Wednesday, December 8, 2010

तुझे सब है पता.... है ना माँ !


माँ ना जाने कब से नाराज़ होती थी ? याद नही ...!

इसलिये नही याद कि तब बहुत सारे कवच थे, बाबूजी, दोनो दीदियाँ और मेरी सबसे बड़ी भाभी। इन सब के बीच गर्मियों में दोपहर १२. ३० और सर्दियों मे शाम के लगभग ३.३० बजे मिलने वाली माँ का गुस्सा याद नही...!

बहुत छोटे पर जब अपनी बात पूरी ना होने पर अपने ही बाल उखाड़ने का झूठा नाटक करती थी तब अक्सर सबके हँस देने के बाद एक दिन माँ का डण्डा ले कर बैठना कि अब अगर सारे बाल नही उखाड़ लोगी, तो मार खाओगी....! वो याद है अब तक।

और तो बस ज्यादा याद नही। याद तब से है जब मैं और माँ दोनो ही बदलाव के दौर से गुजरे। ९० में, जब मेरी टीन एज यूँ ही मुझमें बहुत सारे परिवर्तन कर रही थी, उसी समय दीदी की शादी के साथ मेरे पहले प्रेम का विछोह और बाबूजी के जाने से मेरे अचानक कवच रहित हो जाने के साथ ही माँ भी बहुत बड़े परिवर्तन से गुजर रही थी।

उनका सबसे बड़ा संबल...! उनका जीवन साथी...! अचानक बिना कुछ कहे सुने अपनी अबूझ यात्रा पर जाने को ऐसे तैयार हुआ कि लाख सिर पटकने, लाख वास्ते देने, लाख यादें दिलाने पर भी रुका नही।

मैने अपने माँ बाबूजी जैसा जोड़ा अब तक नही देखा। सुना है जब माँ का रिश्ता लेकर नानाजी अपने सिंगापुर के दोस्त के घर अच्छी पढ़ाई कर रहे (उस समय और उस क्षेत्र के अनुसार) उनके बेटे के लिये गये थे, तो ये सोच कर रिश्ता लौटा दिया गया था कि लड़की नौकरी में है और लड़का पढ़ रहा है अभी। और तब बाबूजी ने अपनी भौजाई, मेरी बड़ी माँ से कहा कि वो जो आये हैं, उन्हे हाँ कह दो, उनकी लड़की जवार में सबसे पढ़ी लिखी है, और बगिया तक गये नानाजी को रोक लिया गया था।

मेरी होशदारी में अम्मा जाने कौन कौन से उलाहने देतीं और बाबूजी के सिर पे जूँ तक रेंगती नही दिखती। अम्मा कहती रहती "इसने ये कहा, उसने वो कहा और आप कुछ नही बोले।" बाबूजी चुपचाप सुनते सुनते अचानक कहते " किरन ! खाने की क्या पोज़ीशन है?" या फिर " साढ़े सात बज गया,टी०वी० चलाओ न्यूज़ आ रही होगी।" और माँ कहती " किसी को अपनी बात कहनी हो, तो जाये दीवाल से कह ले, पेड़,पल्लव से कहले लेकिन इन से ना कहे।" बाबूजी को तब भी फरक नही पड़ता।

और जब बाबूजी नाराज़ होते तो अम्मा की मनावन। उनकी नाराज़गी का सिंबल था, तमतमाये चेहरे के साथ शर्ट की बाँह डालना, यानी बाबूजी गुस्से में घर छोड़ के जा रहे हैं (मन मेरा भी यही होता है गुस्से में) बस अम्मा का पीछे लग जाना। "अरे अब बस। ठीक है। सुनिये तो।"

दोनो की अपनी अपनी कमाई और महीने के हिसाब की दोनो की अलग डायरी। बाबूजी की डायरी में लिखा होता १० पैसा गुड्डन को और अम्मा की डायरी में २५ पैसे की मूँगफली। दोनो के आय और व्यय दोनो के सामने क्लीयर। और कभी कभी किसी हिसाब के फँस जाने पर हम इंतज़ार करते कि कब याद आयेगा इन्हे वो २ रुपये कहाँ खर्च हुए और कब हम लोगो को खाने की हरी झंडी मिलेगी।

