Sunday, October 11, 2009

कबिरा को रामान्द मिलें,हमको बस गुरु का प्यार मिले- गुरु जी के जन्म दिन पर

११ अक्टूबर का ये आज का दिन, जब तारीख की इकाई दहाई एक ही होती है, एक समान... अंक ज्योतिष में सुना है कि इस तारीख को इसी कारण से शुभ मानते हैं और शुभ मानने के साथ ही अमिताभ बच्चन जी का उदाहरण भी दे दिया जाता है कि कैसे इस तारीख ने उन्हें शहंशाह बना दिया है...! नही नही भाई कोई बवाल ना कीजिये इस बात पर... मैं ये कहाँ कह रही हूँ कि जिस शख्स की बात मैं कर रही हूँ वो ब्लॉग जगत का शहंशाह है, मैं तो बस ये बता रही हूँ कि हमारे गुरु जी का भी आज ही जन्मदिन है..आज....जिस दिन शहंशाह का भी जन्मदिन होता है... पता नही ये बात कितनी सच है कितनी झूठ कि ये अंक भाग्यशाली है मगर हाँ दिलों का शहंशाह तो ये बनाती ही है....!!!

तो सबसे पहले तो मेरे साथ मिल कर बधाई दीजिये मेरे गज़ल गुरु एवं अग्रज श्री पंकज सुबीर जी को उनके जन्मदिन की। चूँकि गुरु जी ने बताया कि टॉम एण्ड जेरी उनका प्रिय कार्टून है और घर में मेरे झगड़े की प्रवृत्ति के कारण मुझे अक्सर जेरी की उपाधि से नवाज़ा जाता है तो इस जेरी की तरफ से



गुरु जी की पुस्तक ईस्ट इंडिया कंपनी मुझे वीर जी द्वारा राखी बँधाई मे मिली थी। भारतीय ज्ञान पीठ से प्रकाशित इस सजिल्द कथा संग्रह में कुल १५ कहानियाँ है, जिनमें से मात्र ६ कहानियाँ ही कल तक पढ़ी थी। ये तो परसो रात में सोते समय लगा कि क्यों ना गुरु जी के जन्मदिवस पर उनकी ही कृति के विषय में लिखूँ ? तो लिखने के पहले ज़रूरी था विषय को पढ़ना... तो कल सुबह से पहले तो बची हुई कहानियों को पढ़ा और अब आधी रात में पढ़ने के बाद उपजे विचारों को लिखने का प्रयास कर रही हूँ। प्रयास इस लिये कि किसी चीज को लिखना और समझना दोनो दो स्तर का होता है। लिखने वाला अपने मानसिक स्तर पर जा कर लिखता है और पढ़ने वाला अपने मानसिक स्तर पर गिर कर समझता है। साथ ही गुरु जी की कहानियाँ अधिकांशतः प्रतीकों के माध्यम से लिखी गई है, अब इन प्रतीकों को लिखते समय गुरु जी ने किस तरह समझाना चाहा और मैने किस तरह समझा ये तो ....

इस संग्रह के विषय में नीरज जी ने पूर्व में सारी जानकारी यहाँ दे रखी है।

तो कहानी संग्रह की पहली कहानी है क़ुफ्र..! बात बात में धर्म के लिये लड़ने वाला आदमी... धर्म के नाम पर मानवता का संहार करने वाला आदमी कैसे समझौता कर लेता है, अपने आप से जब बात दो जून रोटी की हो। हर क़ुफ्र जायज़ हो जाता है, जब लगने लगे कि इस के बिना बच्चो का पेट भरने का कोई उपाय ही नही। एक हक़ीकी कहानी। यथार्थ दर्शाती।

दूसरी कहानी अँधेरे का गणित। समलैंगिकता जैसे विषय पर इतनी सफाई से लिखा जाना मुझे इस कहानी को कथा संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी कहने पर मज़बूर करता है। आज जब कुछ पत्रिकाओं को उठाने के पहले ही पता चल जाता है कि उसमे कहानी छपी होने का मतलब एक खास विषय की अनिवार्यता है, तब ऐसे ही खास विषय को सफाई से बयाँ भी करना और श्लीलता बनाये रखना मुझे लगता है कठिन के साथ चुनौतीपूर्ण कार्य भी है।

तीसरी कहानी घेराव सामान्य छेड़ छाड़ पर सांप्रदायिकता का मुलम्मा चढ़ जाने के बाद हुए हश्र की कथा है। और जब मरने मारने वालों के नाम हिंदु और मुसलमान मात्र रह जायें तब जनता, प्रशासन और मीडिया पर अलग अलग इसकी क्या क्रिया प्रतिक्रिया होती है इसका हाल ए बयाँ है ये कथा।

