Friday, July 24, 2009

ज़रा सा और दो पल को.ज़रा सा और दो पल को-१०० वीं पोस्ट



कुछ आम से दिनो को कुछ अपनो का साथ खास बना देता है। उन्ही आम दिनो में ये भी दिन है..आज का दिन। जो खास बस इसलिये हो गया क्योंकि बहुत से अपने आज एक ही दिन दुआयें देते हैं। आज की पोस्ट मेरी १०० वीं पोस्ट है। आप मुस्कुरा रहे होंगे और मन ही मन कह रहे होंगे कि दो साल का ब्लॉगीय सफर और अब जा कर शतक ? शर्मिंदा होने वाली तो बात है ही। मगर क्या करें। सच भी यही है।

तो ये थी एक आम सी बात। मगर खास यूँ हुई कि आज जो गज़ल लगा रही हूँ उसमें बहुत से अपनो का साथ और हाथ है। ये पोस्ट आज ही के दिन डाली जाये ऐसा मेरे छुपेरुस्तम अनुज अर्श का सुझाव था। अब चूँकि इस गज़ल को वो आवाज़ देने वाला था, तो उसका सुझाव तो मानना ही था। ये है पहली बात जो इस पोस्ट को खास बनाती है। दूसरी खास बात ये कि इस गज़ल को गुरु जी ने न सिर्फ सँवारा है, बल्कि आशीष स्वरूप मुझे एक शेर भी भेंट किया है (आखिरी शेर), आप समझ सकते हैं कि ये बात कितनी सुखद है कि मेरे गुरुभाई इससे अवश्य जल रहे होंगे। but who cares ?? :) तीसरी खास बात ये कि इस में एक शेर गूढ़ रहस्यों के ज्ञाता रविकांत जी ने भेंट किया है।(8वाँ ) गूढ़ रहस्यो के ज्ञाता क्यों कहा ये तो आप जान ही रहे हैं और अगर नही जान रहे तो जान लीजिये यहाँ जा कर। And the last but not least reason....ये कि इस गज़ल को जिसने सबसे पहले जिसने दाद दी वो थी हमारी भाभी संजीता राजरिषी और इस गज़ल का 7वाँ शेर समर्पित है उन्ही को।

तो पढ़िये और सुनिये ये पंचमेल खिचड़ी। आवाज़ के विषय में यही कहना बहुत है कि मेरी दीदी ने इस आवाज़ को सुनने के बाद कहा कि तुम्हारे मृत शब्दों को जान दे दी इस आवाज़...! मेरे शब्द मृत...??? भाला ऐसे भी धोते है किसी को :( मगर क्या करे..?? यही तो कहा था उन्होने।

अर्श कहता है कि उसे सुरों का कोई ज्ञान नही है, मगर जिस तरह की शब्दावली उसने रिकॉर्डिंग के समय मुझसे चैट पर प्रयोग की, मैं मान ही नही सकती कि उसे संगीत का ज्ञान नही है। ये इसके छुपेरुस्तम होने का दूसरा उदाहरण गुरु जी के सामने पेश है। और शेष अंदाज़ आप गीत सुन कर ही लगा सकते हैं। अर्श ने इसमें बहुत मुश्किल सुरों का प्रयोग चुना है। और बिना किसी म्यूज़िकल सपोर्ट के ९ शेरों को गाना सभी समझ सकते हैं कितना मुश्किल रहा होगा। मैं इस खूबसूरत उपहार को कभी नही भुला सकती।

सुनिये और गुनिये।









सुबह की नींद जैसा वो, बहुत प्यारा लगे दिल को,
ज़रा सा और दो पल को.ज़रा सा और दो पल को।

तरीक़ा हम में होता ग़र, अगर हम भी अदा रखते,
तो तुम ना छोड़ पाते यूँ, मेरे मन पाक़ निश्छल को।

हमें जीने की आदत है, हर इक पल जी के जीते हैं,
सिसक कर खूब दुक्खों को, विहँस कर हर हसीं पल को।

किसी में कुछ,किसी में कुछ, सभी कुछ तुम में पाना है,
यही उलझन तुम्हे भी है, यही उलझन मेरे दिल को।

वो तुम में है न जाने क्या, कि जो भाने लगा हमको,
समझ पाते नहीं हम, दिल की इस अन्‍जान हलचल को।

