Tuesday, February 24, 2009

दिल्ली ६ मेरी नज़र से


अभिषेक बच्चन कुल मिला कर अच्छे ही लगते हैं हमको और कोशिश होती है कि उनकी फिल्में देख ही ली जाये, मगर ऐसा भी नही है कि सारी फिल्म उनकी देखी ही है मैने..!

फिलहाल भूमिका बना रही हूँ दिल्ली 6 की, जो कि मैने २१ फरवरी को निपटाई। रंग दे बसंती का जो राकेश ओम प्रकाश मेहरा प्रभाव था, उसके कारण देर नही करना चाह रही थी, फिल्म देखने में और ये भी जानती थी कि अगले हफ्ते शायद देख भी ना पाऊँ। यूँ बहुत अच्छे रिव्यू नही आ रहे हैं फिल्म के विषय में, पर मुझे पता नही क्यों बहुत अच्छी लगी।

शुरुआत में ही दिल्ली के मोहल्ले का जो माहौल दिखाया गया, वो शायद अब दिल्ली में भी न हो और कानपुर में भी नही। लेकिन मुझे अपने कानपुर का मोहल्ला याद आ गया।

रोशन कहता है कि यूँ तो दादी अपनो को छोड़ कर आ गई हैं, लेकिन यहाँ कौन अपना नही है ये पता नही चल रहा। वाक़ई यही माहौल तो होता है मोहल्लों का। जहाँ ज़रा ज़रा सी बात पर झगड़े भी जम कर होते हैं और जरा सा दुख पड़ने पर सब सबके लिये हाज़िर भी उसी शिद्दत से होते हैं। आज जब अपने ही शहर के रिश्तेदार खाना नही भेज पाते अपनी रफ्तार वाली जिंदगी में,तब वो माहौल याद आता है, जब पिता जी के न रहने पर हर घर से १० दिन तक चाय, पानी, खाना आता रहता था। हॉस्पिटल में रहने वालों का,खाना पहुँचाने वालों का ताँता। कोई भईया, कोई चाचा, कोई बुआ और सब में स्नेह। मुझे अपना कानपुर याद आ गया, जो अब ऐसा नही रहा। सब कुछ बदल गया, फिर भी औरो की अपेक्षा अच्छा है। अब में भी त्योहारों में ही पहुँचती हूँ और छूटे लोग भी, तो फिर उतने दिन वही माहौल हो जाता है।

इण्टरवल तक ये परिचय और छोटे छोटे घटनाक्रम ही चलते रहे। हालाँकि लंच में भाजे ने कहा कि मौसी अभी तक कुछ स्टोरी नही बनी। लेकिन मैं तो अब तक स्टोरी में पहुँची भी नही थी। फिर भी मैने कहा रंग दे बसंती में भी सेकंड हाफ में ही कहानी बनती है। अब शुरू होगी। और कहानी बाद में ही बनी भी।

फिल्म इस लिये भी बहुत पसंद आई, क्योंकि छोटे छोटे कई संदेश दे गई ये। छुआछूत....! जलेबी जो कहती है उसकी भाषा थोड़ी ठेठ हैलेकिन सच है। ठाकुर साहब या पंडित जी की मिस्ट्रेस भले नीच जाति की हो, लेकिन छूना वर्ज्य है उसका। ये बात बहुत बार मैं खुद भी सोच चुकी हूँ। अभी हाल में रास्ते की उस पागल औरत को देख कर भी जिसके शरीर के नुचे कपड़ों पर एक लिहाफ डालते सबको घृणा आ रही थी, मगर उसके कपड़े जब नुचे तब वो घृणा पता नही कहाँ थी। उस दिन आँखें बंद करो तो वही दृश्य घूम जाता, बंद आँखों में

धार्मिक दंगे....! पता नही कौन करता है, ये दंगे। जब दीवाली आती है, तब फुलझड़ियाँ मेंहदी हसन हमसे ज्यादा खरीदता है, जब होली आती है, तो हम अगर काम में व्यस्त हों तो तहसीन भाभी रंग लगाने पहले पहुँच जाती हैं। ईद पर हम अपनी सब से नई ड्रेस पहन कर सिंवईया खाने निकलते हैं...! मगर ये दंगे...??? ये एक दिन में ऐसा क्या कर देते हैं कि अपने घर में,अपनों के बीच हम असुरक्षित हो जाते हैं। हनुमान भक्त मंदू दादी के बीमार होने पर मुस्लिम होते हुए भी उन्हे हनुमान जी का झण्डा हाथ पर बाँधता है। मगर दंगा होने पर वो दोस्त जिसका कहना था कि मंदू की दुकान मेरी दुकान, वही आग लगा देता है....! मंदू का रिऐक्शन काबिल ए तारीफ है।

