Saturday, May 24, 2014

मैं और कुँदरू

कुछ चीजें पता नही क्यों बहत पसंद आने लगती हैं। इतनी कि आप उन चीजों के नाम से पहचाने जाने लगते हो। और फिर अचानक अंदर ही अंदर उससे ऊब होने लगती है, लेकिन, चूँकि आप उस चीज़ से पहचाने जाने लगे हो इस कारण आप किसी से कह भी नही पाते कि अब उस के साथ वो बात नहीं, बल्कि अजीब विरक्ति सी  हो जाती है।
 
कुँदरू... मेरे जीवन में वही चीज़ कुँदरू है। घर में एक उपेक्षित सब्जी के रूप में जाना जाने वाला कुँदरू, बाबूजी दवारा कभी कभी ही लाया जाता था। ऐसा कहा जाता था कि कुँदरू खाने से रतौंधी हो जाती है। इसलिये यूँ भी लगातार तो उसकी आमद हो ही नही सकती थी। बड़े भईया कहते थे "कुँदरू खाने से दिमाग कुंद हो जाता है।" ये एक अलग समस्या। मेरे पास जितना भी दिमाग था, उतने को ले कर मैं इतनी कांशस थी कि उससे कम नही करना चाहती थी।
 
मगर कुँदरू था कि पसंद ही आता था। पतला पतला कटा हुआ। मेथी मिर्चे से तड़का दे कर बनाया गया। भाभी उसे खूब सोंधा भूनती थीं। वैसे मैं सुबह की रोटी शाम को नही खाती, लेकिन कुँदरू की उस सब्जी के साथ रोटी और चाय खा ली जाती थी।
 
तब कुँदरू फ्रिक्वेंटली खाने पर डाँट भी पड़ती थी ना़ शायद इसलिये वो इतना प्यारा लगता था।
 
खैर ! नौकरी लगी और मैं पहुँची आंध्र प्रदेश। कुँदरू तो यहाँ भी था ही, मगर यहाँ कुँदरू काटने पर खीरे जैसी महक आती थी और कुँदरू का आकार परवल जैसा होता था। यहाँ का कुँदरू उतनी अच्छी तरह भूना नहीं जा सकता था, क्योंकि कुछ पनिहल होता था। फिर भी कुँदरू तो कुँदरू ही होता है ना। मैं बड़े चाव से बनाती थी। शांता अम्मा से मैने उसे दक्षिण भारतीय तरीके से बनाना भी सीख लिया था, जिसमें राई, करी पत्ता का तड़का दे कर, लहसुन कूट के डालते और ट्योमैटो भी (मैने बड़ा पता किया कि अंग्रेजों के आने के पहले टमाटर को तेलुगू में क्या कहते थे ? लेकिन सारी खोज ट्योमैटो पर आ कर खतम हो गई।)
 
आंध्रा मे कुँदरू के साथ का पहला संस्मरण उस समय का है जब मैं तेलुगू बोलना सीख रही थी। मैने सब्जियों के नाम सीखे और पता चला कि कुँदरू को 'गुंडकाय' कहते हैं। आफिस वाले जिन्हे ये बात पता थी छोटे छोटे वाक्य पूछ कर मेरी प्रैक्टिस करवाते रहते थे। उस दिन आफिस पहुँची तो गौड़ जी ने पूछा " एम मैडम ? एम चेस्नावो ?" (क्या मैडम ? क्या पकाया ?)
मैने आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया "गुंडकाय।"
 
वहाँ बैठे सभी लोग अचानक हँसने लगे। मैं समझ नहीं पाई। वैसे भी वहाँ मुझे अजायब घर के प्राणी की तरह ही ट्रीट करते थे सब।
 
करुणा मैम  ने हँस कर पूछा पता " किसका दिल पकाया "


फिर पता चला कि असल में कुँदरू को 'दोंडकाय' कहते हैं। 'गुंडकाय' का अर्थ दिल होता है। असलियत पता चलने के बाद खूब शर्म आई और खूब हँसी  भी

 
अब यहाँ भी सबको पता चल गया था मेरे कुँदरू प्रेम के बारे में। शांता अम्मा के आँगन में कुँदरू की बेल लगी थी। उनका बेटा प्रदीप मेरे जीवन के उन अद्भुत स्नेहियों में एक हो चुका था, जिन पर हमेशा खुश हुआ जा सकता है। यहाँ प्रदीप को चिढ़ थी कुँदरू से। उसे वेंडकाय (भिंडी) प्रिय थी। मेरे कुँदरू प्रेम पर वो खूब चिढ़ाता, मगर शांता अम्मा के हाथ के कुँदरू और पराँठा...ओह ओह !
 
