Thursday, December 17, 2009

एक इंसान हूँ मैं तुम्हारी तरह


हरिश्चंद्र श्रीवास्तव जी पूर्णतः दृष्टिहीन हैं। उनकी दवा के पर्चे पर देखकर मुझे पता चला कि उनकी उम्र ७० वर्ष है, अन्यथा मुझे तो ५५ ही लगती थी। और इसके बावज़ूद वो एक दृष्टिबाधित विद्यालय चलाते हैँ। जिसमें कभी ४० विद्यार्थी पढ़ा करते थे।

कई बार सोचा था आप लोगो से उनके विषय में बाँटने को, मगर कुछ न कुछ दूसरा आ जाता तो श्रीवास्तव जी पीछे रह जाते। ये तो मुझे भी नही याद आ रहा है कि किस तरह श्रीवास्तव जी से मुलाकात हुई। पर जब से हुई तब से दिमाग से उतरे नही वो। एक दुबला पतला शरीर। जिसे अपने रास्ते पर चलने के लिये किसी और से मार्गदर्शन लेना पड़ता हो, वो शख़्स ४० ऐसे बच्चो का मार्गदर्शन कर रहा है, जो अँधेरों में भटक रहे हैं।

मोहित, आकाश, विजेंद्र, जैसे जाने कितने बच्चे, जिनमे किसी के पिता ठेला लगाते हैं, किसी के फेरी, किसी के दिहाड़ी की मज़दूरी। उनके लिये किसी काम के नही है वो बच्चे। 7-8 की तादात में की गई उनकी वंशवृद्धि का रुतबा इस एक के होने से ज़रूर बिगड़ता है, ना होने से नही। जितने बच्चे होंगे, उतने हाथ कमाई कर के लायेंगे। मगर बदकिस्मती से हुए फाउल जैसी ऐसी संतान का वो करें क्या? ये ला कर तो कुछ ना देगी मगर इसे खिलाने में एक तो बिना रिटर्न का इनवेस्टममेंट दूसरे तीमारदारी में एक और व्यक्ति को लगने से दोहरा नुकसान...! ऐसे में जो बच्चा श्रीवास्तव जी के विद्यालय में आ जाता है उसे माँ बाप वापस ना ले जाने की ही पूरी कोशिश करते हैं।

विद्यालय मे पहुँचते ही बच्चों के चेहरे पर आई खुशी को देख कर आप को लगेगा कि हम कहाँ बिना मतलब की औपचारिक मुस्कानों में फँसे है। असली मुस्कान तो यहाँ बसी है।

"दीदी अबकी आप किस चीज से आई हो।... वो बंदूक आप राहुल को दे गईं थी, अबकी हमे देना।...बहुत बहुत दिन बाद आती हैं आप...अब कब आयेंगी.. १० दिन बाद आ जायेंगी..ठीक १० दिन बाद ना...!"

और मै झूठा वादा कर के आ जाती। १० दिन बाद कौन कहे महीनो नही जा पाती। श्रीवास्तव जी ने लगभग २ साल पहले बताया कि सरकारी सहायता जो थोड़ी बहुत मिलती थी,वो बंद हो गई, नई सरकार आने पर। अब तो रेगुलर डोनेटर्स का ही सहारा है। मैं आश्चर्य में पड़ जाती, रेगुलर डोनेटर्स के बल पर इतना बड़ा जिम्मा... और डोनेटर्स कितने रेगुलर हैं ये तो मैं खुद से ही जानती हूँ।

इसके बावज़ूद विद्यालय चलता रहा। बीच बीच में श्रीवास्तव जी की खबर ले ली जाती या वो खुद दे देते। "बस गवर्नमेंट एड फिर से मिलनी शुरु हो जाये, फिर सब ठीक हो जायेगा।" श्रीवास्तव जी विश्वास से कहते या फिर हम लोगो को विश्वास दिलाते।

अधिकतर मेरी समस्याओं के चलते वे किसी को आफिस भेज देते, अगर कोई काम होता। जुलाई तक की खबर थी, इस बार सोचा कि चलो चलके देख आते हैं बच्चों को। मैने श्रीवास्तव जी की लोकेशन जानने के लिये फोन मिलाया। तो फोन विद्यालय के एक लड़के वीरेंद्र ने उठाया जो देख सकता था। (दो ऐसे बच्चे जो गरीब घरों के हैं और देख सकते हैं वे इस विद्यालय में बाजार और दृष्टि से संबंधित काम करते हैं) और उसने बताया "मैम जी अब तो विद्यालय वहाँ नही रहा जहाँ था।"

