Thursday, April 1, 2010

शहीद को श्रद्धांजली में ना पसंद क्या ?

अभी दो दिन पहले मेजर गौतम राजरिशी ने एक पोस्ट लगाई, जो कि एक मेजर की शहादत पर थी। एक साथी फौजी का अचानक जाने से शायर फौजी का दुखी होना लाज़मी था। ब्लॉग जगत के टिप्पणी व्यवहार से हम सभी परिचित हैं। इसी के चलते मेजर राजरिशी ने इस संवेदनशील पोस्ट पर टिप्पणी का विकल्प नही रखा। जिसका हर संवेदनशील व्यक्ति ने स्वागत भी किया। मगर आज जब यूँ ही ब्लॉगवाणी की सैर कर रही थी तो पाया कि इस पोस्ट को १० लोगो ने पसंद किया और दो लोगो ने नापसंद भी।





अपनी इस पोस्ट से मैं पूँछना चाहती हूँ उन किसी भी अतिसक्रिय महोदय/महोदया से कि इस साधारण संवेदनशीलता में ना पसंद सा क्या लगा ?


साथी मेजर की शहादत पर भावुक होना ?
या
टिप्पणी का विकल्प ना रखना ?


या
किसी "nice" या "वाह, अच्छी रचना" जैसे शब्दों से बचने का प्रयास करना ?



विरोध किसका



मेजर राजरिशी का
या
मेजर जोगेंदर की शहादत का


व्यथित हूँ। आक्रोशित हूँ।

अपने स्वार्थ में हम क़लम के पुजारी कितना गिर सकते हैं ? देश के लिये हुई शहादत को ब्लॉग के व्यक्तिगत विरोध में शामिल करना ?? आह॥! कितना घृणित और ओछा है हमारा व्यवहार।


पोस्ट लिखने का ध्येय गौतम राजरिशी के पक्ष विपक्ष में बैठना नही। मेजर जोगेंद्र शेखावत जैसे शहीदों से क्षमा माँगना है। वो ब्लॉगर नही थे। वो सैनिक थे। हमारी पसंद ना पसंद की राजनीति से ऊपर था उनका लक्ष्य....!



गौतम राजरिशी की गज़ल को जितना मन चाहे नापसंद कीजिये। देश के लिये शहीद किसी फौजी को श्रद्धांजली ना दे कर उस लेख पर नापसंद का चटका लगा कर आपने अपमानित किया है। लज्जित किया है।

शर्मसार हूँ कि मैं इस ब्लॉगजगत का हिस्सा हूँ।


29 comments:

Ankit Joshi said...

वाकई, ये तो शर्मसार करने वाली बात है,
आपने इस घटना का ज़िक्र करके अच्छा किया, मेरे विचार से जिन्होंने नापसंद किया होगा उन्होंने शायद पोस्ट ही नहीं पढ़ी हो क्योंकि उन्हें क्लिक करना पसंद होगा.
मेजर शेखावत की शहादत सब स्वार्थों से परे, देश के लिए है.........................
आप, कुछ मूर्खतापूर्ण और बचकानी हरकतों से अपने आप को व्यथित ना करें.

Vivek Rastogi said...

ओह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और एक सैनिक की शहादत पर कुछ भारतियों का रवैया जो कि इस ब्लॉग जगत का हिस्सा हैं, इसका मतलब क्या निकाला जाये कि ये जो दो लोग हैं वे या तो भारतीय नहीं हैं या फ़िर भारतीय होते हुए भी देशप्रेमी नहीं हैं।

अफ़लातून said...

कंचनजी ,
यह सिर्फ़ साबित करता है कि बिना सोचे भी यह खिलवाड़ किया जा सकता है । ऐसे मूर्ख मौजूद हैं । नापसंदगी की बाबत आपके प्रश्न अनुत्तरित रहेंगे ।

Kishore Choudhary said...

भारत सिर्फ साधू - संतों और विदुषियों - विद्वानों का ही नहीं जाहिलों और फूहड़ों का भी देश है.

Mired Mirage said...

निम्न में से कुछ भी कारण हो सकता हैः
१. बहुत से लोग देश की लुटिया डुबाना भी चाहते हैं। शायद उन्हें यह शहीद होकर देश बचाने की भावना पसन्द ना आई हो।
२. शायद उन्हें मेजर का लेखन पसन्द न हो तो बिना पढ़े ही नापसन्द कर दिया।
३. शायद उन्हें यह विषय पसन्द न हो।
४. शायद उन्हें चटके लगाना पसन्द है और वे रैन्डम पसन्द या नापसन्द के चटके लगाते हों।
५. गलती से पसन्द की जगह नापसन्द का चटका लगा दिया।
मुझे पाँचवी सम्भावना अधिक लग रही है। वैसे एक से गलती होना समझ आता है दो से जरा कठिनाई से गले उतरता है।
घुघूती बासूती

PD said...