काला बंदर जैसी चीजें भी अक्सर आ ही जाती हैं। अभी हाल में मुँह नोचवा चला था सिद्धार्थनगर, बस्ती में जितने लोग उतनी अफवाह...!सब ने देखा लेकिन किसी ने भी नही देखा...!

साथ में एक सीख कि काला बंदर हम में ही कहीं है....! मेरी व्तक्तिगत रॉय है कि फिल्म का समाज पर असर पड़ता है। आज जब फिल्मों में रिआलिटी के नाम पर सब सब कुछ जायज जैसी चीजें चीजें दिखाते हैं तब आम जनता पर कहीं न कहीं असर ये आता है कि "यार ये तो ह्यूमन साईकॉलॉजी है, फलाँ फिल्म मे देखो कितना सही दिखाया गया था।"

फिल्म के दो गीत जो मुझे बहुत पसंद आये। दोनो ही बिलकुल अलग मूड के हैं। एकभक्ति भावना से सराबोर...! दूसरा ससुराल पहुँची नवोढ़ा की चुहल...! पहले सुनिये ये गीत जिसमें आवाज़े हैं जावेद अली, कैलाश खेर और कोरस की और संगीत रहमान का, स्वर शायद प्रसून जोशी ने दिया है लेकिन इस विषय में मैं बहुत निश्चित नही हूँ, यदि कोई सज्जन जाने तो कृपया सही कर दें। इस गीत को सुनने के बाद सच में बहुत सुकूँ मिलता है मुझे।


अर्जियाँ सारी चेहरे पे मै लिख के लाया हूँ,
तुम से क्या माँगूँ मैं.
तुम खुद ही समझ लो मौला

मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
दरारें दरारें है माथे पे मौला
मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला

तेरे दर पे झुका हूं मिटा हूँ, बना हूँ
मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला
मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला

(जो भी तेरे दर आया,झुकने जो भी सर आया,
मस्तियाँ पिये सबको झूमता नज़र आया ) -2
प्यास ले के आया था, दरिया वो भर लाया
नूर की बारिश में भीगता सा तर आया
नूर की बारिश में भीगता सा तर आया

मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
दरारें दरारें है माथे पे मौला
मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला
(जो भी तेरे दर आया,झुकने जो भी सर आया,
मस्तियाँ पिये सबको झूमता नज़र आया ) -2

(एक खुशबू आती थी)-2
मैं भटकता जाता था, रेशमी सी माया थी
और मैं भटकता जाता था
(जब तेरी गली आया, सच तब ही नज़र आया)-2
मुझमे वो खुशबू थी, जिससे तूने मिलवाया
मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
दरारें दरारें है माथे पे मौला
मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला

टूट के बिखरना मुझको ज़रूर आता है
टूट के बिखरना मुझको ज़रूर आता है
पर ना इबादत वाला शऊर आता है
सज़दे में रहने दो, अब कहीं ना जाऊँगा
अब जो तुमने ठुकराया तो सँवर ना पाऊँगा
मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
दरारें दरारें है माथे पे मौला
मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला

सर उठा के मैने तो कितनी ख्वाहिशें की थीं
कितने ख्वाब देखे थे, कितनी कोशिशें की थीं
जब तू रूबरू आया
जब तू रूबरू आया, नज़रें ना मिला पाया
सर झुका के एक पल में ओऽऽऽऽऽऽ
सर झुका के एक पल में मैने क्या नही पाया
मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
दरारें दरारें है माथे पे मौला
मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला
(मोरा पिया घर आया, मोरा पिया घर आया)-2
मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मेरे मौला
दरारें दरारें है माथे पे मौला
मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला


और दूसरा ये गीत जो कि माटी की खुशबू लिये हुए है और मुझे इस तरह के लोकगीत पसंद भी बहुत हैं। इस गीत के लिरिक्स का श्रेय कैसेट में किसी को नही दिया गया है। ये एक लोकगीत है जिसमें रहमान जी ने संगीत की थोड़ी बहुत फेरबदल के बाद बहुर सुंदर बना दिया है। इसक खूबी ये भी है कि बड़ी बिटिया नेहा की शादी तय होने के बाद छोटी सौम्या इसे गा कर दिन भर उसे छेड़ती है और बड़ी को जबर्दस्ती शर्माने की ऐक्टिंग करनी पड़ती है :) इस में आवाजें रेखा भारद्वाज, श्रद्धा पंडित, सुजाता मजूमदार और कोरस की है





ओओ ओओ ओओ ओओ
ओय होय होय ओय होय होय
ओय होय होय ओय होय होय
सईयाँ छैड़ देवै, ननद जी चुटकी लेवै
ससुराल गेंदा फूल
सास गारी देवै, देवर समझा लेवै
ससुराल गेंदा फूल
छोड़ा बाबुल का आँगन भावे डेरा पिया का होऽऽऽ
सास गारी देवै, देवर समझा लेवै
ससुराल गेंदा फूल
सईयाँ है व्यापारी, चले हैं परदेस,
सुरतिया निहारूँ, जियरा भारी होवे
ससुराल गेंदा फूल
सास गारी देवै, देवर समझा लेवै
ससुराल गेंदा फूल
सईयाँ छैड़ देवै, ननद जी चुटकी लेवै
ससुराल गेंदा फूल
छोड़ा बाबुल का आँगन भावे डेरा पिया का होऽऽऽ
बुशट पहिने खाइ के बीड़ा पान
पूरे रायपुर से अलग है सईयाँ जी की शान
ससुराल गेंदा फूल
सास गारी देवै, देवर समझा लेवै
ससुराल गेंदा फूल
सईयाँ छैड़ देवै, ननद जी चुटकी लेवै
ससुराल गेंदा फूल
छोड़ा बाबुल का आँगन भावे डेरा पिया का होऽऽऽ
ओय होय होय ओय होय होय
ओय होय होय ओय होय होय
ओय होय होय ओय होय होय
ओय होय होय ओय होय होय
ओओ ओओ ओओ ओओ


मुझे पता है इस गीत को सुनने में बहुत समय देना पड़ेगा. ऐसा कोई ज़रूरी भी नही है कि आप सुनें जरूर। कभी फिर सुन लीजियेगा, जब समय हो या कहीं और सुनाई दे रहा हो। मैने तो बस अपनी डायरी मेनटेन की है, ताकि सनद रहे :)

26 comments:

दिगम्बर नासवा said...

सुन्दर व्याख्या है दिली ६ की, मैंने भी ये फिल्म देखी और मुझे भी लगताहै छोटी छोटी सामाजिक बातों को अच्छी प्रभावी तरीके से उठाया है इस फिल्म में. शूटिंग जयपुर की है ऐसा सुनने में आया है. ससुराल गेंदा फूल............गीत बहुत ही मनमोहक है, अच्छा लगता है

कुश said...

राकेश मेहरा मुझे कई बार इनस्पाइर भी करते है.. उनकी रंग डे बसंती एक कालजयी कृति है.. पर मैं दिल्ली 6 को उसके आस पास भी नही देखता.. राकेश मेहरा के नाम की उत्सुकता मुझे फिल्म की और खींच ले गयी.. पर मुझे फिल्म में वो बात नज़र नही आई जो मैं एक्सपेक्ट कर रहा था.. हो सकता है मैने उम्मीद ज़्यादा लगा ली..

मैने आमिर को पढ़ा था अहा! ज़िंदगी में.. जब उनसे उनकी फिल्म तारे ज़मीन पर के बारे में पूछा गया था.. आयेमिर का कहना था की अगर मुझे शिक्षा देनी है लोगो को तो मैं स्कूल खोलूँगा.. पर अगर फिल्म बना रहा हू तो मैं पहले लोगो का मनोरंजन करूँगा.. रंग डे बसंती भी कुछ इसी तरह की फिल्म थी.. उस फिल्म से एक संदेश लोगो को जाता है.. पर दिल्ली 6 शायद संदेश देने के लिए ही बनी है..

