Friday, November 14, 2008

"मुझे चाँद चाहिये"


"मुझे चाँद चाहिये" ये शीर्षक ही कुछ ऐसा था जो मुझ जैसे लोगों को आकर्षित करता था। सबसे पहले मेरी सहेली शिवानी सक्सेना के द्वारा मैं इस उपन्यास से परिचित हुई और पढ़ने के लिये लालायित हुई। इसके बाद मनीष जी की पोस्ट और उस पर अनूप जी, चारु और बसलियाल जी के विचारों ने और भी विकल कर दिया। अनूप जी का कथन था कि पुस्तक उनकी निजी संपत्ति है, सो मैने सोचा कि कुछ दिनो के लि़ए माँग ली जाये और वे राजी भी थे...लेकिन १४ अक्टू० को जब वो पुस्तक के साथ लखनऊ पहुँचे तब मैं एक तो लखनऊ में थी नही दूसरे ये किताब मैं पुस्तक मेला से ले आई थी।

५७० पृष्ठों की ये किताब मैने शुरू की तो इस के जाल में फँसती चली गई। समस्या ये है कि कुछ भी पढ़ो तो वो मेरे मन मष्तिष्क पर ऐसे छाता है कि जैसे मेरी दिनचर्या। और इस बार भी वही हुआ। वर्षा वशिष्ठ पल भर को साथ नही छोड़ती थी और दूसरी समस्या ये कि मै उस चरित्र को समझने में बिलकुल नाकामयाब हो रही थी। लेकिन आकर्षण इतना अधिक था उस शख्सियत का कि बिना समझे रहा भी नही जा रहा था। यदि वो कोई पुरुष होती तो मैं सोच लेती कि पुरुष स्वभाव ऐसा ही होता होगा, यदि वो कसी उच्च वर्गीय घराने से संबंध रखती तो मैं सोचती कि बड़े घरों की संस्कृति है, लेकिन.... वो ऐसे ही महौल से ताल्लुक रखती थी, जिससे हम जैसे लोग रखते हैं। इसीलिये तो परेशानी हो रही थी। ऐसा लगता कि जैसे कितना भाग कर तो मैं उसके साथ आती हूँ सहेली बनाने को और मेरे साथ पहुँचते ही वो मुझसे दो कदम और आगे बढ़ जाती है..और मैं फिर हैरान परेशान।

घर की सिलबिल ने अपना नाम यशोदा शर्मा से वर्षा वशिष्ठ कर लिया क्यों कि "हर तीसरे चौथे के नाम में शर्मा लगा होता है। मेरे क्लास में ही सात शर्मा हैं।....और यशोदा ? घिसा पिटा दकियानूसी नाम। उन्होने किया क्या था सिवा किशन को पालने के?" " यशोदा शर्मा नाम में कोई सुंदरता नही।" और वर्षा नाम उसने अपना इसलिये रखा कि पिता की अलमारी में रखी ॠतुसंहार पुस्तक में छहो ॠतुओं में उसे सबसे प्रिय वर्षा लगी। " देखो प्रिये, जल की फुहारों से भरे हुए मेघों के मतवाले हाथी पर चढ़ी हुई, चमकती विद्युत पताकओं को फहराती हुई और मेघ गर्जनों के नगाड़े बजाती हुई यह अनुरागी जनो की मनभायी वर्षा राजाओं का सा ठाठ बनाये हुए यहाँ आ पहुँची है।" ये है उसके दुस्साहस का पहला नमूना।

और इसके बाद हैं श्रृंखलाए...! पढ़ते समय भतीजे ने जब पूँछा इस चरित्र के बारे में तो मुँह से निकला कि "वर्जित शब्द वर्ज्य है इस नायिका के लिये" सब कुछ ऐसे करती जाती है जैसे कितने दिनो से अभ्यस्त है। कहीं कोई हिचक ही नही। अपनी प्रेरणा श्रोत दिव्या के घर पर अंडों का सेवन वो बिना किसी संकोच के कर चुकी है। लखनऊ पहुँचने पर जब टूँडे के कवाब की प्लेट उसकी तरफ बढ़ाई जाती है तो बात करती हुई वर्षा के हाथ एक पल को भी सकुचाते नही वरन् सामान्य माँसाहारी की तरह सहजता से उठा लिया जाता है और बियर के साथ ऐसे लिया जाता है जैसे सिलबिल रोज रात माँ पिता के साथ एक पैग लेने की आदि हो। बाद में वो स्वीकार करती है कि बीफ का भी सेवन कर चुकी है।