कभी सबसे भले हो तुम, कभी सब से बुरे हो तुम,
असल में वो तुम्‍हीं हो जो, बदलते हो हर इक पल को।

किनारा तेरे सीने का, तेरी बाँहों की ये लहरें,
यही सागर है जिसकी प्‍यास थी जुल्‍फों के बादल को।

तुम्‍हें तो महफिलों की रौनकें ही दिख रहीं केवल,
कभी देखो जरा रोती हुई लाचार पायल को।

सलामत तुम रहो सौ साल तक ये है दुआ मेरी
मगर मत भूलना राखी पे अपने बीर पागल को


नोटः बहुत देर तक ढूँढ़ती रही, जैसा चाह रही थी वैसा चित्र नही मिला तो ये चित्र डाल दिया.... मैं और मेरे होने वाले दामाद जी :) (भांजी के होने वाले पति)

Tuesday, July 7, 2009

मुड़ मुड़ के देखता हूँ-राजेंद्र यादव


मुड़ मुड़ के देखता हूँ....राजेंद्र यादव जी की ये आत्मकथा पढ़ने का मन हुआ मेरा मन्नू भंडारी की आत्मकथा एक कहानी ये भी पढ़ने के बाद। चूँकि राजेंद्र यादव की आत्मकथा पहले लिखी गई थी और मन्नू जी की बाद में तो सोचा पहले इस की चर्चा कर लें। मगर ये भी सच है कि मन्नू भंडारी की आत्मकथा पढ़ने के बाद बड़ा मुश्किल था खुद को तटस्थ और पूर्वाग्रहों से अलग रख पाना। मगर फिर भी प्रयास यही किया है कि इस चर्चा में खुद को मन्नू भंडारी से मुक्त रख सकूँ और चर्चा सिर्फ और सिर्फ मुड़ मुड़ के देता हूँ पुस्तक की करूँ!

यह पुस्तक १० अध्यायों मे लिखी गई है। अध्याय को अध्याय नाम नही बल्कि सुंदर शीर्षकों से सजाया गया है। पहले अध्याय मुड़ मुड़ के देखता हूँ में ही राजेन्द्र यादव जी ने कहा कि इसे उनकी आत्मकथा नही बल्कि आत्मकथांश समझा जाये..! शायद सही ही कहा। क्योंकि आगे चल के कई जिज्ञासाएं अधूरी ही रह जाती हैं, राजेंन्द्र जी को जानने से संबंधित।

फिर दूसरा अध्याय भूमिका

तीसरा अध्याय हक़ीर कहो फक़ीर कहो में अपनी साठवीं वर्षगाँठ पर मित्रों के बीच राजेंद्र जी द्वारा आगरे में दिया गया वक्तव्य है।

चौथा अध्याय है अंत से शुरुआत..जो दुर्घटनाओं में भी बचा रहता है अर्थात संकल्प, जिसमें जिक्र किया है उन्होने दिल्ली से कानपुर गिरिराजकिशोर जी के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम मे जाते हुए हुई राजधानी ट्रेन दुर्घटना से सही सलामत आ जाने का।

पाँचवा अध्याय ऐयार (इम्पोस्टर) से सावधान में अपने हम शक्लो की चर्चा के साथ अपने विभिन्न चेहरों (मुखौटों) के प्रति आगाह किया है।

छठे अध्याय अपनी नज़र से में किसी प्रिय को संबोधित करते पत्र मे अपने विषय में टुकड़ों ड़ुकड़ों में लिखा है जहाँ कुछ कुछ देर के लिये कुछ लेखक मित्र मन्नू से विवाह उनसे मनोमालिन्यता और पिता की मृत्यु का भी जिक्र है।

सातवाँ अध्याय पुनः मुड़ मुड़ के देखता हूँ, जहाँ मुझे कुछ क्रम सा नज़र आता है,जिसमे शुरु से ही शुरु है :)। और मैने जब पुस्तक पढ़ी तो यहीं से पढ़ी। पीछे का कुछ तब समझ में आया जब इसे पढ़ लिया। अतः पिछले छः अध्याय मैने पुनः पढ़े या बाद में पढ़े। यहाँ राजेंद्र जी के बचपन का घर, उनका अपने चाचा जी के घर पढ़ने को जाना, वहाँ बच्चों के झगड़े में किसी बच्चे के हाकी मार देने से राजेंद्र जी के पैर में चोट आना, घर पर बात छुपा ले जाने के कारण चोट का बढ़ जाना और घुटने से टखने तक की हड्डी का गल जाना और आपरेशन द्वार निकाल दिये जाने से पैर में कुछ समस्या आ जाना तथा बैसाखी के सहारे चलना। यहीं उन्होने अपनी रचनात्मकता की शुरुआत को भी समझा। दिनभर बिस्तर पड़े होने से उनकी कल्पना शक्ति बढ़ी और कथाकारी करने लगी। यहाँ उन्होने अपनी विभिन्न किताबों के विषय में लिखा।