एक थॉट था राकेश मेहरा के पास की एक व्यक्ति बंदर बन कर दंगा रोक देता है.. जिसके लिए उन्होने पूरी फिल्म की कहानी लिखी.. सिनेमाई दृष्टि से ये कदम अधिक सराहनीय नही है.. कुछ सीन देखकर मुझे नही लगा की मैं राकेश मेहरा की फिल्म देख रहा हू..

हालाँकि फिल्म के एक गाने में चाँदनी चॉक को अमेरिका में दिखाए जाने वाली कल्पना के लिए मैं राकेश मेहरा को दाद देता हू.. और जैसा आपने लिखा.. कौन अपना कौन पराया वाली लाइन मुझे भी बहुत पसंद आई थी..

हालाँकि एक और बात थी जिसने मुझे प्रभावित किया कि.. इस फिल्म कि शूटिंग जयपुर के पास सांभर में हुई थी और फिल्म देखते वक़्त सांभर और चाँदनी चॉक में कोई खास फ़र्क़ नज़र नही आया..

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका संगीत है.. जो फिल्म को आगे बढ़ाता है.. अब समझ में आ रहा है राकेश मेहरा ने फिल्म पूरी होने के बाद क्यो रहमान से कहा था कुछ मिसिंग है.. और रहमान ने मेहरा को मस्सकली दिया...

मुंहफट said...

बहुत अच्छी लगी...अच्छी है भी. आज कल अमेरिका तक धूम मचा रही है. वैसे आपने और कुश ने काफी कुछ लिख मारा है. खूब डूब कर लिखा है. थोक में पढ़वाने के लिए बधाई.

Udan Tashtari said...

समीक्षा के दृष्टिकोण से बेहतरीन लिखा है अपना पक्ष. चलो, अच्छा हुआ आपको पसंद आई वरना तो मेहरा जी का दिवाला ही पिट लेता. :)

neeshoo said...

दिल्ली-६ मैंने भी देखी और कुलमिलाकर फिल्म को एक बार देखा जा सकता है । यह मेरी राय है । वैसे फिल्म मेहरा साहब की थी इसलिए उम्मीद भी ज्यादा ही की गयी । सोनम कपूर का अभिनय प्राकृतिक लगा । संगीत लाजवाब है जैसा की आपने लिखा है । पहले हाफ में फिल्म दर्शकों को समेटने में सफल नहीं रही है यह बात सही है पर दूसरे हाफ में अच्छी वापसी की है । कुल मिलाकर अच्छा कहा जा सकता है ।

विनय said...

हमने अभी देखी नहीं अगले रविवार देखेंगे, अब आपने इतनी तारीफ़ जो कर दी है!

Kishore Choudhary said...

बहुत अच्छी समीक्षा लिखी है फिल्म जितनी ही सुन्दर, बधाई

रौशन said...

ये फिल्म हमने कुश के ही कहने पर देखी आज ही. कुश ने सही ही कहा जैसा राकेश ओमप्रकाश मेहरा से उम्मीद थी वैसी नहीं थी पर ठीक ही थी.
सबसे अच्छा हमें गोबर का कथन लगा कि जिस दिन दस का एक नोट लेने लग गया एक एक के दो सिक्के भी मिलने बंद हो जायेंगे.
संगीत वाकई अच्छा है

ताऊ रामपुरिया said...

अच्छी समीक्षा की आपने. हम तो अभी देख नही पाये हैं पर आप कह रही हैं तो बेहतर होनी चाहिये. समय मिला तो अवश्य देखेंगे.

रामराम.

डॉ .अनुराग said...

आइना लेकर दिल्ली की गलियों में घूमता फ़कीर .....कुछ देर पहले जो चेहरे अच्छे दिखते है धर्म का लबादा ओड़ते ही वे कुरूप दिखने लगते है ...रामलीला रोककर कुर्सी पर बैठी राजनीति...पुलिस ओर मीडिया का चेहरा ....राम लीला बाहर सुनते एक जाति के लोग...
दरअसल हम सब ऐसे ही है ..कुछ चीजे जान बूझ कर इग्नोर कर देते है ओर कुछ चीजों को जान बूझकर अपनी दृष्टि से देखने की कोशिश करते है... रंग दे बसंती के बाद से मेरी उम्मीदे ओर ज्यादा थी ....लेकिन भारतीय निर्देशक की समस्या यही है वो जब तक सिम्पलीफाइंड होकर एक्स्प्लैन नहीं करेगा उसकी फिल्म के सीमित दर्शक होगे ..कायदे में तो अंत में प्रोटागोनिस्ट को मरना चाहिए था ....लेकिन हम हिन्दुस्तानियों को दुखद अंत नहीं चाहिए ....(मुझे भी कई बार )इसलिए अंत सुखद हुआ ......मुझे फिल्म अच्छी लगी ...ओर
रहना तू मेरा फेवरेट गाना है इस फिल्म में

सुशील कुमार छौक्कर said...

