Thursday, December 18, 2008

वो भला कौन है किसकी तलाश बाकी है?


पिछली पोस्ट के शेर पर अनुराग जी ने कमेंट में एक शेर लिखा था

हाथ की लकीरों में लिखा सब सच होता नही,
कुछ किस्मते भी कभी थक जाया करती है

और उस शेर से ही याद आई अपनी एक कविता, जो कि मैने २०‍‍-9-२००७ को लिखी थी...! लीजिये आप भी शामिल हो जाइये उस कविता में

अपने हाथों की लकीरों में ढूँढ़ती हूँ जिसे,
वो भला कौन है किसकी तलाश बाकी है?
सुबह होने को है दीयों में तेल भरती हूँ,
तमन्ना तुझको अभी किसकी आस बाकी है।

किया जितनी भी बार ऐतबार है सच्चा,
हुए है उतनी बार अपनी नज़र में झूठे।
न जाने कितने गलासों को चख के देखा है,
हुए हैं हर दफा अपने ही होंठ फिर जूठे।
मगर सूखे हुए, पपड़ी पड़े इन होंठों को,
न जाने चाहिये क्या, अब भी प्यास बाकी है।

गिरे हैं इस कदर उठने को जी नही करता,
बहुत हताश कर रही है मेरी साँस मुझे।
बहुत थके हैं कि चलने को जी नही करता,
मगर तलाश मेरी रुकने नही देती मुझे।
गुज़र चुका है सबी कुछ भला बुरा क्या क्या
बड़ी हूँ ढीठ कि अब भी तलाश बाकी है।

सितारे सो चुके है साथ मेरे जग के मगर,
मैं अब भी चाँद की आहट पे कान रखे हूँ।
वो धीमे कदमों से आ कर मुझे चौकायेगा,
संभलना है मुझे धड़कन का ध्यान रखे हूँ।
बढ़ा दो लौ-ए-शमा की ज़रा सी और उमर,
वो आ भी सकता है, थोड़ी सी रात बाकी है!

23 comments:

Suneel R. Karmele said...

बहुत सुन्‍दर कवि‍ता पोस्‍ट की है आपने

सितारे सो चुके है साथ मेरे जग के मगर,
मैं अब भी चाँद की आहट पे कान रखे हूँ।
वो धीमे कदमों से आ कर मुझे चौकायेगा,
संभलना है मुझे धड़कन का ध्यान रखे हूँ।
बढ़ा दो लौ-ए-शमा की ज़रा सी और उमर,
वो आ भी सकता है, थोड़ी सी रात बाकी है!

असरदार है.....
संघर्ष करते हुए नाउम्‍मीदी में भी उम्‍मीदों की ढेर सारी कि‍रणें लि‍ए हुए। वैसे भी आपकी रचनाऍं काफी उम्‍मीदों से भरी रहती हैं। बधाई कंचन जी....

ताऊ रामपुरिया said...

गिरे हैं इस कदर उठने को जी नही करता,
बहुत हताश कर रही है मेरी साँस मुझे।
बहुत थके हैं कि चलने को जी नही करता,
मगर तलाश मेरी रुकने नही देती मुझे।
गुज़र चुका है सबी कुछ भला बुरा क्या क्या
बड़ी हूँ ढीठ कि अब भी तलाश बाकी है।

बहुत प्रेरक रचना !

राम राम !

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

सुंदर और उर्जावान कविता के लिए आपको बधाई,
प्रेरक भी है और संजीवन भी.

कुश said...

वाह लगता है अनुराग जी से कुछ और शेर लिखने की रिकवेस्ट करनी पड़ेगी.. जिस से की आप और भी बढ़िया बढ़िया कविताए लेकर आए..

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सितारे सो चुके है साथ मेरे जग के मगर,
मैं अब भी चाँद की आहट पे कान रखे हूँ।
वो धीमे कदमों से आ कर मुझे चौकायेगा,
संभलना है मुझे धड़कन का ध्यान रखे हूँ।
बढ़ा दो लौ-ए-शमा की ज़रा सी और उमर,
वो आ भी सकता है, थोड़ी सी रात बाकी है!

बहुत सुद्नर बात लिखी है आपने ..बहुत बढ़िया

Rachna Singh said...

tum bas likhtee rahoo , jeetee raho aur jndgi kee har jung mae aagey hee aagey raho , mae yahii dua kartee hun

प्रहार - महेंद्र मिश्रा said...

बहुत सुन्‍दर कवि‍ता....बधाई

Parul said...

वो धीमे कदमों से आ कर मुझे चौकायेगा,
संभलना है मुझे धड़कन का ध्यान रखे हूँ।..komal..baat hai ye to...

डॉ .अनुराग said...

अपनी डायरी के पन्ने ओर खोलो कंचन ...शायद हमें कुछ ओर कविता पढने को मिल जाये ... शेर पोस्ट में थोड़ा ग़लत हो गया है....
"हाथ की लकीरों में लिखा सब सच होता नही
कुछ किस्मते भी कभी थक जाया करती है".....

ओर हाँ तुम्हारी तलाश पर सिर्फ़ इतना कहूँगा..............."आमीन ".तहे दिल से

मीत said...

Bahut badhiya. Kya baat hai.