दो पीढ़े लगते थे। अम्मा बाबूजी अगल बगल फिर भईया लोग और अक्सर मैं बाबूजी की थाली में।

और वो पीढ़े ७ फरवरी, ९० को अंतिम बार साथ लगे। अम्मा ने उस जगह पर दोबारा आज बीस साल हो गये खाना नही खाया।

तो बदलाव मुझमें और माँ दोनो में साथ साथ आया। हम दोनो के साथी छूटे थे। माँ को जिम्मेदारियाँ निभानी थी और मुझे जिंदगी। शाम से वो छत पर चली जातीं या दरवाजे पर, जिधर से बाबूजी आते उधर देखती रहतीं।

कभी कभी मुझ पर बहुत ज्यादा गुस्सा हो जातीं। मुझे लगता कि ये ठीक नही है। उन्होने समझा ही नही कि मैं क्या कहना चाहती थी। वो बिना समझे नाराज़ हो गई। इतना ज्यादा...?? मैं रोती..! कॉपी के बीच के पन्ने पर बाबूजी से, भगवान से बाते करती .... आज भी उन पर आँसुओं से बिगड़े हुए एक आध अक्षर मिल जायेंगे।

मगर तब मैं और माँ दोनो अकेले थे। दोनो को एक दूसरे का सीधा सामना करना था। बीच में कोई नही।

माँ मुझे बिलकुल बिगड़ने देना नही चाहती थी। ईश्वर ने इतनी बेकार जिंदगी खुद ही दी थी उनकी बेटी को (उनके अनुसार) उस पर स्वभाव भी बिगड़ गया तो ...?? जुबान में लोच बिलकुल भी नही...! कोई इसका साथ कैसे देगा ? पहले तो इतना मीठा बोलती थी कि राह चलते आदमी को मोह लेती और अब इतनी कड़वी जुबान हो गई है।

उनके और मेरे बीच का मुख्य मुद्दा यही था। मैं कहती मैने सही बात कही। और वो कहती यही बात कहने का तरीका अलग होना चाहिये था। वो कहती "ऊषा,किरन कभी इस तरह नहीं बोलतीं।" मैं कहती "मैं ऊषा किरन नहीं हूँ ।"

मुझे अजीब सी चिढ़ होती। छोटी छोटी बातें..! समझती हीं नहीं। अरे पंखा पाँच से अचानक तीन पर कर देने का क्या मतलब है ? कितना बिजली का बिल बच जायेगा ? जब मुझे नही लग रही सर्दी तो क्यों पहनूँ स्वेटर ? फुल स्वेटर..? इतना मोटा सा ? काटता है वो मुझे ? और हाफ स्वेटर पहनने का क्या मतलब हैं अंदर आखिर ? वो पहनो ना पहनो ?? एक ही बात है। " थोड़ी देर खुली हवा में रहो।" अरे नही है मेरा मन खुली हवा में रहने का। मुझे कोर्स पूरा करना है। अचानक लाईट बंद कमरे की। "जब पढ़ नही रही तो लाइट न जलाओ, दिन में इतना उजाला बहुत है।" हद है....। भाभी और मेरी आपस में अडरस्टैण्डिंग है तो, वो तो कुछ नही कहतीं। फिर भी बीच पढ़ाई में "तुम सब्जी काट लिया करो और चावल बीन लिया करो, किसी को ये ना लगे कि तुम बैठी रहती हो।" अरे इतने लोगो में जरूरी है क्या कि मैं हाथ लगाऊँ ?