आंसरिंग मशीन को आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं। तथाकथित साहित्यकारी में विद्यमान तथाकथित विद्वानो के गणित की कहानी, जिसमें ईमान को ताले में बंद कर के रखना ही आवश्यक हो जाता है। ऐसी परिस्थति में नये नये आये सुदीप का इस माहौल से सामंजस्य बिठाने के क्रम को दर्शाती है ये कथा।

ईस्ट इण्डिया कंपनी जो कि कहानी संग्रह नाम भी है, एक अद्भुत कहानी है जिसमें खड़े पति और खड़ी पत्नी को ईस्ट इण्डिया कंपनी का रूपक बना कर अनोखा व्यंग्य प्रस्तुत किया गया है।

हीरामन एक संवेदनशील कहानी है। आधुनिक कथा हेतु आवश्यक तत्वों का समावेश इसमें भी बखूबी किया जा सकता था। मगर कहानी संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ती है। मालिक के प्रति वफादार हरिया का खुद की नज़रों में गिर कर भी नमक का कर्ज़ अदा करना और स्वयं खाली हाथ रह जाना। कहानी अंत की ओर जैसे जैसे बढ़ती है रोमावलियों में सिहरन पैदा हो जाती है।

घुग्घू कहानी में घुग्घू को प्रतीक बना कर नारी के गूढ़ मन की तुलना करना, मुझे तो बहुत भाया। ये कहानी भी मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत अच्छी लगी। "एक छोटा सा कीड़ा घुग्घू जो जब भी धूल में घुसता है तो ऊपर एक शंकु के आकार का गडढा छोड़ जाता है, और इसी शंकु के अंतिम सिरे पर धूल में कहीं गहरा छुपा होता है घुग्घू " वाक्य से जिस घुग्घू का परिचय कराया गया उससे मैं स्वयं असल में परिचित नहीं हूँ। मगर बच्चों के लाख प्रलोभनो और तीली घुमा घुमा कर ढूँढ़े जाने के बावजूद बाहर ना आने वाले घुग्घू की शालिनी के संस्कारिक मन से तुलना कहीं स्त्री विमर्श का सटीक रूप लगती है।

तस्वीर में अवांछित कहानी में दुनियादारी के फेर में फँसा वो व्यक्ति जो खुद के घर में अपरिचित हो गया है। प्रतीको का भरपूर प्रयोगा इस कहानी में भी किया गया है। आदमी के अंदर बैठे दूसरे आदमी की उहापोह, कुंठा और मंथन इस कहानी के अंग हैं।

एक सीपी में तीन लड़कियाँ रहती थीं, हरी, नीली और पीली कहानी में भी प्रतीकों का अनोखा खेल है। हरी, नीली और पीली लड़कियों के माध्यम से तीन व्यक्तित्वों की चर्चा और तीनों का अंत एक ही होना, कहीं फिर से नारी विमर्श नही तो कन्या विमर्श की श्रेणी में तो आता ही है।

ये कहानी नही है के मुख्य पात्र मैँ ने जो देखा वो सहजता से बयाँ किया... पढ़ने वाले अपने अपने अर्थ लगा सकते हैं।
रामभरोस हाली का मरना भी एक सामान्य घटना को सांप्रदायिक जामा पहनाने के कथानक को ले कर बनाई गई कहानी है। इस कहानी में विशुद्ध गाली को पढ़ना मुझे चौंकाता है, वरना तो बहुत सी ऐसी जगह भी बच के निकल गये हैं जहाँ कहानी की माँग के नाम पर बहुत कुछ लिखा जा सकता था।

तमाशा
एक विद्वान बाप की अनपढ़ पत्नी की संतान को दिया गया नाम है। जिसने शादी के मौके पर पिता को कन्यादान ना देने का आग्रह इस आधार पर किया है कि दान की वस्तु का अपना होना आवश्यक है और पलायनवादी इस पिता ने लड़की को कभी अपना नही बनने दिया। ये एक संवेदनशील कथा है।

शायद जोशी कहानी में एक कहानी के साथ पूरे गीत की समीक्षा का प्रयोग अनोखा प्रयोगा है। मेरे जैसे चटू लोगो के बात करने पर लोग क्या करते होंगे इसका थोड़ा बहुत अनुभव हुआ इस कहानी के साथ। जिसमें शायद जोशी जैसे व्यक्ति के समस्या पुराण को प्रत्यक्ष में सुनने वाला मन ही मन शंकर हुसैन फिल्म के गीत
अपने आप रातों में चलमने सरकती है,
चौंकते हैं दरवाजे सीढ़िया धड़कती है