कमलेश "कमल" से प्लैटोनिक लव के बाद लखनऊ के मिट्ठू से दो ही तीन मुलाकात बाद गहन सन्निकटता, और दिल्ली के हर्ष से भी कुछ ही मुलाकातों के बाद समर्पण की पराकाष्ठा प्राप्त करना फिर हर्ष की बहन द्वारा सगाई के लिये कहने पर इन सबके बावजूद "अभी सोचने के लिये समय माँगना" और बॉम्बे में ऐसे ही सहज मित्र सिद्धार्थ के प्रणय निवेदन को बिना किसी विरोध के स्वीकार करना और फिर से हर्ष के लिये वही समर्पण की पराकाष्ठा पहुँचना..... उफ्फ्फ्फ मैं तो कन्फ्यूज़ हुई जा रही थी। सिद्धार्थ के साथ साथ मैं भी उस पर आक्षेप लगाते हुए पूँछती हूँ कि " क्या तुम उनमें से हो जो थोड़ा सा भी भावात्मक अकेलापन नही झेल सकते।"

अंत की ओर बढ़ते हुए उपन्यास में जब पिता द्वारा मदिरापान करने पर प्रश्न खड़ा करने पर वो उत्तर देती है कि " शुरुआत जिग्यासा और ऐड्वेन्चर से हुई थी" और कहना कि " मैं गलत कह गई। दरअसल एक प्रमुख कारण अनुभव की माँग थी।" तब कुछ स्पष्ट होता है। वर्षा को अपने जीवन में अगर सबसे प्रिय कुछ है तो वो है उसका मंच, उसका नाट्य, मैं उसे कैरियर भी नही कह सकती, लेकिन उसक कला ऐसी चीज है जिसकी पराकाष्ठा पर पहुँचना वर्षा वशिष्ठ का जुनून है। वो किसी से भी विद्रोह कर सकती है मगर अपनी कला से नही वो उसके प्रति पूर्ण ईमानदार है। वहाँ वो कोई भी शॉर्टकट नही अपनाती, वहाँ वो कोई भी अड़ियल रवैया नही रखती। वह स्वीकार करती है कि " अगर मुझे भूख और शाहजहाँपुर में से किसी एक को चुनना पड़ेगा तो मैं भूख को चुनूँगी।

हर्ष के साथ उसका व्यवहार हो सकता है कि अनुभव कि माँग के कारण ही हो। क्योंकि अनुभव की कमी के कारण ही उसका पहला नाटक "बेवफा दिलरुबा" फ्लॉप रहा था।

मगर उपन्यास का अंत होते होते सभी भ्रम पीछे छूट जाते हैं.... और बस यही भावना रह जाती है कि वो शुरू से दुस्साहसी न होती तो इतना बड़ा निर्णय कैसे लेती ? धारा के विरुद्ध जाने की क्षमता न होती तो उस प्रवाह में वो जाने कहाँ बह गई होती..! और अंत में मै भी समर्थ हो ही जाती हूँ, उसे सखी बनाने में। जा के बैठ जाती हूँ उसके बगल में और जब उसे एक आँसू निकालने के लिये झकझोरा जा रहा होता है तो उसके आँसू मेरी आँखों से निकल रहे होते हैं।

एक ऐसा उपन्यास जो हमेशा मेरे द्वारा पढ़ी गई बेहतरीन किताबों में एक होगा।

हाँ वर्षा को समझने में शायद हर्ष का चरित्र भुला दिया जाता है, परंतु अपने अनेकों दुर्भाग्य के बावजूद हर्ष का चरित्र भी कम आकर्षक नही है। हर्ष मे मुझे जो चीज सबसे पहले भाती है वो है वर्षा के लिये उसकी एकनिष्ठा। शिवानी उस पर दिल-ओ-जाँ से फिदा है। तनुश्री पत्रकारों के सामने स्वीकार करती है। रंजना उसके लिये सायकिक हो गई है, लेकिन हर्ष पल भर को भी सिलबिल के अलावा किसी को मन में नही लाता। मंचीय क्षमता उसकी बेजोड़ है। वो अपने स्तर को कम करने समझौता नही कर सकता। वो गलत लोगो को बर्दाश्त नही कर सकता। मगर इस सबके साथ उसमे जो कमी है और ऐसी है जो उसकी सारी अच्छाइयों पर हावी है, वो है उसका अहं....लेकिन मै नही मानती कि ये अहं ही उसे पतन की ओर ले जाता है, पतन की ओर उसे लेजाता है उसका दुर्भाग्य.... जैसा कि वर्षा भी मानती है कि उसकी जिंदगी के तीसरे पृष्ठ चेखव को भी कभी सम्मानित नही किया गया था और वो इस मामले में उनसे अधिक भाग्यशाली थी।