आठवें अध्याय मुड़ मुड़ के देखता हूँ भाग २ ये तुम्हारा स्वर मुझे खींचे लिये जाता.... में चर्चा की है अपने मित्रों की जिसमें विस्तार महिला मित्रों को ही मिला है। हेमलता नाम की उनकी किसी उद्योगपति घराने से संबंध रखने वाली प्रशंसिका, जिसे उन्होने बाद में दीदी कहना शुरू कर दिया, उनकी रचनाओं पर उन दीदी का प्रभाव इस कदर था कि मित्र उन्हे दीदीवादी लेखक भी कहने लगे बाद में कुछ आकर्षण..... जिसको बंधन आर्थिक विषमता के कारण नही मिल सका। कर्मयोगी के संपादक रामरखसिंह सहगल की मृत्यु के बाद बी०एड० करने आई उनकी पु्त्री से अति आकर्षण,जिसके आगे ना बढ़ पाने के लिये राजेन्द्र जी ने अपनी अपंगता को दोषी माना। फर्राट मीता जिससे परिचय उनका ट्यूशन के जरिये तभी हुआ जब वो १४-१५ वर्ष की ही थी और अब लगभग ५० वर्षो की जनपहचान हो चुकी है; जिसने विवाह प्रस्ताव कि यह कर टाल दिया कि हम मित्र है है और मित्र ही रहेंगे। राजेंन्द्र यादव ने जिसे पर लिखा कि "ये साफ साफ मेरा रिजेक्शन था। तुम सिर्फ कभी कभी मित्रता के लायक हो, साथ बँधने के नही।" बाद में उन्होने ये भी स्वीकार किया कि मन्नू जी से विवाहके पश्चात कई बार जब मीता और राजेंन्द्र जी ने शादी की तारीखें भी तय कर लीं तब पता नही किन कारणों से राजेन्द्र यादव ही पीछे हट गये। इस विश्वासघात के लिये उनका कहना है कि इसने उन्हे ही बार बार तोड़ा। इन सारे संबंधों से परे जहाँ किसी ने शारीरिक और किसी ने आर्थिक विषमताओं की आड़ ले कर राजेंद्र जी से, मित्रता की तो सारी मान्यताए निभाईं मगर जीवनबंधन में बँधने से परे रह गये; पर जब मन्नू जी ने उन्हे जस का तस स्वीकार किया तब भी वो ना जाने कौन से कारण थे जिन्होने उन दोनो को साथ नही रहने दिया। जबकि राजेंन्द्र जी स्वीकार करते हैं कि रिश्तेदारों और मित्रों के बीच मन्नू जी उनका अहम् बड़ी चतुराई से रख लेती थी। बच्ची, परिवार, समाज, राजेंन्द्र जी को जब जब जरूरत हुई तब तब सहयोग के बावजूद राजेंद्र जी घर गृहस्थी में न जम सके क्योंकि उनके अनुसार "बौद्धिक और व्यक्तिगत तौर पर वह सब मुझे असहज बनाता है जो जिंदगी को बने बनाये ढर्रे में कैद कर के सारी संभावनाओं को समाप्त कर देता है।" प्रभा खेतान का भी हल्का फुल्का जिक्र है। अनेकानेक स्त्रियो से संबंध मे वे दीदी, मीता और मन्नू का विशेष योगदान मानते हैं अपने जीवन में। मगर अब तीनो ही उनकी जिंदगी में नही है। जिंदगी किशन नाम के एक नौकर के सहारे ही चल रही है।अध्याय के अंत में कलकत्ते का एक रात घूमने का वर्णन है।

