Wednesday, July 1, 2009

लहर की खामोशी



जान ले के जायेगी, ये कहर की खामोशी,
कब खुदारा टूटेगी, उस नज़र की खामोशी।

आँख भीग कर सारे भेद खोल जाती है,
हम छिपा न पाते हैं, दिल जिगर की खामोशी।

पैर के निशाँ बेशक, ले गई लहर लेकिन,
मन में अब भी बैठी है, रेत पर की खामोशी।

रोज आप आते हैं, रोज सोचते हैं हम,
आज आप समझेंगे, इस नज़र की खामोशी।

आपके मिजाजों से, और गर्म लगती है,
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

पा के शोर करता है, है अजब ये सागर भी,
दे के कुछ नही कहती, है लहर की खामोशी *

* इस शेर को खिताब मिला हासिल-ए-मुशायरा का


लीजिये पढ़िये आज वो गज़ल जिस के एक शेर को गुरु जी के ब्लॉग पर आयोजित तरही मुशायरा में हासिल-ए-मुशायरा का खिताब मिला। इस मुशायरे में आई सभी गज़लो के रचनानाकार का नाम ना बताते हुए स्वनामधन्य श्री प्राण शर्मा जी के पास हासिल-ए-मुशायरा का खिताब हेतु चुनने के लिये भेजा गया था। नतीजे के साथ गुरु जी को जो पत्र प्राण जी ने भेजा उसमे लिखा था "कृपया शेर लिखने वाले को मेरी हार्दिक बधाई अवश्य दीजियेगा। चूँकि उसमे बहुत संभावनाएं हैं इसलिये उससे बहुत आशाएं भी हैं।" और प्राण जी को व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद भेजने पर उन्होने मुझे जो मेल से आशीर्वाद दिया वो इस प्रकार था

प्रिय कंचन जी,

उम्दा शेर के लिए मेरी बधाई स्वीकार कीजिये.मुझे प्रसन्नता होती है जब कोई अच्छे
शेर कहता है.शायद ऐसा खूबसूरत शेर मैं न कह पाता.आप इसी तरह शेर कहते रहिये और सबकी "वाह,वाह" लूटते रहिये.शेर कहने का आपका अंदाज़ बड़ा प्यारा है.शब्दों के नाप-तौल से ,लगता है आप अच्छी तरह परिचित हैं.भविष्य में इतना ध्यान रखिये
कि आपकी शायरी में भारतीयता की सुगंध हो. आपके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ मैं. आशा है कि आप सानंद हैं.

आपका शुभ चिन्तक ,
प्राण शर्मा

इस आशीर्वाद से मै कितनी कृतकत्य हुई मैं ही जानती हूँ.......!
तो आप भी पढ़ें इस गज़ल को

ये रहा प्रमाण पत्र

32 comments:

ओम आर्य said...

बहुत ही खुबसूरत है खामोश नजरो की जबान ..............एक दिन वह जरुर समझ जायेगे.....सुन्दर

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत बढ़िया . बधाई.

M Verma said...

कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी
बहुत खूब

Manish Kumar said...

सहज जुबां से जिंदगी की इन खामोशियों के जिक्र करने का आपका ये प्रयास अच्छा लगा। मुझे ये खयाल खास तौर पर पसंद आए

पैर के निशाँ बेशक, ले गई लहर लेकिन,
मन में अब भी बैठी है, रेत पर की खामोशी।

आपके मिजाजों से, और गर्म लगती है,
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया!!

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया!!

पंकज सुबीर said...

मिठाई विठाई लड्डू वड्डू कुछ नहीं बस खाली हें हें हें हम जीत गये । ये ठीक तरीका नहीं है खुशखबरी सुनाने का । लखनऊ में तो कफी तरह की मिठाइयां बनती हैं । ऐसा नहीं चलेगा हमने आज तक कोई भी खुशखबरी बिना मिठाई के नहीं सुनी । हमारे कान बिना मिठाई के कुछ सुनना पसंद नहीं करते । सो हमने कुछ नहीं सुना आपने अपने ब्‍लाग पर क्‍या कहा ।

दिगम्बर नासवा said...

खुबसूरत है खामोश की जबान .....