लेखक के ग्यान से मैं अभिभूत थी। मनीष जी के विपरीत मुझे उपन्यास बिलकुल बोझिल नही लगी। कारण ये भी हो सकता है कि अभी हाल ही में छोटे भांजे ने रंगमंच ज्वॉइन किया, तो उसके स्तर पर बहुत कुछ समझने का मौका मिला। हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत पर सामान्य रूप से अधिकार रखने वाले सुरेंन्द्र वर्मा के विषय में नेट पर कुछ भी नही मिला परंतु मनीष जी ने बताया कि यूनुस जी के अनुसार वे मुंबई रंगमंच से जुड़े हुए हैं।

मैने अपनी पोस्ट मे जो कुछ भी लिखा वो मेरी तरफ से भावात्मक विश्लेषण था, इस संबंध में तकनीकी और व्याख्यात्मक विवरण पढ़ने के लिये आप मनीष जी की ये पोस्ट पढ़ सकते हैं।



कुछ वाक्य जो मुझे भले लगे-

1. कुपात्र के साथ बँधने से अकेले रहना अच्छा है। (वर्षा)

2. मुझे ये समझना चाहिये था कि अपना बोझ ढोने के लिये हर कोई अभिशप्त है। (वर्षा)


३. "ड्रामा स्कूल के प्रति तुम्हारा जो मोह है, हम सचमुच उसे समझने में असमर्थ है।" वह हल्की मुस्कान से बोले।
" ऐसा हो जाता है।" सिलबिल ने काफी ऊँचाई से हामी भरी " क्योंकि हम लोग एक दूसरे की जिंदगी जीने में समर्थ नही हैं।"

३ अब मुझे महसूस होता है कि जिस चीज का हमारे पेशे में महत्व है, वह यश नही है, बल्कि सहने की क्षमता है, अपना दायित्व निभाओ और विश्वास रखो। मुझमें विश्वास है और इसीलिये अब वैसा दर्द नही उठता और जब मैं अपने अंत के बारे में सोचती हूँ तो मुझे अपने जीवन से डर नही लगता।" (वर्षा द्वारा अभिनीत नाटक का एक अंश)

४. खुशी का कोई स्विच नही होता। वह अपने आप पनपती है। उसके लिये अवसर तो देना होगा न। (वर्षा)

५. "जब चुप होती हो तो, ज्यादा अच्छी लगती हो"
वर्षा भीतर ही उदासी से मुस्कुरायी। "तो अच्छा लगने का यह मूल्य चुकाना होगा।"

६. " न मेरे हाथों में लगाम है, न मेरे पाँवों में रकाब, और उम्र का घोड़ा तेज तेज दौर रहा है। (वर्षा)


७. रोजी कमाना जिनकी मजबूरी है वो नापसंदगी की दलील कैसे दे सकते हैं।


८. maturity lies in having limited objectives in life


९. हर्ष के चेहरे का वह भाव उसे बहुत दिनो तक याद रहा। उसमें वैसा ही आतंक था, जैसे कोई अबोध बालक मेले में अकेला छूट गया हो। (हर्ष के पिता की मृत्यु पर)


१० छप्पर की लकड़ी की पहचान भादों में होती है।

११.अजीब है... कभी कभी रिश्ते की स्थिति का कारण नही स्पष्ट होता।


१२. मृत्यु चाहे कितने ही उत्कृष्ट रूप में हो, उस जीवन से बेहतर नही हो सकती जो चाहे जितनी ही निकृष्ट हो....ऐसा चाणक्य कहा करते हैं।

१३. जब किसी की स्मृति नींद ला देने में समर्थ होने लगे, तो इसे व्यवहारिक रूप से प्रेम कहा जा सकता है।
शिवानी उदास चंचलता से मुस्कुराई " और जब किसी की स्मृति से नींद उड़ने लगे, तो क्या यह भी प्रेम की उतनी ही सार्थक परिभाषा नही होगी?