इस बीच छुट्टी मिलते ही मैं कानपुर आई तो सुबह सुबह भाभी को सब्जी में कुँदरू काटते हुए देखा। मैं मुस्कुरा दी। भाभी ने मुस्कुराहट के जवाब में कहा "जब से आप गईं कुँदरू खरीदने का ही मन नही होता है। पहली बार जब अम्मा लाईं तो कुँदरू देखते ही लगा रुलाई आ जाएगी लेकिन अम्मा ले ही आईं थीं तो बनाना तो था ही।"
 
अम्मा के साथ खाना खाने बैठी तो कुँदरू रोटी के साथ लेते हुए वो बोलीं, "कुँदरू देखते ही तम्हारी याद जाती थी। तुम्हारे जाने के बाद जब पहली बार सब्जी के ठेले पर कुँदरू देखा तो बड़ी तेज रुलाई आई। मन तो नहीं हुआ कि खरीदें, लेकिन फिर सोचीं कि सुनीता (भाभी) कहेंगी कि अपनी बिटिया चली गई तो अब उसके पसंद का कुछ बनेगा ही नहीं क्या"


मैं मन ही मन मुस्कुराई। तो सुनीता अम्मा के चक्कर में कुँदरू खा रही हैं और अम्मा सुनीता के चक्कर में और दोनो इमोशनल हैं ये दोनो नहीं बता रहे। "गिरि को गिरीश ढूँढ़ें, गिरिजा गिरीश को।"

 
१३ महीने में लगभग महीने छुट्टी पर रहने के बाद मेरा ट्रांसफर लखनऊ हो गया। घर के पास पहुँचने की खुशी में मुझे यहाँ के लोगो के साथ बिताये अच्छे दिन भी नहीं याद रह पा रहे थे। इमोशनल तो थी, लेकिन जितना वहाँ के लोग थे, उतना नहीं शायद।

 
फिर भी कुशल व्यवहारिक लड़की की तरह मैं हर घर तक विदा लेने गई और उन्हे शुक्रिया दिया, घर से दूर अच्छा साथ निभाने के लिये। हर घर से एक भावुक पल ले कर लौटी, हर घर से एक भाव भरी विदा की निशानी।
 
प्रदीप जाने कितने दिन पहले से सेंटी मारने लगा था। उसके साथ रहने पर तो हमेशा डर रहता था, मेरे भी सेंटी होने का। किसी दिन का उसका मोनोलॉग धीरे से टेपरिकॉर्डर की बटन पुश करने से कैसेट में कैद हुआ आज भी होगा शायद धूल खा रहे कैसेट्स में। मुझे लेने पहुँचे थे भईया और अंशु। अंशु ने जब व्हील चेयर हाथ में लेनी चाही तो बड़े धीरे से उसका हाथ पकड़ते हुए प्रदीप ने कहा "आप को तो अमेशा मिलेगा ये चलाने को, लेकिन अमको अब फिर कबी नई मिलेगा। तो अबी जितने दिन है सिर्प अमको चलाने दीजिये प्लीज।" अंशु ने हँस कर हाथ हटा लिया और फिर कभी कोशिश भी नहीं की। व्हील चेयर ड्राइविंग का फुल लाइसेंस केवल प्रदीप को दे दिया गया।
 
लखनऊ आने के पहले वाले वीकएन्ड पर बाथरूम में कपड़े धुलते हुए कॉलबेल की आवाज़ कान में पड़ी ,दरवाज़ा खोला तो शांता अम्मा हाथ में टिफिन लिए खडी था। आँचल से आँखे पोंछते हुए वो बोल नहीं पा रहीं थी, किसी तरह रुँधे गले से बोलीं " अमारे  हात का आकिरी डोंदाकय आपके लिये ले के आया।"



 
मैं तेलुगू लिखना सीख कर आई थी और उन लोगों को हिंदी सिखा कर आई थी,जिससे चिट्ठी लिखी जा सके। बीच का रास्ता रोमन तो था ही। चिट्टी लिखने का सहज तरीका वही था। प्रदीप का खत आया "धीधी!" (मैने अमूमन वहाँ द के लिये dh और त के लिये th ही पढ़ा है) वो बैकयार्ड में दोंडकाय का जो क्रीपर है ना उसको देखने से तेरा बहुत ज्यादा याद आता है। मेरा उदर जाने को मन नई ओता। वो क्रीपर बहुत परेसान करता था दीदी। एक दिन मैने उसे पूरा उकाड़ दिया। अम्मा बउत गुस्साया मेरे ऊपर। लेकिन मै उसे उकाड़ के फेंक दिया। लेकिन कल देखा तो उदर एक और पौदा उग आया धीधी ! मैने तो मन में सोचा ये दीदी का दोंडकाय बी ना एकदम की दीदी की ही तरा है। जितना भी कोसिस कर के सोच लो कि उसको याद नई करना ! फिर कईसे ना कईसे तो वो याद आ ही जाता है।"
 