आर्थिक सहयोग ना मिल पाने के कारण विद्यालय के पूर्व भवन का किराया नही दिया जा सकता था अतः घर बदलना पड़ा। खैर मैं पिंकू को ले कर फोन करके पता पूछते हुए वहाँ पहुँची। संस्था अब संकरी गलियों के बीच थी। एक बाउंड्री रहित घर...! जिसके छोटे से दरवाजे के अंदर प्रवेश करते ही बैठक कक्ष शुरु हो जाता है और वहीं बेड पर श्रीवास्तव जी पड़े थे। "कैसे है ?" का जवाब देने में ऐसा लगा कि उन्हे शरीर की पूरी ताकत लगा देनी पड़ी। वीरेंद्र ने बताया कि फेफड़ों में समस्या है। एक कंकाल पर पतला सा चमड़े का आवरण मात्र ही रह गया था शरीर के नाम पर....! पहले वाला भवन मेरे विद्यालय के पास ही था, तो मैं अकेले चली जाती थी। घर से पिंकू मेरे साथ पहली बार आया था। मैने देखा कि उसकी आँख में आँसू उमड़ रहे हैं और वो बार बार चेहरा घुमा ले रहा है।

वो पितृपक्ष के दिन थे। एक हाई प्रोफाईल दंपत्ति ने कमरे में प्रवेश किया। कल उनकी माता जी का श्राद्ध था और वो यहाँ खाना खिलाना चाह रही थीं। उन्होने ७०० रुपये का पेमेंट किया और मेन्यू पूछा आप क्या क्या खिलायेंगे ? वीरेंद्र ने बताना शुरु किया उससे पहले श्रीवास्तव जी ने हाँफती हुई आवाज़ में बताया।
"बस..? मिठाई नही" श्रीवास्तव जी के मेन्यू बताने के साथ ही उन्होने आश्चर्य से पूछा।
"आप कहेंगी तो मिठाई भी कर लेंगे।" वीरेंद्र ने कहा
"आपने तो चालीस बच्चे बताये है, यहाँ तो २८ हैं।"
" कुछ बच्चे सुबह पढ़ने आते हैं, विद्यालय में नही रुकते, मगर खाना तो उन्हे भी देना पड़ता है। फिर खाना बनाने जो आती हैं वो अम्मा। जो बर्तन झाड़ू पोंछा करती हैं वो और मैं और मोहित भी हैं।"
"ये लोग भी खायेंगे...! असल में हमे अपनी माँ का श्राद्ध करना है ना तो हम चाह रहे हैं कि खाना सही जगह पहुँचे।"
मेरा धैर्य जवाब दे रहा था। मगर शांत थी। ७०० रु में हम अपने घर में भी क्या इस मँहगाई के दौर में ४० लोगों को ठीक से भोजन करा सकते हैं ?

इसके बाद उन्होने प्रश्न किया "कितने बजे खिला देंगे"
"१०.००"
"फिर कितने बजे देते हैं कुछ खाने को ?"
"फिर ८.०० बजे रात में"
"इतना लंबा गैप?...बीच में कुछ भी नही...!"

मुझे शालीनता का लबादा ओढ़ कर बोलना पड़ा। "आप निश्चिंत रहें, आपकी माँ के श्राद्ध के लिये इससे बेहतर जगह और कोई नही हो सकती। और ये जो बच्चे हैं, ये अगर अपने घर में होते तो शायद चौबीस घंटे में एक बार भी ठीक से खाना ना नसीब होता इन्हे। यहाँ इस गैप के बाद मिल तो जा रहा है। आप सर की हालत तो देख ही रही हैं। ऐसा व्यक्ति इस संस्था को चला रहा है, गहराई से सोचिये तो बहुत आश्चर्यजनक है ये।"

उन्हे लगा कि मैं भी इस संस्था की सदस्य हूँ और हिकारत के साथ निगाह डालती हुई उन्होने कहा "आप भी यहीं रहती हैं।" श्रीवास्तव जी ने हाँफते हुए फिर से मेरा परिचय देने की कोशिश की मैने उन्हे रोकते हुए कहा " नही मैं श्रीवास्तव जी की शुभचिंतक हूँ और इन्हे देखने आई हूँ।"

चलते समय मैने श्रीवास्तव जी से पूँछा "आप सरकारी सहायता के लिये प्रयास कर रहे थे ?"
उन्होने बहुत ताकत लगा कर निकली हाँफती हुई मगर आत्म विश्वास से भरी आवाज़ में कहा " एक बार मुझे ठीक हो जाने दीजिये बस.."