नवें अध्याय हम ना मरै मरिहैं संसारा में अपनी मृत्यु की परिकल्पना का दृश्य

और अंत में एक आटोप्सी (शव परीक्षा) जिसे तोते की जान शीर्षक से लिखा है अर्चना वर्मा ने और मैं इसे पुस्तक की जान मानती हूँ। राजेंन्द्र जी के गुण और दोषों को जिस पारदर्शिता के साथ लिखा गया इस परिशिष्ट में वो काबिल-ए-तारीफ है। संपादक राजेंद्र जी के साथ के रोज के अनुभवो से ले कर मन्नू जी को खाँटी घरेलू औरत कहने पर तीक्ष्ण प्रतिक्रिया तक।

अंत में अपनी तरफ से ये कहूँगी कि कहना तो बहुत कुछ चाह रही थी मैं। मगर फिर ये लगता है कि किसी की कहानी पर कुछ कहो तो कहो किसी की जिंदगी पर क्या कहना? शायद सच ही कह रहे हो राजेंद्र जी कि " जो कुछ उन्होने किया, उसके सिवा वे और कुछ कर ही नही सकते थे। रफ़ हो या फेयर उनकी जिंदगी यही होती जो है...!" हाँ मगर कुछ चीजो को स्थान न देने की शिकायत तो कर ही सकती हूँ। बचपन में एक बड़ी दुर्घटना जिसने उनका जीवन बदल दिया उससे निकलने में कहीं न कहीं परिवार का, माता पिता का शायद बहुत बड़ा सहयोग रहा होगा। उसको उतना विस्तार नही मिला जितना मिलना चाहिये था। एक पाठक के मन में उनके और मोहन राकेश की मित्रता और विरक्ति के भी कारण जानने की जिज्ञासा बनती है और कमलेश्वर को तो खैर उतना भी स्थान नही मिला जितना मोहन राकेश को। क्या व्यक्तित्व निर्माण में सिर्फ विपरीतलिंगी मित्रों का ही हाथ होता है।

कुछ भी हो इस बात का अफसोस भी है कि चाहे वो जो भी कारण हो मगर इस मामले में मैं राजेंद्र जी को मैं भाग्यहीन मानती हूँ कि बहुत से निःस्वार्थ रिश्ते वो संभाल न सके। उन्होने इसका दोष अपनी कुंठा को दिया। वो कुंठा जो उन्होने बार बार बताया कि उनकी अपंगता के कारण आयी..यहाँ तो शायद मै बोलने का अधिकार रखती ही हूँ कि ये जो दैवीय गाँठे हैं, उन्हे खोलने का एक ही तरीका है स्वार्थहीन स्नेह..! और अगर ये स्नेह भी ना खोल सके गाँठें तो क्षमा करें मगर आप कोई भी जीवन पाते कुंठा के शिकार ही रहते।


यह पुस्तक राजकमल प्रकाशन की सजिल्द पुस्तक है मूल्य है रु० १९५/-

औरत नही पाठक नेचरिका जी

नेचरिका जी की टिप्पणी के जवाब में जो टिप्पणी लिखी वो इतनी लंबी थी कि टिप्पणी बॉक्स में आई ही नही। अतः यह पोस्ट लिखनी पड़ गई। श्रीमान नेचरिका कृपया ध्यान दें।

श्रीमान नेचरिका जी! सादर अभिवादन ! आप मेरे ब्लॉग पर आये। श्री राजेंद्र यादव जी की आत्मकथा मुड़ मुड़ के देखता हूँ पढ़ने के बाद लिखे गये मेरे विचारो को पढ़ा और पढ़ने के बाद अपने विचार व्यक्त किये। ये सबका मौलिक अधिकार है और आप अपने विचार बहुत अच्छे तरीके से रख सकने में सक्षम भी हैं। आप के अन्य रचनाएं भी पढ़ीं मैने। आप बहुत अच्छा लिखते हैं...!