 
आंध्र प्रदेश छोड़ते हुए उतना कष्ट नहीं हुआ था। लेकिन यहाँ आने के बाद लगता था कि जिंदगी में कुछ अजीब घट कर खतम हो गया। प्रदीप की ये बात कभी नही भूलती।
लखनऊ में भी दीदी को जब कुछ पसंदीदा बनाना होता तो कुँदरू ही बनाती। अब पिंकू बाज़ार से जब कुँदरू लाता है तो "आपका कुँदरू आया है।" का अहसान मिश्रित प्रेम जरूर दिखाया जाता है।

 
लेकिन असलियत तो ये है कि जाने कब उस कुँदरू से मेरा जी भर गया। विरक्ति हो गयी उस नाम से जिसे मेरे साथ जोड़ा जाता है हर बार। मै किसी को बता भी नही पाती। कैसे बताऊँ कि प्यार हमेशा एक जैसा नहीं रहता। हम ना चाहते हुए भी जाने कब किसी चीज़ से ऊब जाते हैं। बताओ तो अपने अस्थिर स्वभाव पर गाली खाओ  "आप तो ऐसे ना थे" की दुहाइयाँ सुनो। तो इससे अच्छा शांत ही रहो, ऊपरी मन से सही दिखाते रहो की चाहत पहले सी बरकरार है। उसे पा कर खुश होने का दिखावा करो और मन ही मन खुद के अजब गजब व्यक्तित्व पर हैरान हो.


वैसे हम सब के जीवन में कुछ ऐसे कुँदरू होते हैं ना....!!

9 comments:

मीनाक्षी said...

हमेशा की तरह भावनाओं से ओतप्रोत संस्मरण , अन्तिम पैराग्राफ में मानव स्वभाव का गहराई से किया गया विश्लेषण प्रभावित करता है !

Shekhar Suman said...

आपकी इस पोस्ट को आज के ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है...

shikha varshney said...

यथ श्री कुंदरू कथा :) . बेहद प्यारा संस्मरण.
यह मानव स्वभाव है कि जिस चीज़ के लिए हमें मना किया जाए मन उसी की तरफ खींचता है. फिर वह हमारी पहचान बन जाता है और आगे चलकर एक तरह का बंधन भी. जिससे हम खुद को जुड़ा हुआ पाते हैं और यह कहीं न कहीं हमें हमारे अपनों से जोड़े भी रखता है.

shikha varshney said...

यथ श्री कुंदरू कथा :) . बेहद प्यारा संस्मरण.
यह मानव स्वभाव है कि जिस चीज़ के लिए हमें मना किया जाए मन उसी की तरफ खींचता है. फिर वह हमारी पहचान बन जाता है और आगे चलकर एक तरह का बंधन भी. जिससे हम खुद को जुड़ा हुआ पाते हैं और यह कहीं न कहीं हमें हमारे अपनों से जोड़े भी रखता है.

गौतम राजरिशी said...

बहोत अच्छा किया धीधी वो दोन्डकाय को याद कर तुमने एक पोस्ट तो राइट किया ना...बहोत अच्छा किया धीधी | हम बहोत हैप्पी हुआ | अबी देखा हम , पिछला पोस्ट तुम फाइव मंथ पीछे लिखा था | अच्छा नहीं है धीधी...नहीं मेरा मतलब पोस्ट अच्छा है...ये इतना इतना दिन बाद लिखना अच्छा नहीं है | कोसिस करके लिखो ना धीधी जल्दी जल्दी !!!

sudhakar mishra said...

ये कुंदरू तो रूपक बन गया मेरे लिएI

SKT said...

Ek dialogue yaad aa raha:
Bas bhi karo, rulaaogi kya!
..kundaroo se!!

वाणी गीत said...

कुंदरू की आड़ में मानव मनोविज्ञान का रोचक वर्णन !

"अर्श" said...

महीनों बाद आया इस कोने / पन्ने पर .... बहुत से पुराने लोग अब भी यहाँ सक्रिय हैं देख कर अच्छा लगा .... लम्बी पोस्ट है फुर्सत से पढूंगा !