हम लोग चले आये मैने सोचा था कि इस बार ३ दिसंबर को विकलांग दिवस पर मैं उन्ही के आत्मविश्वास की गाथा लिखूँगी और साथ में उनका फोटो भी....!!


मगर....! २६ नवंबर को जब मैं नेहा की शादी में व्यस्त थी तभी उनका नंबर स्क्रीन पर आया। फोन उठाने पर आवाज़ वीरेंद्र की मिली। हाल पूछने पर उसने कहा "मैम श्रीवास्तव जी ५ अक्टूबर को दुनियाँ छोड़ गये। संस्था बहुत अधिक फाइनेंशल प्रॉबलम से गुज़र रही है। आप मेम्बर बनवा देतीं रेगुलर डोनेशन वाले।"

शादी के उत्साह में थोड़ी देर के लिये हाथ पैर रुक गये। शांत हो कर सोचा " शरीर का एक अंग कम होने से यदि जीवन इतने परिपूर्ण अर्थों में जी लिया जाये तो कमी अच्छी है। यदि वास्तव में मृत्यु के बाद लेखा जोखा ईश्वर के सामने खुल रहा होगा, तो जीवन भर कमियाँ झेल कर दूसरों की जिंदगी जीने के काबिल बनाने वाला ये व्यक्ति वहाँ के अमीरों में गिना जा रहा होगा।"

पुनःश्चः- तीन ३ दिसंबर को ये पोस्ट लिखने की सोची थी। मगर २ दिसंबर को शादी से वापस आने और आफिस मे कामो के चलते नही लिख सकी। देखा तो एक भी पोस्ट नही मिली विकलांग दिवस पर।
एक घटना और बाँटती हूँ

दीदी के घर के लॉन में मैं बैठी थी तभी एक सज्जन और उनकी विवाहित बहन जीजाजी के पास किसी कोर्ट के केस के सिलसिले में आते हैं। आने के बाद उनकी पहली नज़र मेरे पैरों पर पड़ती है और मुझे कुछ अजीब सा भी लग सकता है, इसकी परवाह किये बगैर वो मेरे पैरों को घूरते रहते हैं। मैं दीदी को आवाज़ दे कर बुलाती हूँ और वो उन्हे जब बैठक में ले जाती हैं, तो मुझे लगता है कि मेरा दम घुटते घुटते अचानक साँस आ गई।

वो अंदर जा कर मेरे विषय में पूछते हैं। दीदी बताती है कि "मेरी बहन है। लखनऊ से आई है।"
वो पूरे करुणानिधान बन कर कहते हैं "बड़ा अच्छा है। इसी बहाने थोड़ा मन बहल जायेगा। अब तो शादी तक रहेगी।"
"नही..! शादी में फिर आयेगी। सर्विस करती है ना तो एक साथ इतनी छुट्टी नही मिलती।"
उनकी आँखें चौड़ी हो जाती हैं "सर्विस करती है ?"
"हाँ...! केन डिपार्टमेंट में। सेंट्रल गवरमेंट का आफिस है।" जितनी आँखें चौड़ी हुई थी उतना ही दीदी के स्वर का उत्साह
"अच्छा..?? किस पद पर"
दीदी ने सगर्व बताया और साथ ही और भी बहुत कुछ जो उनके मन को मुझे ले कर खुश करता है, सेलरी भी बता दी गई। दीदी की हर बात के साथ उनका अच्छा कहने का तरीका बदलता रहा और हद तब हो गई जब वे उठ कर फिर से मुझे देखने बाहर लॉन में आ गये। इस बार निगाह पैर पर नही चेहरे पर थी.......।

मुझे जो नही मिला वो किस्मत से और जो मिला वो भी किस्मत से। सरकारी नौकरी तो तुक्के की बात है। व्यवस्थाएं इतनी आसान भी तो नहीं कि आसानी से सब कुछ मिल जाये। ना मिलता तो मेरी बुद्धि, मेरी भावना, मेरा व्यक्तित्व सब कुछ शून्य था। मिल गया तो किसी को ये जानने की जरूरत भी नही कि मैं मूलतः किस स्वभाव की हूँ।

सड़क पर बैसाखी लिये चिथड़ों में भागता व्यक्ति. पटरे पर पहिये लगा कर हाथ में चप्पल लिये सड़क पार करता किशोर, व्हीलचेयर पर पान मसाला बेचता युवक..... सब मेरे सामने थे....!! सब में मैं थी...मुझमे सब थे....!!!