वो आ भी सकता है, थोड़ी सी रात बाकी है!

Bahut acchaa likha hai.

महावीर said...

वो धीमे कदमों से आ कर मुझे चौकायेगा,
संभलना है मुझे धड़कन का ध्यान रखे हूँ।
बढ़ा दो लौ-ए-शमा की ज़रा सी और उमर,
वो आ भी सकता है, थोड़ी सी रात बाकी है!
बहुत सुंदर! बस लिखती रहो।
('महावीर' पर रश्मि प्रभा की रचना का फ़ान्ट बड़ा कर दिया है, दिखने में अब ठीक है।)

गौतम राजरिशी said...

बड़ी हूँ ढीठ कि अब भी तलाश बाकी है...क्या बात है कंचन जी...क्या बात है भई वाह,मुग्ध कर दिया इस रचना ने

दिल से निकली तारीफ को शब्दों में बांधना मुमकिन नहीं हो पा रहा

Manoshi said...

वाह कंचन। सुंदर लिखा था तुमने।

"बहुत थके हैं कि चलने को जी नही करता,
मगर तलाश मेरी रुकने नही देती मुझे।" क्या बात है!


मेरी एक पुरानी ग़ज़ल का शेर याद आया-

लाख चाहें फिर भी मिलता सब नहीं है
जुस्तजु पर आदमी को कब नहीं है

लिखती रहो...

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

कितना सुँदर और कोमल भाव उभारा है अपनी बातोँ से इस कविता मेँ कँचन बहुअ अच्छी लगी
-स स्नेह आशिष सहित,
- लावण्या

Manish Kumar said...

सही है...इंतज़ार की लौ तो जलाकर रखनी ही पड़ती है इसी लौ की प्रेरणा से लगता है रची गई ये कविता...

सुशील कुमार छौक्कर said...

गिरे हैं इस कदर उठने को जी नही करता,
बहुत हताश कर रही है मेरी साँस मुझे।
बहुत थके हैं कि चलने को जी नही करता,
मगर तलाश मेरी रुकने नही देती मुझे।
गुज़र चुका है सबी कुछ भला बुरा क्या क्या
बड़ी हूँ ढीठ कि अब भी तलाश बाकी है।

आपने बहुत ही अच्छा लिखा हैं। अद्भुत। ये कह सकता हूँ आपने लोगो के दिल की बात कह दी हैं। वैसे ऐसे ढीठो की तलाश कभी पूरी होती है?

बवाल said...

बढ़ा दो लौ-ए-शमा की ज़रा सी और उमर,
वो आ भी सकता है, थोड़ी सी रात बाकी है!

वाह वाह कंचन जी, यही आशा की लौ तो आलम में जीस्त दवां (ज़िन्दगी प्रवाहित) करती है, वरना तो ये कहा ही गया है कि "आलम दोबारा नीस्त"
(दुनिया फिर न होगी).

sidheshwer said...

सुंदर!

सुनीता शानू said...

कंचन जी,
सचमुच बहुत सुन्दर कविता है यह...बहुत-बहुत बधाई। विशेषकर...

गिरे हैं इस कदर उठने को जी नही करता,
बहुत हताश कर रही है मेरी साँस मुझे।
बहुत थके हैं कि चलने को जी नही करता,
मगर तलाश मेरी रुकने नही देती मुझे।
गुज़र चुका है सबी कुछ भला बुरा क्या क्या
बड़ी हूँ ढीठ कि अब भी तलाश बाकी है।

एस. बी. सिंह said...

गिरे हैं इस कदर उठने को जी नही करता,
बहुत हताश कर रही है मेरी साँस मुझे।
बहुत थके हैं कि चलने को जी नही करता,
मगर तलाश मेरी रुकने नही देती मुझे।


बहुत सुंदर ! मजाज़ की कुछ पंक्तिया याद आगई-

राह में रुक कर के दम लेलूँ मेरी आदत नहीं,
मुड़ के मैं वापस चला जाऊं मेरी फितरत नहीं,
हमनवां मिल जाए कोई ये मेरी किस्मत नहीं,
ऐ गमेदिल क्या करून ऐ वहशतेदिल क्या करुँ।

reza ranjbar said...

سلام….
من ایرانیم….اتفاقی اومدم وبلاگت ولی خب چیزی نتونستم بخونم….
فقط گفتم یه یادگاری گذاشته باشم…
اینم ادرس وبلاگ منه خوشحال میشم یه سر بزنی…

http://www.marzrood.blogfa.com

ललितमोहन त्रिवेदी said...

बहुत थके हैं कि चलने को जी नही करता,
मगर तलाश मेरी रुकने नही देती मुझे।
सारी थकान बौनी पड़ जाती है मन के सामने !बहुत मार्मिक गीत लिखा है आपने !अति सुंदर !!

NirjharNeer said...

kahte hai har acchaii mein kuch burai chhipi hoti hai ..par yahan to jitna bhi hai sab accha hi accha hai
अब जब गवाक्ष खुल ही गए हैं तो अच्छा बुरा सब आपके सामने ही आएगा...!
yakinan kuch bhi bura nahii hai..
aapki blog aapke vyaktitv ka aaina hai

sundar ati sundar aana to ittifaq se hi huaa par aake khushi huii
daad kubool karen..