Thursday, December 10, 2009

कोई संग इमाम खुदा ने बख्‍शा ना ...मगर संग है गुरु जी के विवाह की वर्षगाँठ

ये अच्छा हुआ कि अपनी गज़ल के चक्कर में इतनी बार गुरु जी को फोन करना पड़ा कि इस डर से कि कहीं कल भी मुझे बार बार फोन कर के पकाये ना गुरु जी ने अपरोक्ष रूप से प्रकट किया कि कल अर्थात आज उनकी शादी की सालगिरह है और प्रवेश वर्जित



खैर... ऐसा गुरु जी ने कुछ नही कहा..मैं यू ही अपने अधिकारों का नाज़ायज फायदा उठा रही हूँ।

बात बस इतनी है कि आज गुरु जी की शादी की सालगिरह है। मैने जब गुरु जी से पूँछा कि भाभी जी का मायका कहाँ है तो गुरु जी ने हँस के बताया पागल खाने वाले शहर में यानी ग्वालियर में।



ये बात भाभी जी को शादी की वर्षगाँठ निकल जाने के बाद तब बताई जायेगी जब किसी गज़ल के लिये ज्यादा लाल पीले होंगे गुरुजी। गुरु जी मुझसे कहते हैं अपना विज़न बढ़ाओ और मेरा विज़न है कि यहीं जा के अटक जाता है कि देखें गुरु जी का कौन सा कमजोर पत्ता हाथ में आ रहा है....!! :)

रेखा भाभी और गुरु जी के विवाह को आज नौ वर्ष हो गये। हर तरफ से प्रशंसा पा रही गुरु जी की कहानी महुआ घटवारिन के नायक नायिका की तरह इन दोनो का बचपन साथ ही बीता है। कहानी की तरह दोनो के पिता मित्र भी हैं। बस कहानी में विछोह है और यहाँ संयोग। असल में गुरु जी और रेखा भाभी के पिता मित्र थे। बचपन में दोनो का विवाह तय कर दिया गया था। और फिर दोनो अलग अलग शहर में पलने बढ़ने लगे थे। बाद में संयोग से फिर जब दोनो जनकों की पोस्टिंग मुरैना में हुई तो ये बात फिर से याद की गई और ये बंधन बँधा। पूर्णतः प्रबंधित विवाह (Completely Arranged Marriage.....!)



LOVE AFTER MARRIAGE का ये उदाहरण देखिये और शुभकामनाएं...बधाईयाँ देते हुए पढ़िये ये गज़ल। जिसका मतला और आखीरी शेर गुरु जी की खालिस देन है और यूँ तो पूरी गज़ल ही उनके आशीष से बनी है...!





दो पल का आराम खुदा ने बख्‍शा ना
कोई भी इनआम खुदा ने बख्‍शा ना


उन रिश्तों की खातिर रोना कैसे हो,
जिन रिश्तों का नाम खुदा ने बख्शा ना।

उनकी खातिर अश्कों का अंबार मिला,
हक उनपे ही तमाम खुदा ने बख्‍शा ना।

दिन भर मेहनत कुछ मन का पा लेने की,
और हिसाब ये शाम,खुदा ने बख्शा ना....।

खुद की खुद के जज़्बों से वो जंग छिड़ी,
जिसमें युद्धविराम, खुदा ने बख्शा ना।

किस्मत सारे फतवे करे खिलाफ मेरे,
कोई संग इमाम खुदा ने बख्‍शा ना।

कंचन जो पाया है, उसमें खुश हो लो
क्‍या ग़म जो इल्‍हाम खुदा ने बख्‍शाना ना।

मैं भी पत्‍थर बनी प्रतीक्षारत थी पर
मुझको कोई राम खुदा ने बख्‍शा ना




24 comments:

Udan Tashtari said...

खुद की खुद के जज़्बों से वो जंग छिड़ी,
जिसमें युद्धविराम, खुदा ने बख्शा ना।

शानदार...


गुरु जी को विवाह की वर्षगांठ की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ.

आपका आभार सूचित करने का.

मनोज कुमार said...

दिन भर मेहनत कुछ मन का पा लेने की,
और हिसाब ये शाम,खुदा ने बख्शा ना....।
बेहतरीन। बधाई।
गुरु जी को शादी की सालगिरह की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ.

पंकज सुबीर said...

कहानी यूं है कि मेरे श्‍वसुर जी के सात बेटियां हैं । सो मेरे पिताजी ने उनसे कह दिया था कि एक की तो चिंता मत करो एक को हम ले जाएंगे । बात आई गई हो गई और फिर वरसों बाद जब फिर एक साथ हुए तो वो बात याद आ गई । शुभकामनाओं के लिये आभार ।

गौतम राजरिशी said...