32 comments:

RAJNISH PARIHAR said...

अच्छे काम में हमेशा ही कठिनाइयाँ आती है ...अब संस्था के क्या हाल है?आपने जिस खूबी से जिंदगी का सामना किया वो प्रेरणास्पद है...

मनोज कुमार said...

काफी अच्छा आलेख। प्रेरणास्पद।

सतीश सक्सेना said...

मार्मिक लेख, अपने भुगते दर्द की पीड़ा आपने सादा शब्दों में बयान की है कंचन जी ! विद्यालय, स्थान तथा संचालकों के बारे में बताइयेगा शायद मैं भी थोडा योगदान कर सकूं ! श्रीवास्तव जैसी विभूतियों का अंत ऐसा होना, इस ह्रदयहीन दुनिया का एक कड़वा सच है यहाँ करुणा और ममता को कोई मोल नहीं, भले लोगों को भुगतने पड़ते हैं अंतहीन कष्ट !
सादर !
satish1954@gmail.com

Kishore Choudhary said...

आपकी संवेदनशीलता के साथ एक आदमकद हौसला देखता हूँ तो बहुत राहत होती है और बल भी मिलता है. ये पोस्ट मेरे लिए महज एक पोस्ट नहीं वरन एक दस्तावेज है जो मुझे भी कोई नेक कार्य करने को प्रेरित करता रहेगा. यूं तो हर इन्सान का इन्सान होना तभी सार्थक है जब वह समाज और राष्ट्र के लिए अपनी प्रतिबद्धता को हर दिन बढ़ाये. आज की सुबह आपके इन शब्दों से इस तरह हुई है कि दो गुना जीवट अपने भीतर देख रहा हूँ. कुछ दिन पहले एक पोस्ट लिखी थी मित्रों के लिए और फिर शहर से बाहर जाना पड़ा. दिन में कोई एक दो बार अप डेट्स के लिए नेट पर आ जाता था. कल कुछ मित्रों ने कमेंट्स किये थे उनको देख कर पशोपेश में था कि इनकी उपयोगिता क्या है और उद्देश्य क्या है ? फिर मैं खोजने लगा कि जिन मित्रों ने वापसी की है उनके मन का क्या हाल है ? आज आपकी इस पोस्ट का लिंक मैं उन सबको इसलिए भेजना चाहता हूँ कि वे शब्दों के इस आईने में खुद को देखें और फिर तय करें कि मुश्किलें क्या है और हौसला क्या है. आपकी भाषा तो सदा ही इतनी सरस और सरल होती है कि सीधे मन को छू जाया करती है. कई पंक्तिया कुछ दिनों तक मेरे साथ ही बनी रहेंगी वे मुझे मेरे होने का अहसास करवाएगी और कुछ प्रेरणा भीदेंगी.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत बढ़िया लेख!

Udan Tashtari said...

संवेदनाएँ, आत्मविश्वास..एक हौसला..सब साथ में हिलोरे ले रहा है/// बेहतरीन आलेख..फिर से पढ़ना होगा इन्मिनान से!!


अनेक शुभकामनाएँ.

anjule shyam said...

jo bhi kiya unhone apni himmat aur hosle se hi kiya.hum aur hamara samaj unka bahut ridi rahega...
anjule shyam maurya.

कुश said...

अगर ये दुनिया अभी तक टिकी हुई है तो कंचन जैसे कुछ लोगो की वजह से.. दुसरे पार्ट के लिए तो मुझे व्हील चेयर वाली लड़की याद आ गयी.. पहले पार्ट के लिए फोन कर रहा हूँ..उठाओ

पारूल said...

सड़क पर बैसाखी लिये चिथड़ों में भागता व्यक्ति. पटरे पर पहिये लगा कर हाथ में चप्पल लिये सड़क पार करता किशोर, व्हीलचेयर पर पान मसाला बेचता युवक..... सब मेरे सामने थे....!! सब में मैं थी...मुझमे सब थे....!!!..kitni badi baat kahi tumne...aur dekho --hum kitne naashukrey hain...zara zaraa me dharya khote ...