वैसे तो मैंने ये फिल्म पहले ही देख ली थी पर नैना बेटी और उनकी मम्मी जी को कल दिखाने ले गया था। हमें तीनों को तो फिल्म अच्छी लगी। और हाँ आपने एक अच्छी पोस्ट लिख दी इस पर। वो भी इतनी सुन्दर और गानों के साथ। हम तीनों को ही ससुराल गेंदा पसंद है और मैने तो जबसे सुना तब से ही इसका दीवाना हो गया हूँ। और बेटी भी कभी फरमाईश कर देती है कि पापा जी वो वाला गाना चलाना ससुराल गेंदा फूल। और हम बाप बेटी झूमने लगते है। वो संगीत पर और हम उसके बोल पर।

रवीन्द्र रंजन said...

हमें तो बहुत-बहुत पसंद आई दिल्ली 6. स‌ंगीत भी बहुत अच्छा लगा।

गौतम राजरिशी said...

अभिषेक हमें भी पसंद हैं, दरअसल उनके पिता और उनकी मम्मी के जबरदस्त फैन रहे हैं हम एक बचपन से.....और पत्नि के तो तब से उस पेप्सी वाले एड के जमाने से

फिल्म तो अभी तक देख नहीं पाया हूँ...अपने शहर में दो महीने विलंब से चलती हैं नई फिल्मों का सिलसिला...

बस आपकी लेखनी में रमने आ गये थे फिर से कंचन....

गुरू जी के तरही में इस बार तो शामिल हो रही हैं न आप?

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अच्छी समीक्षा और कँचन बेटे आपके ब्लोग से कई नई प्रविष्टीयोँ का पत लगता है इसलिये आभार आपका !
- लावण्या

मीनाक्षी said...

फिल्म की समीक्षा पढ़कर सोचा है कि मौका मिलते ही ज़रूर देखेगे..गीत सुन नही पा रहे..लेकिन हाँ दाईं तरफ के हरेभरे रंग और उसमें डूबे कुछ ब्लॉग दिखे जिन्हें जब चाहे पढ़ सकते है... फिर अचानक नज़र गई फूलो के बने दिल पर जिसके पास ही लिखी एक लाईन ने मन मोह लिया...
"नित्य समय की आग में जलना, नित्य सिद्ध सच्चा होना है। माँ ने दिया नाम जब कंचन, मुझको और खरा होना है....!"

अनिल कान्त : said...

अच्छी समीक्षा की है आपने फिल्म मुझे भी अच्छी लगी ....


मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

mamta said...

अरे कंचन हमने भी कुछ ऐसी ही मिलती-जुलती delhi 6 की समीक्षा लिखी है पर उसे परसों के लिए शेडूल कर रक्खी है ।

हमें तो फ़िल्म बहुत पसंद आई और इसका मैसेज भी ।

कंचन सिंह चौहान said...

पहला धन्यवाद कुश जी को...! जिन्होने सही टिप्पणियों के आमंत्रण में सहायता दी...! इस दृष्टि से मैं अपनी इस पोस्ट को विशिष्ट मानती हूँ। अन्यथा मैने देखा है कि सहमति और असहमति से अलग हट कर घोर समर्थन और प्रखर विरोध की प्रथा चल गई है ब्लॉग जगत में १०० प्रतिशत सहमत तो शायद हम अपने प्रिय से प्रिय व्यक्ति से भी नही होते। ऐसे में अपने विचारो से अलग विचार आ जाने पर या तो कटु और तीक्ष्ण शब्दों का प्रयोग होता है या कट के चले जाते हैं या मन से अलग बात लिख दी जाती है। जबकि जो सच्चे मन से लिखेगा उस के लिये बस एख बात मायने रखती है कि उसके लिखे हुए को किसी पूर्वाग्रह के बिना विश्लेषण मिला है। उचित अथवा अनुचित। कुश जी को फिल्म नही पस्द आई, अधिकतर लोगो नही पसंद आई। उन्होने जो बाते कहीं है वो तर्क संगत है। मुझे पसंद आई उसके अपने तर्क है, हम दोनो का अलग अलग परिवेश है, अलग अलग मेंल स्टेटस है। लेकिन हम दोनो में कोई एक ही सही है या हम विरोधी हो गए इस बात से बचना होगा ....कुश जी आप अपनी साफगोई और विनम्रता इसी तरह बनाए रखियेगा।

