नेचरिका जी की टिप्पणी के जवाब में जो टिप्पणी लिखी वो इतनी लंबी थी कि टिप्पणी बॉक्स में आई ही नही। अतः यह पोस्ट लिखनी पड़ गई। श्रीमान नेचरिका कृपया ध्यान दें।
श्रीमान नेचरिका जी! सादर अभिवादन ! आप मेरे ब्लॉग पर आये। श्री राजेंद्र यादव जी की आत्मकथा मुड़ मुड़ के देखता हूँ पढ़ने के बाद लिखे गये मेरे विचारो को पढ़ा और पढ़ने के बाद अपने विचार व्यक्त किये। ये सबका मौलिक अधिकार है और आप अपने विचार बहुत अच्छे तरीके से रख सकने में सक्षम भी हैं। आप के अन्य रचनाएं भी पढ़ीं मैने। आप बहुत अच्छा लिखते हैं...!
आप ने जो भी लिखा था उसे पढ़ कर मैं यूँ ही निकल जाने वाली थी, मगर....! एक चीज जिसने मुझे टिप्पणी लिखने पर विवश किया, वो है आपका शीर्षक। मेरा लेख पढ़ने के बाद यदि आपके मन में कहीं भी ये आया कि ये लेख मैने एक औरत की दृष्टि से लिखा है तो कृपया इसे पुनः पढ़ें। ऐसा कोई भी संकेत मैने अपनी पोस्ट में नही दिया है कि यह लेख मैने एक औरत कि निगाह से लिखा है। इस तरह के कामों में मै कभी भी शरीक नही होती। मैंने जो भी लिखा एक पाठक की हैसियत से लिखा और जब कभी भी लिखती हूँ तो एक रचनाकार की हैसियत से लिखती हूँ। न कि औरत या मर्द। जिसने भी अपने को इन श्रेणियों में बाँधा वो कैसे अच्छा रचनाकार हो सकता है ? रचनाकार होने के लिये तो सभी का दर्द समझना पड़ेगा। वो चाहे औरत हो, मर्द हो, दलित हो, सवर्ण हो, भारतीय हो, विदेशी हो बच्चा हो बूढ़ा हो। तो पहली बात तो आपसे आग्रह है कि ये औरत की निगाह में मर्द जैसा शीर्षक हटा लें। मेरा पूर्ण विरोध है इस से।
दूसरी बात कि जब मैं मुड़ मुड़ के देखता हूँ की बात कर रही हूँ तब सिर्फ मुड़ मुड़ के देखता हूँ की बात कर रही हूँ। उसमें सारा आकाश. शह और मात, आदमी की निगाह में औरत जैसी किसी भी रचना की चर्चा नही है। चर्चा उस आत्मकथ्यांश की है जो मुड़ मुड़ के देखता हूँ में किया गया है। और अगर राजेंद्र यादव जी की कुंठा की बात की गई है तो उसी पुस्तक के आधार पर ना कि मन्नू भंडारी के आक्षेप के पूर्वाग्रह पर। मैं जब एक कहानी ये भी की चर्चा करूँगी तब उस की बात करूँगी अभी मैने एक भी शब्द कहीं और से नही लिये हैं। ये राजेंन्द्र यादव जी के आत्मकथ्यांश में बार बार प्रयोग किया गया शब्द है कि वे कुंठा के शिकार हैं। उस कुंठा का दोषी उन्होने अपनी अपंगता को बताया। उन्होने कहा कि एक के बाद दूसरी स्त्री से संपर्क में आने के पीछे कारण ये था कि कहीं वें अपने अधूरेपन को हराना चाहते थे। बार बार अपनी पूर्णता की परीक्षा लेना चहाते थे। क्या शारीरिक स्तर पर इस तरह के प्रयोग ही आपको पूर्ण बनाते हैं। ये कुंठा नही तो और क्या है? फिर कितनी बार? कितनी बार अपनी परीक्षा लेंगे आप ? सही कहा आपने "कुंठा से निकलने का सर्वोत्तम उपाय है स्वयं को रचनात्मक कार्यों में लगाना ....और इस मामले में आप राजेंद्र यादव के सामने किसे खड़ा करेंगी...?" बिलकुल सही..! यही तो मैं कहना चाहती हूँ कि इतना सम्मान, इतना स्नेह, इतनी रचनाएं, इतनी रचनात्मकता जिसमें दुनिया की कुंठाएं जला कर खाक की जा सकती हैं, उसके बावजूद खुद को कुंठित बताना और उस कुंठा से निकलने का उपाय स्त्री संसर्ग बताना। कैसे सही माना जा सकता है। फिर एक बात और मैने राजेंद्र जी पर लिखने के पहले कम से कम तीन माह का समय लिया और जब लिखने चली तो लिखा कि अंत में अपनी तरफ से ये कहूँगी कि कहना तो बहुत कुछ चाह रही थी मैं। मगर फिर ये लगता है कि किसी की कहानी पर कुछ कहो तो कहो किसी की जिंदगी पर क्या कहना? शायद सच ही कह रहे हो राजेंद्र जी कि " जो कुछ उन्होने किया, उसके सिवा वे और कुछ कर ही नही सकते थे। रफ़ हो या फेयर उनकी जिंदगी यही होती जो है...!" और इसके बाद जब मैने ये लिखा कि उन्होने इसका दोष अपनी कुंठा को दिया। वो कुंठा जो उन्होने बार बार बताया कि उनकी अपंगता के कारण आयी..