छोटी छोटी बाते...! और हमेशा नसीहतों का कटोरा। मुझे समझती हीं नही वो।

लेकिन बड़ी बड़ी बातें...! उनमें लगता कि वो बहुत समझदार हैं। मैं अपनी डायरी में क्या लिखती हूँ, उन्होने नही पूछा। मेरी किताबों की तलाशी नही ली। मेरे नाम से आने वाले लेटर, उन्होने कभी नही खोले और सीधे मेरे पास पहुँचाये। मैने खुद जो भी बताया हो कि फलाँ ने ये लिखा है, उन्होने सब सुन लिया। मेरे लिये आने वाले फोन पर डायरेक्ट मुझे बुला कर कभी वहाँ नही रुकीं। घर में रिश्ते-नातों, जानने वालों मे कौन सिर्फ मेरे लिये आता है, उन्हे बहुत अच्छी तरह से पता था। उन्होने उन्होने बहुत समझदारी से मुझ पर होल्ड बना कर मुझे फ्री छोड़ रखा था। मुझे तब भी ये पता था। और अब भी ये लगता है कि अपनी सोच विकसित कर सकने में उनका ये साथ बहुत मायने रखता है। मैं जब अपनी उन सहेलियों, जिनकी माँ और उनमे २०- २५ साल का अंतर था के बीच की समझ में ये आभाव देखती तो ईश्वर को धन्यवाद देती कि ४२ साल के अंतर ने भी जनरेशन गैप की वो समस्या नही डाली मुझमें और उनमें।

वो जब मुझे डाँटती थी, तो मुझे बहुत गुस्सा आता, चिढ़ होती। लेकिन वो जब मुझसे नाराज़ होतीं, तो मैं सबसे ज्यादा परेशान होती थी जिंदगी में। क्योंकि वो तब बोलना छोड़ देती थीं।

मुझे याद है कि सबसे ज्यादा वो मुझसे ७ दिन तक नही बोली थीं। कोई ट्रिक नही चली थी। ना पुच्ची, ना गले में हाथ.. कुछ नही, छूने भी नही दे रहीं थी वो...! तब बहुत बहुत रो कर मनाया था उन्हे, वो भी तब जब मेरे भाग्य से मुझे बुखार आ गया था। इस बात ने मुझे कुछ प्वॉईंट दे दिये थे।

अभी उस दिन फिर मैने फोन पर बहुत गलत तरीके से बात करी थी उनसे। "क्या अम्मा! आप हर बात मौसी से बता देती हैं।" ये बात कही थी लेकिन सच में बहुत हार्सली कही थी. मुझे पता था कि वो गुस्सा हो ही जायेंगी। फिर भी..!

मै बहुत चिड़चिड़ी हो गई हूँ आजकल। इसीलिये कोशिश करती हूँ कि कम से कम फोन उठाऊँ। इसका सारा दोष मैं अपनी बीमारी को, थोड़ा सा आफिस के माहौल को, कुछ भागदौड़ वाली जिंदगी को देती हूँ, मगर खुद को कभी नही। आदमी किसी भी बुरे काम के लिए खुद को कब दोषी मानता है ?

फोन रखने के बाद पता चल गया था कि अब अम्मा नही बोलेंगी मुझसे। दीदी और भाभी से जायज़ा लिया, तो पता चला कि मैं सही हूँ। मुझे वो सात दिन याद आ गये। मगर तब तो माँ साथ में थी। अब तो कभी कभी ४-५ दिन बात भी नही होती। चलो, १० को पहुँचूँगी कानपुर तो मना लूँगी सोच कर छोड़ दिया। वैसे भी वो फोन पकड़ेंगी ही नही, मेरा जानकर।

मगर रात में नींद खुली तो याद आया "अम्मा गुस्सा हैं।" फिर नींद नही आई।

शनिवार , रविवार वो गजब व्यस्तता...! मगर बार बार याद आया कि अम्मा गुस्सा हैं। खुद को समझाया बस आज रविवार है और शुक्रवार को तो पहुँच कर मना ही लूँगी। सोमवार अमित की शादी..! २ बजे लौटना ही हुआ। रास्ते में फिर भाभी से पूछा " अम्मा गुस्सा है ना ?" और उनको ये बताते हुए खुद को फिर समझाया कि "१० को आएंगे तो वही मना लेंगे, अम्मा फोन तो पकड़ेंगी नही मेरा।" भाभी मुसकुरा दीं।