के मुखड़े सहित तीनों अंतरों का सुंदर विश्लेषण करता है।

छोटा नटवर लाल कहानी मैँ अब तक नही पढ़ पाई। अतः उस संबंध में कुछ नही कह पाऊँगी।

और कहानी मरती है भी मुझे विशेष रूप से पसंद आने वाली कहानी में से एक है। जिसमें कहानी के पात्र असली बन कर स्वयं की नीयति से विद्रोह करते है और एक लेखक के ऊहापोह को दर्शाते हैं।

तो ये थी मेरी त्वरित प्रतिक्रिया ईस्ट इंडिया कंपनी के विषय में।

चलते चलते पढ़िये वो कविता जो मैने बी०ए० प्रथमवर्ष में अपने संगीत गुरू श्री काशी नाथ बोड्स के लिये उनके जन्मदिन पर लिखी थी। पाँच अंतरों वाली इस कविता का आगाज़ और अंजाम ही याद रह गया है अब। आज गुरु जी के जन्मदिन पर पुनः उन्हे संबोधित करते हुए...!



मिले राम को विश्वमित्र,, एकलव्य को द्रोणाचार्य मिलें,
कबिरा को रामान्द मिलें, हमको बस गुरु का प्यार मिले।

यदि विश्वमित्र ने रघुवर को शिक्षा का कोई दान दिया,
प्रभु ने भी उनकी रक्षा में वन में धनु का संधान किया।
आचार्य द्रोण ने शिक्षा के बदले में अँगूठा माँग लिया,
तो रामानंद ने भी कबीर पर पैर धरा तब ज्ञान दिया।
हम से सर उन ने कुछ लिया नही,
बस प्यार दिया, बस प्यार लिया
हमको भाविष्य में भी उनसे
ये प्यार भरा आगार मिले।

कबिरा को रामान्द मिलें. हमको बस गुरु का प्यार मिले।

होंगे कितने ही शिष्य, आप पर है अधिकार अनेकों का,
इस तुच्छ चीज़ सी कंचन को पर दे दें इतना सा मीका,
जब नेह सभी को बाँट चुकें,छोड़े से गुरुवर हाथ रुकें,
एक नेह दृष्टि दीजेगा डाल, जिससे मेरा संसार खिले,
कबिरा को रामान्द मिलें. हमको बस सर का प्यार मिले।

32 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

गुरु बिना न उतरे पार,गुरु की महिमा अपरंपार...
बढ़िया प्रस्तुति..धन्यवाद!!!

अनूप शुक्ल said...

जेरी की बधाई शहंशाह को। पंकज जी को जन्मदिन की मंगलकामनायें।
जेरी का लिखना दिन पर दिन उंचा होता जा रहा है।

Kishore Choudhary said...

गुरु के लिए ढेर सारी शुभकामनाये,
अभी मेजर के ब्लॉग पर भी दे कर आ रहा हूँ आपके यहाँ तो अनिवार्य ही है. बहुत सुंदर लिखा है. आपका नाम ही रिश्तों की महक का दूसरा नाम है. ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए मैंने अपने विभागीय लाईब्रेरी से कहा है मंगवाने को उनका वादा है इस वित्तीय वर्ष में जरूर आएगी. आपकी समीक्षा ने जिज्ञासा और बढा दी है.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

शुक्रिया कंचन बेटे ...
गुरूजी की सालगिरह ११ तारीख को
और अमिताभ भैया की भी :)
कल रेखा जी की भी थी ..........
सारे ग्रेट लोग
एक साथ उत्सव मना रहे हैं :)
समीक्षा - शानदार
कविता भी बढिया -
आपके गुरूजी और
हमारे गुणी अनुज
भाई श्री पंकज जी को
स स्नेह
साल गिरह की अनेकानेक बधाइयाँ
-
- लावण्या

गौतम राजरिशी said...

गुरूदेव को जन्म-दिन की समस्त शुभकामनायें...