यहाँ तो शायद मै बोलने का अधिकार रखती ही हूँ....!" तो आपको बता दूँ श्रीमान कि जितनी देर मैने यह पुस्तक पढ़ी मैं बार बार दुःखी हुई। इस लिये क्योंकि जिस आंशिक अक्षमता के कारण राजेन्द्र जी स्वयं को बार बार कुंठित बताते हैं, वो मैं पूर्णरूप से जी रही हूँ। आधे पैर की वो समस्या जिसने उनके दैनिक जीवन के किसी भी कार्य (बकौल मुड़ मुड़ के देखता हूँ सयकिल चलाना, यात्राएं करना इत्यादि) को बाधित नही किया है, उसे मैं कमर से ले कर दोनो पैर और एक हाथ में झेल रही हूँ। तो क्या मैं अधिकारिणी हो जाती हूँ अपने स्वाभावगत दोषों का आक्षेप इस अक्षमता को लगाने की। कितने ही काम रोज करने को रह जाते हैं इस कारण, मगर जब जब मैं स्वयं को देखती हू तो अपने परिवार और कुछ मित्रों को धन्यवाद देती हूँ, जिनके कारण कोई शिकायत नही है जीवन से। और इसीलिये मैने कहा कि यहाँ तो शायद मै बोलने का अधिकार रखती ही हूँ क्योंकि जो इस दर्द में शामिल ना हो उसे बोलने का अधिकार नही है मगर मैं उसे कई गुना झेल रही हूँ तो कुछ अधिकार तो रखती ही हूँ।
एक बार फिर कहूँगी कि आपके विचार आपके अपने हैं मैं उनका आदर करती हूँ, मगर शीर्षक का आधार चूँकि आपने मेरे विचारों को रखा है अतः इसे बदल दें। मैंने औरत की नही पाठक की निगाह से लिखा है ये लेख।
11 comments:
आपकी कलम से उतरे शब्द दिल छू लेते हैं
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चाँद, बादल और शाम
बहुत संतुलित जबाब. सहमत : पाठक पाठक होता है न कि स्त्री, पुरुष!!
Uadan tashtari se mai bhi sahmat hun......
औरत कोई कमतर संबोधन नहीं है मदाम !अगर आप मुझे आदमी कहें तो मैं केवल यही कहूँगा आप मेरा नाम भी ले सकती थी।
(मैं आपकी आज्ञा के सम्मान में शीर्षक में बदलाव कर रहा हूँ )
पाठकों से अनुरोध है की कृपया naturica पर 'औरत की निगाह में राजेंद्र यादव' पोस्ट का शीर्षक सुधारोपरांत
/राजेंद्र यादव का 'एसिड टेस्ट'/ पढ़ें।
बात मान सम्मान की है ही नही श्रीमान...! बात ये है कि जो है बात है ही नही उसका श्रेय क्यों लिया जाये..! शीर्षक बदलने की अधिसूचना जारी करने का धन्यवाद...!
आह!
स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, और जाने क्या-क्या विमर्श के नाम पर साहित्य को धंधा बना देने महाप्रभुओं को कोई ये आलेख तो पढ़ने को कहे...!!!!
तुम्हारे इस पोस्ट को ठीक से पढ़ लेने के पश्चात{ठीक से मतलब चौथी बार पढ़ रहा हूँ} अब जाकर इसके तुरत लगाने का औचित्य समझ में आ रहा है।...तो पिछली पोस्ट पर की गयी अपनी दूसरी टिप्पणी के शब्द वापस लेता हूँ, कंचन।
hey! एक बात और, ये अपरोक्ष रूप से मेरी टिप्पणी {सारा आकाश वाली} का भी तो प्रत्युत्तर नहीं? :-)
i am proud of you, sis!
प्रिय कँचन,
ये भी पढ लिया और अब आगे की टीप्पणियाँ पढने जा रही हूँ :)
राजेन्द्र यादव जी की पुस्तक
मैँने पढी नहीँ
किँतु
आपकी विस्तृत व सँयत समीक्षा ने
मानोँ पुस्तक का परिचय
करवा दिया है -
बहुत अच्छा प्रयास रहा -
बधाई !
स्नेह,
- लावण्या
बहुत ही संयत और सुसम्मत प्रतिउत्तर .
समीर जी की टिप्पणी मेरी भी .
विकलांगता कुंठित जरूर करती है पर उस कुंठा का परिणाम , अवांछित बना दे ?
शायद उनकी कुंठा का परिणाम साहित्यिक ' तैमूर लंग ' बन कर फूटा है.
कंचन जी आपको जन्नदिन की लाखों शुभकामनाएं
वीनस केसरी
ठीक १२ .०१ बजे :)
है न परफेक्ट टाइमिंग :)
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