डॉ .अनुराग said...

पंद्रह दिन पहले अमरुद के ठेलेपर रुका तो एक मोटर साइकिल वाला गोगल्स लगाये हुए दो रुपये के लिए अमरुद वाले से लड़ रहा था ...उसने गाली देकर कहा साले अपने देश में कम नहीं सकते यहां लूट मचा रहे हो ...अमरुद वाला उड़ीसा का था ...मुझे लगा हम व्यर्थ ही राज ठाकरे को गाली देते है .....देश ?किसका देश ?अमरुद वाला सर झुकाये सुनता रहा .गरीबी ओर पेट आपके भीतर बहुत पेशेंस दे देता है ...

श्रीवास्तव जी जैसे लोगो को देखकर लगता है हम किस बात पे इतराते है ....ओर हमने किया ही क्या है अब तक ?ये वो लोग है जो बिना इश्तेहार बाजी के वर्तमान सिस्टम में रहते उसकी कमियों को जानते बूझते इससे कम या ज्यादा कुछ निकालकर उसे बेहतर कामो में इस्तेमाल कर रहे है ....अब समय दूसरा है सलमान जब विवाद में फंसते है तो अचानक उनकी चेरिटिया बढ़ जाती है .इमेज मेक ओवर प्रोसेस है.......परोपकार भी करना है ओर यश की चाहत भी है .....जाने दो इमोशनल हो जायूंगा तो बहुत कुछ कह जायूंगा ...
ओर हां तुम सुनो ......तुम वाकई असाधारण हो ....

अभिषेक ओझा said...

पोस्ट तो पढ़ गया लेकिन टिपण्णीयों को पढ़ते-पढ़ते आँखे नाम हो ही गयी. ऑफिस में पोस्ट पढ़ रहा हूँ, बगल वाले से बोला रात को सोया नहीं ढंग से स्क्रीन पर देखते-देखते आँखों में पानी आ गया. उसे पता है मैं झूठ बोल रहा हूँ. खैर... श्रीवास्तवजी जैसे कुछ लोगों से मिलना हुआ है. पर शायद श्रीवास्तवजी से किसी और की तुलना करना बेमानी होगा. पुणे में एक अकेली अनपढ़ महिला लड़ रही हैं. आज से ८ साल पहले एक बच्ची को लेके घर आई थी आज ४० से ज्यादा बच्चे हैं, कुछ कॉलेज के लड़कों का सहयोग मिल गया तो अब पैसे की समस्या जाती रही. उनका जोश देखकर अपना जीवन निरर्थक लगता है.
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लखनऊ वाली बात पर कुछ नहीं कहूँगा, अपनी गलती और आपका गुस्सा दोनों निःसंकोच स्वीकार है. आपका नंबर होता तो एक बार फोन करके बताया जरूर होता कि इतने घंटे और यहाँ हूँ, इतने मिनट खाली हूँ बताइये कहाँ आना है. रंजनाजी से इतना ही कह दिया था तो दिल्ली से ये शिकायत तो नहीं आई.

परमजीत बाली said...

बहुत बढ़िया आलेख है।

dimple said...

pinku to apne ansu chupa ne ke liye apna chehra guma leta tha .par baki sab kya kare?is post ko sirf marmik post ya achhi post kah ke hi peecha chhudha lena namumkin hai..

रंजना said...

तुमने जो कहा......अब कुछ भी नहीं मेरे पास कहने को......
संस्था यदि अभी भी चल रही है,तो पता बता दो...जो बन पड़ेगा भेज दूंगी...सीधे सीधे अपने हाथों ऐसे काम को न कर पाने का बोझ कुछ तो हल्का होगा.....
तुमने शब्दों में पिरो जिस पीर को कागज पर बिखेरा है,संवेदनाओं की जो दुनियां दिखाई है...बस क्या कहूँ....जीती रहो....
लाजवाब बहना ..लाजवाब....

Mired Mirage said...

कंचन, बहुत मार्मिक लेख लिखा है। और क्या कहूँ, श्रीवास्तव जी को श्रद्धाजंलि और तुम्हारे साहस को सलाम।
घुघूती बासूती

निर्मला कपिला said...