मैं तो चकित रह गया कंचन, पूरी रात वो क्या कहते हैं अँग्रेजी में "मिडनाइट ओयल बर्न" करने वाली बात...वही माजरा रहा होगा तुम्हारे संग।

"ईस्ट इंडिया कंपनी" तो मेरी चंद पसंदीदा कहानी-संग्रहों में से एक बन चुकी है। नहीं,महज इस बात के लिये तारीफ़ नहीं कर रहा कि वो हमारे गुरूजी की किताब है....और तुम्हारी इस बात से तो शत-प्रतिशत सहमत हूँ कि जिस तरह से प्रतिकों का इस्तेमाल किया है गुरूदेव ने अपनी इन तमाम कहानियों में, वो लाजवाब है।

तुम्हारी कविता पहले ही सुन चुका हूँ। फिर से तारीफ़ करूँ क्या?

लेकिन इस जेरी वाले कार्टून ने सबसे ज्यादा मन को लुभाया...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पंकज जी को इस खूबसूरत बधाई के लिए आप को बहुत बहुत बधाई! और मंगलकामनाएँ!

गौतम राजरिशी said...

"...और कहानी मरती है" के साथ नाइंसाफी क्यों?

Udan Tashtari said...

मास्साब को जन्म दिन की बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ. अब तुम मॉनीटर हो तो तुम मिठाई खिलाओ मास्साब के जन्म दिन की. फटाफट!!

Udan Tashtari said...

मास्साब की पुस्तक हमने पढ़ी और बस दीवाने हो लिए..

सतीश सक्सेना said...

हालांकि मैं गीत ग़ज़ल लिखनें की कला में नितांत अज्ञानी हूँ, मगर आपके गुरु शायद आज के शिष्य-गुरु परंपरा में सबसे लोकप्रिय गुरु हैं !

निर्विवादित पंकज सुबीर के व्यक्तित्व से प्रेरणा मिलती है !

रविकांत पाण्डेय said...

गुरू जी को जन्मदिन मुबारक हो। परमात्मा उन्हे सारी खुशियां दे।

पंकज सुबीर said...

जेरी का भेजा हुआ चाकलेट का डब्‍बा टाम को मिल चुका है । और टाम ने उसे पूरा का पूरा समाप्‍त भी कर दिया है । और अब कम्‍प्‍यूटर पर अपना पसंदीदा शो टाम एंड जेरी देख रहा है । जेरी ने जन्‍मदिन पर जो शुभकामनाएं दीं उनके लिये टाम आभारी है तथा एक दिन की युद्ध विराम की घोषणा करता है ।

पारूल said...

"तो रामानंद ने भी कबीर पर पैर धरा तब ज्ञान दिया" जेरी बहुत सुन्दर...
गुरू जी को जन्म दिन की बहुत बधाई व् शुभकामनाएँ.

दिगम्बर नासवा said...

गुरूदेव पंकज जी...... जन्म दिन की बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ .....

"अर्श" said...

ईस्ट इंडिया कंपनी इस किताब को सबसे पहले खरीदने वाला इंसान मैं हूँ इसके लिए अपने आपको गौरवान्वित और भाग्यशाली समझता हूँ , इसके विमोचन पे मैं भी मौजूद था और ऐसा महसूस कर रहा था जैसे मैं अपने भगवान् के साथ हूँ जितने समय तक गुरु जी के साथ था मन में अजीब सी हलचल हो रही थी , देर रात तक उनके साथ रहना उनके साथ घूमना और बातें करना मैं तो बस उन्हें निहारता ही रह रहा था के मेरे प्रभु मेरे सामने हैं , पहली मुलाक़ात पे मैं उनके पैर छूने के लिए जैसे ही झुका उन्होंने मुझे अपने सिने से लगा लिया , मेरे मन में क्या हो रहा था उस चीज को बता पाने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है ... पुस्तक की समीक्षा बेहद आलातरीन तरीके से आपने की है ,,, हर चप्टर के दिल को सामने आपने निकाल कर रख दिया है , गुरु जी के लेखनी के बारे में मैं भला क्या कह सकता हूँ पुस्तक पढ़ने के बाद ही लोग उनके जादूगरी लेखन का सुखद स्वाद के अनुभूति से अबिभूत होंगे... इनके लिए कुछ कह पाना मेरे सामर्थ्य की बात नहीं है ,.. ये टॉम और जेरी की बात बहुत पसंद आयी ... गुरु जी से मेरे लिए काजू की कतली की थोडी सिफारिश कर दो ,.. मैं उनका सबसे बिगडा हुआ शिष्य हूँ... कही मुझे कनिथी ना पड़ जाये ... गुरु जी को सादर चरणस्पर्श

अर्श

Manish Kumar said...

जन्मदिन की हार्दिक बधाइयाँ सुबीर जी को ! उनके जन्मदिन पर उनकी किताब पर समीक्षात्मक टिप्पणी दे कर आपने उन्हें और हम सब को बेहतरीन उपहार दिया है।

दर्पण साह "दर्शन" said...