मंगल आफिस में सुबह से इतनी भी फुरसत नही मिली कि पूछ सकूँ कि भाभी कितने बजे निकली कानपुर के लिये। सात बजे तो घर ही पहुँची। मुँह धो कर ब्लोवर चला कर सामने बैठी और भाभी को फोन लगाया। अम्मा की आवाज़ पीछे से आ रही थी। मेरा फोन जानकर हट गई होंगी। मन और बेचैन हुआ माँ की आवाज़ सुनकर। एक ट्राई मारते हैं। भाभी से कहा फोन अम्मा को दो..! फोन अम्मा ने नही पकड़ा गया। " कह दो कह फिर से मिला लेंगे क्या फायदा।" मैने धमकी दी। हिमांशी ने फोन उनके कान में लगा दिया। पीछे से आवाज़ आई " बुआ आप बोलिये हम फोन कान मे लगाये हैं।"

"मम्मा..मम्मूऽऽ..! नाराज़ हैं आप हमसे ? मॉम...! हम तो ऐसे ही हैं। हमेशा से दुष्ट रहे हैं। गलती हो गई। आप कि ही तो बेटी हैं। देखिये ना हमें अच्छा नही लग रहा। हम नही बोल पाते मीठा।"

" तुम सोती क्यों नही हो रात में? ऊषा कह रही थीं। अपना स्वास्थ्य खुद नही देखोगी तो कौन देखेगा? हमसे कहती हो मेरे विषय में न सोचो, तुम क्या सोचती हो ? दुनिया में बहुत से लोगो के साथ बहुत कुछ होता है, हम बस अफसोस करते हैं। मगर अपने बच्चो के साथ जो होता है, उससे हम दुखी होते हैं। ये कष्ट साँस के साथ जाता है।"



पता नही ये उम्र थी या बच्चों का प्रेम...! जो अब उन्हे ठीक से नाराज़ भी नही होने देती। वो अपने सारे बच्चों के स्वभाव के साथ एड्जस्ट करने की कोशिश कर रही है शायद ...!

और बच्चे ये जानते हैं की हमारे अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है...! कल से बहुत बुरा लग रहा है...! अम्मा के नाराज़ हो जाने जितना ही...!

कि वो ठीक से नाराज़ क्यों नहीं हुई...?

37 comments:

सागर said...

इसे जारी रखिये और पढना चाहेंगे हम

वन्दना said...

माँ से कब क्या छुपा है …………बिना कहे भी सब जानती है वो।

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (9/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

रचना said...

good post a typical weblog

नीरज गोस्वामी said...

एक एक शब्द रुक रुक कर पढ़ना पढ़ा है...एक साथ पढ़ ही नहीं पाए हम तो...सब माएं लगता है एक जैसी ही होती हैं...इस भावपूर्ण लेख के लिए क्या कहूँ? प्रशंशा के लिए उचित शब्द मिले तो फिर लौटूंगा...अभी जो मिल रहे हैं वो बहुत हलके लग रहे हैं...
मुस्कुराती रहो....लिखती रहो...ऐसा लेखन विरलों को ही नसीब होता है...


नीरज

अभिषेक ओझा said...

पढ़ रहे हैं...

ana said...

bhavporna

Rashmi savita @ IITR said...

कि वो ठीक से नाराज़ क्यों नहीं हुई...? yeh ek line itna cheer gayi hai andar tak ki kya batau Di..."luv u"...kuchh din aapke sah rahna chahti hoon...kabi avasr milla toh.........
apka prose bahut touching hota hai...Di ...sansmaran likhiye ...aur ek book publish kariye.....logo i aankhe nam kar dene ka maddda hai aapke andar....

Rashmi savita @ IITR said...

कि वो ठीक से नाराज़ क्यों नहीं हुई...? yeh ek line itna cheer gayi hai andar tak ki kya batau Di..."luv u"...kuchh din aapke sah rahna chahti hoon...kabi avasr milla toh.........
apka prose bahut touching hota hai...Di ...sansmaran likhiye ...aur ek book publish kariye.....logo i aankhe nam kar dene ka maddda hai aapke andar....

POOJA... said...

आज पहली बार आपको पढ़ रही हूँ... बहुत अच्छा लगा...
कुछ बातें तो मुझसेऔर मेरी माँ से मिलती हैं...
पर आख़िरी लाइन... निःशब्द कर दिया...
यूँही लिखती रहे...

dev said...