अन्य सभी मित्रों को उनकी राय का शुक्रिया।
समीर जी की स्माईल के बदले में एक भरपूर स्माईल।
रोशन जी वो लाइन थी ही काबिल ए तारीफ..! कभी कभी जिसे हम बहुत मूर्ख समझते हैं वो सबसे सयाना होता है।
विनय जी, ताऊ जी अवश्य देखें...!
वाक़ई अनुराग जी लास्ट में जब कोई डॉ की तरफ नही दौड़ रहा था, और गोबर moral of the story narrate करने लगा तो सब जानते बूझते भी हमारे तो हाथ जुड़ गए रोशन की उम्र की दुआ के लिये :)
गौतम जी गुरू जी के तरही मुशायरा जैसी चीजें जानबूझ कर भला कौन छोड़ना चाहता है। बस समस्या इतनी सी है कि कविता के लिये जो शांत मन चाहिये वो नही मिल पा रहा आज कल।
लावण्या दी शुक्रिया
मीनाक्षी दी आप गीत ज़रूर सुनिये, दोनो ही गीत आपको ज़रूर पसंद आएंगे, ये मुझे पता है।
ममता जी हो जाता है ऐसा कभी कभी, हम जो लिखने वाले होते हैं बिलकुल वही चीज दूसरा लिख देता है।

नीरज गोस्वामी said...

पिछले हफ्ते देखी थी ये फिल्म...और मुझे बहुत अच्छी लगी...इसके बहुत सारे छोटे बड़े पात्र ही इसकी असली जान हैं...यहाँ तक की दो छोटे बच्चों ने भी कमाल का काम किया है...वहीदा जी तो खैर वहीदा जी हैं ही....अभिषेक मुझे बहुत पसंद है...बहुत स्वाभाविक एक्टिंग करता है और बिना बोले ही बहुत कुछ कह देता है...
ससुराल गेंदा फूल सबसे पहले सुबीर जी की मेहरबानी से सुना था और पहली बार सुन के ही मन में बैठ गया...
कुल मिला कर बेहद खूबसूरत फिल्म है देल्ही -6

रंजना said...

आपके विवरण और टिप्पणियों ने उत्सुकता को चरम पर पहुंचा दिया है.....अब तो जल्द से जल्द फिल्म देखनी ही पड़ेगी...

kumar Dheeraj said...

शानदार पोस्ट । अभिषेक की फिल्म से लेकर दिल्ली ६ तक चली गई । साथ ही फिल्म की कसौटी भी समझाती गई । लिखने का अंदाज बेशक निराला रहा । फिल्म की तमाम चचाॆए मिली । लिखने के लिए आभार

Manish Kumar said...

फिल्म देखी नहीं पर अब तक मैंने जो रिव्यू पढ़े हैं अच्छे पढ़े हैं इसलिए देखने का मन है।

Abhishek said...

Chote-chote sandesh to hain magar ek sth kai muddon ko sametne ke karan thodi ladkhada si gai film.

रविकांत पाण्डेय said...

मुझे तो फ़िल्म अच्छी लगी और आपकी समीक्षा भी। वैसे अकेले नहीं देखी थी (company matters!!!)

सुमित प्रताप सिंह said...

सादर ब्लॉगस्ते,
कृपया पधारें व 'एक पत्र फिज़ा चाची के नाम'पर अपनी टिप्पणी के रूप में अपने विचार प्रस्तुत करें।

आपकी प्रतीक्षा में...

अभिषेक ओझा said...

हाल के दिनों में सबसे ज्यादा ससुराल गेंदा फूल ही सुना है. 'सईयाँ है व्यापारी, चले हैं परदेस' के पास म्यूजिक में जो परिवर्तन आता है... Amazing !