SAHI HAI KANCHAN JI...

...JHAMARI TARAF SE BHI 'PANKAJ JI' JAISE ADBHOOT RACHNAAKAR AUR AAPKE GURU DEV KO SHUBH KAMNAAIYEN

Anil Pusadkar said...

गुरुदेव को हमारी भी बधाई।

manu said...

यहाँ भी आपके गुरु जी को जन्मदिन की मुबारक देते हैं ....

ताम एंड जेरी के साथ साथ और भी सभी कार्टून हमें पसंद हैं..
और ये कार्टन कुछ ज्यादा ही मस्त है कंचन गुडिया...

केक में मोमबत्ती की जगह पेन्सिल की लगाई जा रही है जी...?
ये कौन सी नयी शरारत है गुडिया की ...??
:)

कुश said...

जिज्ञासा हो रही है पुस्तक पढने की.. जन्मदिन की बधाई हम भी दे देते है..

अंकित सफ़र said...

गुरु जी को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनायें......................
कंचन दीदी आपने बहुत अच्छी समीक्षा की है "ईस्ट इंडिया कंपनी" की, गुरु जी हम सब के लिए एक प्रेरनादायी स्रोत हैं. ईश्वर उन्हें असीम खुशियाँ दे और उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करें.
आखिरी में..........................आप ही के शब्दों में "कबिरा को रामान्द मिलें. हमको बस गुरु का प्यार मिले।"

अभिषेक ओझा said...

थोडी देर पहले मेजर साहब की पोस्ट से यहाँ आ रहा हूँ. पुस्तक तो कमाल की लग रही है. और शिष्यों को देखकर ही गुरूजी के प्रति श्रद्धा बढ़ जाती है इससे अधिक और क्या कहूं :)

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह.. साधुवाद........

राकेश जैन said...

Guru JI ko Janmadivas kee subh kamnayen...

Nirmla Kapila said...

गुरू के प्रति शिश्या का ये तोहफा लाजवाब है पुस्तक की समी़अ पढ कर पुस्तक पढने को मन उतावला हो रहा है मंगवाते हैं । आदरणीय सुबीर जी को बहुत बहुत बधाई और उनके सभी शिश्यों को भी जो इस गुरू शिश्य की पवित्र परंपरा को प्यार से निभा रहे हैं शुभकामनायेम्

प्रकाश पाखी said...

गुरुदेव को फिर जन्म दिन की शुभकामनाएं..!
ईस्ट इंडिया कम्पनी की समीक्षा के लिए आभार...इसको पढने की इच्छा है.
टॉम और जेरी का युद्ध विराम?
हा!हा!
विशवास नहीं होता!

venus kesari said...

गुरुदेव को जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनाएं..!

venus kesari

सुशील कुमार छौक्कर said...

सबसे पहले हमारी तरफ से गुरु जी को बहुत बहुत शुभकामनाएं। बहुत सुन्दर और प्यार से गुरु जी को याद किया आपने।

संजीव गौतम said...

कंचन जी नमस्कार
अभी आपकी दो पोस्ट और सुबीर जी के यहां हिमांशी की ग़ज़ल पढी. 'खानदानी मितभाषी' आनन्द आ गया इस जुमले को पढकर. वाह!
हिमांशी का आगाज़ अद्भुत है. उसे संभाल कर रखियेगा. बहुत कीमती नग है. एक दिन अपनी चमक से हिन्दी साहित्य जगत को रौशन करेगी.

Shardula said...

प्यारी कंचन, हाँ तो आपका लेखन भी आपके कथन की तरह लंबा लंबा है, और ऊंचा-ऊंचा भी ! बहुत रस से पगा सा लिखती हो :) सुबीर भैया का ये कथा संकलन मेरे पास भी है खुशकिस्मती से! मुझे भी बहुत पसंद है.

ओम आर्य said...

बढ़ा दो अपनी लौ
कि पकड़ लूँ उसे मैं अपनी लौ से,

इससे पहले कि फकफका कर
बुझ जाए ये रिश्ता
आओ मिल के फ़िर से मना लें दिवाली !
दीपावली की हार्दिक शुभकामना के साथ
ओम आर्य

ओम आर्य said...

बढ़ा दो अपनी लौ
कि पकड़ लूँ उसे मैं अपनी लौ से,

इससे पहले कि फकफका कर
बुझ जाए ये रिश्ता
आओ मिल के फ़िर से मना लें दिवाली !
दीपावली की हार्दिक शुभकामना के साथ
ओम आर्य