Monday, August 30, 2010

तुम्हारी चैट





जी करता है

तुम्हारी चैट का प्रिंट आउट निकाल कर

सिरहाने रख लूँ,

और पुराने खतों की तरह पढ़ूँ

रोज सोते समय



34 comments:

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

रचना said...

waese print out ki jagah content ko cut copy paste karke sms kar do mobile par aur phir raat biraat kyaa jahaa chao wahaa padho
dear kanchan

वन्दना said...

vaah ye andaaz bhi badhiya hai.

कुश said...

खाली जी करता है एच नहीं करता..?

नीरज गोस्वामी said...

कंचन जी इस बेहतरीन रचना और कमाल के चित्र के लिए बधाई ...लेकिन असली बाज़ी मारी है कुश ने अपने कमेन्ट से...हंसी अभी तक नहीं थम रही...बहुत शैतान हो गया है बच्चा... नहीं ?

नीरज

गौतम राजरिशी said...

अकविता..यूं ही...

या फिर

यूं ही..अकविता...???

कुछ सूझ नहीं रहा कि क्या लिखूं। पहले तो ये रात-बिरात चैटियाना बंद करो नेट पर और समय का सदुपयोग करो कुछ क्रियेटिव राइटिंग के लिये। बहुत ढ़ील मिल रही है तुम्हें भाईयों से...

sunshine said...

Didi....a nice as u said "akavita".......alluring!

रंजना said...

चित्र और अ-कविता दोनों एक दुसरे की पूरक है...दोनों एक दुसरे को सार्थक किये दे रही हैं..

dimple said...

वो जो ख़त तूने मुहब्बत में लिखे थे मुझको..
बन गये आज वो साथी मेरी तन्हाई के...:-)

Kishore Choudhary said...

इस अकविता को दो पंक्तियों पर नहीं रोकना था.

Divya said...

beautiful thought .

zealzen.blogspot.com

"अर्श" said...
This comment has been removed by the author.
"अर्श" said...

सिर्फ देर की चैटिंग का ये असर है, जो तुम्हे इस तरह की क्रिएटिव लिखने को प्रेरित करता है तो मेरे तरफ से छूट है , मगर ....... वो अकड़ वाली बात आने मत देना ... :) :)

अर्श

ओशो रजनीश said...

अच्छा लिखा है ........
कुछ लिखा है, शायद आपको पसंद आये --
(क्या आप को पता है की आपका अगला जन्म कहा होगा ?)
http://oshotheone.blogspot.com

mridula pradhan said...

very good.

अभिषेक ओझा said...

जी करता है इसे चुरा कर किसी को भेज दूं ये कहते हुए कि मैंने लिखा है तुम्हारे लिए :)

Udan Tashtari said...

है तो शानदार...

Vivek Rastogi said...

सही है .... प्रिंटआऊट निकालकर...

गजब.. मोबाईल पर चैट खोलकर सिराहने रखकर भी सोया जा सकता है, नहीं.... आधुनिक सोच से...

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प.....जैसे किसी मेसेज को संभालना इन्बोक्स में कई दिनों तक

Meenu Khare said...

सुंदर रचना.

रावेंद्रकुमार रवि said...

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अरे, वाह! बहुत सुंदर!
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neera said...

चेट ही नहीं यह फोटो भी सिहराने रखने लायक है... :-)

डा० अमर कुमार said...


चैट-चपाटे का इतिहास क्या इतना प्रभावी ट्राँक्युलाइज़र होता है । मालूम न था, अपने कुछ करीबियों को ट्राई करने को बोलता हूँ ( सुन रहे हो.. कुश ? )

रविकांत पाण्डेय said...

अच्छा है... पर खत की तो बात ही कुछ और है..सुना है खत में लोग कलेजा भी निकाल के रख देते हैं...व्यक्तिगत तौर पर मुझे चैट फ़ास्ट-फ़ूड जैसा लगता है जबकि खत देसी भोजन जैसा...शेष अपनी-अपनी रूचि...ऊपर छायाचित्र भी सुंदर लगा।

sidheshwer said...

ओह !
सीधी सादी बात
सच्ची संवेदना का स्पर्श!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज कल खतों का सिलसिला तो खत्म ही हो गया ...अब चैट से ही काम चलाओ ...मेल नहीं आते ?
वो थोड़े लंबे हो सकते हैं ...

Yashwant Mehta "Yash" said...

अक्सर सोचा करता हूँ की कविता में इन शब्दों का प्रयोग कैसे किया जा सकता हैं
आज एक उत्तम कविता पढ़ भी ली!!! बहुत अच्छी लगी!!

महाशक्ति said...

बढिया

Tripat "Prerna" said...

Ah! bahut sunder :)

http://liberalflorence.blogspot.com/

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

वैसे आजकल थ्रीडी प्रिंटर भी आ रहे हैं.. हो सकता है कुछ दिन बाद आप ’उन्हीं’ का प्रिंट निकाल लें :-)

अंकित "सफ़र" said...

पुराने ज़माने में जो ख़त चलते थे वो आजकल चैट हो गए हैं, मगर सिरहाने रखने का एहसास तो अब तक वैसा का वैसा ही है.

Manish said...

जब तक कोई जी न ले... बता नही सकता जिन्दगी का स्वाद!

ये जो नया जरिया बना है... बहुत ही खूबसूरत है.

कई बार पढ़ा है स्क्रीन पर ही... ः) ः)

मीनाक्षी said...

प्रिय कंचन... खुश रहो... यूँ ही हम भी इधर आ पहुँचे और अकविता पढ़ कर मुस्कुरा दिए...अतीत की कुछ यादें ताज़ा हो गईं...

चैट said...

चैट करें - the best one.