श्रीवास्तव जी सब के लिये प्रेरणा स्त्रोत है उनको विनम्र श्रद्धाँजली।और आपकी संवेदनायें भी सराहनीय हैं शुभकामनायें

Manish Kumar said...

Mujhe bhi sanstha ka A/c no. mail karein jis par sahyog rashi bheji ja sake.

हिमांशु । Himanshu said...

प्रविष्टि ने सोचने के पहले ही संवेदना का अतिरेक दिया । आँखें डबडबा उठीं । मैंने अंतिम पंक्ति पर गौर किया - "सबमें मैं थी, मुझमें सब थे "। अपना-सा हो आया यह मन ! हदय के सारे गवाक्ष खुले हैं आपके - जो दिखता है वह संवेदना का, अनुभूतियों का आकाश है ।

यह ’कमी’ बहुत गहरे से महसूस की है- अपने भतीजे की मानसिक मंदता को लेकर बहुत जूझा हूँ । समाज की उस दृष्टि का जवाब आज भी नहीं खोज पाया हूँ कि इस लड़के के जन्म में भईया-भाभी का दोष क्या था ! त्रिआयामी अनुभव बटोरे हैं, दर्द सँजोया है - इलाज के लिये डाक्टर के पास पहुँचने के वक्त की मानसिक स्थिति, भतीजे का टुकटुक मेरी तरफ देखते रहना, बिना समझे कि वह किसे देख रहा है और लोगों द्वारा उसकी निस्पृह मनःस्थिति को लेकर डाली गयी उपेक्षित दृष्टि !

मैं भकुआ गया हूँ श्रीवास्तव जी की अंतिम दशा पर, उनके अंत पर ! मेरा आशावादी सात्विक मन यही सोचता, समझता रहा है कि सत्य, सत्व हमेशा ही संघर्ष तो करते है, पर विजयी होते हैं । यह क्या विपरीत सिद्ध हो रहा है मेरी चेतना के लिये - मेरा विश्वास बदल जायेगा क्या ?

एक ऐसे ही विद्यालय की कथा कहनी है मुझे भी, पर फिर कभी !

Siddharth said...

Kanchan ji ! bahut hi sundar post. dil me utar gayi.

दर्शन said...

जहाँ हम जैसे लोग एक एक एहसास के लिए जद्दोजहत करते हैं वही 'श्रीवास्तव' जैसे लोग भी हैं जो 'इद्म न ममः' की भावन से एहसासों के अनंत स्पर्श पैदा कर जाते हैं, पूरी पोस्ट पढने के बाद श्रीवास्तव जी के ऊपर फक्र होता है और अपने आप पे कुंठा की क्यूँ न हम उठ पाए (इतना ऊँचे तो नहीं तो कम से कम थोड़ी) ऊपर ? अँधा कौन है? और किसकी आँखें हैं?
हाँ मगर कम से कम इतना वादा तो कर सकते हैं :
माना !
किन्ही मजबूरियों
और अपनी जिम्मेदारियों को
निभाते रहने की हालत में
मुमकिन नहीं
हर पल ,
हमेशा ,
दूसरों का भला कर पाना
लेकिन......
मुमकिन है यह
हर पल ,
हमेशा ,
ख़याल रखना इस बात का
किसी का दिल न दुखने पाए
किसी का बुरा न होने पाए ...
ऐसी कोशिशें
करते रहना भी तो
दूसरों का
भला कर पाने के समान ही है
आख़िर.....
ख़ुद को
अपनी पहचान
हमें ख़ुद ही देनी है ......!!
-DK Muflis

चलो यही सही....

Inse parichay karwane ke liye bahut bahut shukriya.

sanjay vyas said...

मैंने कुछ साल पहले रेडियो के लिए दृष्टिहीनों के क्रिकेट पर एक रूपक बनाया था.यहीं जोधपुर के विशेष स्कूल के बच्चे जो इस ख़ास तरह के क्रिकेट में राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेल कर आये थे,उनसे और बाकी खिलाड़ियों से खूब बातचीत करने का मौका मिला था.मज़ेदार बात ये थी कि हमारे सामने पूरा मैच खेला गया.छर्रे की गेंद,लोहे के परस्पर जुड़े विकेट्स और खूब सारा हौसला.एक भरपूर रोमांच भरा अनुभव.निश्चित रूप से आप अपनी कमी को किनारे कर और अपनी बेशुमार खूबियों को उभार कर मन का रेडियो बजा सकते हैं.श्रीवास्तव जी को नमन.और आपसे हौसला उधार लेने का मन करता है.