AAPKI GAZAL AUR SAB SHER LAJAWAAB HAI.... BAHOOT HI BADHIYA

सुशील कुमार छौक्कर said...

कोई खामोशी भाए या ना भाए ये खामोशी तो हमें भाइ है।
आपके मिजाजों से, और गर्म लगती है,
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

बहुत ही उम्दा।

डॉ .अनुराग said...

ये दोनों शेर खास पसंद आये कंचन......

रोज आप आते हैं, रोज सोचते हैं हम,
आज आप समझेंगे, इस नज़र की खामोशी।

ओर इस शेर से तो एक जुदा कंचन का पता चला .....

आपके मिजाजों से, और गर्म लगती है,
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

क्या बात है....

vandana said...

kanchan ji

aaj to har sher par ek aah nikal gayi......khamoshi ko bhi jubaan mil gayi............kya kahun......har sher aisa ki har sher par dam nikle...........dil ko bahut gahre tak choo gayi..........aapko bahut bahut badhayi.......aap aage bhi aise hi likhti rahiye.

कुश said...

बधाईया ले जाइए.. ग़ज़ल बढ़िया रही.. पर...

Harkirat Haqeer said...

पा के शोर करता है, है अजब ये सागर भी,
दे के कुछ नही कहती, है लहर की खामोशी *

waah ...क्या बात कही है kanchan जी .....!!

tarhi mushayare का khitab मुबारक हो .....!!

venus kesari said...

हार्दिक बधाई, पिछली बार के तरही मुशायरे की कठिन बहर से तो मेरे हाँथ पाँव फूल गए ठ, उस बहर पर आपके इतने शुन्दर शेर, वाह
बहुत सुन्दर

वीनस केसरी

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

कँचन बेटे, शायरी सुँदर लिखी है तो इनाम मिलना ही था ! इस अवसर पर अनेकोँ शुभकामनाएँ
Keep writing &
Be inspired ...
- - लावण्या

अनूप शुक्ल said...

खामोशी पर बड़े बोलते हुये शेर लिखे। बधाई। इनाम पाने की भी बधाई! और आगे के लिये शुभकामनायें।

"अर्श" said...

GURU BAHAN KO BAHOT BAHOT BADHAAYEE IS GAZAL KO AUR ISKE SHE'R KO HASILE MUSHAYARAA MILNE PE .... DIL SE BAHOT KHUSHI HO RAHI HAI .... MAGAR AISE TO BILKUL BHI NAHI CHALEGA... BAGAIR MITHAAYEE KE HAMAARE BHI KNAAN NAHI KHADE HOTE HAI TO MITHAAYEE KA TO INTAZAAM HONI HI CHAHIYE... WESE MAINE TO SUNAA HAI KE LUCKNOW KE LOG AAWOBHAGAT ME BAHOT AAGE HOTE HAI MAGAR YAHAAN TO KHALI KHALI HAI YE KYA SAHI HAI.... JALDI SE MITHAAYEE MANGAALO.....HA HA HA ,,, JI BAHOT BAHOT BADHAAYEE...



ARSH

कंचन सिंह चौहान said...

आप सभी लोगों का धन्यवाद...!
दोपहर की खामोशी वाला शेर जिन लोगों को भी पसंद आया. उनको बताना चाहूँगी कि असल में तरही मुशायरा में हमें जिस मिसरे पर लिखना था, वो मिसरा ही था कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी जो कि शायरा नुसरत मेंहदी (वर्तमान में म०प्र० उर्दू अकादमी की सचिव) का लिखा हुआ है। इसमें गिरह सबने अपने हिसाब से जोड़ी है जैसे मैने
आपके मिजाजों से, और गर्म लगती है,
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

और दिगम्बर जी ने
धूप की गठरी सरों पर बूँद भर पानी नही,
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

अभिनव शुक्ल जी ने
रहगुज़र की खामोशी, हमसफर की खामोशी
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

अर्श ने लिखा
कौन घर ले आया है, दर ब दर की खामोशी
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

गौतम जी ने
सुबह के निपटने से और शाम ढलने तक
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

वीनस जी ने
कह रही थी कल मुझसे, रहगुजर की खामोशी
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

