Friday, September 12, 2008

ना ले के जाओ, मेरे दोस्त का जनाजा है,


वो गीत जो चलता रहा मेरे मन में मेरे आँसुओं के साथ, वो गीत जो एक दिन यूँ ही पूरे दिन सुनने के बाद ऐसे ही डर गई थी कि कभी किसी के साथ ये सत्य हो जाये तो क्या होगा और पूरी रात क्या दो दिन नही सो पाई थी.... वो गीत जो सिसकियों के साथ जुबान पर आया जाता था उस दिन...! शायद सुना हो तुमने भी...!




ना ले के जाओ, मेरे दोस्त का जनाजा है,

अभी तो गर्म है मिट्ती ये जिस्म ताज़ा है,

उलझ गई है कहीं साँस खोल दो इसकी,

लबों पे आई है जो बात पूरी करने दो,

अभी उमीद भी जिंदा है, ग़म भी ताज़ा है

ना ले के जाओ, मेरे दोस्त का जनाजा है,
अभी तो गर्म है मिट्ती ये जिस्म ताज़ा है,


जगाओ इसको गले लग के अलविदा तो कहूँ,

ये कैसी रुखसती, ये क्या सलीका है,

अभी तो जीने का हर एक ज़ख्म ताजा है

ना ले के जाओ, मेरे दोस्त का जनाजा है,
अभी तो गर्म है मिट्ती ये जिस्म ताज़ा है,

33 comments:

neeshoo said...

bahut accha

फ़िरदौस ख़ान said...

जगाओ इसको गले लग के अलविदा तो कहूँ,
ये कैसी रुखसती, ये क्या सलीका है,
अभी तो जीने का हर एक ज़ख्म ताजा है
ना ले के जाओ, मेरे दोस्त का जनाजा है,
अभी तो गर्म है मिट्ती ये जिस्म ताज़ा है,

बेहद मार्मिक रचना है...

vimmi said...

bahut hi dil ko chhuta hua geet hai ye.....poori tarah se maine ise mahsoos kiya hai.isliye aapko kuchh likhne se khud ko na rok paai ........waise main parul ki frnd hoon aur uske blog ke thrugh akser aapka blog bhi padhti hoon...

sabhar.......

डॉ .अनुराग said...

कंचन क्या ये वही गीत है जो फिजा फ़िल्म में है ?तुम बहुत सेंटी बंदी हो यार....

mamta said...

दिल को छू लिया इस गीत ने और इसकी गायकी ने।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर ..सुनवाने का शुक्रिया

विवेक सिंह said...

बेहद मार्मिक रचना है...

Parul said...

sakhi ho kar rulati ho??

अभिषेक ओझा said...
This comment has been removed by the author.
अभिषेक ओझा said...

भावुक कर देने वाला गीत !

रंजना said...

सचमुच बहुत ही मार्मिक दिल हिला देने वाली पंक्तियाँ.

sidheshwer said...

गीत बहुत अच्छा है.इस गीत के गायक का कुछ पता तो दीजिए.

कंचन सिंह चौहान said...

Vimmi Ji baat kuchh aisi hi thi ki ye geet mahasus poori tarah se maine bhi kiya hai.aur jis ke liye kiya aaj us ki 7th death anniversary hai.

ji ha.n anurag ji sahi kah rahe hai ye vahi geet hai.senti bato pe senti hona hi padta hai kya karu.n?

Siddheshwar kuchh baat karne kaa man nahi ho raha tha, isiliye kuchh bhi nahi likha... asal me post ka uddeshya gana sunvana tha hai nahi bas baat ye thi ki mai use aise yaad karna chahati thi...!

aap sabhi logo se kshamam jinhe post adhuri lagi.

संवेदनाऍं said...

बहुत मार्मि‍क और संवेदनाओं से परि‍पूर्ण रचना, वि‍स्‍तार से टि‍प्‍पणी फि‍र..

संवेदनाऍं said...

बहुत मार्मि‍क और संवेदनाओं से परि‍पूर्ण रचना, वि‍स्‍तार से टि‍प्‍पणी फि‍र..

Shastri said...

आपकी रचना, एवं टिप्पणी द्वारा उसकी पृष्ठभूमि देने, के लिये आभार !!