अभी थोड़ी देर पहले ही गुरुदेव से फोन पर बात हुई इस दिन-विशेष की बधाई देने की खातिर और जैसे ही नेट पे आया तो देखा कि अनुजा ने यहाँ भी ऐलान कर रखा है।

वैस भाभी जी से एक और बात बतायी जायेगी बाद में कि इस दिन-विशेष को शहीद-दिवस की संज्ञा दी गयी है। लेकिन फिर सोचता हूँ कि ये तो शिकायत वाली बात ही नहीं हुई...क्योंकि अभी कुछ ही दिन पहले मेरा भी शहीद दिवस मना था... :-)

गुरूजी और भाभी जी को समस्त शुभकामनायें। वैसे गुरूजी तनिक और खुलासा कर देते कि भाभी सात बहनों में कौन से नंबर पे हैं, तो गुरू जी की सालियों की गणना करता, फिर कुछ और वजहें जुड़ जातीं उनसे जलने-भुनने के लिये... :-)

ग़ज़ल तो सचमुच निखर उठी है। मुझे अपने हास्पिटल वाले दिनों की याद हो आयी। कितना सर खाया था तुमने मेरा इस ग़ज़ल के पीछे...

"तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है" की धुन पर गुनगुनाता हुआ पढ़ रहा हूँ इसे।

मतला लाजवाब बना है...
दूसरे शेर की तारीफ़ पहले भी खूब कर चुका हूँ।
तीसरे शेर को गुरू जी ने क्या खूब चमका दिया है। मुझे याद आ रहा है कि कितनी मशक्कत की थी तुमने इस शेर के पीछे।..और वही बात चौथे शेर के लिये भी।
पाँचवें शेर पर दर्जनों वाह-वाह कबूल करो!लाजवाब काफ़िया चुना है "युद्धविराम" और उतना ही लाजवाब उसका निर्वहन।
छठे शेर का मिस्‍रा-उला...उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़!
और मक्ता...तुम्हारा नाम इतनी सुंदरता से बैठता है जब भी तुम ऐसे मिस्रे बुनती है।

आखिरी शेर तो गुरू जी का बुना हुआ है ना। बेहतरीन तो होना ही है इसे।

पूरी ग़ज़ल और एक बेमिसाल रदीफ़{साथ में इतनी सफलता से उस रदीफ़ को निभाना} के लिये दिल से बधाई अनुजा!

god bless you!

पंकज सुबीर said...

गौतम तुम्‍हारी जानकारी के लिये बता दूं कि तुम्‍हारी भाभी का नंबर ठीक बीच में है अर्थात तीन ऊपर तीन नीचे । और एक बात बचपन की मुझे तो बहुत हल्‍की याद है कि मुझे घर वाले चिढ़ाया करते थे कि तहसीलदार मिश्रा जी ( मेरे श्‍वसुर) की लड़की से तुम्‍हारी शादी होगी । मैं शायद छ: या सात साल का था लेकिन उस समय भी ये सुन कर लजा जाता था । और एक बात जो मुझे याद है वो ये कि तहसीलदार मिश्रा जी की लड़की को मैं स्‍कूल के मैदान में शरमाते हुए घांस खिलाता था । घांस का मतलब ये कि घांस के अंदर एक साफ्ट सा तना होता है जो खाने ककड़ी जैसा लगता है । मैं तहसीलदार मिश्रा जी की बेटी को वही छील छील कर खिलाया करता था । मतलब मैं तो कह ही सकता हूं अपनी पत्‍नी से कि तुमने तो घांस चर रखी है । अब ये याद नहीं कि वो घांस मैं मिश्रा जी की कौन सी लड़की को खिलाता था क्‍योंकि बहुत पुरानी बात हो गई है ।

डॉ .अनुराग said...

किस्मत सारे फतवे करे खिलाफ मेरे,
कोई संग इमाम खुदा ने बख्‍शा ना।
ये शेर बहुत पसंद आया ....पंकज जी को विवाह की वर्षगाँठ की ढेरो शुभकामनाये .....वैसे कितने वर्ष हुए विवाह को.....

पारूल said...

पंकज जी को बहुत बधाई और शुभकामनाएँ.
ग़ज़ल पूरी की पूरी बहुत खूबसूरत है. तुम्हारी ...

