Monday, June 18, 2007

भाग्यहीन कौन

अट्ठाररह दिन प्रलय मचा कर, खत्म हुआ जब कुरुक्षेत्र रण,
अंत एक सबका दिखता था हों अभिमन्यु या दुर्योधन |
द॓ख देख लीला विनाश की, बहुत व्यथित था इक व्याकुल मन,
"मुझको इसी बात का डर था", बिलख बिलख कहते थे अर्जुन.
"कृष्ण कहो अब कौन भला है भाग्यहीन मैं या दुर्योधन ?"

"तात भ्रात की लाशों पर मैं, राज भला क्या कर पाऊँगा?
नर से हीन धरा ले कर के क्या नरेश मै कहलाऊँगा ?
यही सोच गांडीव धरा था, पर तुमने ही विकाल करा था,
गीता का उपदेश सुना कर, एक विराट रूप दिखला कर,
तुमने क्यों कर बदल दिया था बोलो कान्हा ये मेरा मन
तुम्ही कहो अब कौन भला है भाग्यहीन मै या दुर्योधन ?"

"स्वर्ग मिला करता है उनको, वीरगति जिनको मिलती है,
और बचे वीरों की खातिर वीरभोग्या ये धरती है |
तुमने ये उपदेश दिया ‍पर बोलो किसका भोग करूँ मै ?
इतनी मौतें देख देख, मन तो करता है जोग धरूँ मै |
इन आँखों के आगे मेरे तात सदृश गुरु द्रोण को मारा,
वो मेरा अपना भाई था, हाय निहत्था कर्ण बेचारा |
रोम रोम बिंध गया पितामह का मारे मैने इतने शर,
किया शिखंडी को आगे मै हाय हो गया इतना कायर |
इतने अपनों की मौतों का भार सहूँ कैसे मधुसूदन,
तुम्ही कहो अब कौन भला है भाग्यहीन मै या दुर्योधन ?"

"मैं कैसे कह दूँ दुर्योधन भाग्यहीन था तुम्ही कहो,
तात, भ्रात पुत्रों के संग मे जिसने जीवन जिया प्रभो!
और मौत है अंत सभी का, वीरगति है वर क्षत्रिय का,
पर जीवन भर तो दुर्योधन ने हमको हर कदम पे जीता |
फिर चाहे वो लाक्ष्यागृह हो या कि द्यूत खेल भगवन,
हमको ही हर बार भटकना पड़ा बताओ क्यों वन‌‌‍‍ वन ?
तुम्ही कहो अब कौन भला है भाग्यहीन मै या दुर्योधन ?"

पुत्रहीन मै, पित्रहीन मै, भाग्यहीन सबसे बढ़ कर,
खुद से प्रश्न किया करता हूँ, युद्ध किया मैने क्यों कर ?
सूनी गोद पांचाली की, गोद सुभद्रा की सूनी,
सूनी माँग सुभद्रा की है, और मेरी नजरें सूनी |
राजतिलक मे कहो कन्हैया, कौन कहे आशीर्वचन ?
मैने इन्ही हाथ से तो है मार दिये अपने गुरुजन |
गँवा दिया अभिमन्यु मैने गए पांचालीनंदन,
किसको मै युवराज बनाऊँ, तुम्ही कहो हे नंनंदन!
दुर्योधन की मौत भली है या अर्जुन का ये जीवन,
जिसको जी कर के मरना है मुझको हर क्षण और हर पल,
तुम्ही कहो अब कौन भला है भाग्यहीन मै या दुर्योधन ?"


सिसक रहे अर्जुन कहते थे, प्रभु कुछ ऐसा कर जाना,
एक नई गीता लिख कर के इस समाज को दे जाना,
लिख देना ये युद्ध नही देता है शांति का उपहार,
इसके बाद मिला करता है जीवन को बस हाहाकार,
शांति, शांति और शांति मात्र ही है शांति का एक विकल्प,
लिख देना अब शांति धर्म पालन का सब ले लें संकल्प |
न कोई अर्जुन सा जीते, ना दुर्योधन सा हारे,
ना कोई पुत्रों की बलि दे ना कोई साजन वारे,
क्या पूरा कर पाओगे प्रभु तुम ये मेरा मधुर सपन,
अब ना युद्ध करें धरती पर कोई भी मैं ना दुर्योधन!

10 comments:

मोहिन्दर कुमार said...

बहुत सुन्दर रचना है कंचंन जी,

एक पौराणिक विषय पर लिखना कुछ आसान नही होता... आप के लिखने से ही लगता है कि आप का शब्दकोष बहुत विस्त्रत है और लेखन में गहरायी है

Manish said...

विचार कर रहा था उस वक्त कृष्ण क्या सोच रहे होंगे ? सब तो उन्हीं का किया करवाया था एक व्यापक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ! पर उनके खुद के लिए क्या था इसमें ?

कंचन चौहान said...

उत्साहवर्द्धन के लिये धन्यवाद मोहिन्दर जी! पौराणिक अथवा समकालीन किसी भी विषय की वेदना जब आप जीने लगते हैं तब कविता स्वयं बह निकलती है ऐसा ही कुछ इस कविता के साथ भी हुआ |

कंचन चौहान said...

यही तो मेरा मन भी अर्जुन बन के सोंच रहा था मनीष जी! और आज भी प्रश्न पर प्रश्न ही चले आ रहे हैं इस उम्मीद में कि कभी तो कोई कृष्ण बन कर उत्तर देगा !

महावीर said...

सारी रचना बड़ी सुंदर है। अंतिम पंक्तियों में एक आदर्श-स्थिति दी गई है जहां दुःखदग्ध जगत और आनन्दपूर्ण स्वर्ग दोनों के एकीकरण का
आभास मिलता है।
सुंदर कविता के लिए धन्यवाद।

maithily said...

"न कोई अर्जुन सा जीते, ना दुर्योधन सा हारे,
ना कोई पुत्रों की बलि दे ना कोई साजन वारे,
क्या पूरा कर पाओगे प्रभु तुम ये मेरा मधुर सपन,
अब ना युद्ध करें धरती पर कोई भी मैं ना दुर्योधन!"

इस कविता को हम तक पहुंचाने के लिये धन्यवाद

कंचन चौहान said...

मैथिली जी एवं शर्मा जी! उत्साहवर्द्धन के लिये हृदय से धन्यवाद

दिनेश पारते said...

पसंद आई यह कविता,
कविता के भाव, अभिव्यक्ति और उपसंहार...तीनों सटीक हैं और बहुत कुछ कहने में सक्षम हैं

कंचन चौहान said...

धन्यवाद दिनेश जी!

गौतम राजरिशी said...

तुमसे मिलने के बाद, तुम्हें जानने समझने के बाद, इस अद्‍भुत रचना का पूरा मंतव्य ही बदल गया है मेरे लिये तो......

उफ़्फ़्फ़्फ़ !