-- शास्त्री जे सी फिलिप

-- समय पर प्रोत्साहन मिले तो मिट्टी का घरोंदा भी आसमान छू सकता है. कृपया रोज कम से कम 10 हिन्दी चिट्ठों पर टिप्पणी कर उनको प्रोत्साहित करें!! (सारथी: http://www.Sarathi.info)

अनूप शुक्ल said...

पढ़ लिया सुन लिया। हमारी संवेदनायें।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

मार्मिक सिहरादेनेवाली पुकार है दिल को चिरकर उठती हुई :-(

मीत said...

ओह ! ये क्या सुना दिया कंचन ? ये तो गूंजता रहेगा दिमाग में बहुत देर तक .... It's too good. It haunts...

राकेश खंडेलवाल said...

अच्छी लगी आपकी रचना. पिछला गीत भी सुन्दर था. पिछले गीत में (?) हैं. जिन्हे भाआड ंऎम फॊऒचःऒऒम्घाआ

Rohit Tripathi said...

arre wah.. pahli baar sunda.. lekin bahut acha laga.. ab Kanchan ji yeh bataye ki yeh song ab hume milega kaha se?

New Post :
I don’t want to love you… but I do....

योगेन्द्र मौदगिल said...

ये कैसी रुखसती, ये क्या सलीका है,
अभी तो जीने का हर एक ज़ख्म ताजा है

Maarmik
संवेदनाऒं को झकझोरती प्रस्तुित

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत खूबसुरत रचना है। सुनवाने का शुक्रिया।

sachin said...

Aap bhi aate rahiye hume bhi bulate rahiye,
Dosti jurm nahi dost banate rahiye,
tasveer to jehan mein aapke bhi hogi koi,
kabhi to ban jaayegi tasveer banate rahiye...

very nice blog...

http://shayrionline.blogspot.com/

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

जगाओ इसको गले लग के अलविदा तो कहूँ,
ये कैसी रुखसती, ये क्या सलीका है,
अभी तो जीने का हर एक ज़ख्म ताजा है।

मार्मिक गीत है, उपरोक्‍त पंक्तियॉं सीधे दिल में उतर गयीं।

Sangeeta Kumari said...

http://literatureindia.com/hindi/content/view/15/28/

आपका शुक्रिया...

रवीन्द्र रंजन said...

दुर्भाग्य स‌े मैने पहले यह गीत कभी नहीं स‌ुना था। इतने अच्छे गीत स‌े रूबरू कराने का बहुत-बहुत शुक्रिया।

Dr. Nazar Mahmood said...

wahhhhhh kya jazbaat ko lafzon ki chadar chadhayi gayi hai is geet main, sab kuch keh gaya aur sab baaqi hai

अर्शिया अली said...

अरे वाह, आप भी लखनउ की हैं, यह जानकर खुशी हुई।

गौतम राजरिशी said...

.....आज फ़ुरसत में एक पोस्टियाने के बाद आपकी तमाम प्रस्तुती को पढ़ा. दिल छुने वाली रचनायें.खास कर ये "अभी तो गर्म है मिट्ती ये जिस्म ताज़ा है" वाली....उफ़्‍!!!!

...और मेरे ब्लौग पे आके दुबारा तारिफ़ करने के लिये नवाजिश करम,शुक्रिया मेहरबानी.....

ललितमोहन त्रिवेदी said...

कंचनजी ! मेरे गीत पर टिप्पणी के लिए धन्यवाद !आज आपका प्रस्तुत गीत सुना जो अंतस को हिलाकर रख देता है !सच कहूँ तो मैं आपको ऐसे दर्दनाक गीत पोस्ट न करने के लिए लिखना चाहता था परन्तु लेबल "श्रद्धांजलि" और आपकी टिप्पणी पढ़कर सन्न रह गया हूँ कि क्या कहूँ और क्या न कहूँ ! वेदना भी जीवन का हिस्सा है परन्तु पर्याय नही !आपके सकारात्मक और आशापूर्ण गीतों की प्रतीक्षा है !

shama said...

Aapko itne achhe compliments milen hain ki mera to kaheen kho jayega...Lekin padhke dil bhar aaya...aisahee ek prasang mujhpe guzraa tha...laga wahee jee rahi hun phirse...!

vishal said...

जगाओ इसको गले लग के अलविदा तो कहूँ,
ये कैसी रुखसती, ये क्या सलीका है,

अभी तो जीने का हर एक ज़ख्म ताजा है

उम्दा प्रस्तु‍ति :