गौतम राजरिशी said...

कहते हैं बार मौन रहना बड़े-से-बड़े संवादों से ज्यादा श्रेयष्कर होता है, किंतु इस ब्लौग पर अपना मौन प्रदर्शित कैसे करूं...?

अपनी वर्तमान स्थिति में जब रोज जूते के लेस बाँधने या कमीज का बटन बंद कर पाने की नाकामी पर खुद पर झुंझलाता हूँ तो तुम हौसलों की टोकरी लिये चली आती हो। सोचने लगता हूँ कि मेरी तो ये बस कुछेक महीनों के लिये है और तुम...उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़!

i salute you, dear sis!

योगेन्द्र मौदगिल said...

Better post....

ललितमोहन त्रिवेदी said...

कल ही माँ की तेरहवी कर लौटा हूँ गांव से !विगत एक वर्ष से जर्जरित देह वाली ९६ वर्षीय माँ के लकवा ग्रस्त अर्धांग से दवा और दुआ के साथ पल पल जूझा हूँ ,उनकी अनकही पीड़ा को बहुत निकट से जाना है , परन्तु वह तो माँ थी मेरी ! धन्य हैं श्रीवास्तव जी जैसे लोग जो पराई पीर को छाती से चिपकाये सर्वस्व होम देते हैं ,और कंचन जी अद्वितीय हैं आप भी जो उनकी पीड़ा को इतनी गहराई से अनुभव करतीं हैं !आपकी संवेदन शीलता को और आपके हौसले को नमन करता हूँ !

Shefali Pande said...

aapke blog me aksar aatee hun....aapke shabd...aapkee bhaavnaen ..aapkee himmat sab mere lie anukarneeya hai...

rashmi ravija said...

श्रीवास्तव जी,के जीवन को कहते हैं...सार्थक जीवन...और आपके आलेख को कहेंगे...सार्थक लेखन....यह सब जान सुन खुद के छोटेपन का अहसास होने लगता है...कि छोटी छोटी खुशियों के बीच भागते हैं हम....और कुछ लोग रोज सिर्फ जिंदा रहने की लड़ाई लड़ रहें हैं....और उनकी इस लड़ाई में सहायता के लिए कोई अपना सर्वस्व निछावर कर देता है...
बहुत ही मर्मस्पर्शी आलेख...मैंने भी बहुत पहले इस विषय पर लिखा था..."मानसिक विकलांगता से कहीं बेहतर है शारीरिक विकलांगता'(वक़्त मिले तो पढ़ें)...और सचमुच बहुत क्षोभ होता है...लोगों का रवैया देखकर...जब कि कमी तो उनमे होती है
http://mankapakhi.blogspot.com/2009/10/blog-post_10.html

मुकेश कुमार तिवारी said...

कंचन जी,










सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

कृपया वह संस्था के संपर्क सूत्र दीजियेगा, जो मुझसे बन पड़ेगा कर सकूंगा।

नीरज गोस्वामी said...

कंचन जी अनुराग जी के कमेन्ट को पढने के बाद...और कुछ कहने को नहीं रह जाता....
मुझे बताएं उन बच्चों के लिए क्या कैसे कुछ किया जा सकता है...?
आप और आपके ज़ज्बे को नमन...धन्य हैं वो माता पिता जिन्होंने आपको जन्म और ऐसे संस्कार दिए ...
नीरज

वन्दना अवस्थी दुबे said...

शानदार, मार्मिक संस्मरण.

neera said...

एक सच्चे हीरो से मिलवाने के लिए तुम्हारा आभार ..इंसानियत को आवाज़ और रूतबा देने में तुम किस कदर समक्ष को कंचन ...
क्ष्रीवास्तव जी की संस्था का नाम और पता जानना चाहूंगी

Meenu Khare said...

http://meenukhare.blogspot.com/2009/12/blog-post_23.html

vishal said...

कंचन दी! मरणोपरांत ही सही श्रीवास्तव जी जैसे कर्मठ, प्रेरणादायी इंसान के बारे में लिखें जरूर। मुकेश तिवारी जी और नीरज अंकल को साधुवाद जिन्होंने मदद की इच्छा जताई।