Monday, October 22, 2007

तुम मेरा नाम क्यो नही लेती?



कार्यालय में जब हिंदी दिवस मनाया जा रहा था तब कुछ भी लिखने पढ़ने का मौका नही मिल
रहा था कार्यालय में हिंदी दिवस जो मनाया जा रहा हो तो हम हिंदी पद वालों के लिये तो सहालग का समय ही चल रहा होता है और कुछ समय यदि मिल भी जाये तो सुबीर जी के नोट्स पढ़ लिये जाते
थे।

ऐसे में एक दिन जब मै भोजनावकाश पर गई तो मेरी एक सखी ने मुझे एक गज़ल दिखाई, जो कि साहित्यकार रामलाल की साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित उर्दू कहानी संग्रह की सीढ़ियों की धूप में लिखी हुई थी, आत्मकथात्मक तरीके से लिखी गई इस कहानी के विषय में मैं ये नही समझ पा रही हूँ कि ये कथा सत्य पर आधारित है अथवा लिखने का अलग अंदाज़ है,लेकिन उस कहानी में शायर का नाम क़लीम हैदर बताया गया है, श्रएर मुझे इतने पसंद आये कि तुरंत ही अपने ब्लॉग मित्रों से बाँटने की भावना बलवती हो गई। गज़ल का मकता तो खेर कई शायरों ने अपने अपने अंदाज़ में कई बार कहा है लेकिन मुझे पहला और आखिरी मिसरा बहुत पसंद आया(मास्साब! कुछ गलती होगी तो अकेले में डाँट लीजियेगा) गज़ल कुछ इस तरह है-

अब तो मामूल है अपना, तनहाई के गाँव में,
चाँद से बैठे बातें करना, प्यार की ठंडी छाँव में।

पाप तो हर सूरत मुमकिन था, जिस्मों में यूँ कुरबत थी,
जाने कौन सी ताकत हमको, बाँध गई सीमाओं में।

जब से उसको प्यार हुआ है, ज्योतिषियों से कहती है,
देखो क्या अंजाम लिखा है, हाथों की रेखाओं में।

धरती माँ की लाज बचाने, जंग में भेजे बेटों को,
जानेकितना सब्र है हैदर, हिंदुस्तानी माँओं में।

और उसी कहानी में आगे जा कर एक और शेर था,जिसने मन को छुआ... वो कुछ इस तरह था-

शरम, दहशत, झिझक परेशानी,
ज़ब्त से काम क्यों नही लेती?
आप, वह, तुम, मगर यह सब क्या है?
तुम मेरा नाम क्यों नही लेती?

तो ये थी अपनों से अपनी बात! चलती हूँ, कार्यालय बंद होने वाला है और हम ग़रीब लोग तो सरकारी कंप्यूटर पर ही लेखकीय कार्य करते है।

खुदा हाफिज़।

9 comments:

हरिराम said...

अच्छी रोचक सामग्री बाँटने के लिए धन्यवाद.

parul k said...

शरम, दहशत, झिझक परेशानी,
ज़ब्त से काम क्यों नही लेती?
आप, वह, तुम, मगर यह सब क्या है?
तुम मेरा नाम क्यों नही लेती?

वाह कंचन जी……thx fr sharing

Pratik said...

बहुत खूब... उम्दा ग़ज़ल बांटने के लिए शुक्रिया।

Manish said...

शुक्रिया ग़ज़ल के लिए।
वैसे बड़ी सुंदर तसवीरें ढूंढ लेते हैं गरीब लोग...

Udan Tashtari said...

मास्साब की डांट मिली कि तारीफ??

सही है. सब लोग सबके सामने डांट खायें और आप कह रही है अकेले में डांटे, हा हा!!!

उम्दा शेर:

जब से उसको प्यार हुआ है, ज्योतिषियों से कहती है,
देखो क्या अंजाम लिखा है, हाथों की रेखाओं में।


--मतले की पहली लाईन कुछ साफ समझ नहीं आई.

बाकी बढ़िया है, बधाई.

Udan Tashtari said...

मेरा कहने का तात्पर्य था ’मामूल’ का अर्थ बता दें. :)

हिन्दी टुडे said...

उम्दा रचना लगी। दिल को छू गयी।

कंचन सिंह चौहान said...

हरिराम जी, पारुल जी, प्रतीक जी एवं अतुल जी धन्यवाद!

मनीष जी सुना है कोई भिखारी मरा तो उसके घर से लाखों का माल बरामद हुआ, आजकल के गरीब बड़े अमीर हो गये हैं, मेंटीनेंस चार्ज नही देने पड़ते ना! तस्वीरें पसंद करने का शुक्रिया!

समीर जी मामूल का मतलब routine होता है और मास्साब डाँट लें तब तक तो ठीक ही है, वो तो गुस्सा हो कर क्लास ही लेना छोड़ देते हैं, समस्या तो तब आती है।

रवीन्द्र रंजन said...

कुछ तकनीकी समस्याओं के कारण कुछ दिनों तक ब्लाग की दुनिया से वंचित रहा। आज मौका मिला तो देखा कंचन जी ने बड़े खूबसूरत शे र प्रस्तुत किये हैं। यूं तो ये सभी चुनिंदा और बेहतरीन हैं लेकिन मुझे यह विशेष पसंद आया--
शरम, दहशत, झिझक परेशानी,
ज़ब्त से काम क्यों नही लेती?
आप, वह, तुम, मगर यह सब क्या है?
तुम मेरा नाम क्यों नही लेती?

यह भी पता चल गया कि कंचन जी दफ्तर में बैठकर ब्लागिंग में मशगूल रहती हैं। यह तो बेहद संगीन गुनाह है। है न........?