१४. हर स्त्री पुरुष के बीच में किसी न किसी तरह का तनाव आता है। इस रिश्ते की प्रकृति ही ऐसी है। अगर तुम्हारी तरह हर कोई सौ फीसदी अंडरस्टैंडिंग की दलील ले कर अड़ जाये तो यहाँ तो कोई घर ही न बसे। अंडरस्टैंडिंग एक प्रक्रिया है जो एक साथ धूप छाँव झेलने से ही अपना स्वरूप लेती है। इसमें दोनो पक्षों को एड्जस्ट करना होता है। (सुजाता)

१५. भावना की लगाम ना मोड़ने से मुड़ती है, न रोकने से रुकती है।


१६. दुख व्यक्ति में गंभीरता, गहराई और गरिमा लाता है। दुख व्यक्ति का आध्यात्मिक परिष्कार कर देता है।


१७. आत्महंता को यह पता नही होता कि अपने निकटतम लोगो को वह कैसे सर्वग्रासी दुख के शिकंजे में कसा छौड़ रहा है।अपनी टुच्ची खुदगर्जी में वह सिर्फ अपने दर्द में डूबा रह जाता है। वे पीछे छूटे हुए लोग वंदनीय हैं, जो पीड़ा के दंश से चीखते हुए फिर अपने कर्मपथ पर वापस लौटते हैं।

29 comments:

Udan Tashtari said...

बेहतरीन समीक्षा कर दी है. मनीष को भी पढ़ा था. अब किताब पढ़ने की इच्छा है. आभार.

शायद अनूप जी मेहरबान हो जायें वरना खरीद लेंगे. :)

mehek said...

waah bahut hi badhiya samiksha rrahi behad umda

रंजना [रंजू भाटिया] said...

मैंने शुरू की हुई है ..और आपकी तरह ही इस के मोह जाल में फंसी हुई हूँ ...अच्छी समीक्षा कर डाली आपने इस ने ..बाकी बात इस पर पढ़ लेने के बाद

डॉ .अनुराग said...

कई साल पहले पढ़ी थी ....शायद एक सीरियल भी बना था इस पर .ओर फ़िल्म भी बनने की बात हुई थी .....इत्तेफकान इसे ओर मंजूर अह्तेशाम का सुखा बरगद ओर कमलेश्वर जी का कितने पाकिस्तान इसके फ़ौरन बाद पढ़ा था........ तीनो इतने अलग सब्जेक्ट थे की मै कई दिनों तक अलग दुनिया में विचरता रहा था ...बाद में दो नोवलो का पपेरबेक संस्करण भी निकला ,इसका निकला है क्या ?

प्रहार - महेंद्र मिश्रा said...

अच्छी समीक्षा.आभार.

अभिषेक ओझा said...

बड़ी लम्बी और अच्छी समीक्षा है. पढ़नी पड़ेगी.

masijeevi said...

यह पुस्‍तक जिन अलग अलग वजहों से अलग अलग पाठकों को झिंझोड़ती है वह मजेदार है। कई पाठक तो वर्षा के उस मौलिक आख्‍यान के परे ही नही जा पाते जो वह नैतिकता को लेकर खड़ा करती है।

पुस्‍तक पर आपके विचार और उथल पुथल अच्‍छी लगी

Ratan Singh Shekhawat said...

अच्छी समीक्षा

pallavi trivedi said...

अच्छी समीक्षा की है..अब पढ़ के बताएँगे!

अजीत said...

नमस्कार कंचन जी,
समीक्षा बहुत ही भावपूर्ण और बहाव लिए हुए है और साथ में दूसरों को पढने के लिए प्रेरित भी करती है. आपकी समीक्षा ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है और शायद ये उपन्यास पढने को लेकर एक अजीब सी बेचैनी भी.
और अंत में आपका ये कहना कि बड़े निर्णय लेने के लिए किसी का दुस्साहसी होना जरूरी है, एक नई बहस शुरू कर सकता है.