आप ने जो भी लिखा था उसे पढ़ कर मैं यूँ ही निकल जाने वाली थी, मगर....! एक चीज जिसने मुझे टिप्पणी लिखने पर विवश किया, वो है आपका शीर्षक। मेरा लेख पढ़ने के बाद यदि आपके मन में कहीं भी ये आया कि ये लेख मैने एक औरत की दृष्टि से लिखा है तो कृपया इसे पुनः पढ़ें। ऐसा कोई भी संकेत मैने अपनी पोस्ट में नही दिया है कि यह लेख मैने एक औरत कि निगाह से लिखा है। इस तरह के कामों में मै कभी भी शरीक नही होती। मैंने जो भी लिखा एक पाठक की हैसियत से लिखा और जब कभी भी लिखती हूँ तो एक रचनाकार की हैसियत से लिखती हूँ। न कि औरत या मर्द। जिसने भी अपने को इन श्रेणियों में बाँधा वो कैसे अच्छा रचनाकार हो सकता है ? रचनाकार होने के लिये तो सभी का दर्द समझना पड़ेगा। वो चाहे औरत हो, मर्द हो, दलित हो, सवर्ण हो, भारतीय हो, विदेशी हो बच्चा हो बूढ़ा हो। तो पहली बात तो आपसे आग्रह है कि ये औरत की निगाह में मर्द जैसा शीर्षक हटा लें। मेरा पूर्ण विरोध है इस से।

दूसरी बात कि जब मैं मुड़ मुड़ के देखता हूँ की बात कर रही हूँ तब सिर्फ मुड़ मुड़ के देखता हूँ की बात कर रही हूँ। उसमें सारा आकाश. शह और मात, आदमी की निगाह में औरत जैसी किसी भी रचना की चर्चा नही है। चर्चा उस आत्मकथ्यांश की है जो मुड़ मुड़ के देखता हूँ में किया गया है। और अगर राजेंद्र यादव जी की कुंठा की बात की गई है तो उसी पुस्तक के आधार पर ना कि मन्नू भंडारी के आक्षेप के पूर्वाग्रह पर। मैं जब एक कहानी ये भी की चर्चा करूँगी तब उस की बात करूँगी अभी मैने एक भी शब्द कहीं और से नही लिये हैं। ये राजेंन्द्र यादव जी के आत्मकथ्यांश में बार बार प्रयोग किया गया शब्द है कि वे कुंठा के शिकार हैं। उस कुंठा का दोषी उन्होने अपनी अपंगता को बताया। उन्होने कहा कि एक के बाद दूसरी स्त्री से संपर्क में आने के पीछे कारण ये था कि कहीं वें अपने अधूरेपन को हराना चाहते थे। बार बार अपनी पूर्णता की परीक्षा लेना चहाते थे। क्या शारीरिक स्तर पर इस तरह के प्रयोग ही आपको पूर्ण बनाते हैं। ये कुंठा नही तो और क्या है? फिर कितनी बार? कितनी बार अपनी परीक्षा लेंगे आप ? सही कहा आपने "कुंठा से निकलने का सर्वोत्तम उपाय है स्वयं को रचनात्मक कार्यों में लगाना ....और इस मामले में आप राजेंद्र यादव के सामने किसे खड़ा करेंगी...?" बिलकुल सही..! यही तो मैं कहना चाहती हूँ कि इतना सम्मान, इतना स्नेह, इतनी रचनाएं, इतनी रचनात्मकता जिसमें दुनिया की कुंठाएं जला कर खाक की जा सकती हैं, उसके बावजूद खुद को कुंठित बताना और उस कुंठा से निकलने का उपाय स्त्री संसर्ग बताना। कैसे सही माना जा सकता है। फिर एक बात और मैने राजेंद्र जी पर लिखने के पहले कम से कम तीन माह का समय लिया और जब लिखने चली तो लिखा कि अंत में अपनी तरफ से ये कहूँगी कि कहना तो बहुत कुछ चाह रही थी मैं। मगर फिर ये लगता है कि किसी की कहानी पर कुछ कहो तो कहो किसी की जिंदगी पर क्या कहना? शायद सच ही कह रहे हो राजेंद्र जी कि " जो कुछ उन्होने किया, उसके सिवा वे और कुछ कर ही नही सकते थे। रफ़ हो या फेयर उनकी जिंदगी यही होती जो है...!" और इसके बाद जब मैने ये लिखा कि उन्होने इसका दोष अपनी कुंठा को दिया। वो कुंठा जो उन्होने बार बार बताया कि उनकी अपंगता के कारण आयी..यहाँ तो शायद मै बोलने का अधिकार रखती ही हूँ....!" तो आपको बता दूँ श्रीमान कि जितनी देर मैने यह पुस्तक पढ़ी मैं बार बार दुःखी हुई। इस लिये क्योंकि जिस आंशिक अक्षमता के कारण राजेन्द्र जी स्वयं को बार बार कुंठित बताते हैं, वो मैं पूर्णरूप से जी रही हूँ। आधे पैर की वो समस्या जिसने उनके दैनिक जीवन के किसी भी कार्य (बकौल मुड़ मुड़ के देखता हूँ सयकिल चलाना, यात्राएं करना इत्यादि) को बाधित नही किया है, उसे मैं कमर से ले कर दोनो पैर और एक हाथ में झेल रही हूँ। तो क्या मैं अधिकारिणी हो जाती हूँ अपने स्वाभावगत दोषों का आक्षेप इस अक्षमता को लगाने की। कितने ही काम रोज करने को रह जाते हैं इस कारण, मगर जब जब मैं स्वयं को देखती हू तो अपने परिवार और कुछ मित्रों को धन्यवाद देती हूँ, जिनके कारण कोई शिकायत नही है जीवन से। और इसीलिये मैने कहा कि यहाँ तो शायद मै बोलने का अधिकार रखती ही हूँ क्योंकि जो इस दर्द में शामिल ना हो उसे बोलने का अधिकार नही है मगर मैं उसे कई गुना झेल रही हूँ तो कुछ अधिकार तो रखती ही हूँ।

