वास्तविकता और उस समाज के लोगों की दोमुंही सोच को सामने रखती प्रतीत हो रही है।

अजित वडनेरकर said...

जारी रखिये... बधाई