Tuesday, November 11, 2008

मुझे तुम याद आये

मैने वादा किया था कि माँ के पसंदीदा गीत के साथ दोबारा मिलूँगी असल में एक गीत के कारण वो पोस्ट रह जा रही थी जिसे हमने आईपॉड पर रिकॉर्ड किया था और उसमें वायरस के कारण कंप्यूटर पर सेव नही कर पा रही थी।



मेरे भईया के मित्र और माँ के मानस पुत्र नीरज भईया ये गीत बहुत अच्छा गाते हैं। नीरज भईया कैरियर क्षेत्र में मेरे प्रेरणा श्रोत भी हैं। जब मैंने इण्टरमीडिएट की परीक्षा पास की, उसी समय नीरज भईया की जॉब हिन्दुस्तान पेट्रोलियम में हिंदी अनुवादक के पद पर लगी थी और भईया ने मुझे भी यही तैयारी करने की सलाह दी और मैने स्नातक परीक्षा में इसी अनुसार विषय लिये। भईया ने मुझे एक टाइप राइटर भी ला कर दिया और अनुवाद की तैयारी का सबसे बढ़िया तरीका ये बताया कि रोजगार समाचार के दोनो वर्ज़न मँगाया करो। जब एक साल तक मैं हिंदी ही वर्ज़न मँगाती रही तो उन्होने खुद हॉकर को अंग्रेजी वर्ज़न मेरे घर डाल कर पेमेंट उनसे लेने को कह दिया और ये उनका मेरे प्रति सत्य स्नेह ही था शायद कि वो पेपर जब पहली बार मेरे घर आया तो दोबारा मुझे मँगाने की जरूरत नही पड़ी क्योंकि इसी पेपर मे मेरे चुने जाने का परिणाम आया था। :)



तो नीरज भईया ने हिदुस्तान पेट्रोलियम के वार्षिक समरोह में ये गीत गाया तो अधिकतर लोगों की आँखें नम हो गईं और ये किस्सा सुनाते हुए जब भईया ने ये गीत अम्मा को सुनाया तो फिर अम्मा ने फोन पर मुझे बताया कि कंचन मेरे कान में ये गीत सुबह शाम गूँजता रहता है.........मै समझ सकती थी।



तो उनके जन्मदिन पर इससे अधिक भला उपहार हो ही क्या सकता था नीरज भईया द्वारा...! लीजिये सुनिये आनंदबक्षी के बोलो से सजा लक्ष्मीकात, प्यारेलाल का संगीतबद्ध किया हुआ ये गीत पहले नीरज भईया (पार्टी के शोर के साथ)

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जब जब बहार आये और फूल मुस्कुराए,


मुझे तुम याद आये,


मुझे तुम याद आये,



अपना कोई तराना मैने नही बनाया,


तुमने मेरे लबों पर हर एक सुर सजाया,


जब जब मेरे तराने दुनिया ने गुनगुनाए,


मुझे तुम याद आये,



एक प्यार और वफा की तसवीर मानता हूँ,


तसवीर क्या तुम्हे मैं तकदीर मानता हूँ


देखी नज़र ने खुशियाँ, या देखे गम के साये


मुझे तुम याद आये,



मुमकिन है जिंदगानी कर जाये बेवफाई,


लेकिन ये प्यार वो है जिसमें नही जुदाई,


इस प्यार के फसाने जब जब ज़ुबाँ पे आये,


मुझे तुम याद आये,

और फिर मो० रफी की आवाज में



jab jab bahar aaye
और साथ ही ये गीत भी सुनिये जो भईया के दूसरे परम प्रिय मित्र अनुराग भईया द्वारा गाया गया है

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चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला,



मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला।



बड़ा दिलकश बड़ा रंगीन है ये शहर कहते हैं,


यहाँ पर हैं हजारों घर, घरों में लोग रहते हैं,


मुझे इस शहर ने गलियो का बंजारा बना डाला





चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला,
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला।




मै इस दुनिया को अक्सर देख कर हैरान होता हूँ,


न मुझसे बन सका छोटा सा घर दिन रात रोता हूँ,


खुदा या कैसे तूने ये जहाँ सारा बना डाला


चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला,


मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला।



नोटः योगेंन्द्र जी एवम् राजर्षि जी को विशेष धन्यवाद...जिन्होने याद तो रखा कि दीपावली बहुत देर मनती रही..! और राजर्षि जी आपकी दूसरी शिकायत के विषय में यही कहना है, कि क्या चाहते हैं भईया कि कमेंट भी देना बंद हो जाये :) :) असल में रोमन लिपि में तो काम के साथ साथ कमेंट होते रहते हैं..लेकिन हिंदी के लिये थोड़ा समय लेना पड़ता है... फिर भी कोशिश की है आज हमने..!

13 comments:

Suneel R. Karmele said...

कंचन जी, मुझे बहुत पसंद है यह गीत।
शुक्रि‍या....

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

गाने तो सुन नही पाऊँगा .. हेड फ़ोन नही है पर.. साइड बार में जो आपने राधा कृष्ण की तस्वीर लगाई है.. उसने असीम आनंद की प्राप्ति करा दी... बहुत ही सुंदर है..

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर है यह गीत ..अच्छा लगा सुनना

अभिषेक ओझा said...

पोस्ट तो कल ही पढ़ ली थी... शायद आपने पब्लिश करते ही हटा दिया था, रीडर में पडा था. बस गाने नहीं सुन पाया था उसमें. बहुत अच्छी लगी ये प्रस्तुति.

mehek said...

bahut sundar geet

योगेन्द्र मौदगिल said...

गाना सुन नहीं पा रहा हूं. कंप्यूटर में कुछ छेड़छाउ़ कर दी बच्चों ने. बाद में सुन लूंगा. बहरहाल पढ़ने में अच्छा है. शेष शुभ.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

सुँदर गीत सुँदर चित्र बहुत पसँद आये हमारी शुभकामनाएँ आपके नीरज भाई साहब के लिये..
कँचन शुक्रिया !
-लावण्या

"अर्श" said...

main nahi sun pa raha hun ye on nahi ho raha hai pata nahi ku par pyasrat rahunga...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

पहली बार यहाँ टिप्पणी कर रहा हूँ। बड़ा आत्मीय माहौल है यहाँ। आता रहूंगा। आपको बधाई, इस प्यारे गीत के लिए।

गौतम राजरिशी said...

बचपन में सोचा करता था कि बड़ा होकर मोहम्मद रफ़ी बनुंगा....ये गाना अक्सर गुनगुनाया करता था मैं भी.शुक्रिया फिर से उन यादों को ताजा करने का
और आप टिप्पणीयां जारी रखें,गुस्ताखी माफ़

डॉ .अनुराग said...

दूसरा गाना तो मेरा भी फेवरेट है.......गुलाम अली की आवाज में .....मेरे मोबाइल में भी है......आप इतने होनहार ओर अच्छे लोगो के साथ है......तभी अच्छी है...ऐसे ही बनी रहिये .....

महावीर said...

गाना नहीं सुन पाया। एक अच्छी प्रस्तुति जिसमें घरेलू वातावरण सा बन गया है जो बहुत अच्छा लगता है।

Jimmy said...

Bouth Aacha

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