इसके इलावा घास खाने व् खिलाने वाली बात अभी तक गुदगुदा रही है मुझे :)

परमजीत बाली said...

उन रिश्तों की खातिर रोना कैसे हो,
जिन रिश्तों का नाम खुदा ने बख्शा ना।

बहुत बढिया।
पंकज जी को बहुत बधाई और शुभकामनाएँ.

अनिल कान्त : said...

गुरु जी को विवाह की वर्षगांठ की बहुत बहुत बधाई

वन्दना said...

मैं भी पत्‍थर बनी प्रतीक्षारत थी पर
मुझको कोई राम खुदा ने बख्‍शा ना

behtreen.........sare jazbaat utar aaye hain.
pankaj ji ko shadi ki varshgaanth ki hardik badhayi.

अनूप शुक्ल said...

क्या जलवेदार पोस्ट है। बधाई। परिणय वर्षगांठ की बधाई!

Kusum Thakur said...

"उन रिश्तों की खातिर रोना कैसे हो,
जिन रिश्तों का नाम खुदा ने बख्शा ना।"

बहुत ही खूबसूरत शेर है . आपको शुभकामना और बधाई !!

निर्मला कपिला said...

अरे वाह! मुझे तो पता ही न चलता अगर आज नेट पर ये पोस्ट न पढती। अनुज सुबीर और रेखा जी को बहुत बहुत बधाई भगवान उनकी इस बगिया को यूँ ही फलता फूलता रखें । उन्ककी गज़ल के लिये तो मैं कुछ नहीं कह सकती अभी इस काबिल नहीं हूँ बस यही मेरे लिये बहुत है कि उन्होंने मुझे आशीर्वाद देने का अधिकार दिया है दिल से इन्हें आशीर्वाद देती हूँ। आऔर आपका भी बहुत बहुत धन्यवाद हम तक ये खबर पहुँचाने के लिये।

नीरज गोस्वामी said...

उन रिश्तों की खातिर रोना कैसे हो,
जिन रिश्तों का नाम खुदा ने बख्शा ना।
वाह कंचन वाह...क्या शेर कहा है...दिली दाद कबूल करो...और गुरूजी का लिखा मक्ता जैसे सोने पर सुहागा...ऐसी बात सिर्फ और सिर्फ वो ही लिख सकते हैं...अच्छा हुआ जो तुम्हारे ब्लॉग पर आया वर्ना गुरूजी से मिठाई खाने की गुहार कैसे लगा पाता...तुम्हारे पास वाकई बहुत सी गुप्त काम की सूचनाएँ उपलब्द्ध रहती हैं...
नीरज

दिगम्बर नासवा said...

खुद की खुद के जज़्बों से वो जंग छिड़ी,
जिसमें युद्धविराम, खुदा ने बख्शा ना...

खुद से खुद का युध तो जीवन पर्यंत चलता रहता है .........

गुरु जी को शादी के सालगिरह मुबारक हो ............

अभिषेक ओझा said...

घास खिलाने वाली बात तो मजेदार है, काश हमें उस उम्र में पता होता तो हम भी किसी को घास खिलाते :)

"अर्श" said...

अहा जय हो , बात कहाँ से शुरू करूँ इसी सोच में डूबा हूँ... मुझे इस बात की ज़रा सी भी भनक नहीं थी... सबसे पहले गुरु जी को और भाभी जी को इस विशेष दिवस की असीम शुभकामनाएं ... दिल से बहुत बहुत बधाई.... वेसे मेरे से बात चित में गुरु जी ने इस खास दिवस को बलिदान दिवस की संज्ञा दी है ... फिर मैंने कहा आपको मुबारक हो और फिर दोनों खूब देर तलक हस्ते रहे इस बात पर .. और जब मैंने कहा के ये खास दिवस सबके जीवन में हमेशा अलग लग दिन में आता है , और फिर उनका ठहाका लगाना ... नजर ना लगे ... ...
वेसे घास वाली बात पसंद आयी ... हा हा हा ... अगर भाभी बिच की हैं तो गुरु जी क्या मेरे लिए कोई चांस है... कहीं... ?? हा हा हा माफ़ी भी साथ में रख रहा हूँ... मेरे लिए कहू की कतली भूलने वाली बात नहीं होनी चाहिए... बहुत बहुत बधाई...

और जब बात ग़ज़ल की हो तो आपको सुबह ही बधाई दे चुका हूँ मगर इस शे'र पे तो अब क्या कहूँ चुप हूँ ...
उन रिश्तों की खातिर रोना कैसे हो,
जिन रिश्तों का नाम खुदा ने बख्शा ना। ..

