Friday, May 2, 2008

हमें तुम से प्यार कितना

१९८१ में प्रदर्शित क़ुदरत फिल्म का एक सर्वकालीन हिट गीत है,

हमें तुम से प्यार कितना ये हम नही जानते,
मगर जी नही सकते, तुम्हारे बिना।
मज़रूह सुल्तानपुरी
द्वारा लिखे गये और आर० डी० वर्मन साहब द्वारा स्वरबद्ध किये गये इस गीत के फिल्म में दो वर्ज़न है किशोर कुमार द्वारा गाया गया गीत लोगों की ज़ुबान पर अधिक चढ़ा हुआ है। चूँकि सहजता से गाये गये सहज भाव है। जो प्रेम के शाश्वत गुणों का बखान करते हैं कि हम में से कोई इस बात का पैमाना नही रख पाता कि हम अपने प्रिय को कितना चाहते है... हाँ बस इतना पता होता है कि उसके बिना जिंदा रहना जिंदगी नही कहलाता। और दो अंतरों मे कही गई बातें भी प्रेम के मूल सिद्धांतों की है, जिसमें एक प्रेम जन्य ईर्ष्या की बात है और दूसरी जुदाई की कल्पना।

लेकिन मैं आज आप सब के साथ सुनना चाहती हूँ दूसरा वर्ज़न, जिसे गाया है आसाम में जन्मी भारती शास्त्रीय गायिका परवीन सुल्ताना ने जो कि पटियाला घराने से संबंध रखती हैं। इस गीत के लिये उन्हे १९८१ में बेस्ट महिला पार्श्वगायिका का सम्मान मिला था ।

२००२ में आंध्रा प्रवास के दौरान शुरुआती दिनो मे ही जब मैं गेस्टहाउस की गेस्ट हुआ करती थी उसी समय की बात है कि मैं लंच पर आई हुई थी और लंच कर के मैं और मेरा भतीजा लवली दोनो विविध भारती सुन रहे थे... तभी ये गीत अचानक बज उठा हम दोनो एकदम शांत हो गए ३ मिनट के लिये..किशोर कुमार वर्ज़न हम दोनो का प्रिय गीत था लेकिन इस गीत को सुनने के बाद ये उस पर हावी हो गया..और हम अब जब भी फैमिली गैदरिंग में गीत संगीत के माहौल में होते हैं इस गीत को जरूर याद करते है।
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हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नही जानते,
मगर जी नही सकते, तुम्हारे बिना !

मैं तो सदा कि तुम्हरी दीवानी,
भूल गए सईंया प्रीत पुरानी,
क़दर न जानी, क़दर ना जानी

हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नही जानते,
मगर जी नही सकते, तुम्हारे बिना


कोई जो डारे तुमपे नयनवा,
देखा न जाये हमसे सजनवा,
जले मोरा मनवा, जले मोरा मनवा

हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नही जानते,
मगर जी नही सकते, तुम्हारे बिना


नोटः यह पोस्ट मैने २ मई, शुक्रवार को ही लिख ली थी इस उम्मीद के साथ कि गीत तुरंत इंटरनेट पर मिल जायेगा परंतु यह मेरी भूल थी, गाने का यू ट्यूब तो मिल रहा था आडियो नही... अब हमारे पास एक ही साधन था कि हम यूनुस जी से संपर्क करें और हमने वही किया...! यूनुस जी ने हमें उसी दिन गीत उपलब्ध करा दिया, परंतु शनिवार, रविवार अवकाश और सोम, मंगल नेट मे समस्या के कारण आज यूनुस जी की आभारी होते हुए गीत बाँट रही हूँ।

15 comments:

PD said...

युनुस जी पता नहीं कितनों का धन्यवाद लेंगे..
वैसे ये गीत मुझे भी बहुत पसंद है.. पहली बार परवीन जी की आवाज में मैंने सन् 1998 मे सुनी थी.. मेरे भैया कहीं से लेकर आये थे.. फिर तो कभि किशोर दा की आवाज में हमने सुनी ही नहीं.. :)

Parul said...

is khuubsurat aavaaz me ye geet aur bhi karaamaati ho jaataa hai...sunvaaney ka dhanyavaad KANCHAN

DR.ANURAG ARYA said...

कुछ गीत वाकई आपको रोक देते है....पहली बार ये गीत मैंने सुना था तो चौंक गया .कि अब तक कहाँ चुप रहा...ऐसे ही एक रोज जब हॉस्टल मे नींद नही आ रही थी तो रेडियो मे गाना बजा ....."रात भर आपकी याद आती रही .....कोई दीवाना सडको पे फिरता रहा ....गम कि लौ जगमगाती रही......ओर रफी साहेब का एक गीत "ओर हम खड़े खड़े गुबार देखते रहे .....जो नीरज जी ने लिखा था ...ऐसे कितने गीत है जिनका जन्म किस परिस्थिति मे हुआ होगा ओर लिखते वक़्त किसी ने कैसे सोचा होगा.....पर वाकई ये अमर बन गए है.......यूनुस जी का धन्यवाद आप आपको भी ढेरों साधुवाद ......

अरूणा राय said...

shukriya is post ke liye

Rohit Tripathi said...

Hamare manpasand geeto mein se ek, pahli baar sunte hi geet hriday mein utar gaya tha, aur tabhi se hamar favorite bhi hai.. yeh alag baat hai ki is song ki singer ka naam hume aaj malum pad paya hai :-)

PD said...

@ डा.अनुराग जी - क्या साहेब, कहां कहां से क्या क्या गीत जुगाड़ करके सुना रहें हैं.. भई हम तो रफ़ी जी के उस गीत के कायल हैं "कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे"...... :)

mamta said...

चलो कंचन आपने गीत सुनवाने का सिलसिला दोबारा शुरू किया। बधाई।

और शुक्रिया इस गीत को सुनवाने के लिए।

मीत said...

A favourite. Thanks.

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा गीत-पॉडकास्ट की बधाई.

Manish said...

सुंदर गीत और बेहतरीन प्रस्तुति। बहुत दिनों बाद सुना परवीन जी की आवाज़ में। मैं तो भूल ही चुका था ये वर्सन।

कंचन सिंह चौहान said...

पीडी साहब, अरुणा जी, मीत जी, समीर जी एवं मनीष जी गीत पसंद करने का शुक्रिया....!

पारुल मेरी तो आवाज़ ने मेरा साथ छोड़ दिया लेकिन तुम ये गान बहुत खुबसूरति से गा सकती हो...!

अनुराग जी वाक़ई आप के द्वारा उल्लिखित दोनो ही गीत मन को कु्छ का कुछ बना देते हैं....! नीरज क तो खैर मैं दीवानी हूँ...! रात भर आपकी याद आती रही के साथ ही...वो एख गीत है न " सईयाँ निकसि गए मैं न लड़ी थी"...याद आ जाता है...रात के सन्नाटे में ये दोनो गीत आँसू बन के मन को छूते हैं।

ममता जी इस गीत और शब्द की दुनिया को हम जैसे लोग छोड़ कर जाएं भी तो कहाँ जाएं

रवीन्द्र रंजन said...

यूनुस जी जिंदाबाद

रवीन्द्र रंजन said...

यूनुस जी जिंदाबाद

योगेन्द्र मौदगिल said...

कंचन जी, वाकई कमाल की कम्पोजीशन है. पसन्द ही नहीं मन में बसाने लायक.
शुक्रिया.

sunny said...

yunus to mera yaar hai, he is a GR........EAT hai.