एक बार फिर कहूँगी कि आपके विचार आपके अपने हैं मैं उनका आदर करती हूँ, मगर शीर्षक का आधार चूँकि आपने मेरे विचारों को रखा है अतः इसे बदल दें। मैंने औरत की नही पाठक की निगाह से लिखा है ये लेख।

Wednesday, July 1, 2009

लहर की खामोशी



जान ले के जायेगी, ये कहर की खामोशी,
कब खुदारा टूटेगी, उस नज़र की खामोशी।

आँख भीग कर सारे भेद खोल जाती है,
हम छिपा न पाते हैं, दिल जिगर की खामोशी।

पैर के निशाँ बेशक, ले गई लहर लेकिन,
मन में अब भी बैठी है, रेत पर की खामोशी।

रोज आप आते हैं, रोज सोचते हैं हम,
आज आप समझेंगे, इस नज़र की खामोशी।

आपके मिजाजों से, और गर्म लगती है,
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

पा के शोर करता है, है अजब ये सागर भी,
दे के कुछ नही कहती, है लहर की खामोशी *

* इस शेर को खिताब मिला हासिल-ए-मुशायरा का


लीजिये पढ़िये आज वो गज़ल जिस के एक शेर को गुरु जी के ब्लॉग पर आयोजित तरही मुशायरा में हासिल-ए-मुशायरा का खिताब मिला। इस मुशायरे में आई सभी गज़लो के रचनानाकार का नाम ना बताते हुए स्वनामधन्य श्री प्राण शर्मा जी के पास हासिल-ए-मुशायरा का खिताब हेतु चुनने के लिये भेजा गया था। नतीजे के साथ गुरु जी को जो पत्र प्राण जी ने भेजा उसमे लिखा था "कृपया शेर लिखने वाले को मेरी हार्दिक बधाई अवश्य दीजियेगा। चूँकि उसमे बहुत संभावनाएं हैं इसलिये उससे बहुत आशाएं भी हैं।" और प्राण जी को व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद भेजने पर उन्होने मुझे जो मेल से आशीर्वाद दिया वो इस प्रकार था

प्रिय कंचन जी,

उम्दा शेर के लिए मेरी बधाई स्वीकार कीजिये.मुझे प्रसन्नता होती है जब कोई अच्छे
शेर कहता है.शायद ऐसा खूबसूरत शेर मैं न कह पाता.आप इसी तरह शेर कहते रहिये और सबकी "वाह,वाह" लूटते रहिये.शेर कहने का आपका अंदाज़ बड़ा प्यारा है.शब्दों के नाप-तौल से ,लगता है आप अच्छी तरह परिचित हैं.भविष्य में इतना ध्यान रखिये
कि आपकी शायरी में भारतीयता की सुगंध हो. आपके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ मैं. आशा है कि आप सानंद हैं.

आपका शुभ चिन्तक ,
प्राण शर्मा

इस आशीर्वाद से मै कितनी कृतकत्य हुई मैं ही जानती हूँ.......!
तो आप भी पढ़ें इस गज़ल को

ये रहा प्रमाण पत्र