ग़ज़ल कहते हो के बहुत पुरानी है तो बीते दिनों में भी ऐसी गज़लें कहती थी ??????
आवाक हूँ मैं ... फिर से ग़ज़ल के लिए दाद दिए जा रहा हूँ गुरु जी ने कुछ खास काम दे रखे हैं मुझे वही करने जा रहा हूँ....

आपका
अर्श

रंजना said...

उन रिश्तों की खातिर रोना कैसे हो,
जिन रिश्तों का नाम खुदा ने बख्शा ना।
......

मैं भी पत्‍थर बनी प्रतीक्षारत थी पर
मुझको कोई राम खुदा ने बख्‍शा ना
.......

KYA KAHUN...KAHAN SE KAHNA SHURU KARUN ...SAMAJH NAHI AA RAHA....
SABSE PAHLE TO TUMHARA AABHAAR,JO TUMHARE WAJAH SE YAH SOOCHNA PRAT KARNE KA SUAWSAR MILA....

PANKAJ BHAAI AUR REKHA BHABHI KO BAHUT BAHUT SHUBHKAMNAYEN...

TUMNE JO LIKH DALA USPAR KUCHH KAHNA BAHUT HI KATHIN HAI...TUMAHARI SHUBHKAMNA DENE KI YAH ADA TO BAS ABHIBHOOT KAR GAYI...MAN SE NIKLA ..WAAH !!

LEKHAN KE ROOP ME IS BHAVBHARI RACHNA NE TO BAS MAN MUGDH KAR LIYA...MAN SE NIKLA..JIYO....

TIPPANIYON NE JO RAAJ KHOLE....WAAH ...KYA KAHNE...
YAH POST JO YUMNE NA DALI HOTEE TO YE GUDGUDATI BAATEN KAISE BAHAR AATIN....
SO BAS SABKUCHH LAJAWAAB !!! THANKS BAHNAA !!!

Manish Kumar said...

खुद की खुद के जज़्बों से वो जंग छिड़ी,
जिसमें युद्धविराम, खुदा ने बख्शा ना।

किस्मत सारे फतवे करे खिलाफ मेरे,
कोई संग इमाम खुदा ने बख्‍शा ना।

ye ashaar khas taur par pasand aaye. Pankaj ji ko is avsar par hardik shubhkaamnayein

रविकांत पाण्डेय said...

सोचा तो था कि इस अवसर पर एक पोस्ट लिखूंगा पर इधर की व्यस्तताओं ने उलझा दिया। गुरूजी एवं भाभी जी को कोटि-कोटि शुभकामनायें, एक मुक्तक-

समय भाल पर तिलक लगाता स्वस्ति स्वयं श्रुतियां गाती हैं
सुमन-वृष्टि कर रही दिशाएं स्नेहसिक्त ध्वनियां आती हैं
दो विहगों ने आज साथ मिल नीड़ बनाया था सपनों का
उन सपनों की मोहक गाथा अब तक स्मृतियां दुहराती हैं

और आपकी गज़ल.....पिछले दिनों कोई कह रहा था कंचन तो कलमतोड़ संस्मरण लिखती है...मैने कहा, जी, वो जो भी लिखती हैं अच्छा लिखती हैं....सारे शेर कमाल के हैं, बस चौथे शेर पर थोड़ा सा कंफ़्यूज हूं...युद्धविरामवाला शेर खूब पसंद आया और अंत वाला शेर तो पूछिये मत कि कितना सुंदर बना है!! बहुत-बहुत बधाई।

venus kesari said...

बहुत सी बाते गौतम जी,अर्श भाई और रवि भाई ने पह्ले हि कह दी है जो मै कहना चाहता था

गजल बहुत पसन्द आई खास कर आखरी के तीन शेर तो वाह वाह है

बार बार पढने पर भी मन नही भर रहा है

आपके यहा शादी का कार्यक्रम कैसा सम्पन्न हुआ जानने की उत्सुकता है

वीनस

हृदय पुष्प said...

पहली बार ब्लॉग पर आया हूँ. ग़ज़ल पढ़कर हृदय पुष्प पुलकित हो गया - अति सुंदर बेहद उम्दा ख़यालात आमीन.

Meenu Khare said...

मैं भी पत्‍थर बनी प्रतीक्षारत थी पर
मुझको कोई राम खुदा ने बख्‍शा ना

बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है कंचन जी. बधाई.

psingh said...

बहुत खूब अच्छी रचना
बधाई स्वीकारें