वह मैंने भी देखा था.. मेरे देखे जाने के समय तक पसंद ८ और नापसंद २ थे..

कल ही मैंने गुनेश्वर जी के एक पोस्ट, जिसमे उन्होंने "सतेन्द्र दुबे हत्याकांड के फैसले के विरोध में अपनी बात कही थी", पर मैंने कहा था "कभी कभी मुझे शर्म आती है कि मैं भारतीय हूँ".. पुलिस, न्यायपालिका, मिडिया, या फिर भारत के लोग मुझे शर्मिंदा होने से कब बचा पाएंगे? मुझे नहीं पता..

डॉ .अनुराग said...

उम्मीदे कम करो.. ज्यादा पढ़े लिखे लोगो के नाखून अद्रश्य होते है ...... अभी भी एक बाप उतरांचल सरकार ओर केन्द्र सरकार के ऑफिसों के धक्के खा रहा है ....उस पेट्रोल पम्प के वास्ते जिसका वादा किया गया था ....उसके शहीद बेटे के नाम पर ......किस -किस पर शर्मसार होगी ?कितनी बार ?

रंजना said...

डाक्टर साहब के पन्क्तियों को ही दुहराना चाहूंगी....
" इतना उम्मीद न रखा करो "

किस किस से शिकायत या अच्छाई की उम्मीद रखोगी-
उनसे जो हिंसा में ही विश्वास रखते हैं और युद्ध तथा अशांति को पोषित करते हैं,जिनके कारण असमय असंख्यों को काल कलवित होना पड़ता है या इस प्रकार के तुच्छ सोच समझ रखने वाले मनुष्यों से....

रचना said...

KANCHAN
i can understadn your anger but technology has its own disadvantage

some times we click many time on the pasand / napand tab because the server is not responding

now if you click once on the upper tab its 1 up
on the lower tab its 1 down

but if you click 2 times on the upper tab its zero up
3 times on the upper tab its 1 down

the reader is not always culprit its the server

सुशील कुमार छौक्कर said...

ये दुनिया बड़ी अजीब है कंचन जी। पता नही कैसे कैसे लोग है इस दुनिया में। मुझे भी चुभती है ऐसी बातें। अनुराग जी सही कह रहे है। कभी कभी ज्यादा उम्मीद नही करता पर अक्सर दिल ही नही मानता।

M VERMA said...

कंचन जी
यह ब्लोगजगत है
यहाँ कुछ भी हो सकता है
एक पंक्ति में कहूँ तो
शर्मनाक है ये वाकया

गिरिजेश राव said...

@ शर्मसार हूँ कि मैं इस ब्लॉगजगत का हिस्सा हूँ।

बहुत भावुक हैं आप तो !

इस जगत में बहुत से घटिया काम हर क्षण होते हैं तो क्या आप इस से भी शर्मसार होंगी कि इस जगत का हिस्सा हैं?
रचना जी की बात पर भी विचार कीजिए।

सुशीला पुरी said...

ओह !!!!!!!! ऐसा ? बहुत लज्जा की बात है .

"अर्श" said...

निहायत ही गिरे हुए लोग होंगे वो जिनको जवानों की शहादत से कोई फर्क नहीं पड़ता...
अपने घर में पैर पसार के सो रहे होंगे , जब कोई जवान इस धरती को बचाने के लिए अपना
सर्वस्वा न्योछावर करता है .... उनकी खुद की इज्ज़त लुटे
होते तो भी उन्हें कोई फर्क नहीं पडेगा ऐसा लगता है ... नाहक ही शर्म की बात
ऐसे लोगों को मेरे बस में होता तो ....
हाँ ऐसे बेशर्म लोगों से कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिए ... जिस दिन गौतम
भाई ने यह पोस्ट डाली थी तभी कहना चाहता थे के मोडरेशन में डालो मगर किसी किसी तरह नहीं कह पाया ........... खैर इस संसार में कुछ ऐसे भी जंतु हैं ... यही कहूँगा


अर्श

वीनस केशरी said...