अजीत

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

कँचन जी
आप ही से पहली दफे इस
"बिन्दास नायिका वर्षा "
के बारे मेँ सुन रही हूँ
मनीष भाई का लिखा नहीँ पढा था - ये नये विचारोँ को दर्शाती कथा है
समीक्षा अच्छी की आपने ..
भारतीय समाज
निस्चय ही बदल रहा है
- स स्नेह,
लावण्या

गौतम राजरिशी said...

कुछ बिसरी यादें ताजा हो गई.....ल्गभग ग्यारह वर्ष पहले मुझे भेंट में ये किताब मिली थी.जिसने दी , वो मेरी जीवन-संगिनी है अभी.और उन्हीम दिनों ये सिरियल के रूप में भी आता था

...वो जवां रुमानी दिन और स्वतंत्रता-दिवस का विलक्षण उद्धरण,मेरे दिलों दिमाग पर कई-कई दिन तक छाया रहा..

और आपने ये देवनागरी में टिप्पणी टाइप करके,मुझे बेबाक कर दिया,,,

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

शानदार समीक्षा... ढूँढ के लाकर पढ़नी पड़ेगी..

रौशन said...

शानदार समीक्षा
मुझे चाँद चाहिए में एक शानदार प्रवाह है जिससे इसका विस्तार पता ही नही चलता

makrand said...

bahut acchi katha samiksa
regards

lata said...

कंचनजी धन्यवाद , इतनी प्यारी समीक्षा के लिए.
मैने ये किताब दो साल पहले खरीदी थी और तबसे आजतक इसे 3 बार पढ़ चुकी हूँ.
सचमुच इसे पढ़ते हुए मै हर नई बात पर चकित हो जाती थी की लेखक ने ये कहानी कैसे लिखी होगी,
इसके लिए उनकी जानकारियों का स्तर कितना उँचा रहा होगा, एक आम ग़रीब परिवार से लेकर रंगमंच
और मुंबई नगरी तक पहुचने वालों का संघर्ष, मायानगरी के अंदर की जानकारियाँ और सबसे बढ़कर वर्षा वशिष्ठ का चरित्र-चित्रण, सचमुच सबकुछ बहुत ही अभिभूत करने वाला है,
ये मेरी भी बहुत पसंदीदा पुस्तकों मे से एक है जिसे फ़ुर्सत पाते ही मै फिर से पढ़ना चाहूँगी.

Parul said...

itminaan se padhna chaah rahi thii..isliye aaraam se aayi huun aaj..varsha ko lekar tumari uhaa-poh dekh chuki huun..paatron se jud janey ke baad ye svabhaavik bhi hai!!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

इस किताब के बारे में सुना तो था, लेकिन पढ़ना नहीं हो पाया था। आप की समीक्षा पढ़ ली। अब उसे ढूँढता हूँ। आभार।

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

समीक्षा का यह निराला अंदाज है, जो उपन्यास के बारे में बहुत कुछ कह देता है।

कंचन सिंह चौहान said...

महक जी, महेंद्र जी, रतन जी, लावण्या दी, कुश जी, मकरंद जी, ज़ाकिर जीधन्यवाद!

समीर जी ! अनूप जी अवश्य मेहरबान होंगे..!

रंजना जी शीघ्र पढ़िये तो मिल कर चर्चा करे :)।

जी अनुराग जी मैने इसका पेपरबैक संस्करण ही पढ़ा हैं।

अभीषेक जी क्या पढ़ना पड़ेगा..? लंबी समीक्षा...या पुस्तक..??? :)

मसिजीवी जी! आपके टिप्पणियाँ महत्वपूर्ण होती हैं मेरे लिये। धन्यवाद!

अजीत जी किसी भी विषय पर स्वस्थ बहस कभी भी की जा सकती है.. दुस्साहसी होना एक आवश्यक तत्व है, यह कहना मेरा अर्थ नही था, लेकिन उपन्यास पढ़ेंगे तो जानेंगे कि वर्षा ने जो निर्णय लिया वो सामान्य लीक पर चलने वाले शायद नही ही ले पाए..! शुरू से स्वभाव में कुछ विशेष होना चाहिये था..! बाकि एक सार्थक बहस हेतु आपका सदैव स्वागत है :)

राजरिशी जी बहुत अच्छा लगा आपके अनुभव में शरीक होना।

सही कहा पारुल तुम से चर्चा के बाद बहुत अलग अनुभव रहे उस दिन के..! चरित्र को समझने में तुमने बहुत मदद की।

सिद्धार्थ जी अवश्य पढ़ें

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाकई पढ़ना पड़ेगा
अब तो
खैर
ढूंढते है

नीरज गोस्वामी said...