रविकांत जी ने
खो गई कहाँ वो किलकारियाँ सवेरे की
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी


तो इतना सब कुछ कहने का आशय ये था कि पूरी गज़ल में एक पंक्ति जो मेरी नही थी, वो थी
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी हाँ आपके मिजाजों से, और गर्म लगती है के साथ गिरह मैने लगाई थी।
गुरु जी मिठाइयाँ लखनऊ में आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं
और अर्श रोज़ आइसक्रीम और रसगुल्ले खाते हो मगर जैसे ही गुरु जी ने कहा मिठाई के बारे में तो तुम भी चले आये "हाँ दीदी.. हम भी, हम भी, कहते...! नाऽऽऽ bad manners..! :):)

Nirmla Kapila said...

कंचन जी मै तो इस लाजवाब गज़ल को पढने से रह जाती अगर मुझे अर्श ने ना बताया होता अब क्या कहूँ शब्द ही मौन हो गये हैं बहुत बहुत बधाई

अनिल कान्त : said...

वाह वाह ...बधाई

Parul said...

आपके मिजाजों से, और गर्म लगती है,
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी..bahut acchhey...pichhli post bhi padhin tumari...blog kii varshgaanth per dher si badhaayii....

रंजना said...

फिर से बधाई ले लो....

इतना उम्दा लिखा है तुमने की कई बार पढ़कर भी संतोष नहीं हुआ....

ऐसे ही लिखती रहो...शुभकामनाये.

MUFLIS said...

the reward...
the regard...
is rightly awarded to the poet
who really deserved it. . .
CONGRATS !!

---MUFLIS---

Kishore Choudhary said...

लेखन के नए नए आयामों की जानकारी मिल रही है आपके ब्लॉग के साथ चलते हुए, कुछ शाईर दोस्तों की कमी थी अब पूरी होने को है. प्राण जी तो मुझे नब्बे के दशक में भी पसंद थे और उन्होंने आपको पसंद किया है क्या बात है ... बताओ कैसे बधाई दूं ?

अशोक कुमार पाण्डेय said...

hamari tarf se bhi badhai sviikar kiijiye...

kumar Dheeraj said...

आँख भीग कर सारे भेद खोल जाती है,
हम छिपा न पाते हैं, दिल जिगर की खामोशी।

बेहद मारमिक लिखा है कंचन जी आपने । हर लाइन में एक भावना छिपी है । चीजो को आपने भावनात्मक तरीके से लिया है । प़ढ़कर बहुत अच्छा लगा धन्यवाद

गौतम राजरिशी said...

कुछ और कहने के लिये अलग से शब्द-कोश कहाँ से लाऊँ...

you deserved it more than anyone....

इस हासिले-मुशायरा शेर के अलावा अपनी पसंद को तो मैंने पहले ही हासिले-मुशायरा का खिताब दे दिया था वो "पैर के निशां" वाला शेर...
और यकीनन सबसे अच्छा गिरह भी तुम्हारा भी था।

i am so happy for you sis!
god bless you!

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन पुनर्प्रस्तुति... अच्छी रचना के लिये साधुवाद..Wahwa...

abhivyakti said...

कंचन जी,
तरही मुशायरे में तो आपकी गजल अलग नजर आ ही रही थी,फिर आदरणीय प्राण साब ने आपके शेर को खिताब के लिए चुना तो,बहुत अच्छा लगा.पर आपके ब्लॉग पर पूरी गजल अलग और खूबसूरत नजर आ रही है.बार बार पढने पर गहरे अर्थ सामने आने लगते है.एक एक शब्द में गहरे भाव समाहित है.पढ़कर बहुत अच्छा लग रहा है...
पुनः बधाई स्वीकार करें..

प्रकाश 'पाखी'

raj said...

रोज आप आते हैं, रोज सोचते हैं हम,
आज आप समझेंगे, इस नज़र की खामोशी।khamoshi ki apni zuba hoti hai....boht khoobsurat ahsaaso se bhari rachna...

अल्पना वर्मा said...

na jane Kaise miss ho gayee itni achchee gazal!

Umda gazal hai aur Haasil-E-mushaira bhi behad umda hai!

badhaayee!

राकेश जैन said...

Di, Badhaai Ho !!!