ओह पढ़ कर दुःख हुआ, गुस्सा आया और शर्म भी आयी
मैंने पोस्ट को अपने ब्लॉग के लिंक से पढ़ा और ईमेल कर दी थी इस लिए देख नहीं पाया

सच कहा है अगर पसंद की जगह ना पसंद का बटन दब गया तो ये एक बार हो सकता है २ बार ऐसा हुआ और गलती से हुआ ये बात गले नहीं उतर रही है
किसी ब्लॉगर ने पोस्ट पढ़ कर ऐसा नहीं किया होगा
सकारात्मक सोच तो यही कहती है
मगर बिना पढ़े ये किया तो गलती और भी बड़ी है

Udan Tashtari said...

मुझे लगता है कुछ लोग मुहिम के तहत नापसंदगी के चटके लगाते हैं और यह अफसोसजनक घटना उसी का परिणाम है. आतंकवादियों और समाज में दुराचरण फैलाने वालों को कौन रोक पाया है अब तक.

कुछ गैरजिम्मेदाराना लोगों की हरकतों से पूरे ब्लॉगजगत को उसी तराजू में तौल कर खुद को इस बात के लिए शर्मसार महसूस करना कि आप इस जगत का हिस्सा हैं, यह भी अपने आप में गैर जिम्मेदाराना व्यक्तत्व्य ही है.

अगर इस वर्चुअल समाज के बाहर भी ऐसी ही सोच रख कर देखें तो एक दिन जीना भी पाप ही कहलायेगा कि आप ऐसे समाज का हिस्सा हैं.

जरा विचारें. दुखद होना, अफसोस जताना अपनी जगह है और पूरे समाज को नाम दे शर्मसार होना अपनी जगह!!

इतना गया गुजरा भी पूरा ब्लॉगजगत नहीं हो गया है कि आप इसका हिस्सा मात्र होने से शर्मसार हो जायें.
आपका कथन मैं अतिश्योक्ति की श्रेणी में रखता हूँ किन्तु अफसोस और दुख में आपके साथ हूँ इस हरकत पर.

मुनीश ( munish ) said...

i do agree with u . narrow considerations regarding these posts is shameful indeed.

मुनीश ( munish ) said...

......but as Samir bhai said it would not be appropriate to hold the entire Blogger family responsible for two miscreants. So let us condemn the act , but stay together.

कुश said...

अदृश्य नाख़ून...कितनी सही बात है ना..?

ajit gupta said...

नापसन्‍द का चटका गलती से लग गया होगा। टेक इट ईजी।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

क्या कहा जाय ...
बड़े चट-खोर होते हैं चटखा लगाने वाले ...सोचते थोड़े ही हैं ...
सोचते - सोचते मानव प्रजाति ऊब गयी है इसलिए अब न
सोचने के कारनामों में यकीन करने लगी है ... यह तो व्यापक नियति
का संकेत मात्र है !

गौतम राजरिशी said...

cool it sis....just cool it out!

सर्वत एम० said...

यह सिर्फ सम्वेदनहीनता का मामला है. शहादत भी नापसंद कर दी जाए या किसी की श्रद्धांजली को महत्व न दिया जाए, इससे घटिया और कुछ हो भी नहीं सकता. इस तरह के लोगों का वहिष्कार किया जाना चाहिए.
मैं पहली बार इस ब्लॉग तक आ सका हूँ. आपका शुक्रिया कि आपने बाज़ी मार ली और पहले ही मेरे ब्लॉग तक पहुँच गईं. मेरा समर्थन करने के लिए साधुवाद.
मैं भी लखनऊ में ही हूँ, आशा है कभी सरे-राह मुलाक़ात भी होगी.
९६९६३१८२२९ हम इस पर बात कर सकते हैं शायद.

राकेश जैन said...

दुनिया की बात से खुद को नहीं आँका करते,
ये दौर है ऐसा, जहाँ खुद का ही जहाँ होता है..

Gussa to aapki naak par rahta hai,kis kis se ladogi bahina.

अपूर्व said...

God!!Its very embarrassing..Do we deserve such martyrdom?
शर्म हमको मगर नही आती!

गौतम राजरिशी said...
This comment has been removed by the author.
गौतम राजरिशी said...

how are you GUDDAN? ab khush?

PD said...

अब मान भी जाईये दीदी.. कुछ नया लिख ही डालिए.. :)

अनूप शुक्ल said...

...हम इसई लिये कहते हैं कि जिसकी जैसी अकल होती है वो वैसा ही काम करता है। :)