Monday, September 27, 2010

नया तो तब हो "गर तुम लौट आओ.....!!"


लोग कहते हैं कि
अब मेरे लिखने में नही रही वो बात जो पहले थी।
कैसे बताऊँ उन्हे,
कि लिखना तो दर्द से होता है।
और मेरा दर्द तो बहुत पुराना हो गया है अब,
इतना ....
कि अब ये दर्द हो गया है साँसों की तरह सहज और अनायास।

चाहे जितनी भी असह्य पीड़ा हो,
आप कितनी देर तक चिल्ला सकते हैं उस पीड़ा से ?
कितनी तरह से कराह सकते हैं ?

अपनी पीड़ा व्यक्त करने के सारे के सारे तरीके तो कर चुकी हूँ इस्तेमाल।
कराहने के लिये प्रयुक्त हर शब्द तो चुकी हूँ उचार।
कितनी कितनी बार......!
कितनी कितनी तरह......!

और अब दर्द पहुँच गया है उस मुकाम पर,
जहाँ कुछ कहने से बेहतर चुप रहना लगता है !
या शायद कहूँ तो क्या ?
कुछ है भी तो नही नया......!!

सुनो....!!


अगर सुन रहे हो,


तो तुम्ही से कह रही हूँ
नया तो तब हो "गर तुम लौट आओ.....!!"



तमन्ना फिर मचल जाये अगर तुम मिलने आ जाओ

35 comments:

संजय भास्कर said...

bahut pyaree chanchal see kavita....

संजय भास्कर said...

कंचन सिंह जी
बहुत दिनों बाद इतनी बढ़िया कविता पड़ने को मिली........ गजब का लिखा है

Anjana (Gudia) said...

दिल को छू गयी आप की कविता...

अजय कुमार said...

सुंदर भाव

Arvind Mishra said...

सहसा यह भी टीस सी उठी -जाग दर्दे इश्क जाग दिल को बेकरार कर !

Udan Tashtari said...

क्या बात है...फिर वो गज़ल!! ओह!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

वाकई .नया तो तब हो जब तुम लौट आओ ...खूबसूरत रचना ..

गजेन्द्र सिंह said...

सुंदर भाव ..... खूबसूरत रचना ..
बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने .......

पढ़िए और मुस्कुराइए :-
आप ही बताये कैसे पार की जाये नदी ?

पारूल said...

ये मौसम भी बदल जाये ....

ग़ज़ब

वन्दना said...

नया तो तब हो "गर तुम लौट आओ.....!!"

क्या बात कह दी………………और उतनी ही सहजता से कह दी……………बहुत सुन्दर्।

अनिल कान्त : said...

अंत में आते-आते भीतरी मन को इस तरह स्पर्श कर जाती है कविता ...कि...

रंजना said...

और अब दर्द पहुँच गया है उस मुकाम पर,
जहाँ कुछ कहने से बेहतर चुप रहना लगता है !

...........
अब
क्या कहूँ....

Archana said...

मैं चुप हूँ...

निर्मला कपिला said...

तो तुम्ही से कह रही हूँ
नया तो तब हो "गर तुम लौट आओ.....!!"
बस यही तो मुश्किल है--- कुछ लोग लौट आने के लिये नही जाते उनका क्या करें। मार्मिक अभिव्यक्ति। शुभकामनायें।

Manish Kumar said...

ग़ज़ल तो मेरी पसंदीदा है ही कविता में व्यक्त विचारों से भी सहमति है..दर्द के बिना सृजन वो असर नहीं ला पाता लेखन में..

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर अभिव्‍यक्ति !!

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

Kusum Thakur said...

"और अब दर्द पहुँच गया है उस मुकाम पर,
जहाँ कुछ कहने से बेहतर चुप रहना लगता है "
बहुत सुन्दर ....

शरद कोकास said...

इसमे कुछ बात तो है ।

अंकित "सफ़र" said...

कुछ कहने को नहीं बन रहा है.............

mridula pradhan said...

behad sunder.wah.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

भावनाओं की अतिवृष्टि कराती कविता। बधाई।
................
…ब्लॉग चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।

आर्जव said...

दर्द बस एक ही तरह का हो सकता है क्या ?
क्यॊं न एक "निरपेक्ष दर्द" की संकल्पना करें !!!!!!!!!

VIJAY KUMAR VERMA said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना .... प्रस्तुति के लिए बधाई
मजा आ गया पढ़कर

Umra Quaidi said...

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

http://umraquaidi.blogspot.com/

उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”

manu said...

achchhi kavitaa likhi hai...

jaane kaise likh di...?

manu said...

achchhi kavitaa likhi hai...

jaane kaise likh di......?

उस्ताद जी said...

5.5/10


एक ऐसी सहज और साधारण कविता जिसकी
गूँज गहरी है. अच्छी पोस्ट.
नोट : पीड़ा भरे स्वर की निरंतरता अक्सर सामने वाले के एहसास और संवेदना को ख़त्म कर देती है. चुप रहने से जो पीड़ा व्यक्त होती है उसका असर बहुत ज्यादा समय के लिए होता है.

जयकृष्ण राय तुषार said...

very nice

Anonymous said...

kanchanji,nam kevanuroop hi kavita me bavon ki chamak hai.
santosh pandey
sarerang.blogspot.com

स्वाति said...

और अब दर्द पहुँच गया है उस मुकाम पर,
जहाँ कुछ कहने से बेहतर चुप रहना लगता है !

Rashmi savita @ IITR said...

कितनी कितनी बार......!
कितनी कितनी तरह......!
इन शब्दों में अभिव्यक्ति के सामर्थ्य कि सीमा साफ़ दिखाई पद रही है ...
...aap toh hamesha hi achha likhti ho Di!....hoping to meet u soon ...at this time @ ur aashiyana :)

muskan said...

Bahut Sundar...

गौतम राजरिशी said...

ये पोस्ट जाने कैसे छूट गयी थी...पढ़ा तो लगा कि ऐसा ही कुछ तो मैं भी लिखना चाहता था।

लेबल में "अकविता" की घोषणा क्यों मगर? आजकल तो यही कविता है, सिस ।

परावाणी : Aravind Pandey: said...

..........यह कवित्व ही है जो घने अन्धकार में भी प्रकाश का विश्वास बनाए रखता है...और शांत होकर, प्रकाश की प्रतीक्षा कर सकता है.इसलिए कवि की सत्ता सार्वभौम एवं सर्वोच्च है......