कंचन जी.....



माँ.....

पत्नी,बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी थोड़ी सी सब में,

रिश्तों की नाजुक, डोरी पर, नटनी जैसी चलती माँ.....

बहुत भावपूर्ण लेख है.....बधाई.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अब कल तो पहुँच ही रही हैं न ...माँ का गुस्सा तो कपूर स होता है जो जल्दी ही उड़ जाता है ....पर अंतिम पंक्तियाँ ..गज़ब ही लिख दी हैं ...इस बात कि भी खलिश है कि ठीक से गुस्सा क्यों नहीं हुईं ....मन भर आया ...

संजय भास्कर said...

कंचन जी
नमस्कार !
बहुत भावपूर्ण लेख है.....बधाई.

neera said...

मां और बेटी के रिश्ते की बारीकियों को भावनाओं से कशीदी एक बेजोड़ पोस्ट...

डॉ .अनुराग said...

हते है बेटी मां के के सपनो का एक्सटेंशन होती है .....रिश्ते भी उम्र के हिसाब से अपनी सूरत बदलते है ....कभी आप पिता के नजदीक होते है ....कभी मां के ....ओर जब दोनों से दूर रहना पड़े तो .....ये भी एक उम्र में सारी माये एक दूसरे की जीरोक्स होती है........जाने दुबली पतली काया में कौन सी शक्ति आ जाती है ..के कितने दुखो....कितने हालातो से गुजर जाती है ...ओर कई बार पांचवी पास पढ़ी मां भी ग्रेज्यूवेट बेटी को जीवन का पथ पढ़ा देती है .जैसी कह रही हो .तजुरबो के अलावा दिल को साफ़ कोई पढाई नहीं करती .....

तुम जब अपनों के बारे में लिखती है .....तब शायद अपनी बेस्ट फॉर्म में होती है ...बतोर राइटर !!!

कुश said...

शायद पहली बार मैं इस ब्लॉग पर इतना सीरियस हुआ हूँ.. मुझे तीन घंटे लगे है इसे पढने में.. और कमेन्ट करना मेरे बस की बात नहीं..

अनुपमा पाठक said...

bahut sundar lekhan...
bhaav bahte hue se!!!

Kishore Choudhary said...

तुम जब अपनों के बारे में लिखती है .....तब शायद अपनी बेस्ट फॉर्म में होती है ...बतोर राइटर !!!
डॉ अनुराग जी की इसी बात को आगे बढ़ते हुए याद दिलाता हूँ कि पारुल जी से मुलाकात जा संस्मरण ही इतना खूब खूब लिखा था कि कभी भूल न पाऊं

Sadhana Vaid said...

बहुत ही मर्मस्पर्शी संस्मरण कंचन जी ! बहुत कुछ अपना सा जाना पहचाना सा लगा ! आभार !

इस्मत ज़ैदी said...

कंचन ,सच कहूं तो शब्दों का अभाव साल रहा है मुझे इतनी प्रभावी रचना है कि यथायोग्य शब्द ढूंढ नहीं पा रही हूं और वो भी मां से संबंधित ,ये रिश्ता ऐसा है कि जिस के बारे में कुछ कहना वैसे भी बहुत मुश्किल काम है
ये सच है कि कोई अपना जो साधिकार नाराज़ होता हो अचानक नाराज़ होना बंद कर दे तो ये ख़लिश उस तकलीफ़ से ज़्यादा बड़ी होती है जो उस की नाराज़गी से थी
बस यूं ही मां के आशीर्वाद से अच्छा ,बहुत अच्छा लिखती रहो

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

शरद कोकास said...

अच्छी पोस्ट

रंजना said...

अंतिम कुछ लाईने पढने में बड़ी कठिनाई हुई रे...भरे आँख से पढना आजतक नहीं आया न क्या करूँ...

वीना said...

एक सांस में पढ़ती ही गई...बहुत अच्छा लिखा है और यह होता ही है...अभी मेरी आधी दुनिया बाकी है...जीभरकर जीना चाहती हूं उनके साथ...

anshubhai said...