"मुझे चाँद चाहिए" वर्मा जयी कालजयी पुस्तक है...आप ने बहुत अच्छा विश्लेषण किया है...हर हिन्दी पुस्तक प्रेमी को ये उपन्यास पढ़ना चाहिए...साधुवाद आपको इस पुस्तक पर प्रकाश डालने पर.
नीरज

Sanjeet Tripathi said...

ये किताब मेरी पसंदीदा किताबों में से एक है।
आप इसे जितनी बार पढ़ेंगी, बहुत सी बातें कई नए आयाम खोलती नजर आएंगी।
समीक्षा वाकई अच्छी है।

Suneel R. Karmele said...

अच्‍छी समीक्षा। इस उपन्‍यास को पढ़ते समय समय का ध्‍यान ही नहीं रहता। बहुत रोचक और संग्रहणीय उपन्‍यास है।

Manish Kumar said...

आपने काफी मेहनत की है इस पोस्ट को लिखने में। इस किताब को पढ़ने की उत्सुकता रखने वालों के लिए ये पोस्ट काफी उपयोगी होगी।

एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि अपनी पोस्ट में मैंने उपन्यास के सिर्फ कुछ अंशों को बोझिल कहा था पूरे उपन्यास को नहीं।

वर्षा के अनूठे चरित्र के आलावा ये पुस्तक लेखक द्वारा रंगमंच और फिल्म जगत में कला के प्रति समर्पित कलाकारों की घुटन को ईमानदारी से उभारने के लिए याद की जाएगी।

sidheshwer said...

सुरेन्द्र वर्मा के उपन्यास'मुझे चाँद चाहिये'को १९९६ का साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला था और यह काफी चर्चित हुआ था . मेरी जानकारी में तब तक सुरेन्द्र वर्मा की ख्याति एक नाटककार के रूप में ही थी किन्तु इस उपन्यास ने उन्हें एक शीर्ष कथाकार के रूप में में भी चर्चित कर दिया.

इस उपन्यास को मैंने कई बार पढा़ है .शुरू में तो इसकी नवीन कथाभूमि के कारण चमत्कॄत होता रहा किन्तु बाद में इसे अलग नजरिए से भी देखा , जहां कथ्य से ज्यादा अनकहे पर नजर रही.ाअज जब इस उपन्यास को समकालीन विमर्श से बाहर पाता हूं तो आश्चर्य होता है कि हिन्दी की पाठकीय बिरादरी की याददाश्त सचमुच कुछ छोटी है.

इस उपन्यास पर मैंने एक पर्चा तैयार किया था जो शिमला के एक कोर्स में प्रस्तुत किया गया था.आज आपकी समीक्षा पढ़कर लगा कि आप तो बहुत ही ऊँचे दरजे की एप्रिसिएशन क्वालिटी की मालिक हैं .अच्छा लगा , बहुत अच्छा. अपनी कुछ और पसंदीदा किताबों पर जरूर लिखें.

अनूप शुक्ल said...

बेहतरीन पोस्ट। इसे पढ़ना बहुत मजेदार अनुभव है। बार-बार इसके कुछ अंश पढ़ते हैं। मजा लेते हैं।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

आपने बहुत अच्छी समीक्षा प्रस्तुत की. उपन्यास पढने का मौका नहीं मिला मगर उस पर आधारित टी वी सीरिअल देखा था. सारे चरित्र और परिस्थितियाँ अन्दर तक जाने-पहचाने हुए थे. उन बच्चियों को भी जानता हूँ जिन्होंने स्कूल में अपना नाम खुद बदला, सामान कारणों से, उस लड़के को भी जो खेल में नहीं चमक सका क्योंकि टीम के साथ जाने का पैसा नहीं था और पंडित जी की उन बेटियों को भी जिन्हें दहेज़ के दानव ने निगल लिया था. पहली बार उस पृष्ठभूमि पर इतनी बेबाकी से चित्रण देखा था. कुल मिलाकर सुरेन्द्र वर्मा और सीरिअल से जुड़े सभी लोगों ने बहुत प्रभावित किया था.

Sanjay Kumar Shah said...

bahut achha laga. likhna achhi bat hai.