दीदी ऐसा क्यों लिखती हो की आँखें धुंधली हो जाये? मुझे एक बार फ़ोन जरुर करना मेरा नो. है ०९८३८००२१२५ और ईद तो बहरहाल आ ही जायेगा अपने आप. मैं लखनऊ से ही हु तुम्हारा छोटा भाई अभिषेक कुमार श्रीवास्तव.

ajit gupta said...

यह पोस्‍ट मुझसे कब छूट गयी? इसलिए अब फोलोवर बन गयी हूँ। आज ऐसा ही कुछ मन हो रहा था लिखने का और यह पोस्‍ट दिखायी दे गयी। बस अन्‍दर तक शब्‍दों को अनुभव कर रही हूँ।

गौतम राजरिशी said...

कितनी देर से अटका हुआ हूँ इस पोस्ट पर...और कितना कुछ मन कर रहा है लिखने को, लेकिन जब लिखने के लिये इस टिप्पणी-बक्से को खोला तो लग रहा है कि जैसे मुझे तो लिखना आता ही नहीं। ऐसे भी सारी टिप्पणियाँ पढ़ लेने के बाद और विशेष कर डा० साब की बातें पढ़कर सोच में पड़ गया कि कुछ लिखना...कुछ भी लिखना बेमानी होगा...व्यर्थ का प्रयास होगा अपने भीगे-गीले भावों को शब्द देने का।

माँ ने पढ़ा होगा कि नहीं, सोच रहा हूं। नहीं पढ़ा तो पढ़ेगी कि नहीं कभी, ये भी सोच रहा हूं....बताना!

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

माँ...एक अद्‌भुत अहसास...सबसे छोटा किन्तु सबसे मीठा शब्द...आपकी इस पोस्ट के क्या कहने...वाह!
बधाई!

Mukesh Kumar Mishra said...

बहु ही भावविह्वल कर देने वाली लेखनी। माँ एक अनुभूति है........माँ के प्रेम का निश्छल प्रेम का कोई विकल्प नहीं है। आपके संस्मरण ने अन्तस् तक झकझोर दिया......मुझे मेरी माँ की याद सताने लगी है..........काश मैं उनके पास होता।

ZEAL said...

खुशनसीब हैं वे जिनके पास माँ है। भावुक कर दिया आपके लेख ने।

अंकित "सफ़र" said...

जिस दिन पोस्ट लगी थी पढ़ उसी दिन लिया था, और उसके बाद कई बार पढ़ा और पढता रहा...........
आप की कलम से निकला हर एक लफ्ज़ आँखों के सामने एक चित्र बना देता है, और भाव मन-हृदय को छू के रिमझिम बरसात का एहसास देते हैं.
वैसे सोच रहा था कि क्या कहूं.....जब कि अनुराग जी ने लाख टके की बात कह दी है. और अब तो शायद बीता हुआ सब सुलझ के कुछ नया भी बुन चुका होगा, जितना आप को जानता हूँ उस हिसाब से कह रहा हूँ.

अनूप शुक्ल said...

डा.अनुराग से सहमत- तुम जब अपनों के बारे में लिखती है .....तब शायद अपनी बेस्ट फॉर्म में होती है ...बतोर राइटर !!!

aradhana said...

मुझे लगा जैसे मेरी ही आपबीती हो और कुछ नहीं लिख पाऊँगी.

sanjay jha said...

baraste 'ma' hame to lagta hai....aap
se bhi ab kuch chupa nahi hai.......

pranam

Satish Chandra Satyarthi said...

सचमुच अब लगता है कि कोइ गुस्सा क्यों नहीं होता घर में.. कोइ डांटता क्यों नहीं.... भावुक कर दिया आपने....

देवेन्द्र पाण्डेय said...

यादें, माँ की यादें, पिता की यादें, बचपन की यादें, यादें अनगिन यादें। यादों को इतनी सहजता से समेटा है आपने इस पोस्ट में कि सभी अपनी यादों में खो गए।
...जारी रखिए...अभी तो पूरा जीवन शेष है।

Dr. Rajrani Sharma said...

kanchan ji ---rula diya na
thanks
din main ek bar ro lene wali chij padhna mera dharm hai aaj ke liye shukriya